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Article 35A


Article 35A !! इसमें ऐसा क्या है जिसके बल पर कश्मीरी भारत का खाते हैं, संविधान के अनुरूप सारी सुविधायें भारत से लेते हैं, मुख्य मंत्री भी बनते हैं किंतु सुनते हैं पाकिस्तान का !! भारत मुर्दाबाद चिल्लाते हैं !! 370 नहीं अनुच्छेद 35A है, कश्मीर समस्या की असली जड़ !! संविधान की किताबों से है ‘नदारद’ है अनुच्छेद 35A – मजे की बात ये है की यदि आप संविधान की किसी भी प्रमाणिक पुस्तक को पढेंगे तो आपको यह धारा शायद कहीं दिखायी न दे। आपको अनुच्छेद 35(a) अवश्य पढ़ने को मिलेगा पर 35A ढूंढने के लिए आपको संविधान की (एपेंडिक्स) पर नजर डालनी होगी। यदि इसे संवैधानिक ‘चोरी’ कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)के करीबी माने जाने वाले थिंक टैंक संगठन जम्मू और कश्मीर स्टडी सेंटर(JKSC)अनुच्छेद 35A के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। संस्थान के निदेशक श्री आशुतोष भटनागर के मुताबिक़ यह आर्टिकल संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है,जिसमें संसद भी संशोधन नहीं कर सकती है। इसलिए यह अनुच्छेद पूर्णतः असंवैधानिक है इसलिए सुप्रीम कोर्ट को स्वतः इस मामले पर ‘संज्ञान’ लेना चाहिये। आर्टिकल 370 से पहले अनुच्छेद 35A को हटाया जाना बेहद जरुरी है। भारतीय संविधान की बहु ‘विवादास्पद’ धारा 370 के निरस्तीकरण की माँगे संविधान निर्माण के शुरुआती वर्षों से ही उठती रही है। अनुच्छेद 370 वास्तव में एक प्रक्रिया है और इसे इस आशा से पारित कराया गया कि एक अल्पकालीन व्यवस्था के रूप में स्वतः ही भविष्य में समाप्त हो जाएगी। जम्मू-कश्मीर में छिड़े संग्राम के कारण संविधान सभा के अभाव में राज्य में भारतीय संविधान को लागू करने की तात्कालिक एवं अंतरिम व्यवस्था बनायी गयी। स्वयं संविधान में इस व्यवस्था को ‘अस्थाई उपबंध’ कहा गया है। इसका जम्मू-कश्मीर राज्य से किसी विशिष्ठ व्यवहार एवं विशेष दर्जे का कोई भी लेना-देना नही था। ऐसे में 370 को आखिर भारतीय साम्राज्य की अखंडता पर ग्रहण के रूप में क्यों देखा जाने लगा ? बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं कि धारा 370 को समाप्त कर देने कश्मीर की लगभग सारी समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी। किन्तु यह अधूरा सत्य है व्यवहार में धारा 370 इतना घातक नहीं जितना की 35A है। जी हाँ यही है कश्मीर की वो सबसे दुखती रग जिसकी सततता बनाये रखने की जिद को लेकर कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी पीडीपी सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाँथ मिलाने में कतरा रही थी। आज तो मुख्यमंत्री खुलकर इसके समर्थन में आ गई है। संविधान की स्पष्ट अवमानना है 35A – धारा 370 के कारण हो रही अधिकांश विसंगतियों की जड़ अनुच्छेद 35A ही बना। अनुच्छेद 370 को सशक्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन राष्ट्रपति ने 14 मई 1954 को बिना किसी संसदीय कार्यवाही के एक संवैधानिक आदेश निकाला,जिसमें उन्होने एक नये अनुच्छेद 35A को भारत के संविधान में जोड़ दिया। जबकी यह शक्ति अनुच्छेद 368 के अंतर्गत केवल संसद को प्राप्त थी। बगैर किसी संसदीय कार्यवाही के अनुच्छेद 370 में एक नया अनुच्छेद जोड़ कर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का सरासर उल्लंघन किया गया। इस अनुच्छेद में कहा गया कि “जम्मू-कश्मीर राज्य की विधान सभा स्थायी निवासी की परिभाषा निश्चित कर उनके विशेष अधिकार सुनिश्चित करे तथा शेष लोगों के नागरिक अधिकारों को सीमित करे।” 35A की आड़ में संविधान में वर्णित मूल अधिकारों की अवमानना – इस विशेष अनुच्छेद के नियमों के अनुसार जम्मू और कश्मीर में किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को स्थाई या अस्थाई मानना जम्मू-कश्मीर सरकार की इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर हो गया। इस संवैधानिक भूल का जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक दलों ने जम कर दुरूपयोग किया। परिणाम आपके सामने है भारतीय संविधान की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को मुस्लिम तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। इस अनुच्छेद के अनुसार जो जम्मू कश्मीर राज्य का रहने वाला नहीं है वह वहाँ पर ज़मीन नही खरीद सकता, वह वहाँ पर रोजगार नही कर सकता और वह वहाँ पर निवेश नही कर सकता। अब इसकी आड़ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,19 एवं 21 में भारतीय नागरिकों को समानता और कहीं भी बसने के जो अधिकार दिए, वह प्रतिबंधित कर दिए गए। इस प्रकार एक ही भारत के नागरिकों को इस अनुच्छेद 35A ने बाँट दिया। दलित ‘हिन्दू’ हैं नरकीय जीवन जीने को मजबूर- अनुच्छेद 35A की सबसे ज्यादा मार,1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए 20 लाख से ज्यादा प्रवासी ‘हिन्दू’ झेल रहे हैं। इन प्रवासी हिन्दुओं में ज्यादातर आबादी ‘दलितों’ की थी। पिछले 70 वर्षों से कश्मीर में बसे होने के बावजूद उन्हे वहाँ की ‘नागरिकता’ नहीं मिली है। उन्हें राज्य में ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं है,उनके बच्चे को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के दरवाजे उनके लिए अवरुद्ध हैं। वे लोकसभा चुनावों में तो वोटिंग कर सकते हैं,परन्तु विधान सभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में वे न तो वोट डाल सकते हैं न ही अपनी उम्मीदवारी रख सकते हैं। सीधे तौर पर कहें तो ये भारत के नागरिक तो हैं पर जम्मू और कश्मीर के नहीं। आज इतने सालों बाद भी ये लोग शरणार्थियों सरीखा जीवन जीने को मजबूर हैं। (अधिकांश ने इस विडम्बना से उबरने के लिये इस्लाम अपना लिया है) यह अनुच्छेद केवल कुछ चुनिन्दा लोगों को 370 के तहत ‘विशेषाधिकार’ प्रदान करने में मदद करता है,जबकि शेष को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देता है। बहुत अफ़सोस की बात है की रोहित वेमुला एवं दलितों के मुद्दे में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी तथाकथित लिबरल वर्ग ने कभी भी उसी कश्मीर के वंचित ‘दलित’ तबके के प्रति हुए संवैधानिक अन्याय के खिलाफ अपनी चोंच खोलने की तो छोडिये,संवेदना व्यक्त करने की भी जहमत नहीं फ़रमायी। ================== http://hindutva.info/35a-is-real-prob lem-and-not-370/ ================== सदा सर्वदा सुमंगल., हर हर महादेव,, वंदेमातरम्,, जय सिया भवानी,,, जय श्री राम,,

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