Posted in गंगा माँ

चीनी भाषा में माँ को माँ कहते हैं । अंग्रेजों के चाकरों की किताबों ने मुझे सिखाया कि चीन की सबसे महत्वपूर्ण नदी का नाम ह्वांग-हो है । जब इंटरनेट के माध्यम से मैंने उसका वास्तविक उच्चारण पता किया तो “ग्वङ्गो” निकला, अर्थात “गङ्गा” का अपभ्रंश ! अफ्रीका में विषुवत पर सबसे ऊंचे पर्वत को प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में मेरु कहा गया है (जिसका एक छोड़ उत्तर ध्रुव में सुमेरु तथा दक्षिण ध्रुव में कुमेरु कहा जाता था, बीच में विषुवत पर मेरु था)। अंग्रेजों ने इसका नाम बदलकर माउण्ट केन्या कर दिया, यद्यपि “किनयन-गिरी” कुछ ही दक्षिण तंजानिआ में है । माउण्ट केन्या की तलहटी में आज भी मेरु नाम का नगर है जो मेरु प्रान्त की राजधानी है और वहाँ की भाषा का नाम भी मेरु है । आजकल उन्हें ईसाई बनाने में मिशनरियाँ बहुत सक्रिय हैं । किन्तु संस्कृत का अफ्रीका से चीन तक के सम्बन्धों को छुपाकर यूरोप वाले हमें सिखाते हैं कि आर्य पूर्वी यूरोप और द्रविड़ भूमधसागरीय तटवर्ती क्षेत्रों से आये, ऑस्ट्रेलॉयड और नेग्रिटो अफ्रीका से आये, तथा मंगोलॉयड चीन-मंगोलिया से आये, जैसे भारत मनुष्य की उत्पत्ति के लायक था ही नहीं । सच्चाई उल्टी है : भारत संसार का एकमात्र देश है जहां संसार की सभी नस्लें हैं, दूसरे किसी देश में सारी नस्लें क्यों नहीं गयी ? माउण्ट एवेरेस्ट से बहुत ऊंचा है मेरु, बशर्ते भूकेन्द्र से दूरी को पैमाना माने, न कि काल्पनिक समुद्रतल से (प्रमाण नीचे है)। भूव्यास हर जगह एक समान नहीं है, अतः समुद्रतल एक जैसा नहीं है । पुराणकारों का गणित अंग्रेजों से बेहतर था । ग्रीक लोगों ने ईसा से तीन सौ वर्ष पहले जाना कि पृथ्वी गोल है, जबकि “भूगोल” शब्द उससे बहुत पुराना है और प्राचीन ग्रन्थों में है ।

एक उदाहरण प्रस्तुत है :-

महाभारत में वेद व्यास जी ने लिखा है कि जब जरासन्ध ने मथुरा पर अपनी (तन्त्र द्वारा सिद्ध) गदा फेंकी तो वह मथुरा के बगल में मगध की राजधानी गिरिव्रज से 99  योजन दूर जाकर गिरी । परम्परागत पञ्चाङ्गकारों द्वारा सर्वमान्य और वराहमिहिर द्वारा सर्वोत्तम माने गए सूर्यसिद्धान्त के अनुसार भूव्यास 1600 योजन का है । गूगल अर्थ द्वारा गिरिव्रज और मथुरा के अक्षांशों का औसत निकालकर फल का कोज्या (कोसाइन) ज्ञात करें और उसे विषुवतीय अर्धव्यास से गुणित करें, इष्टस्थानीय भू-व्यासार्ध प्राप्त होगा । इसे मथुरा और गिरिव्रज के रेखांशों (Longitudes) के अन्तर से गुणित करें, फल 98.54 योजन मिलेगा, जो पूर्णांक में 99  योजन है । इसका अर्थ यह है कि व्यास जी ने पृथ्वी को गोल मानकर उपरोक्त गणित किया था । गौतम बुद्ध के काल में मगध की राजधानी राजगीर थी, गिरिव्रज तो महाभारत के मूल कथानक के काल की प्रागैतिहासिक राजधानी थी । ऐतिहासिक युग में योजन का मान बढ़ गया था, विभिन्न ऐतिहासिक ग्रन्थों में भूपरिधि सूर्यसिद्धान्तीय मान 5026.5 योजन के स्थान पर केवल 3200 योजन बतायी गयी । अतः स्पष्ट है कि वेद व्यास जी का गणित पूर्णतया शुद्ध था और अतिप्राचीन था । अब बतलाएं, क्या पृथ्वी के गोल होने और पृथ्वी के व्यास की खोज ग्रीक लोगों ने ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में की ?

माउण्ट एवरेस्ट का अक्षांश है 27:59 । विषुवतीय एवं ध्रुवीय भूव्यासार्धों में अन्तर है 21772 मीटर , अतः माउण्ट एवरेस्ट के अक्षांश पर भूव्यासार्ध का मान विषुवत पर स्थित मेरु पर्वत के पास के भूव्यासार्ध से 6769 मीटर कम है, जबकि माउण्ट एवरेस्ट की समुद्रतलीय ऊँचाई मेरु की समुद्रतलीय ऊँचाई से 3649 मीटर अधिक है । फलस्वरूप भूकेन्द्र से मेरु-शिखर की ऊँचाई भूकेन्द्र से एवरेस्ट-शिखर की ऊँचाई की तुलना में 3120 मीटर अधिक है , दोनों में कोई तुलना ही नहीं है ! पृथ्वी के महाद्वीपीय भार का विषुवतीय केन्द्र पर्वतराज महामेरु ही है जो पृथ्वी के घूर्णन पर जायरोस्कोपिक नियन्त्रण रखता है और सम्पात-पुरस्सरण (precession of equinoxes) का भी केन्द्र है (न्यूटन ने प्रिन्सिपिया में विषुवतीय अफ्रीका के पर्वतीय उभार को पृथ्वी के घूर्णन का जायरोस्कोपिक नियन्त्रक बताया था) । पुराणकारों का गणित अंग्रेजों से बेहतर था न ! फिर भी अंग्रेजों ने मेरु पर्वत नाम बदलकर माउण्ट केन्या कर दिया और पौराणिक गणित को कपोरकल्पित घोषित कर दिया ! मेरुपर्वत की सबसे बड़ी विशेषता है कि चारों ओर के धरातल की तुलना में यदि ऊँचाई मापी जाय तो यह संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है, सपाट धरातल पर पाँच किलोमीटर ऊँचा पिरामिड है जिसकी नक़ल में मिश्र के पिरामिड बनते थे और दक्षिण सूडान में प्रागैतिहासिक मेरु साम्राज्य था (माउण्ट एवरेस्ट आसपास के धरातल से केवल 300 मीटर ऊँचा है)।

ग्रीक लोगों ने प्राचीन सभ्यताओं के सारे ज्ञान का जो थोड़ा सा हिस्सा समझा उसे अपने नाम से लिखकर सिकन्दरिया के विशाल पुस्तकालय में आग लगा दी और विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया । सिकन्दर तो इतना क्रूर था कि अपने बाप फिलिप को पटककर चाकू भिरा दिया था, गुरुभाई कैलीस्थीनीज (प्राचीन ग्रीक में उच्चारण “कालीस्थानी”, ग्रीक में अन्तिम “स” का उच्चारण नहीं होता था) को सूली पर टाँग दिया, और भारत में दिगम्बर साधु महात्मा दाण्डायण को जबरन पकड़ लाने के लिए सिपाहियों को भेजा लेकिन सिपाहियों ने हिम्मत नहीं की तब स्वयं गया, मेगास्थनीज (“महास्थानी”) ने दाण्डायण को “दमदमी” लिखा !

हमारे इतिहासकार भी इन बातों पर ध्यान नहीं देते, उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों में ज्ञान की कोई बात नहीं दिखती, जबकि भारतीय संस्कृति इन्हीं ग्रन्थों पर आश्रित रही है ; वेद कितने लोग पढ़कर अर्थ लगा सकते हैं ? रामायण, महाभारत और पुराणों के माध्यम से ही वैदिक धर्म और संस्कृति बची हुई है जिसे मिटाने में हमारे “सेक्युलर” बुद्धिजीवी रात-दिन परिश्रम करते रहते हैं । एक भी “सेक्युलर” बुद्धिजीवी को संस्कृत भाषा का भी ज्ञान नहीं है, उनके विदेशी आका जो लिखते हैं उसे ये लोग तोते की तरह दुहराते रहते हैं । कोई बहस करे तो उसे इतिहास का भगवाकरण कहकर चिल्ल-पों मचाते हैं, शराफत से शास्त्रार्थ भी नहीं करते । अतः इन बदमाशों का एक ही इलाज है : असहिष्णुता पूर्वक इनके सारे पद, सारी उपाधियाँ और सारे पुरस्कार छीन लिए जाएँ । असत्य और अनाचार को सहना अधर्म है, सहिष्णुता नहीं । सहिष्णुता है सत्य की ओर जाने वाले अपने मार्ग से भिन्न दूसरे सत्य मार्गों को सहन करना , सभी सच्चे पन्थों का सर्वपन्थ-समभाव की भावना से आदर करते हुए अपने पन्थ पर चलना ।
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विनय झा

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