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रामायण एक काल्पनिक कथा या वास्ताविकता ?


रामायण एक काल्पनिक कथा या वास्ताविकता ?

कई सहस्त्र वर्षों से भारतीय समाज रामायण को बड़े

ही श्रद्धाभाव से मानता और सुनता चला आया है ।

इस समय मुख्य रूप से दो ग्रंथ प्रचलित हैं वाल्मिकी

मुनि कृत रामायण और तुलसीदास कृत

रामचरितमानस, रामायण भी कई प्रकार की

मिलती हैं जिनकी कथाओं में थोड़ा थोड़ा भेद

मिलता है । परंतु मुख्य रूप से रामचरितमानस का

प्रभाव इस समय मानव समाज पर अधिक है । ऐसा

इसलिए क्योंकि तुलसीदास ने वालामिकी

रामायण के वास्ताविक श्ब्दों के अर्थ न पकड़कर

उनकी सर्वथा उपेक्षा ही की और कई मनघड़ंत

चमत्कारों और काल्पिनक बातों को रामायण के

पात्रों से जोड़कर इसे अविश्वसनीय बना दिया है ।

परिणाम ये हुआ कि लोग रामायण को मात्र तीर,

भालों, बर्छों से लड़ा गया एक जंगली लोगों के युद्ध

से अधिक और कुछ नहीं मानते । और जो हिन्दू समाज

रामायण का पाठ बड़े श्रद्धाभाव से सुनते हैं उनके

लिए भी राम मात्र पाप मुक्ति और पूजा पाठ करके

मूर्तीयों पर फूल माला फेरने तक ही सीमित हैं , और

वामपंथी, नास्तिक, ईसाई, मुसलमान आदि तो

रामायण को इन्हीं ऊटपटांग बातों के कारण हेय

दृष्टि से देखकर तिरस्कार तक करते हैं । चमत्कारों और

अतार्किक विज्ञानविरुद्ध प्रसंगों को आधार

बनाकर तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखकर राम

का महत्व बढ़ाने के बजाए घटा अवश्य दिया है ।

जैसा कि कहते हैं कि यदि हमें किसी परिवार की

पीढ़ीयों के इतिहास का पता लगाना हो तो हमें

उस परिवर के सबसे वृद्ध व्यक्ति से वो इतिहास पूछना

पड़ेगा न कि उस परिवार के पाँच वर्षीय बालक से ।

ठीक वैसे ही राम चरित्र के वास्ताविक रूप को

जानने हेतु हमें राम युग के वाल्मिकी मुनि की

रामायण का आश्रय लेना होगा न कि मात्र ६००

वर्ष पूर्व तुलसीकृत रामचरितमानस के ।

जबतक रामायण का वह विज्ञानसम्मत और

तर्कसम्मत स्वरूप जनता के सामने प्रस्तुत नहीं किया

जायेगा तबतक लोग इसे केवल एक भक्तिग्रंथ मानकर

अकर्मण्य ही बने रहेंगे । हमारे कथावचकों ने भी

श्रीराम जी के स्वरूप को इतना विकृत करके अत्यंत

क्षमाशील और शत्रुओं को अभयदान देने वाले एक

मोम के ढेले जैसा बनाकर प्रस्तुत किया है । जब्की

रामायण त्रेतायुग के महायुद्ध का एक अद्भुत

इतिहास है जिसके आधार पर लोगों का युद्ध के

कर्तव्य, राष्ट्रप्रेम, दृढ़ता, राजनीति, शत्रुदमन आदि

शिक्षाओं से रक्त गर्म होना चाहिए था और

श्रीराम एक महाबली प्रखर योद्धा थे । बजाए इसके

राम, लक्षमण और सीता जी की मूर्तीयाँ स्थापित

करके उनकी फूल माला करके पापमुक्ति, पैसा

कमाना ही प्रयोजन बनकर रह गया और रामायण

का वह विशुद्ध स्वरूप जनता के समझ में न आ पाया ।

रामायण की घटनाओं का तार्किक वर्णन प्रस्तुत

करने पर ही वास्ताविक इतिहास पता लग सकता है

। जैसी रामायण तुलसी की मान्यताओं के आधार वह

वास्ताविक रामायण का २०% भी नहीं है ।

इसी कारण हम यहाँ रामायण की कुछ घटनाओं का

तार्किक और विज्ञानसम्मत पक्ष यहाँ प्रस्तुत करेंगे

जैसा कि वाल्मिकी मुनि के मन्तव्य के आधार पर है ।

(१) श्रीराम चन्द्र और लक्ष्मण जी का व्यक्तित्व :-

जैसा कि तुलसीदास ने अपनी रामचरितमानस में बहुत

सी चमत्कारिक घटनाओं को श्रीराम जी के जीवन

के साथ जोड़कर उनके कर्तव्यपरायण स्वरूप को छिपा

दिया है , वाल्मिकी मुनि की रामायण के अनुसार

श्रीराम और लक्ष्मण जी उत्तर भारत में ऐसे महाबली

योद्धा राजकुमार हुए हैं कि अनेकों राज्यों के

राजकुमारों की चमक उनके सामने फीकी थी, ये

दोनों राजकुमार समस्त अस्त्रशस्त्र विद्या में निपुण

थे सभी प्रकार के राजनैतिक दाँव पेंच और कूटनीति

में निपुण थे ये सब विद्या इन्होंने वशिष्ठ और

विश्वामित्र जी से गुरुकुलों में प्राप्त की थी ।

पृथिवी के बड़े भूभाग पर राजा राम के रघुवंशीयों

का ही चक्रवर्ती शासन था । और राजधानी

अयोध्या को आज के उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर

अयोध्या से तुलना नहीं करनी चाहिए ।

वास्ताविक अयोध्या उत्तर प्रदेश और नेपाल के

पूर्वी भाग को समाए हुए थी ।

(२) रामायण का प्रगत युग :- ये पश्चिमी लोगों की

मान्यता है कि युग जितना पुराना हो उसके लोग

उतने ही अप्रगत , अशीक्षित, जंगली और बर्बर ही

होने चाहिएँ । ऐसा वे डारविन के सिद्धांतों के

आधार पर कहते हैं कि मानव जंगली अवस्था से

विकसित होता होता उन्नति करता गया । परन्तु

वैदिक परम्परा इसके विपरीत है , जब मनुष्य रचना हुई

तो वह साक्षात ईश्वर के सान्निध्य में अत्यंत

विज्ञानयुक्त थे और रूप में सुंदर और अत्यंत बुद्धि और

बल से सम्पन्न थे , समय के साथ ह्रास होता गया और

मानव वेद की उच्च शिक्षा से दूर होता होता

सम्प्रदायों में बँटता गया और ऐसे ही मानव सभ्यता

ह्रासभाव को प्राप्त हुई । ठीक इसीलिए रामायण

कालीन युग आज की तुलना में अत्यंत प्रगत था ।

जितने दिव्यास्त्रों के नाम हम सुनते हैं वे सब

विज्ञान की यांत्रिक रचनाओं के परिणाम हैं, और

बहुत बार रामायण में प्रयोग किया जाने वाला शब्द

विमान भी इसकी साक्षी देता है । क्योंकि शब्द

बिना किसी अर्थ के नहीं होता है , पदार्थ के

अस्तित्व में ही उसके शब्द का प्रयोग होता है ।

(३) रावण का उपद्रव :- सिंहलद्वीप यानी कि

श्रीलंका का सम्राट रावण ऋषि पुलस्त्य का वंशज

था । वही पुलस्त्य ऋषि जिनके नाम के आधार उनके

शिष्यों ने मरुत प्रदेश में एक देश स्थापित किया था

जिसका नाम पुलस्तीन रखा गया जो समय के साथ

बिगड़ बिगड़ कर वर्तमान फिलिस्तीन ( इज़रायल,

गाज़ा पट्टी समेत )कहलाया गया । उसी का वंशज

रावण अपने गुणों से पथभ्रष्ट होकर राक्षस कहलाया

था । ये रावण इतना विद्वान था कि इसकी लंका में

कई प्रयोगशालाएँ थीं, कई विमान इसके पास थे, हर

सुविधा से सम्पन्न और इतना बलशाली था कि इसे

दशग्रीव ( दस सिर वाला ) कहा जाता था क्योंकि

ये दसों दिशाओं से शत्रुओं को परास्त करने की

क्षमता रखता था । रामायण का एक संस्कृत नाम

इसी आधार पर ‘दशग्रीवस्य वधः’ भी है । इसकी

राक्षसी सेनाओं ने समूचे दक्षिण भारत में भयंकर

उपद्रव मचाया हुआ था आन्ध्र के निकटवर्ती प्रदेशों

में जहाँ वशिष्ठ और विश्वामित्र जी के कई गुरुकुल थे

वहाँ भी राक्षस सेनाएँ तांडव कर चुकीं थीं जिस

कारण राम और लक्ष्मण की भी सहायता समय समय

पर ली जाती रही थी । रावण का शासन मात्र आज

के श्रीलंका तक ही सीमित न समझना चाहिए,

बल्कि लंका से तीन गुना भाग के द्वीप जो कि अब

हिंद महासागर में डूब चुके हैं, एशिया के बाकी देश

जैसे मलेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, इंडोनेशिया

आदि तक रावण के अधीन थे ।

(४) जनक से सन्धि :- रघुकुल वंश के बाद आर्यावर्त में

महत्वपूर्ण राजवंश राजा जनक का था । जिनसे

सन्धि करने के लिये रावण भी आतुर था, और राजा

दशरथ भी , तो सन्धि के लिये उत्तम अवसर स्वयंवर ही

था । रावण की पहले ही कई स्त्रियाँ थीं, इसके बाद

भी वह जनक पुत्री सीता से विवाह राजनैतिक

दृष्टिकोण से करना चाहता था, तांकि रघुवंश के

विरुद्ध राजा जनक के साथ गठजोड़ हो जाए और

रावण का विश्वसम्राट बनने का स्वप्न पूरा हो जाए

। स्वंयवर में धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त थी,

रावण ने भी प्रयास किया और कई राजओं ने भी,

परंतु बलसम्मपन्न और ब्रह्मचर्य शक्ति से युक्त राजा

राम ही ये काम करने में सफल हुए परंतु प्रत्यंचा चढ़ाते

बल से धनुष ही टूट गया । राम विजयी हुए और जनक

पुत्री सीता से राम जी का विवाह हुआ । ( धनुष टूट

जाने पर राम परशुराम युद्ध काल्पिनक है जिसका

वाल्मिकी मुनि ने कहीं उल्लेख नहीं किया है ) केवल

सीता ही नहीं, बल्कि जनक के घराने से उर्मिला,

प्रमिला, शर्मिला कन्याएँ भी अन्य पुत्रों से ब्याह

दी गईं, जिससे कि दोनों राजवंशों का संबन्ध और दृढ़

हो गया । रावण की जगहँसाई हुई और उसे निराश

लौटना पड़ा ।

(५) कैकयी एक राष्ट्रभक्त त्यागिन :- जैसा कि

बताया गया है कि रावण की राक्षसी सेनाएँ

दक्षिण से निकल उत्तर की ओर कूच करती हुईं आतंक

मचाती हुई जा रही थीं, तो वशिष्ठ और

विश्वामित्र जी ने राम और लक्ष्मण जी को रावण

के विरुद्ध संघर्ष करने की योजना बनाई क्योंकि

यही दो राजकुमार थे जिनके बल की तुलना करने का

साहस किसी और में नहीं था यही दोनो रावण के

विरुद्ध उपयुक्त थे । तो इसी कारण विश्वामित्र और

वशिष्ठ जी ने कैकयी जी जो कि सबसे बुद्धिमती

मानी जातीं थीं, उन्हें आर्यावर्त देश में रावण

द्वारा हो रही दुर्दशा के द्वारा बताया और ये भी

सावधान किया कि शीघ्र ही रघुकुल वंश पर रावण

की तलवार लटकने वाली है । तो गुपचुप तरीके से

योजना बनाकर श्री राम और लक्ष्मण जी को

वनवास देने की तैयारी की गई तांकि लोगों को ये

लगे कि कैकयी ने सौतेले व्यवहार के कारण अपने पुत्र

को राजवंश सौंपना चाहा है, कैकयी लोगों के ताने

सुनने को तैयार थी लेकिन राष्ट्र की रक्षा से

समझौता नहीं चाहती थी । रावण को भी यही

दिखाना था कि कैकयी ने सौतेले व्हवहार के कारण

ही राम को वनवास दिया न कि किसी सैनिक

तैयारी के कारण तांकि रावण चौकन्ना न हो जाए

। क्योंकि भरत और शत्रुघन रावण का समाना करने

का सामर्थ्य ही न रखते थे । सीता जी ने भी युद्ध में

भाग लेने का हठ किया तो तीनों का जाना

निश्चित हुआ । तीनों को गुप्तचरों समेत ही सैनिक

टुकड़ियाँ देकर वनवास दिया गया ।

(६) गुरुजनों की योजना :- जब राज्याभिषेक की

तैयारी हो चुकी थी । तो गुप्त विचार करने हेतु

विश्वामित्र जी ने भरत शत्रुघन को उनके मातुल गृह

जो की ऋषीय ( वर्तमान रशिया ) में था वहाँ भेज

दिया । वाल्मिकी रामायण में बर्फीले ऋषीय प्रदेश

में कुत्तों से जुते हुए रथों को चलाने का उल्लेख भी

मिलता है । राम और लक्ष्मण को गुप्त रूप से राज्य से

बाहर सेना टुकड़ी समेत दक्षिण के जंगलों की ओर

प्रस्थान करने की योजना बनाई गई, जिसमें

सीताजी ने हठ करके स्वयं भी जाने की इच्छा की ।

तो तीन सेना टुकड़ियाँ देकर तीनों को उनका

सेनापति बनाकर राज्य से योजनाबद्ध रूप से बाहर

भिजवाया गया । आगे जाकर सीताजी का यही

हठ उनके अपहरण का कारण भी बना जो कि हम आगे

लिखेंगे । जैसा कि कथावाचक भ्रामक प्रचार करते हैं

कि राम, लक्ष्मण और सीता तीनों अकेले ही अरण्य

गए , इसके विपरीत तीनों के पास सैनिक और साधन

समपन्नता थी । जिसके कारण उन्होंने अपनी कई

सैनिक छावनियाँ भी जगह जगह स्थापित की थीं ।

(७) स्वर्णमृग का छल :- सेनाओं के द्वारा राक्षसी

सेनाओं का सफाया करते करते तीनों की सेना

पंचवटी तक का प्रदेश जीत चुकी थी । और पंचवटी में

सैनिक छाँवनी लगाई गई । तब रावण तंद्रा से जागा

और गुप्तचरों की सहायता से पता लगाया कि राम,

लक्षमण और रानी सीता ने युद्ध का आरंभ कर दिया

है और वह पंचवटी तक का प्रदेश हाथ से जाते देख

बौखलाया और उन्हें रोकने की पूरी चाल चलने लगा

। वह जानता था कि राम और लक्ष्मण ही समस्त

युद्धनीति कूटनीति में विश्वामित्र और वशिष्ठ

द्वारा प्रशीक्षित हैं लेकिन सीता नहीं, तो सीता

को कमज़ोर कड़ी जानकर रावण ने सुवर्णमुग योजना

रची । सुवर्णमृग योजना से वर्तमान हमारे कथावचक

सोने का हिरण लेते हैं जो सीता को पसंद आया और

राम जी को उसका शिकार करने को बोला, परंतु

इसका दूसरा अर्थ है छलावा । रावण ने ऐसा व्यूह

रचा कि जिससे सीता की टुकड़ी को ऐसा लगे कि

राक्षसों का सारा खजाना कम सैनिकों के साथ

जा रहा है , और हुआ भी वही चमचमाते हाथी और

यानों से सीता को लगा कि ये रक्षसों की सेना पर

आक्रमण करने का उपयुक्त समय है और युद्ध के इस

सम्मान को अपने नाम करने का भी , तो आक्रमण

कर दिया गया । और बाकी दो सैनिक छाँवनीयों

( राम और लक्ष्मण की ) को संदेश भेजा गया और

उन्हें भी उसी राक्षसी स्वर्णमृग का पीछा करने को

कहा श्री राम जी ने सीता को बहुत समझाया कि

ये छल है पर सीता ने हठ किया और एक न मानी ।

राम जी हारकर अपनी सेना टुकड़ी लेकर वहीं चल पड़े

(८) सीता अपहरण और लक्ष्मण रेखा :- राम जी जब

सेना लेकर निकले तो राम और राक्षसी सेना में कुछ

झड़पें हुईं और राक्षसों ने कुछ सैनिक मारकर उनके

वस्त्र पहन लिए और आकर सीता और लक्षमण जी को

बोला कि राम खतरे में हैं । जिसे सुनकर सीता घबराईं

और लक्ष्मण जी को भी अपने भाई की सहायता

होतु बोला तो लक्ष्मण जी पहले उन्हें बहुत समझाया

कि ये राक्षसों का माया छल है । तो सीताजी ने

लक्ष्मण को बहुत धिक्कारा अंत में लक्ष्मण जी

विवश होतर अपने सैनिक दस्ते का कुछ भाग लेकर

निकल पड़े और सीताजी के पास कुछ अपने सैनिक थे

और कुछ लक्ष्मण जी के और पूरी सैनिक छाँवनी की

सीमाओं को लक्ष्मण रेखा का नाम दिया गया ।

जैसे कि रामचरितमानस में लक्ष्मण द्वारा तीर की

नोक से खींची दैवी रेखा का वर्णन है वैसी रेखा ये

नहीं थी । बल्कि अस्त्र शस्त्रों से सम्पन्न एक

छाँवनी की सीमा थी । अब राम और लक्ष्मण को

सीता से दूर करने में रावण सफल हुआ । और अब अपने

विमान को उस छाँवनी से दूर खड़ाकर करके साधू वेष

धरकर अपनी एक छोटी सी टोली संग भिक्षा माँगने

उस सीता की छाँवनी के पास गया और सैनिकों

को भिक्षा माँगने हेतु रानी जी से मिलने का

आग्रह किया । नियम ये था कि कोई भी छाँवनी में

प्रवेश न कर सकता था जबतक कि दूतों के द्वारा

सहमति और संदेश न पहुँच जाते थे । तभी रानी सीता

जीं सैनिक छाँवनी ( लक्ष्मण रेखा ) लांघ गईं और

कुछ ही दूरी पर रावण और उनके दस्ते ने तुरंत झपट्टा

मारकर उनको पकड़ लिया और उठाकर विमान में

बिठाकर ले गए और पीछे सैनिक विमन की कमी के

कारण देखते रहे और कुछ न कर सके ।

(९) जटायु का विमान दल :- श्रीराम की सहायता

के लिए जो हवाई दस्ता जटायु के नेतृत्व में आया हुआ

था , वह हवा में गश्त लगा रहा था । जटायु कोई

पक्षी नहीं था जैसा कि रामचरितमानस में बताया

जाता है बल्कि , जैट प्लेन की पूरी सेना का कमांडर

था, जिसका अड्डा वर्तमान गुजरात की मरूभूमि में

था । आज भी वहाँ की रेत में काँच पाया जाता है

जो कि तीव्र आग और मिट्टी के संयोग से बनता है

और जैट विमान की आग में ही वो शक्ति है जिससे

कि मिट्टी मे कण कांच में परिवर्तित होते हैं, कहना

ये हैं कि ये विमान जिन्हें प्रचीन काल में गरुड़ कहा

जाता था वे उड़ते थे । आज भी विमान दस्ते अपनी

वर्दी पर पंख के निशान बनाते हैं तांकि देखने से पता

लगे कि ये हवाई सैनिक है । ठीक वैसे ही पंखनूमा

चिह्न जटायु और उनकी सेना लगाती थी, जिसे

भूलवश पक्षी समझा गया । सीता हरण को भांप

जटायु दस्ता रावण की हवाई सेना पर हवाई आक्रमण

करने लगा और क्योंकि जटायु का दल निर्बल था तो

रावण के हवाई दस्ते का सामना न कर भूमि पर क्रैश

हो गिरा । और भूमि पर चोटिल अवस्था में राम को

दूरसंचार से सुचना पहुँचाई और राम उससे मिलने आए ।

तो उसने राम को सारी बात बता दी और मर गया ।

राम और लक्षमण जी के पैरों तले भूमि खिसक गई ।

क्योंकि सीता हरण के बाद सारी योजना पर पानी

फिर गया था ।

(१०) सीता जी की बुद्धिमता :- जब रावण सीता

जी का अपहरण करके ले जा रहा था तो सीता को

अपने किए पर पछतावा हुई और साथ ही आँसू पौँछते

हुए उन्होंने अपने आभूषण रावण के विमान से नीचे

फैंकने शुरू किए । जिससे कि राम लक्ष्मण अपनी सेना

के द्वारा उनके चिह्नों को ढूंढते हुए आ जाएँ । और

हुआ भी ऐसा कि उनके आभूषण सुग्रीव के दस्ते के

हाथ लगे और उन्होंने उसके द्वारा रावण के मार्ग को

भाँप लिया ।

(११) सुग्रीव से सन्धि :- जैसे ही राम जी को सीता

के अपहरण का पता चला उनपर तो पहाड़ ही टूट पड़ा

रावण को पराजित करने का उनका सारा उद्देश्य

सीता के हठ के कारण शून्य सा हो चला था । ऐसे में

कोई मार्ग ढूंढना आवश्यक था जो कि उन्हें

किष्किन्धा ( कर्णाटक ) के दो वानर राजाओं के

युद्ध से मिला । बाली ने सुग्रीव का राज्य छीन

उसकी पत्नि का अपहरण कर लिया था । तो सुग्रीव

की राजा राम और लक्ष्मण से यही सन्धि हुई कि

राम उनका राज्य और पत्नि वापिस दिलवायेंगे और

उसके बदले में सुग्रीव सीता जी को ढूंढने और रावण के

विरुद्ध हर संभव सहायता उन्हें देगा । बाली और

सुग्रीव के युद्ध को बहुत ही हास्यास्पद रूप में बताया

जाता है कि जैसे दोनो ही आपस में लड़ रहे हों,

जब्कि राजा नहीं उनकी सेनाएँ आपस में युद्ध करती

थीं न कि वे अकेले अकेले । जैसे कहा जाय कि

शिवाजी और औरंगज़ेब लड़े तो इसका ये अर्थ नहीं

कि वे एक दूसरे पर आमने सामने प्रहार करने लगे ।

बल्कि सेनाओं के द्वारा युद्ध लड़े ।

(१२) बाली-सुग्रीव बंदर नहीं थे :- वर्तमान में सभी

बाली-सुग्रीव, हनुमान जी को बंदर ही समझते हैं और

उनके पूँछ और बंदर का मुख उनके चित्रों पर लगा देते हैं,

वास्तव में वानर जंगलों में रहने वाली क्षत्रियों की

शाखा थी, और इसी कारण उनके मुख पर ऐसी रंगों से

आकृति बनाई जाती थी, ठीक वैसे ही जैसे कि आज

के आदिवासी लोग अफ्रीका के जंगलों में बनाते हैं ।

लेकिन इस अर्थ को न समझकर हमारे कथाकारों ने

इनको मानव से बंदर ही बना डाला । जैसे दूसरे

विश्वयुद्ध में अफ्रीका के रेगिस्तान में जर्मन और

इंग्लैंड की सेना में भयंकर युद्ध हुआ था । जिस कारण

इनको Desert Rats कहा जाता था, यदि आज से

लगभग हज़ार वर्ष बाद इस युद्ध का इतिहास लिखा

जायेगा और कोई ये लिखे कि जर्मन ने चूहों की

सेना खड़ी की ! तो ये कितना हास्यास्पद लगेगा ?

ठीक वैसे ही हास्यास्पद है बाली सुग्रीव को बंदर

कहना ।

(१३) रावण की एक और चाल :- जब रावण ने राम और

लक्ष्मण जी को सुचनाएँ पहुँचाई कि यदि पत्नि

वापिस चाहते हो तो जीते हुए प्रदेश वापिस करो

और सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर करके अधीनता स्विकार

करो , राम जी के लिए रघुवंश की मर्यादा को

नीचा करना मृत्यु के तुल्य था तो उन्होंने बिना

कोई उत्तर दिये जब सुग्रीव से सन्धि करली और

अपनी और सुग्रीव की सेना को साथ लेकर बाली

को परास्त करके किष्किंधा वापिस दिया । तो

रावण ने अपनी सुंदर बहन सरूपनखा को राम या

लक्ष्मण में से किसी एक से विवाह करने हेतु सेना की

टुकड़ी देकर भेजा । जैसा कि पौराणिक लोग

सरूपनखा पर ये आरोप लगाते हैं कि वो राक्षसी होने

के कारण कुरूप थी । तो ये मान्यता गलत है । वो भी

सीता जैसी ही सौंदर्य से भरपूर थी । तो जैसे

सरूपनखा ने राम जी पास विवाह प्रस्ताव भेजा तो

राम और लक्ष्मण जी ने रावण की चाल को समझकर

विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया और तब सरूपनखा

का राम और लक्ष्मण की सेना से युद्ध हुआ जिसमें

उसका चेहरा बिगड़ गया । पौराणिकों ने मिथ्या

भ्रम ये फैलाया है कि लक्ष्मण ने अपने हाथ से उसके

नार और कान काटे ! जो कि गलत है । इस पराजय पर

रावण बहुत ही क्रुध हुआ ।

(१४) रामायण काल में दूरसंचार यंत्र :- जब विभीषण

द्वारा राम की सहायता का प्रस्ताव आया तो

पहले तो विभीष्ण के विमान लैंड करने के लिए राम

सेना से अनुमति माँगते रहे और रेडियो या संचार

यंत्रों ( वाल्मिकी रामायण में उल्लिखित है ) ये

रावण के विरुद्ध सहायता देने का वचन दिया गया ।

तो पंचवटी से दूर विभिषण के विमान उतरे । पूरी

जांच परख के बाद राम जी ने उससे सैन्य सहायता का

वचन लिया और उसके कई वायुयान भी अपनी

सहायता हेतु कहे । इसके बाद विभीषण की राम जी

से सन्धि हुई और एक बड़ी सेना श्री राम जी की

सहायता के लिये तैयार हो गई ।

ऐसे ही अनेकों प्रसंग तार्किक और विज्ञानसम्मत

होने से ही विश्वस्नीय होते हैं जैसा कि वाल्मिकी

मुनि की रामायण के आधार पर संभव है । तुलसीदास

की रामचरितमानस भ्रमपूर्ण होने से त्याज्य है ।
नुराज आर्य अँधेड़ी

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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