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एकलिंगनाथ : मेवाड़ का शिवधाम – Shri Krishan Jugnu 


एकलिंगनाथ : मेवाड़ का शिवधाम

सावन में शिव स्थानों के दर्शन की परंपरा बहुत पुरानी है और हमारे यहां उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर ठेठ पश्चिम तक शिवालयों की शृंखला दिखाई देती है। राजस्थान में एकलिंगनाथ के मंदिर का बड़ा माहात्म्य है क्योंकि यहां के मेवाड़ के महाराणा शासकों ने शिव को राजा और स्वयं को उनका प्रतिनिधि स्थापित कर शासन सूत्र का संचालन किया।

यूं तो यहां मंदिर स्थापत्य का विकास नवीं सदी से सिद्ध किया गया है लेकिन अभिलेखीय प्रमाण 10वीं सदी से मिलने लगते हैं। नरवर्मा के काल में यहां लाकुलीश मंदिर बना और फिर एकलिंगजी का प्रासाद बना जिसका शिल्प और स्थापत्य मेरु रूपेण है और इसीलिये यह लिखा गया है कि देव मेरुगिरि को और शिव कैलास को बिसार यहां आए।

यह मंदिर कब बना, इसे लेकर कई मान्यताएं हैं। महाराणा जगतसिंह के शासनकाल की 1640 की जगदीश मंदिर की प्रशस्ति में कहा गया है कि महाराणा मोकल (1412-33 ई.) ने यह मंदिर बनवाया जबकि मोकल द्वारा स्थापित 1428 ई. की शृंगी ॠषि की प्रशस्ति में कहा गया है कि मोकल ने इस मंदिर का स्फाटिक जैसी शिलाओं से परकोटा बनवाया और तीन द्वारों पर अलंकृत किंवाड़ लगवाये।

एकलिंगजी के दक्षिण द्वार की 1489 ई. की प्रशस्ति में इस मंदिर के लिए महाराणा हम्मीर (1330-60 ई.) द्वारा शिहेला ग्राम का दान करने का संदर्भ मिलता है। एेसे मंदिर का और पुराना होना सिद्ध होता है। निश्चय ही यह यह पहले बना और इसका पहला प्रमाण आबू के अचलेश्वर मंदिर की 1285 ई. की प्रशस्ति से मिलता है। उसमें प्रशस्तिकार चित्तौड़ निवासी राजकवि वेद शर्मा कहता है कि उसने एकलिंगनाथ के मंदिर की प्रशस्ति की रचना की। (श्लोक 60)

उक्त वेद शर्मा की सारी प्रशस्तियां मंदिर प्रतिष्ठा व गुहिलवंश गौरव गुणमूलक रही है। उसकी रची एकलिंगजी की प्रशस्ति अब नहीं मिलती। वह निश्चित ही काव्य सौष्ठव युक्त रही होगी जैसी कि उसकी अन्य प्रशस्तियां रही हैं और उसके कुछ श्लोक कुंभलगढ़ की प्रशस्ति और एकलिंग माहात्म्य में भी ” तदुक्तं पुरातनै” कहकर उद्धृत हुए हैं और वे बच गए हैं, यह सहज विश्वास होता है ।

आबू पर्वत की प्रशस्ति महारावल समरसिंह के शासनकाल (1282-1301ई.) की है और उसी के काल की चीरवा गांव की प्रशस्ति (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 1330) में तत्कालीन श्री शिव राशि नामक पाशुपत सन्यासी को एकलिंगजी मंदिर का अधिष्ठाता कहकर सम्मान दिया गया है : पाशुपत तपस्विपति: श्रीशिवराशि स शीलगुण राशि:। आराधितैकलिंगोऽधिष्ठातात्रास्ति निष्ठावान्।। (श्लोक 44) यह तपोधन सन्यासी उस काल तक मौजूद था। ( मेरी : राजस्थान की एेतिहासिक प्रशस्तियां और ताम्रपत्र और राजस्थान के प्राचीन अभिलेख)

ये प्रमाण सिद्ध करते हैं कि यह मंदिर 13वीं सदी तक बन चुका था और संवत् 1330 से पूर्व प्रतिष्ठा हो चुकी थी। आज यह प्रासाद अपनी भव्य कला व इतिहास को लेकर शिरोन्नत किए है…
जय जय।
– डॉ. श्रीकृष्ण “जुगनू”

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