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देखो , कैसे हिंदू व हिंदूस्थानी बर्बाद हुए ?? “अतिथि देवो भवः”..????   बदल दो इसको !

देखो , कैसे हिंदू व हिंदूस्थानी बर्बाद हुए ??
“अतिथि देवो भवः”..????   बदल दो इसको !

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बहुत तेज बारिश हो रही थी। सर्दी का समय था। कच्ची सड़क के किनारे एक टूटी फूटी झोंपड़ी देखकर, राहगीर उसी झोंपड़ी की ओर बढ़ गया। झोंपड़ी का छोटा सा दरवाजा बंद नहीं था, सो उसमें प्रवेश भी कर गया।
अंदर जाकर देखा, वो छोटी सी झोंपड़ी थी, और उसमें कई जगह से बारिश का पानी चू रहा था। बचे सूखे हिस्से में एक साधू सो रहा था। असमंजस में खड़े अतिथि को देख कर साधू एक ओर सरक गया, और बोला,.. “आओ लेट जाओ, दो लोगों के लिए तो जगह है ही।”
थोड़ी ही देर में एक और अतिथि बारिश से भीगता भागा हुआ आया, और झोंपड़ी में शरण मांगा। पहले वाले अतिथि ने तुरंत बोला,…  “कहाँ है यहाँ जगह? दिखता नहीं है कि बड़ी मुश्किल से दो लोगों के लेटने लायक जगह है?” लेकिन साधू ने उसकी बात काट कर, उठ कर बैठते हुए कहा,..  “नहीं नहीं, अगर हम दोनों बैठ जाएं, तो आराम से तीन लोग रात गुजार सकते हैं।” पहला वाला अतिथि भुनभुना के रह गया।
कुछ ही समय उपरांत, एक और व्यक्ति भागता हुआ आया और शरण मांगा। पहले के दोनों अतिथियों ने तुरंत प्रतिकार किया कि,.. “कैसे? तीन लोगों के ही बैठने की जगह तो है।” साधू ने फिर से विनम्र भाव से कहा,..  “हम अगर पासपास चिपक कर बैठ लें, तो चार आदमी भी बैठ सकते हैं।”
दैवयोग से कुछ क्षण के बाद ही, बारिश से बचने के लिए एक और व्यक्ति झोंपड़ी पर पहुंचा। पहले के तीनों अतिथि बुरी तरह से प्रतिकार करने लगे उस नए अतिथि का। अब तो जगह भी नहीं बची थी। लेकिन साधू ने कहा,…  “अगर हम चारों खड़े हो जाएँ, तो पांचवे की भी जगह बन सकती है। “अतिथि देवो भवः”

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चलिए उस साधू ने अपनी सनातन सभ्यता की परंपरा का निर्वहन करते हुए, अपनी सामर्थ्‍यानुसार अतिथियों का स्वागत किया।
लेकिन मेरा सवाल यह है कि,  “क्या वे अतिथि उस सेवा सत्कार के योग्य थे?? कुटिया साधू की थी, तो वे कैसे अन्यों के आने का प्रतिकार करने का साहस कर रहे थे?? और जिसने साधू की मर्जी के खिलाफ दूसरे के आने का विरोध किया, क्या साधू को उसी क्षण उसे बाहर नहीं भगा देना चाहिए था??
हम क्यों इतने सहिष्णु रहे हैं कि सहिष्णुता और मूर्खता में अंतर को भूलते रहे? सालों साल से, युगों से ही, क्या हमें ऐसी मूर्खता छोड़ नहीं देनी चाहिए??
कैसे महमूद गजनवी की हिम्मत हुई 17 बार आक्रमण करने की? पहले ही बार में अगर उसको क्षमा करने के बजाय, उसकी लाश को काट कर, फारस के बार्डर पर लटका देते, तो निश्चय ही आगे होने वाले हमलों में हमें लाखों जान माल का नुकसान नहीं उठाना पडता।
फिर शायद मुहम्मद गोरी की हिम्मत नहीं होती आँख उठा कर देखने की। लेकिन हम फिर भी नहीं सुधरे। गोरी के साथ हुई पहली लड़ाई में हमारे लाखों योद्धाओं की जान गवां कर, हमने गोरी को जिंदा पकड़ा था। और उस हत्यारे को हमने जीवनदान दे दिया। जीवनदान मिला, इसीलिए उसने दुबारा आक्रमण किया, और इस बार जीत भी गया। लाखों चौहानों की बलि हुई, उन्हें काट डाला गया, पृथ्वीराज चौहान को भी अन्ततोगतवा जान देनी पड़ी।
क्यों?? क्योंकि हमारे अलावा और कोई भी सहिष्णुता दिखाने की मूर्खता नहीं करता।

यहॉ आक्रमणकारियो को माफी देना ही मूर्खता बन गया
तभी बाबर की भी हिम्मत हुई, तभी हूँड, डच, फ्रांसीसी और फिर अंग्रेजों की भी हिम्मत हुई, हम पर आंख उठा कर देखने की।
तभी डॉ नारंग मारे गए, और उसी मानसिकता की वजह से कल ऑटोचालक राजेंद्र भी मारा गया। अगला नंबर “आपका” है। वो खुलेआम गाय को live कैमरे पर काट कर अपनी मानसिकता दिखा कर तुम्हें ललकार रहे हैं। वो कह रहे हैं कि आओ उखाड़ लो जो अगर उखाड़ सको तो।

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बदल डालिए “अतिथि देवो भवः” जैसी परंपराओं को, जो हमें सहिष्णुता जैसी मूर्खता दिखाने को विवश करती हैं। कम से कम सुपात्र और कुपात्र का ही अंतर करना सीख

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*जय हिन्द।  जय हिंदुत्व*
*सन्देश योगी*✍

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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