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यमुनोत्री यानि यमुना के जन्म की कथा

🌼यमुनोत्री यानि यमुना के जन्म की कथा 🌼🌼🌼🌼🌼
भारत की सबसे पवित्र और प्राचीन नदियों में यमुना का स्मरण गंगा के साथ ही किया जाता है। इन नदियों के किनारे और दोआब की पुण्यभूमि में ही भारतीय संस्कृति का जन्म हुआ और विकास भी। यमुना केवल नदी नहीं है। इसकी परंपरा में प्रेरणा, जीवन और दिव्य भाव समाहित है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यमुना नदी, यमराज की बहन है। जिसका नाम यमी भी है।
यमराज और यमी के पिता सूर्य हैं। यमुना नदी का जल पहले साफ, कुछ नीला, कुछ सांवला था, इसलिए इन्हें ‘काली गंगा’ भी कहते हैं। असित एक ऋषि थे। सबसे पहले यमुना नदी को इन्होंने ही खोजा था। तभी से यमुना का एक नाम ‘असित’ संबोधित किया जाने लगा। कहते हैं कि सूर्य की एक पत्नी छाया थी। छाया दिखने में श्यामल थी। इसी वजह से उनकी संतान यमराज और यमुना भी श्याम वर्ण पैदा हुए। यमराज ने यमुना को वरदान दिया था कि यमुना में स्नान करने वाला व्यक्ति को यमलोक नहीं जाना पड़ेगा।
संवत्सर शुरु होने के छह दिन बाद यमुना अपने भाई को छोड़ कर धरा धाम पर आ गई थी। सूर्य की पत्नी का नाम ‘संज्ञा देवी’ था। इनकी दो संतानें, पुत्र यमराज तथा कन्या यमुना थी। संज्ञा देवी पति सूर्य की उद्दीप्त किरणों को न सह सकने के कारण उत्तरी ध्रुव प्रदेश में छाया बन कर रहने लगीं। उसी छाया से ताप्ती नदी तथा शनीचर का जन्म हुआ।
इधर छाया का ‘यम’ तथा ‘यमुना’ से विमाता सा व्यवहार होने लगा। इससे खिन्न होकर यम ने अपनी एक नई नगरी यमपुरी बसाई, यमपुरी में पापियों को दण्ड देने का कार्य सम्पादित करते भाई को देखकर यमुनाजी गो लोक चली आईं। कृष्णावतार के समय भी कहते हैं यमुना वहीं थी। यमुना नदी का उद्गम यमुनोत्री से है। जिस पहाड़ से यमुना निकलतीं हैं उसका एक नाम कालिंद है इसलिए यमुना को कालिंदी भी कहते हैं.
अपने उद्गम से आगे कई मील तक विशाल हिमगारों और हिम मंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई पहाड़ी ढलानों पर से अत्यन्त तीव्रतापूर्वक उतरती हुई इसकी धारा दूर तक दौड़ती बहती चली जाती है। ब्रज में यमुना का महत्त्व वही है जो शरीर में आत्मा का। यमुना के बिना ब्रज की संस्कृति का कोई महत्त्व ही नहीं है।

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विकाश खुराना

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