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एथीस्ट


कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक……. बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े…… टोटल एथीस्ट….,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं……. फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता…… जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा……. वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता…… ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है….. मुरतीद मुरतीद….. मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए…….. हुक्म की तालीम हो…… हेहेहे….. खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता……… मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है……… सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं…………. सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं…… मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा…… अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे…….. मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा……. तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के………… बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने……..

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जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ…….. ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है………… पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे……… खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा……… मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा…… अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है……. दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है…….. ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है……. एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है….. मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ…….. फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं……. देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है……… राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन……… सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका……..

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मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे……….. भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये……….

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दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया……….

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कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है


*कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है…….🙏*

*सोना*

सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।

*चाँदी*

चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।

*कांसा*

काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

*तांबा*

तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।

*पीतल*

पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

*लोहा*

लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।

*स्टील*

स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी नहीं पहुँचता।

*एलुमिनियम*

एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।

*मिट्टी*

मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।

पानी पीने के पात्र के विषय में ‘भावप्रकाश ग्रंथ’ में लिखा है….

*जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।*
*पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।*
*काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।*
(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)

अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

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ऋग्वेद की रचना


#इतिहास_के_पन्नो_से_भाग_4
#वेदो_की_रचना_कब_और_कैसे_हुई

ब्रिटेनकी sacred books of east पुस्तक माला में मेक्समूलर ने ऋग्वेद की रचना ईसा से 1200 वर्ष पूर्व बताते है साथ में वह यह भी कहते है की यह तिथि निश्चित नहीं है क्यों की वेदो का कालनिर्धारित करना सरल कार्य नही है कदाचित् ही कोई इस बात का पता लगा सके की वेदो की रचना कब हुई थी कोलब्रुकस विलसन ,कीथ आदि की राय मेक्समूलर से मिलती है हॉग आर्कबिशप ऋग्वेद का काल ईसा से 2000 वर्ष पूर्व मानते है किन्तु कोई प्रमाणिक तर्क नही कोई अखंडणीय युक्ति नही सम्भवतया इनकी युक्ति का आधार यह है की बाइबल के अनुसार 6 हजार से 7 हजार वर्ष पूर्व सृष्टि की रचना हुई थी इस लिए इनके भीतर ही कोई पदार्थ रचा गया होगा (अर्थात इनलोगो की सोच और अनुमान उनकी बाईबल के इर्द गिर्द ही घूमता है इसके बाहर निकलने की चेष्टा इन विद्वानों ने कभी नही की )
कल्पसूत्रो में विवाह प्रकरण में “ध्रुव इव स्थिरा भव् “वाक्य आया है इस पर प्रसिद्ध जर्मन ज्योतिषी जैकोबी ने लिखा है की पहले ध्रुव तारा अधिक चमकीला और स्थिर था इसकी अवस्था की तिथि ईसा से 2700 वर्ष पूर्व की है इसतरह कल्प सूत्रो का निर्माण 4700 वर्ष पूर्व हुआ ज्योतिर्विज्ञान अर्थात नक्षत्रो और ग्रहो के आकाशीय स्थिति के आधार पर जैकोबी ने वेदो का निर्माण काल 6500 से अधिक सिद्ध किया ।
लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ,रामकृष्ण भण्डार,शंकर पाण्डुरंग ,शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने बिदेशियो की अंधानुकरण छोड़ स्वयं वेदो का कालअन्वेषण किया लोक मान्य बालगंगाधर तिलक ने खोज की
की ब्राह्मणग्रन्थों के समय कृतिका नामक नक्षत्र से नक्षत्रो की गाड़ना होता था और कृतिका नक्षत्र ही सब नक्षत्रो में आदि गिना जाता था उनदिनों कृतिका नक्षत्र में दिन रात बराबर होते थे आजकल 21 मार्च और 23 सितम्बर दिन रात बराबर होते है और सूर्य अश्विनी नक्षत्र में रहता है खगोल और ज्योतिर्विज्ञानो के अनुसार यह परिवर्तन आज से 4500 वर्ष पूर्व हुआ था इसलिए 4500 वर्ष पूर्व ब्राह्मण ग्रन्थ बने ।
मन्त्र संहिताओं के समय नक्षत्रो की गड़ना मृगशिरा ही सबसे पहले गिना जाता था और इसी नक्षत्र के सूर्य में दिनरात बराबर होते थे खगोल और ज्योतिष के अनुसार आज से 6500 वर्ष पूर्व ये स्थिति थी फलतः संहिताएं 6500 वर्ष पूर्व बनी लोकमान्य के मत से 2000 वर्षो में सारे मन्त्र रचे गए इसतरह कुछ प्राचीन ऋचाएं 8500 वर्ष पूर्व रची गई मृगशिरा में वसन्त की समाप्ति होना ही इस दिशा में लोकमान्य की सबसे बड़ी युक्ति और आधार है ।
अलेक्जेंडर (सिकंदर ) के समय ग्रीक विद्वानों ने अनेक वंशावलियों का जो संग्रह किया था उनके अनुसार चन्द्रगुप्त तक 154 राज वंश 6457 वर्ष भारत में राज्य कर चुके थे इन समस्त राजवंशो के पहले ही वेदो की रचना हो चुकी थी इस आधार पर वेदो की रचना 8000 वर्षो का हुआ ।
पूना के नारायण भवनराव ने भुगर्भशात्र के प्रमाण के आधार पर ऋग्वेदीय निर्माण काल 9000 वर्षो का सिद्ध किया ।
ऋग्वेद (10/136/5) में पूर्व और पश्चिम समुद्रो का उल्लेख मिलता है पूर्व समुद्र पंजाब के ठीक पूर्व में
समस्त गांगेय प्रदेश को आच्छादित करके अवस्थित था इसके भीतर ही पाञ्चाल ,कोशल,वत्स् ,मगध ,बिदेह,ये सारे भूभाग समुद्र गर्भ में थे पश्चिम समुद्र कदाचित् अरब सागर था ऋग्वेद के दो मंत्रो में (10/47/2 और 9/33/6) में चार समुद्रो का उल्लेख है इस प्रकार आर्य निवास के पूर्व ,पश्चिम,उत्तर ,दक्षिण, चार समुद्र थे उत्तरी समुद्र बाहलिक और फारस के उत्तरी भाग में तुर्किस्तान जो प्राकृतिक कारणों से शुष्क हो कर इन दिनों कृष्णह्नद(Black sea ,) कश्यप ह्नद ( caspean sea ,) अराल ह्नद(sea of aral )और बल्काह्नद ( lake Balkash) के रूपो में अवस्थित है भूगोल वेत्ताओं ने इनका नाम एशियाई भूमध्य सागर रखा है इसके उत्तर में आर्कटिक महासागर था इसके पास ही वर्तमान भूमध्य सागर था एशियाई समुद्र का तल ऊँचा तथा यूरोपीय सागर तल निचा था प्राकृतिक परिवर्तनों ने जब वासफारस का मार्ग बना डाला तब एशियाई समुद्र का जल यूरोपीय समुद्र में चला गया और एशियाई समुद्र नष्ट सा हो गया इसके अंश उक्त ह्नदो के रूप में हो गए दक्षिणी समुद्र का नाम राजपुताना समुद्र था (imperial cazetteer of india vol -1) इसी में वह सरस्वती नदी गिरती थी जिनके तटो पर सैकड़ो वेद मन्त्र बने थे प्राकृतिक कारणों से राजपुताना समुद्र और सरस्वती नदी सुख गई आज भी राजपुताना के गर्भ में खारे जल की सांभर आदि झील और नमक की तथे मरुभूमि में बिलुप्त राजपुताना समुद्र की साक्ष्य दे रही है H-G -WELLS -ने अपने THE OUTLINE OF HISTORY में 25 हजार से 50 हजार के वर्षो के बिश्व का नक्शा दिया है उसमे ऐसे समुद्रो का आस्तित्व 25 हजार से 50 हजार वर्षो के बिच माना गया है गांगेय प्रदेश सरस्वती नदी और चारो समुद्र के सम्बन्ध में भूगर्भशास्त्रो का मत है की 25 हजार वर्षो से लेकर 75 हजार वर्षो के भीतर ये सब लुप्त गुप्त और रूपांतरित हुए है इन्ही और ऐसे अन्य प्रमाणों से अमल करने पर ऋग्वेद का निर्माण काल 66 हजार वर्षो का अविनाश चन्द्र दाश ने 75 हजार वर्षो का माना है प्रोफ़ेसर लौटुसिंह गौतम के सामान कुछ कट्टर सनातनी ऐतिहासिक तो ऋग्वेद का रचना काल 4 लाख 32 हजार वर्ष माना है इनके प्रमाण आप्तवचन ही अधिक है जिन यूरोपीय ने वैदिक साहित्य के बारे में लेखनी उठाई है उन सब ने कालनिर्णय पर बड़ी माथापच्ची की है वैदिक उपदेश क्या है उनकी अपूर्वता क्या है उनका प्रतिपाद्य क्या है वैदिक संस्कृति क्या है इन सब बातो पर कम ध्यान दिया गया है और कालनिर्णय पर अधिक इसी उलझन को समझ कर प्रसिद्ध जर्मन विद्वान श्लेगल ने पहले ही लिख दिया की वेद सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ है जिसका समय निश्चित नही किया जा सकता परंतु सबसे मुख्य बात लिखी है प्रसिद्ध जर्मन वेद विद्यार्थी वेबरने उन्होंने कहा की वेद का रचना काल निश्चित नही किया जा सकता है ये उस तिथि के बने हुए है जहाँ तक पहुचने के लिए हमारे पास उपयुक्त साधन नही है बर्तमान प्रमाण राशि हम लोगो को उस समय के उन्नत शिखर पर पहुचाने में असमर्थ है यह उन वेबर साहब की राय है जिन्होंने अपना अधिकाँश जीवन वेदाध्ययन में बिताये है ।
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वैदिक मन्त्रो का निर्माणकाल निर्धारित करना मात्र प्रयास ही हो सकता है क्यों की श्रुतियां ( वैदिक मन्त्र) स्पष्ट कहती है ।

निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदोयजुर्वेदःसामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणंविद्या उपनिषदः(बृहदारण्यक उपनिषद)
ऋग्वेद यजुर्वेद अथर्वेद इतिहास पुराण उपनिषद विद्या सभी ईश्वर के निस्वास् से निकला हुआ है
वेदो नारायण साक्षात् ( वेद ही नारायण का रूप है )
अतः उनका काल निर्धारण करना मूढ़ता का ही परिचायक हो सकता है ।
एवं वैदिक मन्त्रो का रचना किसी ने नही किया उन मंत्रो को दिब्य दृष्टि द्वारा दर्शन किया गया था ।
ऋषिदर्शनात् ( निरुक्त नैगम काण्ड २/११)
अर्थात _ मन्त्रद्रष्टा को ऋषि कहते है
इससे ये प्रमाणित होता है की मन्त्रो की रचना किसी नेे नही किया ऋषियो मात्र उनका दर्शन किया था

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एक बार की बात है , एक नौविवाहित जोड़ा किसी किराए के घर में रहने पहुंचा .


एक बार की बात है , एक नौविवाहित
जोड़ा किसी किराए के घर में रहने पहुंचा .
अगली सुबह , जब वे नाश्ता कर रहे थे , तभी पत्नी ने
खिड़की से देखा कि सामने वाली छत पर कुछ कपड़े फैले
हैं , – “ लगता है इन लोगों को कपड़े साफ़
करना भी नहीं आता …ज़रा देखो तो कितने मैले लग रहे
हैं ? “
पति ने उसकी बात सुनी पर अधिक ध्यान नहीं दिया .
एक -दो दिन बाद फिर उसी जगह कुछ कपड़े फैले थे .
पत्नी ने उन्हें देखते ही अपनी बात दोहरा दी ….” कब
सीखेंगे ये लोग की कपड़े कैसे साफ़ करते हैं …!!”
पति सुनता रहा पर इस बार भी उसने कुछ नहीं कहा .
पर अब तो ये आये दिन की बात हो गयी , जब
भी पत्नी कपडे फैले देखती भला -बुरा कहना शुरू
हो जाती .
लगभग एक महीने बाद वे यूँहीं बैठ कर नाश्ता कर रहे
थे . पत्नी ने हमेशा की तरह नजरें उठायीं और सामने
वाली छत
की तरफ देखा , ” अरे वाह , लगता है इन्हें अकल आ
ही गयी …आज तो कपडे बिलकुल साफ़ दिख रहे हैं , ज़रूर
किसी ने टोका होगा !”
पति बोल , ” नहीं उन्हें किसी ने नहीं टोका .”
” तुम्हे कैसे पता ?” , पत्नी ने आश्चर्य से पूछा .
” आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था और मैंने इस
खिड़की पर लगे कांच को बाहर से साफ़ कर दिया ,
इसलिए तुम्हे कपडे साफ़ नज़र आ रहे हैं . “, पति ने बात
पूरी की .
ज़िन्दगी में भी यही बात लागू होती है : बहुत बार
हम दूसरों को कैसे देखते हैं ये इस पर निर्भर करता है
की हम खुद अन्दर से कितने साफ़ हैं . किसी के बारे में
भला-बुरा कहने से पहले अपनी मनोस्थिति देख
लेनी चाहिए और खुद से पूछना चाहिए की क्या हम
सामने वाले में कुछ बेहतर देखने के लिए तैयार हैं
या अभी भी हमारी खिड़की गन्दी है !

श्री राधे कृष्ण 🙏🏻🌹

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ये जीवन है


R.k. Neekhara‎ ये जीवन है ..♥

एक पान वाला था। जब भी पान खाने जाओ ऐसा लगता कि
वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो।
हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता।
कई बार उसे कहा कि “भाई देर हो जाती है जल्दी पान लगा दिया करो” पर
उसकी बात ख़त्म ही नही होती।
एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।
तक़दीर और तदबीर की बात सुन
मैनें सोचा कि चलो आज इसकी फ़िलासफ़ी देख ही लेते हैं।
मैंने एक सवाल उछाल दिया। मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?
और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।
कहने लगा,आपका किसी बैंक में लाकर तो होगा?
उसकी चाबियाँ ही इस सवाल का जवाब है।
हर लाकर की दो चाबियाँ होती हैं।
एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।
आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य।
जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नही खुल सकता।
अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे।
कहीं ऐसा न हो कि ईश्वर अपनी भाग्यवाली चाबी लगा रहा हो और
हम परिश्रम वाली चाबी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।
बारिश में नहाना आसान तो है,
लेकिन रोज नहाने के लिए हम बारिश के सहारे नहीं रह सकते;
इसी प्रकार भाग्य से कभी-कभी चीजे आसानी से मिल जाती है;
किन्तु हमेशा भाग्य के भरोसे नहीं जी सकते