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महर्षि दुर्वासा

महर्षि दुर्वासा !!!
दुर्वासा हिंदुओं के एक महान ऋषि हैं।

वे अपने क्रोध के लिए जाने जाते हैं।
दुर्वासा सतयुग,त्रैता एवं द्वापर तीनों युगों के एक प्रसिद्ध सिद्ध योगी महर्षि हैं।
वे महादेव शंकर के अंश से आविर्भूत हुए थे।

कभी-कभी उनमें अकारण ही भयंकर क्रोध भी देखा जाता था।

वे सब प्रकार के लौकिक वरदान देने में समर्थ थे।
महर्षि अत्रि जी सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे।

उनकी पत्नी अनसूयाजी के पातिव्रत धर्म की परीक्षा लेने हेतु ब्रह्मा,

विष्णु और महेश तीनों ही पत्‍ि‌नयों के अनुरोध पर श्री अत्री और अनसूयाजी के चित्रकुट स्थित आश्रम में शिशु रूप में उपस्थित हुए।
ब्रह्मा जी चंद्रमा के रूप में,विष्णु दत्तात्रेय के रूप में और महेश दुर्वासा के रूप में उपस्थित हुए।
बाद में देव पत्नियों के अनुरोध पर अनसूयाजी ने कहा कि इस वर्तमान स्वरूप में वे पुत्रों के रूप में मेरे पास ही रहेंगे।

साथ ही अपने पूर्ण स्वरूप में अवस्थित होकर आप तीनों अपने-अपने धाम में भी विराजमान रहेंगे। यह कथा सतयुग के प्रारम्भ की है।
पुराणों और महाभारत में इसका विशद वर्णन है।
दुर्वासा जी कुछ बडे हुए,माता-पिता से आदेश लेकर वे अन्न जल का त्याग कर कठोर तपस्या करने लगे।
विशेषत: यम-नियम,आसन, प्राणायाम,ध्यान-धारणा आदि अष्टांग योग का अवलम्बन कर वे ऐसी सिद्ध अवस्था में पहुंचे कि उनको बहुत सी योग-सिद्धियां प्राप्त हो गई।
अब वे सिद्ध योगी के रूप में विख्यात हो गए।

तत्पश्चात् यमुना किनारे इसी स्थल पर उन्होंने एक आश्रम का निर्माण किया और यहीं पर रहकर आवश्यकता के अनुसार बीच-बीच में भ्रमण भी किया।
दुर्वासा आश्रम के निकट ही यमुना के दूसरे किनारे पर महाराज अम्बरीष का एक बहुत ही सुन्दर राजभवन था।
एक बार राजा निर्जला एकादशी एवं जागरण के उपरांत द्वादशी व्रत पालन में थे।
समस्त क्रियाएं सम्पन्न कर संत-विप्र आदि भोज के पश्चात भगवत प्रसाद से पारण करने को थे कि महर्षि दुर्वासा आ गए।
महर्षि को देख राजा ने प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन किया,पर ऋषि यमुना स्नान कर आने की बात कहकर चले गए।
पारण काल निकलने जा रहा था। धर्मज्ञ ब्राह्मणों के परामर्श पर श्री चरणामृत ग्रहण कर राजा का पारण करना ही था कि ऋषि उपस्थित हो गए तथा क्रोधित होकर कहने लगे कि तुमने पहले पारण कर मेरा अपमान किया है।

भक्त अम्बरीश को जलाने के लिए महर्षि ने अपनी जटा निचोड़ क्रत्या राक्षसी उत्पन्न की,परन्तु प्रभु भक्त अम्बरीश अडिग खडे रहे।
भगवान ने भक्त रक्षार्थ चक्र सुदर्शन प्रकट किया और राक्षसी भस्म हुई।
दुर्वासाजी चौदह लोकों में रक्षार्थ दौड़ते फिरे।

शिवजी की चरण में पहुंचे।

शिवजी ने विष्णु के पास भेजा।

विष्णु जी ने कहा आपने भक्त का अपराध किया है।

अत:यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं,तो भक्त अम्बरीश के निकट ही क्षमा प्रार्थना करें।
जब से दुर्वासाजी अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे,तब से महाराज अम्बरीशने भोजन नहीं किया था।
उन्होंने दुर्वासाजी के चरण पकड़ लिए और बडे़ प्रेम से भोजन कराया।

दुर्वासाजी भोजन करके तृप्त हुए और आदर पूर्वक राजा से भोजन करने का आग्रह किया।
दुर्वासाजी ने संतुष्ट होकर महाराज अम्बरीश के गुणों की प्रशंसा की और आश्रम लौट आए।
महाराज अम्बरीश के संसर्ग से महर्षि दुर्वासा का चरित्र बदल गया।
अब वे ब्रह्म ज्ञान और अष्टांग योग आदि की अपेक्षा शुद्ध भक्ति मार्ग की ओर झुक गए।
महर्षि दुर्वासा जी शंकर जी के अवतार एवं प्रकाश हैं।

शंकर जी के ईश्वर होने के कारण ही उनका निवास स्थान ईशापुर के नाम से प्रसिद्ध है।
आश्रम का पुनर्निर्माण त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्ति वेदान्त गोस्वामी जी ने कराया।
ब्रज मण्डल के अंतर्गत प्रमुख बारह वनों में से लोहवनके अंतर्गत यमुना के किनारे मथुरा में दुर्वासाजी का अत्यन्त प्राचीन आश्रम है।
यह महर्षि दुर्वासा की सिद्ध तपस्या स्थली एवं तीनों युगों का प्रसिद्ध आश्रम है।

भारत के समस्त भागों से लोग इस आश्रम का दर्शन करने और तरह-तरह की लौकिक कामनाओं की पूर्ति करने के लिए आते हैं।
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भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार महर्षि अत्रि और महासती अनसूया ने सौ वर्ष तक जगदीश्वर (जगत को बनाने वाला) को एक समझकर तपस्या की।

उनकी  तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने एक साथ दर्शन दिये।
उनको देख महर्षि अत्रि और महाशती अनसूया ने कहा कि प्रभु! हमने तो श्रेष्ठ संतान हेतु एक जगदीश्वर की तपस्या की थी,आप तो तीन हैं।

आप में से जो भी जगत की रचना करने वाला हो वही हमें श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त होने का वर दे।
तब तीनों ने कहा — हम तीनों ही जगत की रचना करने वाले हैं।

तीनों एक ही हैं।

हमारे तीनों के अंश से ही तुम्हें एक-एक पुत्र प्राप्त होगा।

ब्रह्मा के अंश से सोम,विष्णु से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा उत्पन्न हुए।
महर्षि दुर्वासा ने बचपन से ही तप का मार्ग चुना और वे माता-पिता की आज्ञा लेकर तप करने के लिए वन में चले गए।
उस समय सरस्वती नदी हरियाणा से होकर बहा करती थी जिसके किनारे अनेक ऋषि-मुनियों ने कठोर तप किया।

सरस्वती नदी की धारा से हरियाणा में अनेक सरोवरों का निर्माण हुआ।
दूबलधन का तीर्थ नामक सरोवर भी उन्हीं में से एक है।

जब दुर्वासा तप के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश कर रहे थे तो गहरे वन में इस पवित्र सरोवर पर उनकी दृष्टि पड़ी।
उन्होंने इसी स्थान को उपयुक्त मानकर शिव की कठोर साधना शुरू की तथा अपना आश्रम भी बनाया।
यह भी सर्वविदित है कि महर्षि दुर्वासा अपने नाम के अनुरूप ही भोजन के रूप में केवल हरी दूब का सेवन करते थे।
इस जंगल में दूब अत्यधिक मात्रा में थी इस कारण भी महर्षि दुर्वासा ने इस स्थान का चयन किया था।
महर्षि दुर्वासा के इस वन में आने से यहां धन की उत्पत्ति भी होने लगी।
इसी कारण इस स्थान का नाम दूबलधन पड़ा।
इस स्थान पर उस समय महर्षि दुर्वासा का विशाल आश्रम था जहां वे अपने 24 हजार शिष्यों को शिक्षा प्रदान करते थे।
बेरी में भी महर्षि दुर्वासा द्वारा निर्मित देवी का मंदिर है जहां वे हस्तिनापुर की कुलदेवी मां भीमेश्वरी की पूजा-अर्चना के लिए प्रतिदिन बेरी जाते थे।
बताया जाता है कि इस तीर्थ की यात्रा श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को भी करायी थी।
जिनकी स्मृति में गांव छारा में श्रवण कुमार का मंदिर स्थापित है।

यह मंदिर हरियाणा का एकमात्र श्रवण कुमार का मंदिर है।
लोक-कथाओं में वनवास के दौरान श्री राम,सीता व लक्ष्मण का भी इस वन में ठहरने का वर्णन मिलता है।
इस स्थान को महर्षि दुर्वासा व शृंगी ऋषि की मिलन स्थली के रूप में भी जाना जाता है।
दूूबलधन के तीर्थ सरोवर के बारे में कहा जाता है कि इसमें शकुंतला की अंगूठी गुम होने के कारण शकुंतला ने इसी तीर्थ सरोवर को शाप दिया था  कि ‘जिस प्रकार महाराजा दुष्यंत मुझे भूल गये हैं कलियुग आने पर लोग तुम्हें भी भूल जायेंगे।’
आज भी यह तीर्थ शकुंतला के दिये शाप से ग्रस्त है।
जिस तीर्थ में स्नान मात्र से सारे पाप धुल जाते थे,आज सारे गांव का गंदा पानी इसी तालाब में जमा होता है।
ऋषि दुर्वासा का स्वभाव;
ऋषि दुर्वासा जी जीवन-भर भक्तों की परीक्षा लेते रहे अपने महा ज्ञानी स्वरूप होने तथा सभी सिद्धियों के ज्ञान के बावजूद भी ऋषि दुर्वासा जी अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते थे जो उनकी सबसे बड़ी कमी भी रही।
उन्हें कभी-कभी अकारण ही भयंकर क्रोध भी आ जाता था।

अपने क्रोध के लिए प्रचलित मुनि दुर्वासा जी किसी को भी श्राप दे देते थे।
उन्होंने शकुन्तला को श्राप दिया और जिस कारण शकुंतला को अनेक कष्ट सहन करने पड़े।
इसी प्रकार उनके क्रोध से कोई भी नहीं बच पाया।
आम जन से लेकर राजा,देवता,दैत्य, असुर सभी उनके इस क्रोध के भागी बने।
ऋषि दुर्वासा के जीवन की प्रमुख घटनाएँ |
दुर्वासा ऋषि जी ने अपनी साधना एवं तपस्या द्वारा अनेक सिद्धियों को प्राप्त किया था अष्टांग योग का अवलम्बन कर उन्हें अनेक महत्वपुर्ण उपलब्धियां प्राप्त हुई थीं उनके जीवन में अनेकों ऎसी घटनाएं रहीं हैं जो सदियों तक अविस्मरणिय रहीं हैं और जिनके होने से कई घटना क्रमों की उत्पत्ति हुई
ऋषि दुर्वासा और कुंती;;
एक बार कुंती के अतिथ्य सत्कार से प्रसन्न होकर वह उसे एक मंत्र प्रदान करते हैं जिसके द्वारा वह किसी भी देव का आहवान करके उस देव के अंश को जन्म दे सकती थी।
इसी वरदान स्वरुप कुंती को कर्ण जैसे पुत्र समेत पांच पांडव प्राप्त हुए और जिनकी उत्पत्ति ने इतिहास में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।
दुर्वासा और कृष्ण;;
एक बार दुर्वासा कृष्ण के स्वभाव की परीक्षा लेते हैं की प्रकार से उन्हें विचलित करने का प्रयास करते हैं पर कृष्ण हर अवस्था में शांत स्वभाव व्यक्त करते हैं और एक दिन ऋषि उन्हें अपनी जूठी खीर को शरीर पर मलने को कहते हैं।
उनके आदेशनुसार कृष्ण अपने पूरे शरीर पर खीर लगा लेते हैं तो दुर्वासा प्रसन्न होकर कृष्ण को वरदान देते हैं कि सृष्टि का जितना प्रेम अन्न में होगा उतना ही तुम में भी होगा।
दुर्वासा और राजा अंबरीष;;
एक बारा दुर्वासा ऋषि महाराज अम्बरीष के राजभवन में पधारते हैं।
उस दिन राजा अंबरीष निर्जला एकादशी उपरांत द्वादशी व्रत पालन में थे।
पूजा पाठ करने के पश्चात राजा ने ऋषि दुर्वासा को प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन करते हैं ताकि वह अपना वर्त पूर्ण कर सकें परंतु ऋषि दुर्वासा यमुना स्नान करके ही कुछ ग्रहण करने की बात कहते हैं ओर चले जाते हैं।
इधर पारण का समय समाप्त हो रहा होता है।
अत: ब्राह्मणों के परामर्श पर राजा चरणामृत ग्रहण कर पारण करते हैं।
इस पर जब ऋषि दुर्वासा वहां पहुंच जाते हैं और जब उन्हें इस बात का बोध होता है तो उन्हें बहुत क्रोध आता है और वह राजा अम्बरीश को भस्म करने के लिए अपनी जटा से क्रत्या राक्षसी उत्पन्न करते हैं किंतु राजा बिना विचलित हुए भगवान विष्णु का स्मरण करने लगते हैं और वह राक्षसी जैसे ही उन पर आक्रमण करती है तो स्वत: ही अंबरीष का रक्षक सुदर्शन चक्र उसे भस्म कर देता है और दुर्वासा ऋषि को मारने के लिए सक्रिय हो जाता है।
अपनी रक्षार्थ दुर्वासाजी वहां से भागने लगते हैं परंतु उन्हें कहीं भी शरण नहीं मिलती तब वह शिवजी के पास जाते हैं।
भगवान शिव उन्हें विष्णु के पास भेजते हैं तब विष्णु जी उनसे कहते हैं कि यदि वह अपनी रक्षा करना चाहते हैं तो राजा अम्बरीष से क्षमा मांगें।
इस पर ऋषि दुर्वासा अंबरीष के पास जाते हैं तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगते हैं।

महर्षि दुर्वासा की यह दशा देखकर अंबरीष सुदर्शन चक्र की स्तुति कर उसे लौट जाने को कहते हैं।
इस प्रकार दुर्वासा ऋषि राजा के इस व्यवहार से अत्यंत प्रसन्न हो उन्हें आशीर्वाद देते हैं।
इस तरह से अनेकों घटनाएँ है जिनसे हमें ऋषि दुर्वासा के जीवन का ज्ञान होता है और अनेक शिक्षाऐं भी प्राप्त होती है।

#साभार_संकलित,,
महर्षि दुर्वासा की जय,,

सनातन धर्म की जय,,
जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,

जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सदा सर्वदा सुमंगल,,,

हर हर महादेव,

ॐ विष्णवे नमः,

जय भवानी,,,

जय श्री राम,,

विजय कृष्ण पांडेय

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

6 thoughts on “महर्षि दुर्वासा

    1. कुछ साहित्यकार पोस्ट करते है और कुछ मैं संकलन करता हु। आप भी व्हाट्सअप में शामिल हो सकते है।

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