Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

नीम का पेड़ लगाएं,,

मच्छरों से सदा के लिए मुक्ति पायें,,,
बचपन में मैं देखा करता कि प्रत्येक आँगन में,,

चौराहे पर नीम के पेड़ हुआ करते थे,,,

टूथ पेस्ट एवं फ्लीट या काला हिट की 

आवश्यकता नहीं होती थी,,,
मनुष्य के सुविधभोगी होने के लोभ से नीम के 

पेड़ लगाने की परम्परा ही समाप्त हो गयी है।
चारदीवारी के किनारे,,सड़कों के बीच में यूक्लिप्टस, देवदार या अन्य बृक्ष लगाए जाते हैं किन्तु इन बृक्षों 

से शोभा के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं होता है।
गाँव गाँव नगर नगर में मच्छरों की भरमार है,,

ये मच्छर भयंकर व्याधि एवं रोग को जन्म देते हैं,,,,
नीम का पेड़ मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को दूर रखने में अत्यंत सहायक होता है,,,

जहाँ नीम के बृक्ष होते हैं वहाँ मलेरिया नहीं 

फैलता है,,,

औषधीय गुणों के साथ ही यह विटामिन “ए” का समृद्ध श्रोत भी है,,,,

इसकी छाया से छनकर आनेवाली हवा,कृषि 

स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए अमृत मानी 

जाती है।

कार्बन डाईआक्साइड एवं अन्य घातक गैसों को सहने एवं हजम करने में नीम का पेड़ बहुत सक्षम होता है।
नीम की सघन पत्तियों से आक्सीजन पर्याप्त 

अधिक मात्रा में निकलता है।

उसकी पत्तियों में क्रूड प्रोटीन,क्रूड फाइबर, कार्बोहाइड्रेट,कैल्सियम और फास्फोरस भी 

अच्छी मात्रा में पाया जाता है।
ये तत्व रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ साथ 

वायु प्रदूषण को भी दूर करने में सक्षम होते हैं।

इसी लिए इसे एयर प्यूरीफायर भी कहा जाता है।
आवास के किसी ओर,,बड़े बड़े भवनों की चारदीवारी के किनारे,, नीम का बृक्ष अवश्य लगाएं और कई प्रकार की व्याधियों से छुटकारा पायें एवं स्वस्थ रहें।

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नीम भारतीय मूल का एक सदाबहार वृक्ष है।

इसका वानस्पतिक नाम ‘Melia azadirachta अथवाAzadiracta Indica’ है।

नीम का पेड़ सूखे के प्रतिरोध के लिए विख्यात है।
सामान्य रूप से यह उप-शुष्क और कम नमी 

वाले क्षेत्रों उन में फलता है जहाँ वार्षिक वर्षा 

400 से1200 मिमी के बीच होती है।

यह उन क्षेत्रों मे भी फल सकता है जहाँ वार्षिक 

वर्षा 400 से कम होती है पर उस स्थिति मे इसका अस्तित्व भूमिगत जल के स्तर पर निर्भर रहता है।
नीम कई अलग अलग प्रकार की मिट्टी में विकसित 

हो सकता है,लेकिन इसके लिये गहरी और रेतीली मिट्टी जहाँ पानी का निकास अच्छा हो,सबसे अच्छी रहती है।
यह उष्णकटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय 

जलवायु मे फलने वाला वृक्ष है,और यह 21-32° सेंटीग्रेड के बीच का औसत वार्षिक तापमान सहन कर सकता है। 
यह बहुत उच्च तापमान को तो बर्दाश्त कर 

सकता है,पर4 डिग्री सेल्सियस से नीचे के 

तापमान मे मुरझा जाता है।
नीम एक जीवनदायी वृक्ष है विशेषकर तटीय, 

दक्षिणी जिलों के लिए।

यह सूखे से प्रभावित (शुष्क प्रवण) क्षेत्रों के कुछ छाया देने वाले (छायादार)वृक्षों मे से एक है। 

यह एक नाजुक पेड़ नहीं हैं और किसी भी प्रकार 

के पानी (मीठा या खारा) में जीवित रहता है।
तमिलनाडु में यह वृक्ष बहुत आम है और इसको सड़कों के किनारे एक छायादार पेड़ के रूप मे उगाया जाता है,इसके अलावा लोग अपने आँगन 

मे भी यह पेड़ उगाते हैं।
शिवकाशी(सिवकासी) जैसे बहुत शुष्क क्षेत्रों में, 

इन पेड़ों को भूमि के बड़े हिस्से में लगाया गया है,

और इनकी छाया मे आतिशबाजी बनाने के कारखाने का काम करते हैं।
उपयोग
नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो कि भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। 

इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली है।
१- नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।
२- नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
३- नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है।
४- नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं,और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
५- नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
६- नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने 

से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
७- नीम की पत्तियों के रस को आंखों में 

डालने से आंख आने की बीमारी (नेत्रशोथ 

या कंजेक्टिवाइटिस) समाप्त हो जाती है।
८- नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ 

के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है,

और इसको कान में डालने कान के विकारों में भी फायदा होता है।
९- नीम के तेल की ५-१० बूंदों को सोते समय दूध 

में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।
१०- नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा 

होता है।
विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग
1. नीम की जड़ को गर्भवती स्त्री के कमर में बांधने से बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है। 

किन्तु बच्चा पैदा होते ही नीम की जड़ को कमर से खोलकर तुरन्त फेंक देने का सुझाव दिया जाता है। 

यह प्रयोग देश के कुछ ग्रामीण अंचलों में होते देखा गया है।

परीक्षणों के बाद आयुर्वेद ने भी इसे मान्यता दी है।
2. प्रसूता को बच्चा जनने के दिन से ही नीम के पत्तों का रस कुछ दिन तक नियमित पिलाने से गर्भाशय संकोचन एवं रक्त की सफाई होती है।

गर्भाशय और उसके आस-पास के अंगों का सूजन उतर जाता है,भूख लगती है,दस्त साफ होता है,ज्वर नहीं आता।

यदि आता भी है तो उसका वेग अधिक नहीं होता।

यह आयुर्वेद का मत है।
3. आयुर्वेद के मतानुसार प्रसव के छ: दिनों तक प्रसूता को प्यास लगने पर नीम के छाल का औटाया हुआ पानी देने से उसकी प्रकृति अच्छी रहती है।

नीम के पत्ते या तने के भीतरी छाल को औंटकर 

गरम जल से प्रसूता स्त्री की योनि का प्रक्षालन करने से प्रसव के कारण होने वाला योनिशूल (दर्द) और सूजन नष्ट होता है। 

घाव जल्दी सूख जाता है तथा योनि शुद्ध तथा संकुचित होता है।
4. प्रसव होने पर प्रसूता के घर के दरवाजे पर नीम की पत्तियाँ तथा गोमूत्र रखने की ग्रामीण परम्परा मिलती है।

ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि घर के अन्दर दुष्ट आत्माएं अर्थात संक्रामक कीटाणुओं वाली हवा न प्रवेश करे।

नीम पत्ती और गोमूत्र दोनों में रोगाणुरोधी (anti bacterial)गुण पाये जाते हैं।

गुजरात के बड़ौदा में प्रसूता को नीम छाल का काढ़ा एवं नीम तेल पिलाया जाता है,इससे भी स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
5 आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल ४ माशा तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औंटकर,जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है।
6. स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर 

नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से 

लाभ होता है।

एक बड़े व चौड़े बर्तन में नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में जो सुसुम हो, बैठने से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है।

पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही सुझाव दिया जाता है।

इससे सूजन भी उतर जाता है और पेशाब ठीक होने लगता है।
7. नीम पत्ती को गरम कर स्त्री के कमर में बांधने से मासिक धर्म के समय होने वाला कष्ट या पुरूषप्रसंग के समय होने वाला दर्द नष्ट होता है।
8. नीम के पत्तों को पीस कर उसकी टिकिया तवे पर सेंककर पानी के साथ लेने से सहवास के समय स्त्री योनि के अन्दर या पुरूष लिंग में हुए क्षत भर जाते हैं, दर्द मिट जाता है।
9. घाव चाहे छोटा हो या बड़ा नीम की पत्तियों के उबले जल से धोने,नीम पत्तियों को पीस कर उसपर छापने और नीम का पत्ता पीसकर पीने से शीघ्र लाभ होता है। 

फोड़े-फुंसी व बलतोड़ में भी नीम पत्तियाँ पीस कर छापी जाती हैं।
10. दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीमका तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। 

नीम की पत्तियाँ भी पीसकर छापने से लाभ होता है।
11. गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने परलाभ होता है।
12. नीम की पत्तियों का रस,सरसों का तेल और पानी,इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी 

ठीक हो जाते हैं।
13. नीम का मरहम लगाने से हर तरह के विकृत,विषैले एवं दुष्ट घाव भी ठीक होते हैं। 

इसे बनाने की विधि इस प्रकार है-नीम तेल एक 

पाव, मोम आधा पाव,नीम की हरी पत्तियों का 

रस एक सेर,नीम की जड़ के छाल का चूर्ण एक छटाक,नीम पत्तियों की राख ढाई तोला।

एक कड़ाही में नीम तेल तथा पत्तियों का रस 

डालकर हल्की आँच पर पकावें।

जब जलते-जलते एक छटाक रह जाय तब 

उसमें मोम डाल दें।

गल जाने के बाद कड़ाही को चूल्हे पर से उतार 

कर और मिश्रण को कपड़े से छानकर गाज 

अलग कर दें।

फिर नीम की छाल का चूर्ण और पत्तियों की राख उसमें बढ़िया से मिला दें।

नीम का मरहम तैयार।
14. हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भष्म लगाने से लाभ होता है।
15. छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है।

जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।
16.वसंत ऋतु में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती तथा गोलमीर्च पीसकर खाली पेट पीने से साल भर तक कोई चर्मरोग नहीं होता,रक्त शुद्ध रहता है।

रक्त विकार दूर करने में नीम के जड़ की छाल,

नीम का मद एवं नीम फूल का अर्क भी काफी गुणकारी है।

चर्मरोग में नीम तेल की मालिश करने तथा छाल 

का क्वाथ पीने की भी सलाह दी जाती है।
17. नीम की हरी निबोली का दूध आँखों पर लगाने से रतौंधी दूर होती है।

आँख में जलन या दर्द हो तो नीम की पत्ती कनपटी पर बांधने से आराम मिलता है।

नीम के पत्ते का रस थोड़ा सुसुम कर जिस ओर 

आंख में दर्द हो,उसके दूसरी ओर कान में डालने 

से लाभ होता है।

दोनों आँख में दर्द हो तो दोनों कान में सुष्म तेल डालना चाहिए।
18. शुष्ठी और नीम के पत्तों को सेंधा नमक के साथ पीसकर नेत्र पलकों पर लगाने से सूजन,जलन,दर्द तथा आंखो का गड़ना समाप्त होता है।
19. नीम का तेल आँखों में आँजने और नीम का 

मद ६ तोला दो तीन दिन तक प्रात: पीने से भी 

रतौंधी दूर होती है।

किन्तु मद को दो-तीन दिन से अधिक नहीं पीना चाहिए।
20. नीम का तेल गर्म कर एवं थोड़ा ठंढ़ा कर कान 

में कुछ दिन तक नियमित डालने से बहरापन दूर होता है।
21.घाव एवं उससे मवाद आने में नीम का रस 

(मद) शहद के साथ मिलाकर डालने या बत्ती भिंगोकर कान में रखने से मवाद निकलना बन्द 

होता है और घाव सूखता है।
22. मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर 

नीम के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है।

इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं।

नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है।
23. बालों में नीम का तेल लगाने से जुएं तथा रूसी नष्ट होते हैं।
24. आंत में पड़ने वाली सफेद कृमि या केचुए को जड़ से नष्ट करने में संभवत: नीम जैसा गुणकारी कोई अन्य औषधि नहीं है।

नीम की पत्ती १५-२० नग तथा काली मिर्च १० नग थोड़े से नमक के साथ पीसकर एक गिलास जल में घोलकर खाली पेट ३-४ दिन तक पी लेने से इन कृमियों से कम से कम २-३ वर्ष तक के लिए मुक्ति मिल जाती है।
25. नीम के अन्तर छाल का चूर्ण, सोंठ तथा मीर्च 

का काढ़ा विषम ज्वर में देने से लाभ होता है।
26. तेज सिहरनयुक्त ज्वर के साथ कै होने पर नीम की पत्ती के रस शहद एवं गुड़ के साथ देने से लाभ होता है।

नीम का पंचांग (पता, जड़ फूल, फल और छाल) 

को एक साथ कूटकर घी के साथ मिलाकर देने से 

भी लाभ होता है। 

यह सुश्रुत एवं काश्यप का मत है।
27. साधारण बुखार में नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पानी में छानकर पिलाने से बुखार उतर जाता है।
28. चेचक कभी निकले ही नहीं,इसके लिए आयुर्वेद मत में उपाय है कि चैत्र में दस दिन तक प्रात:काल नीम की कोमल पत्तियाँ गोल मिर्च के साथ पीस कर पीना चाहिए।

नीम का बीज, बहेड़े का बीज और हल्दी समान भाग में लेकर पीस-छानकर कुछ दिन पीने से भी शीतला/चेचक का डर नहीं रह जाता।

चेचक में भूलकर भी नीम के अलावे कोई दूसरा इलाज करना बैद्यों ने मना किया है।
29. नीम का रस (मद) या छाल का क्वाथ शहद 

में मिलाकर नित्य सुबह लेने से पिलिया में लाभ 

होता है।

मोथा और कियू (Costus speciosus) के जूस 

में नीम का छाल मिलाकर उसका क्वाथ देने से भी यह रोग नष्ट होता है।
30. नीम के तने की भीतरी छाल तथा मेथी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित पीने से मधुमेह की हर स्थिति में लाभ मिलता है।
31. गठिया,बातरोग,साइटिका,जोड़ों में दर्द (अर्थराइटीस) में नीम तेल की मालिश,नीम की पत्तियों को पीसकर एवं गर्म कर जोड़ों पर छापने, नीम का मद पीने,नीम के सूखे बीज का चूर्ण हर तीसरे दिन महीने भर खाने से काफी लाभ मिलता है।

नीम के छाल को पानी के साथ पीस कर जोड़ों के दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करने से भी दर्द दूर होता है।
32. नीम का शुद्ध तेल ३० से ६० बूंद तक पान में रखकर खाने से दमा से छुटकारा मिलता है।

नीम के २० ग्राम पत्ते को आधा लीटर पानी में उबालकर जब एक कप रह जाय,कुछ दिन पीते 

रहने से भी दमा जड़ से नष्ट होता है।
33. नीम की पत्तियों की राख २ माशा जल के साथ नियमित कुछ दिन तक खाते रहने से पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।
34. कई वर्षों तक लगातार हर साल १०-१५ दिन तक नीम की पत्तियों का सेवन किये हुए व्यक्ति को सर्प, बिच्छू आदि के विष का असर नहीं होता।

नीम बीज का चूर्ण गर्म पानी के साथ पीने से भी 

विष उतरता है।
35. नीम के पंचांग (पत्ता,जड़,फूल,फल एवं छाल) तथा मिश्री एक-एक तोला पानी के साथ पीसकर पीने से लू का प्रभाव नष्ट होता है।

नीम की पत्ती पीसकर नीम के रस के साथ माथे पर छापने से भी लू का असर कम होता है।
36. चैत्र में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती एवं काली मिर्च पीने वाले व्यक्ति को गर्मी में लू नहीं लगती, शरीर में ढंठक बनी रहती है,कोई फोड़ा-फूंसी,चर्मरोग भी नहीं होता।
37. नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है।

नीम का महीने में १० दिन तक सेवन करते रहने 

से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है।

कोयम्बटूर के एक आयुर्वेदीय अनुसंधान संस्थान में पशुओं पर प्रयोग करके देखा 

गया कि २०० ग्राम तक नीम पत्तियों के प्रयोग से कैलेस्ट्रोल की मात्रा काफी कम हो जाती है। 

लीवर की बीमारी में भी नीम पत्ती का सेवन लाभदायक पाया गया है।
38.एक स्वस्थ व्यक्ति को अनावश्यक रूप से नीम का अधिक सेवन नहीं करना चाहिये,इससे नपुंसकता आती है। 

बहुत से साधु-संत प्रबल कामशक्ति को जीतने के लिए बारहो मास नीम का सेवन करते हैं।

#साभारसंकलित

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जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,

जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सदा सुमंगल,,

वन्देमातरम,,,

जय भवानी

जय श्री राम

विजय कृष्णा पांडेय

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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