Posted in संस्कृत साहित्य

अण्डे में जहर – साकाहारी बने


*अण्डे में जहर*
लोग मुर्गी के अण्डे को शाकाहार कहकर हड़प करने लगे हैं। सारा संसार जानता है कि मुर्गी पक्षी है, जीव है। इसके पेट से अण्डे की उत्पत्ति होती है तो फिर इसको शाकाहार कैसे कहते हैं?

बड़े आश्चर्य और कौतूहल की बात है कि जब संसार भर की सारी शाक-सब्जियां तो धरती माता के पेट से उत्पन्न होती हैं, यह ऐसी कौन-सी सब्जी विशेष हो गई(केवल मांसाहारियों के लिए) जो ईश्वर ने मुर्गी-माता के पेट से पैदा कर दी? जीव के पेट से तो जीव ही पैदा होता है। सिद्धान्त के अनुसार मुर्गी के अण्डे में से इक्कीस दिनों के पश्चात् चूजा या बच्चा निकल जाता है। उस अण्डे में से शाक की भांति मूली, गाजर, बैंगन, तोरई, टमाटर आदि पैदा क्यों नहीं हुए, चूजे या बच्चे (चलते-फिरते) कैसे निकल आए?
आजकल के नए वैज्ञानिक इसके लिए एक और तर्क पेश करते हैं। वे कहते हैं मुर्गी दो प्रकार के अण्डे देती है। एक खाकी infertile (जिसमें बच्चा नहीं होता) और दूसरे Fertile (जिसमें से बच्चा निकलता है।)
इन बुद्धिमानों से कोई यह पूछे कि भाई-क्या मुर्गी के अण्डे देते ही तुम में से कोई वैज्ञानिक या विशेषज्ञ यह बता सकता है कि यह अण्डा जिसे मुर्गी ने अभी-अभी दिया है, उसमें बच्चा है या नहीं? अथवा कौन-सा अण्डा (Fertile or Infertile) है? संसार में कोई एक्सपर्ट एक सप्ताह से पहले इसका निर्णय नहीं कर सकता। क्योंकि कम से कम एक सप्ताह में मशीन के द्वारा यह जांच की जाती है कि यह अण्डा (Fertile या Infertile) है या नहीं।
परन्तु जितने अण्डे खाने वाले हैं, वे जहां से भी अण्डा खरीदते हैं, दुकानदार से यह पूछते हैं कि यह अण्डा ताजा है? दुकानदार फौरन उत्तर देता है कि कल का है ताजा है।

जिन अण्डों को मुर्गी सेती हैं उनकी बात जाने दो। वह तो स्वयं जानती है। जिस अण्डे में से बच्चा नहीं निकलने वाला होता है, मुर्गी सेती ही नहीं। या तो उस अण्डे को अपने पंजों से फोड डालती है या खा जाती है या उसको अपने दड़वे (पंजों के नीचे) से बाहर निकाल देती है। मुर्गी का मालिक उसको खाकी (Infertile) समझ कर उठा लेता है।

अब उन अण्डों की बात है जिनका लोग व्यापार करते हैं अर्थात् जो सैकड़ों-हजारों की संख्या में मुर्गियां पालते हैं, पोल्ट्रीफार्म बनाते हैं। फार्म में तो सैकड़ों-हजारों अण्डे प्रतिदिन प्राप्त होते हैं। पोल्ट्री फार्मिग करने वाले लोगों के पास अण्डे निकालने की मशीन होती है जिसको इन्क्यूबेटर (Incubator) कहते हैं। इसमें हजारों अण्डे एक समय में ही लगाए जाते हैं। परन्तु लगाने से पूर्व उनको लगभग एक सप्ताह कोल्ड स्टोर में रखा जाता है। वहां से अण्डों की छटनी होती है। मशीन के द्वारा यह पता लगा लेते हैं कि कौन से अण्डों में से बच्चा निकल सकता है, उनको इन्क्यूबेटर में लगा देते हैं और शेष कई दिन के बासी, गले-सड़ों को बाजार में भेज देते हैं। ये अण्डे खराब और गन्दे हो जाते हैं। खाने के बिल्कुल योग्य नहीं रहते। इनमें से बदबू आने लग जाती है। इनकी जर्दी और सफेदी दोनों ही काम की नहीं रहती। अधिक लोग इन छटे हुए अण्डों से रोगी हो जाते हैं क्योंकि वे मार्किट में सस्ते मिलते हैं। लोग खाते हैं और मरते हैं।
आज सर्वत्र अण्डे खाने का प्रचार हो रहा है। सम्भवत: कोई परिवार अथवा परिवार का कोई सदस्य बचा होगा इसके प्रयोग से, *कुछ सात्विक प्रवृत्ति के लोगों को छोड़कर अथवा जो आर्य समाजी संस्कार के हैं उनको छोड़ कर।* भारत के प्रत्येक प्रदेश की पाठ्य पुस्तकों में अण्डा, मांस, मछली खाने के पाठ हैं और उनमें अण्डे आदि के खाने की पर्याप्त प्रशंसा और विज्ञापन है। इससे हमारी आने वाली सन्तान के संस्कार बिगड़ते हैं परन्तु हम इस ओर ध्यान ही नहीं देते। ये पाठ्य पुस्तक हमारे बच्चों के लिए विष का काम करती हैं। आज कोई जरा सा रोगी हुआ, दो-तीन दिन के रोग से शरीर में थोड़ी-सी शिथिलता या कमजोरी आई कि डॉक्टर तुरन्त उसको अण्डा, मांस, मछली खाने के लिए अपनी अनुमति ही नहीं अपितु जोर के साथ आदेश भी दे देता है। यदि दुर्भाग्य से कोई सात्विक प्रवृत्ति या धार्मिक विचार का स्त्री-पुरुष न खाए तो वह उसको न अच्छा होने की धमकी के साथ-साथ रोग न ठीक होने की बात भी कहता है और अण्डा न खाने से मर जाने तक के लिए गारन्टी की बात कह देता है।यह हमारे स्वास्थय के दाताओं का हाल है।
वास्तव में देखा जाए तो मुसलमानों और अंग्रेजों ने तो खासकर अन्य भारतीयों की रुचि इस ओर बढ़ाई ही है, इसके साथ यहां के डॉक्टरों ने भी अण्डे खाने के लिए लोगों में रुचि पैदा की है और खाने के लिए लालायित भी किया है। जितने भी रोगी आते हैं, सब ही को अण्डा, मांस, मछली खाने के लिए उत्साहित और अधिकारपूर्ण आदेश देते हैं।
विदेशी डॉक्टरों, प्रोफेसरों, रिसर्च स्कालरों तथा अनुभवियों की राय है कि अण्डों में थोड़ी प्रोटीन है ये हमें कुछ शक्ति देते हैं परन्तु इससे अधिक सोयाबीन में है, जितनी शाक-सब्जी, लोभिया, मटर, चने, मूंग, उड़द जैसी दालों में और बादाम, काजू, पिस्ता, मूंगफली जैसे मेवों में मौजूद है, इतनी अण्डों में नहीं।
विदेशी डॉक्टरों की राय पढ़कर यह अनुमान लगाएं कि वास्तव में अण्डों में विष है। ये अनेक प्रकार के रोगों से भरे पड़े हैं। इनके प्रयोग से हमारा शरीर जीर्ण-शीर्ण ही नहीं अपितु क्षीण होकर हम शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

विष्णुगुप्त चाणक्य

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