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पृथ्वी के नाना रूप और वर्जनाएं

#आनंद_का_आषाढ़ 
विक्रमीय संवत्सर में आषाढ़ मास की कई परंपराएं प्राचीन स्मृतियों की संधारक है और उन मान्यताओं का बने रहना विश्वास से कहीं अधिक वैज्ञानिक भी हो सकता है। जेठ के समापन और आषाढ़ के आरंभ के 3-3 दिन पृथ्वी के ऋतुमती होने के माने जाते हैं। यह मत मुनि पराशर का है जिनका कृषि शास्त्र पुष्कर से लेकर उदयगिरि तक पालनीय रहा है। 
प्राचीन काल में ये छह दिन इतने खास माने गए थे कि औजार लेकर कोई भी खुदाई करने खेत की ओर नहीं जाता और न ही बीजों की बुवाई करता। पराशर के शास्त्र में कहा है कि एेसी चेष्टा करने वाला पाप से नष्ट हो जाता है :
वृषान्ते मिथुनादौ च त्रिण्यहानि रजस्वला। 

बीजं न वापयेत्तत्र जन: पापाद् विनश्यति।।
देवी भागवत, जिसमें मध्यकालीन परंपराएं प्रचुरता लिए हैं, में “अंबुवाची योग” के नाम से भूमि के अस्पर्श होने की धारणा मिलती है। हालांकि, यहां आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण को गिना गया है लेकिन यह साफ तौर पर कह दिया गया है कि इस अवधि में जो पृथ्वी को खोदते हैं, वे ब्रह्महत्या के भागी होते हैं। वे मरकर भी चार युगों तक कीट के कांटे वाले नरक में रहते हैं। 
लगता है कि एक तरह से यह विचार एक धर्मशास्त्रीय निर्देश के रूप में है क्योंकि पुराणकार दो बार यह मत जोर देकर लिखा है। (९, १०, १४ व ९, ३४, ४८) स्पष्टत: यह परंपरा उत्तरी भारत में रही क्योंकि पुराणकार यह भी संकेत करता है : अंबुवाच्यां भूखननं जलशौचादिकं च ये। कुर्वन्ति भारते वर्षे ब्रह्महत्यां लभन्ति ते।। (४८) 
यही नहीं, पराशर ने भी यह मत दोहराया है : 
मृगशिरसि निवृत्ते रौद्रपादेऽम्बुवाची। 

भवति ऋतुमती क्ष्मा वर्जयेत् त्रीण्यहानी।। (१७६)
आषाढ़ की अन्य वर्जनाओं में भूमि का कीचड़मय होना भी है : आषाढे कर्दमान्विता। बारिश होते ही भूमि कर्दमी हो जाती है और फिर तत्काल, बगैर तैयारी बुवाई लाभकारी नहीं होती। एेसे में तैयारी करके ही बीजों को स्पर्श करने का मत है।
है न आषाढ़ की अनूठी परंपराएं और मान्यताएं ! इनका विकास किसी एक काल की देन नहीं है लेकिन इनसे यह भी तो जाहिर होता है कि कृषि की ये गूढ़ बातें आदमी से पहले औरतों ने जानी होंगी और बहुत परखी होंगी तभी औरों ने मानी होंगी।

जय जय।
बारिश के पूर्वानुमान का मास : आषाढ़

#आनंद_का_आषाढ़
ज्येष्ठ के बाद आषाढ़ मास को बारिश के योग परीक्षण का अवसर माना गया है। ज्योतिर्विदों ने ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद पूर्वाषाढ़ा आदि 27 नक्षत्रों यानी लगभग इतने ही दिनों तक बारिश कैसी और कब होती है, उसके अनुसार वर्षाकाल पर विचार करना अभीष्ट माना है। 
यूं तो पूर्वकाल में बारिश के हाल को जानने और बताने की दैवज्ञों में दीवानगी ही थी। वे मेघ गर्भधारण से लेकर उनके 195 दिन तक पकने और बरसने पर चातक की तरह ध्यान लगाए रखते थे और अपनी बात को सच्ची सिद्ध करने को कमर बांधे रखते थे। यदि वराहमिहिर की माने तो बारिश के हाल के अध्ययन के लिए तब तक गर्ग, पराशर, काश्यप और वज्रादि के शास्त्र और उनके निर्देश कंठस्थ होते थे और दैवज्ञ दिन-रात मेघों पर ध्यान लगाए रहते थे जिनके लिए वराहमिहिर ने ‘विहितचित्त द्युनिशो” कहा है। 
एेसे मानसून अध्येता वराह के इलाके से लेकर मेवाड़ तक आज भी इक्का-दुक्का मिल जाते हैं और ‘गरभी’ कहे जाते हैं जिनमें कुछ के तुक्का तीर की तरह लग भी जाते हैं। हालांकि वे वराह जैसे शास्त्र नहीं पढ़े होंगे।
आषाढ़ में नक्षत्रों के अनुसार भी कितनी और कहां बारिश होती है, इसके अनुसार आने वाले वर्षणकाल में कहां कितना पानी गिरेगा ? यह कहने की रोचक परंपरा रही है। कश्यप ने एक प्रदेश में ही पर्याप्त वर्षा के आधार पर अच्छी वर्षा की गणना की बात कही तो देवल ने 10 योजन तक बारिश को अनुमान का आधार बनाने का विचार दिया। गर्ग, वसिष्ठ व पराशर ने 12 योजन तक वृष्टि होने पर वर्षाकाल में उत्तम बरसात बताई। इस प्रकार तीन तरह की धारणाएं 6वीं सदी तक थीं और वराह ने इनका न केवल अनुसरण किया बल्कि उन मतों काे यथारूप महत्व भी दिया। बृहत्संहिता ही नहीं, समाससंहिता और पंचसिद्धांतिका में ये विश्वास जनहित में प्रस्तुत किए।
ये विचार प्रवर्षणकाल को लेकर लिखे गए और आषाढ़ मास यह कालावधि है : 
आषाढादिषु वृृष्टेषु योजन द्वादशात्मके।

प्रवृष्टे शोभनं वर्षं वर्षाकाले विनिर्दिशेत्।। (गर्गसंहिता प्रवर्षणाध्याय)
हां, यह भी आषाढ़ के प्रवर्षण नक्षत्र की बढ़ाई वाली बात ये है कि वही नक्षत्र प्रसव काल में भी बरसता है। तो है न आषाढ़ आनंददायी ! बहुत कुछ बता और सीखा सकता है लेकिन कब, जबकि हम ध्यान लगाए रहें। हां, इस संबंध में कुछ अपना अनुभव भी हो तो बताइयेगा। 
अाषाढ़ : वर्षा योग पर विचार के दिन
हमारे यहां ज्‍येष्‍ठ की पूर्णिमा के बीतने और आषाढ़ लगने पर जिस भी नक्षत्र में बारिश होती, उस के आधार पर पूरे चौमासे में वर्षा की न्‍यू‍नाधिकता का अनुमान लगाया जाता था। यह वर्षा संबंधी नक्षत्रों में बारिश का समय 27 दिन की अवधि का ‘प्रवर्षण काल’ के नाम से जाना जाता था। गर्गसंहिता, जो अब विलुप्‍त हो चुकी है (श्रीकृष्‍ण चरित्र वाली 16वीं सदी की वर्तमान में उपलब्‍ध रचना से अलग, संभवत: शुंगकाल में लिखित गर्गसंहिता) में यही कहा गया है कि ज्‍येष्‍ठ के बीत जाने पर प्रतिपदा तिथि से आगे की तिथियों पर, मूल नक्षत्र को छोड़कर परिवेश में होने वाले निमित्‍तों को देखकर वर्षा का अनुमान किया जाना चाहिए। गर्ग संहिता का यह श्‍लोक वराहमिहिर की बृहत्‍संहिता की भटोत्‍पलीय विवृत्ति में उपलब्‍ध है – 
ज्‍येष्‍ठे मूलमतिक्रम्‍य मासि प्रतिपदग्रत:। 

वर्षासु वृष्टिज्ञानार्थं निमित्‍तान्‍युपलक्षयेत्।।
बाद में, इसके साथ पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के अनुसार वर्षाफल देखने की परंपरा जुड़ी क्‍योंकि तब तक यह मान लिया गया था कि पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र वर्षा का अनुमान देने वाला नक्षत्र है। उस समय एक हाथ के बराबर व्‍यास वाले और एक हाथ गहरे गोलाकार कुण्‍ड से जल का मापन किया जाता था। इसमें करीब 50 पल प्रमाण जल जमा होता था। यह 50 पल एक आढ़क (करीब 4 किलो) कहा जाता था और 4 आढ़क के बराबर एक द्रोण होता था। 
वराहमिहिर सिद्ध करते हैं कि उनसे पहले जिन दैवज्ञों, मुनियों ने वर्षा के अनुमान के लिए अपनी धारणाएं दी थी, वे कश्‍यप, देवल और गर्ग थे। कश्‍यप मुनि का मानना था कि जिस प्रदेश में प्रवर्षण काल में बारिश होती, तो वह पूरे देश के लिए विचारणीय होती थी। देवल कहते थे कि इस काल में यदि दस योजन तक बारिश हो तो उत्‍तम बारिश होती है और गर्ग, वसिष्‍ठ व पराशर मानते थे कि 12 योजन तक किसी नक्षत्र में बारिश हो जाए तो बेहतर वृष्टि जाननी चाहिए। यह भी विचार था कि प्रवर्षण काल में पूर्वाषाढ़ा आदि जिस किसी नक्षत्र में बारिश होती है, प्रसव काल में उसी नक्षत्र में फिर बरसात होती है और यदि न हो तो प्रसव काल में भी सूखा ही रहता है।
प्रवर्षण काल में हस्‍त, पूर्वाषाढ़ा, मृगशिरा, चित्रा, रेवती या धनिष्‍ठा नक्षत्र में बरसात हो तो पूरे सोलह द्रोण बारिश होती है… ऐसे कई अनुमान हैं जो अनुभव आधारित रहे हैं। उस काल का अपना वर्षा विज्ञान था। मयूरचित्रकम्, संवत्‍सरफलम्, घाघ भड्डरी, डाक वचनार, गुरु‍संहिता, काश्‍यपीय महासंहिता, कृषि पराशर, गार्गिसंहिता आदि में ढेर सारे प्रमाण दिए गए हैं।* यानी कि यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है।
जय जय।

– डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
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* परिमल पब्लिकेशंस, 27-28 शक्तिनगर, दिल्‍ली से आई डाॅ. अनुभूति चौहान संपादित ‘वृष्टिविज्ञान’ में भी इस संबंध में विशेष विमर्श है।

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