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भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए हुई थी “श्वेत क्रांति”

 

 

भारत में अंग्रेजों  के विरुद्ध 1857 का विद्रोह हो चुका था | हिंदुस्तान के कुछ गद्दार राजाओं का समर्थन मिलने की वजह से अंग्रेजों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को पूरी तरह कुचल दिया था | राष्ट्र के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को चुन-चुन कर अंग्रेजों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर उल्टा लटका कर जिंदा आग में जला कर भून दिया गया था और कुछ लोगों को सरेआम पेड़ों पर लटका कर फांसी दे दी गई थी | शहीदों की लाशें तब तक लटकती रहीं जब तक उनमें बदबू नहीं आने लगी और उन्हें चील कौए नोंच-नोंच कर नहीं खाने लगे | लोग इन लाशों को कोई उतार न ले इसलिए पुलिस के हिंदुस्तानी सिपाही इन लाशो की हिफाजत में बन्दूक लेकर तैनात थे | 
ब्रिटेन के संसद से भारतीयों को दण्डित व नियंत्रित करने के लिए “भारतीय दंड संहिता 1860”  लागू हो गई थी | साथ ही भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार को समाप्त करने के लिए “आर्म्स एक्ट 1878” भी लागू कर दिया गया था | विद्रोह को इस बुरी तरह से कुचला गया था ताकि अब अंग्रेजों के लूट के विरुद्ध आवाज उठाने वाला कोई भी व्यक्ति न बच सके | इसमें बहुत से निर्दोष हिंदुस्तानियों को भी तोप के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया था |

 

भारत से लूटी गई संपदा से ब्रिटेन के अंदर बड़ी-बड़ी एलोपैथी दवाओं के निर्माण के लिये प्रयोगशालाएं स्थापित की जाने लगी थी | जिनमें एलोपैथी दवाइयों का निर्माण शुरू हो गया था और इन दवाओं की खपत के लिए भारत के अंदर ब्रिटिश सत्ताधारियों द्वारा तरह-तरह के वायरस छोड़े कर चेचक, प्लीज, हैजा, जैसे गंभीर रोग हिंदुस्तान में फैला कर बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानियों की हत्या की जाने लगी थी | किंतु ब्रिटिश डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने देखा के हिंदुस्तान के अंदर यह वायरस उतने प्रभावशाली नहीं थे, जितने अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में थे | परिणामत: एलोपैथी दवाइयों की खपत अन्य ब्रिटिश उपनिवेश के मुकाबले भारत में काफी कम थी | अब इन वायरसों के भारत में कम प्रभावी होने का कारण ढूंढा जाने लगा |

 

निष्कर्ष यह निकला के भारत के अंदर  भारतीय ऋषियों द्वारा तैयार किया गया जो भारतीय नस्ल का गोवंश था, वह एक विशेष तरह का दूध देता है | जिसके अंदर प्राकृतिक रूप से सुपाच्य स्वर्ण होता है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों के अंदर “रोग प्रतिरोधक क्षमता” विकसित करता है क्योंकि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित किये गये गोवंश की पीठ पर एक विशेष तरह की “सूर्यकेतु नाड़ी” होती है जो सूर्य से ऊर्जा लेकर सुपाच्य स्वर्ण अपने अंदर विकसित करती है | यही सुपाच्य स्वर्ण भारतीयों को रोगी होने से बचाती है | जिसका निरंतर प्रयोग करने के कारण हिंदुस्तानियों के शरीर में एक ऐसी अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिसके ऊपर ब्रिटिश प्रयोगशालाओं में तैयार किया गया कोई भी घातक से घातक वायरस असर नहीं करता | 
अब एलोपैथी दवाइयों का उत्पादन और व्यवसाय करने वालों के आगे यह समस्या थी कि वह इन भारतीय नस्ल के गौवंशों को कैसे समाप्त करें | इसके लिए अनेक भारतीय  डॉक्टर और वैज्ञानिकों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की जाने लगी तथा भारतीय गोवंश की कमियाँ बतलाई जाने लगी | किंतु आस्था और संस्कार के कारण भारतीय डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के प्रयास के बाद भी भारतीय नस्ल के गोवंशों के विरुद्ध ब्रिटिश एलोपैथी व्यवसाइयों का यह षड्यंत्र सफल नहीं हुआ | 

 

अतः कालांतर में भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करने के लिए दूसरा रास्ता अपनाया गया | वह था “श्वेत क्रांति” इस श्वेत क्रांति में यह तय किया गया कि यदि भारत के अंदर भारतीय नस्ल के गोवंश को समाप्त करके फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के गोवंश को पालने की आदत भारतीयों में  अधिक दूध प्राप्त करने का लालच देकर पैदा कर दी जाए | तो भारतीय स्वयं ही भारतीय नस्ल का गोवंश छोड़कर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश का पालन शुरू कर देंगे | 
इसके लिये भारतीय नस्ल के  “बैल व सांड़” को अनुपयोगी पशु बतला कर खत्म करने के लिए पूरे देश भर में पशु कत्लखानों की स्थापना की जाने लगी | जिसमें भारतीय नस्ल के “बैल व सांड़” खुलेआम लाइसेंस देकर कत्ल किए जाने लगे | जिस कारण से भारतीय नस्ल की गायों को प्रजनन हेतु “बैल व सांड़” मिलने बंद हो गए | अतः मजबूरीवश फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश से भारतीय नस्ल के गायों का प्रजनन करवाया जाने लगा | इस कार्य के लिए भारत वर्ष में सन् 1937 में पैलेस डेयरी फार्म मैसूर में पहला  “कृतिम गर्भाधान विभाग” का निर्माण किया गया | आज भी का पशुपालन विभाग के अधीन “कृतिम गर्भाधान विभाग” द्वारा फ्रीजियन और जर्सी नस्ल के गोवंश के वीर्य को संग्रह करके भारतीय नस्ल की गायों में प्रजनन हेतु प्रयोग किया जाता है |

 

 और इसके अलावा बैंकों के माध्यम से फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय व भैंसों को खरीदने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में किसानों और दुग्ध व्यवसायियों को कर्ज दिया जाने लगा | धन के लालच में लाखों की संख्या में भारतीय किसानों और दुग्ध व्यवसायियों होने फ्रीजियन और जर्सी नस्ल की गाय तथा भैंसों को पालना शुरू कर दिया कालांतर में यह  प्रचार किया जाने लगा कि भारतीय नस्ल का गोवंश कम दूध देता है | अतः आर्थिक दृष्टिकोण से यह उपयोगी नहीं है |
 

यह सारे प्रयास “श्वेत क्रांति” योजना के तहत किये गये | इस तरह “श्वेत क्रांति” के नाम पर भारत में अमृत तुल्य दूध देने वाली भारतीय नस्ल के गोवंश को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश एवं भैसों का प्रयोग किया जाने लगा |

 

 

अगर भारत को पुनः स्वस्थ करना है तो “योगा” के नाम पर शारीरिक व्यायाम करने से भारत स्वस्थ नहीं होगा बल्कि भारत के अंदर पुनः भारतीय ऋषि द्वारा विकसित “भारतीय नस्ल का गोवंश” ही  दूध के लिए फ्रीजियन और जर्सी नस्ल का गोवंश या भैंस के स्थान पर स्थापित करना होगा |

 

योगेश कुमार मिश्र 

9451252162

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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