Posted in सुभाषित - Subhasit

*ओशो* से किसी ने पूछा-

*”राजनैतिक लुच्चों-लफंगों से देश को छुटकारा कब मिलेगा…?”*

*ओशो* ने जवाब दिया,

*”बहुत कठिन है, क्योंकि प्रश्न “छुटकारे” का नहीं है, प्रश्न तो तुम्हारे “अज्ञान के मिटने” का है…!*

*तुम जब तक “अज्ञानी” हो, कोई न कोई तुम्हारा “शोषण” करता रहेगा!*

*कोई न कोई तुम्हें चूसेगा!*

*पंडित चूसेंगे, पुरोहित चूसेंगे, मौलाना चूसेंगे, राजनेता चूसेंगे!*

*तुम जब तक जागृत नही होंगे, तब तक लुटोगे ही!*

*फिर, किसने लूटा? क्या फर्क पड़ता है…??*

*किस झण्डे की आड़ में लुटे, क्या फर्क पड़ता है…?*

*समाजवादियों से लुटे कि, साम्यवादियों से….?*

*क्या फर्क पड़ता है…!*

*तुम लुटोगे ही….!*

*बस, लुटेरों के नाम बदलते रहेंगे और तुम लुटते रहोगे…!*

*यह मत पूछो कि, राजनीतिक लुच्चों-लफंगों से देश को छुटकारा कब मिलेगा…?*

*यह प्रश्न अर्थहीन है!*

*यह पूछो कि, मैं कब इतना जाग सकूँगा कि, झूठ को झूठ की तरह पहचान सकूँ,ताकि मैं ‘असत्य’ की गिरफ्त में ना आ सकूँ।।*

*और* 

*जब तक सारी मनुष्य जाति “झूठ” को “झूठ” की भाँति नहीं पहचानती, तब तक ‘छुटकारे” का कोई उपाय नहीं है…।”*

          *~ ओशो*

          🙏✍🙏

~(योगिअंश रमेश चन्द्र भार्गव)

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