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अचानक से.. रातोंरात..
महाकाल शासित मालवा की उर्वर भूमि से पैदा हुए किसान आंदोलन की जड़ें खोद कर सच जानना चाहते हैं.. ?

तो पढ़िए..
(कृपया वास्तविक अन्नदाता बंधु अन्यथा न लें.. यदि गहराई में जाएंगे, तो लेख को अपने समर्थन में पाएंगे)
पश्चिमी मप्र अर्थात मालवा और पूर्वी राजस्थान के दो जिलों से मिल कर अफीम उत्पादन का बड़ा क्षेत्र बनता है।

मप्र में मंदसौर, नीमच और रतलाम की जावरा तहसील तथा राजस्थान के प्रतापगढ़ और चित्तौड़गढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में अफीम उत्पादन होता है।
जिन लोगों को जानकारी नहीं है उन्हें बता दूं कि अफीम उत्पादन के लिए सरकार से पट्टा लेना होता है। अर्थात एक निश्चित भूमि में निश्चित मात्रा में आप सरकार की अनुमति से अफीम उत्पादन कर सकते हैं।

इस क्षेत्र के किसान अपनी सीमा से अधिक उत्पादन कर लेते हैं। तय मात्रा सरकार को बेच दी जाती है और अतिरिक्त को तस्करों को बेचा जाता है। स्पष्ट है तस्करों से किसान को तगड़ी रकम मिलती है। कई बार तो सरकारी रेट से ५/७ गुना ज्यादा तक दो नंबर में प्राप्त होता है।
अफीम उत्पादन बहुत झंझट और जोखिम का काम है। मात्र सरकार को बेचने के लिए कोई पागल भी अफीम नहीं बोएगा। शीत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु के बीच जब बसंत आता है तब जब सुबह सर्दी, दिन में हल्की गर्मी और देर रात से फिर सर्दी होती है तब अफीम के फल डोडे को चीरा लगाकर उसका दूध इकट्ठा किया जाता है। वही दूध अफीम है।अफीम निकलने के बाद डोडा सूख जाता है और उसमें से पोस्ता दाना या खसखस की प्राप्ति होती है। खसखस के बाद बचा हुआ डोडा चूरा नशेड़ी लोग उबाल कर चाय की तरह पीते हैं। अर्थात इस फसल में लीगल उत्पाद मात्र खसखस है।
दो नंबर की अफीम और डोडा चूरा की खुली बिक्री से इस क्षेत्र में गब्बर किसानों के एक खतरनाक वर्ग ने जन्म लिया जो क्षेत्र की सामाजिक संरचना को अपने शिकंजे में रखता है। इस वर्ग में सभी जातियों के किसान हैं। जो जाति कृषि क्षेत्र में अग्रणी है उसके तस्करों का प्रतिशत भी अधिक है। किंतु ये तस्कर प्रचलित तस्करों जैसे नहीं हैं। ये अपने खेत से बाहर निकल कर तस्करी नहीं करते।
यहाँ से इस खेल में मुसलमान एंट्री करता है और ब्राउन शुगर उत्पादन से लेकर हैरोइन बनाने वाले अंतरराष्ट्रीय गिरोहों तक मध्यस्थता करता है। डी कंपनी और पाकिस्तानी एजेंसियां इसमें गहराई तक घुसी हुई हैं।
आजतक इन गब्बर किसानों की श्वास नली अवरुद्ध करने का साहस किसी ने नहीं किया था। क्योंकि हवाला के हमाम में नंगी कॉन्ग्रेस और सेकुलर दलों की नसें ISI के हाथ में थी। हवाला रैकेट का केंद्र दुबई में है और बिना ISI की जानकारी के वहां से एक रुपया भी स्विस बैंक में नहीं जा सकता।
भाजपा के भ्रष्टाचार का धन अधिकतर भारत में ही खपा है इसलिए पूर्ण बहुमत हासिल होते ही हवाला की कमर तोड़ने पर मोदी सरकार तुल गई। इसके बाद डोडा चूरा प्रतिबंध लगाया और अफीम तस्करी पर इतनी तगड़ी घेराबंदी की कि अफीम उत्पादन से जुड़े गब्बरों की सांसें बंद होने लगी। पिछले कुछ महीनों से मंदसौर नीमच से बाहर एक किलो अफीम भी निकल नहीं पा रही थी। क्विंटलों डोडा चूरा सड़ रहा था। पुलिस ने बहुत सख्ती की हुई थी।
हार्दिक पटेल ने इस अवसर को भुनाने में देर नहीं की। हार्दिक पटेल जैसे लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े खिलाड़ियों के देसी एजेंट हैं। इन खिलाड़ियों का प्रमुख उद्देश्य हर जगह अराजकता पैदा कर विध्वंसक स्थिति निर्मित करना और फिर वहां सरकार गिराकर अपने पिट्ठू बैठाना है। आज हार्दिक पटेल कॉन्ग्रेस में है जो कॉन्ग्रेस के लिए आत्महत्या का संकेत है।
किसान आंदोलन की आड़ में हिंसा और अराजकता पैदा करने का षड़यंत्र हार्दिक पटेल ने रचा जिसे अमली जामा पहनाने का काम किया अफीम तस्करों ने। मीडिया ने इसे पूरी तरह किसान से जोड़ दिया और प्रशिक्षित लोगों ने जनता में पाटीदार समाज को खलनायक घोषित किया।
इस षड़यंत्र को मालवा के परिपेक्ष्य में देखें। आंदोलन की आड़ में क्विंटलों अवैध अफीम और डोडा चूरा ठिकाने लग गया। गब्बरों के पास धन आ गया। पाकिस्तान को स्मैक और हैरोइन बनाने के लिए भारी मात्रा में कच्चा माल मिल गया। भविष्य में यही स्मैक और हैरोइन भारत की नसों में दौड़ाई जाएगी। आपके युवाओं को जिंदा लाश बना दिया जाएगा और इसका मूल दायित्व उन किसानों पर आएगा जो लोभ में अंधे हुए देशद्रोह जैसे घृणित अपराध को भी अपना मौलिक अधिकार मानते हैं। वो समाज भी इसका अपराधी है जो इन तस्करों को सम्मानित करता है।
शेष भारत के किसानों की भी समस्याएं हैं किंतु थाना जलाने के लिए पिपलिया मंडी में कौन गए ???

टी आइ को जान से मारने की घेराबंदी किसने की ???

वो लोग कौन थे जो भीड़ के पीछे मुंह पर कपड़ा लपेटे खड़े होकर अराजकता पैदा करते और आगजनी करके गायब हो जाते???

मृतकों में कुछ लोगों पर नारकोटिक्स विभाग के प्रकरण थे। वे फरार घोषित थे।

जरा किसी कॉन्स्टेबल से मित्रता कीजिए और पता कीजिए। असली कहानी इतनी सीधी नहीं है जितनी मीडिया ने बनाई है।

संजय द्विवेदी

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Author:

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2 thoughts on “

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