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शूद्र कभी नहीं कहते कि वे दलित हैं

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Pramod Kumar

अधिकांशतः आप देखियेगा –

शूद्र कभी नहीं कहते कि वे दलित हैं , सनातन वैदिक धर्माचार्य कभी नहीं कहते कि शूद्र दलित हैं परन्तु विदेशी शिक्षानीति से उपजे छद्म बुद्धिजीवी ही ये शब्द प्रयोग करते हैं कि शूद्र दलित हैं । और इस दलितवादी मानसिकता की उपज कहॉ से शुरू हुई, इसे आप देखेंगे तो पायेंगे कि अंग्रेजों के जाने के बाद देश में अपना वर्चस्व चाहने वाले राजनीतिक लोगों ने ये एक हवा चलाई कि शूद्र दलित हैं ।

हिन्दू आधिक्य (मेजोरिटी) वाले, गुरुकुलीय परम्परा वाले देश का प्रथम शिक्षामन्त्री एक मुस्लिम को बनाया गया और बच्चों के पाठ्यक्रम में उनके ही हिन्दू धर्म के विरुद्ध जहर घोलती ऐसी शिक्षा परोसी गयी कि वह बच्चा जब कुछ बडा हो जाये तो अपने ही सनातन वैदिक धर्म से, अपने पूर्वजों से ईर्ष्या करने लगे ! इतना कर चुके तो फिर ये मन्थरानुयायी धन मान पद का लोभ शूद्रों को परोसना भला कैसे भूलते ? इनको येन केन प्रकारेण शूद्र वर्ग को सनातन वैदिक धर्म की मुख्य धारा से अलग जो करना है !

अब सनातन वैदिक धर्म का इतिहास देखिये –

ब्राह्मण नगर गॉवों से सुदूर एकान्त वन प्रदेशों में २५ वर्ष गुरुकुल में रहता था , जहॉ वह वेद शास्त्रों का अध्ययन करता था , फिर जब शास्त्र संस्कारों की शिक्षा लेकर घर आता था तो २५ से ५० वर्ष तक गृहस्थी के धर्मों के पालन में डूब जाता था , जिसमें पंचमहायज्ञों से लेकर विविध व्रतोपवासों के दुरूह नियमों का पालन उसे करना पड़ता था , जो उन्हीं मनु स्मृति आदि शास्त्रों में आदेश किये गये हैं , जिन्हें ये तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी ब्राह्मणों की रचना बताते हैं । उन नियमों में कहीं कोई चूक हुई तो प्रायश्चित्त के ऐसे कठोर नियम वर्णित हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते । अस्तु ,

इसके उपरान्त जब ५० वर्ष तक वह गृहस्थ का निर्वाह करके पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा कर ही पाता था कि , फिर ५० से ७५ वर्ष तक के लिये फिर से घर परिवार समाज को छोड़कर वानप्रस्थ आश्रम के पालन के लिये वन चला जाता था , इसके उपरान्त तो फिर संन्यासी ही हो जाता था ।

तो कुल मिलाकर आप देखिये कि जीवन का ७५% एक ब्राह्मण परिवार- गॉव- नगर समाज से दूर रहकर एकाकी होकर स्वाध्याय तपस्या में बिताता था , और जो २५ % उसे मिलता , उसमें वह घर परिवार भी संभालता और अपने गृहस्थी के नियम भी पूरे कर अपनी जिम्मेदारियों को सम्पन्न करता ।

पर फिर भी कुछ मन्थरानुयायी ये विष घोलते हैं कि
शूद्रों को शोषित किया, उनको पीड़ित किया , उनको पिछड़ा बनाया आदि आदि ।

उन शूद्रों को , जिनके लिये किसी भी प्रकार की तपस्या का कोई विधान ही नही था , बस राजाओं की सेवा- बढाई करते हुए खा पी के आजीवन गृहस्थी का आनन्द उठाने में ही जिनके मोक्ष का मार्ग था ।

दुरूह वेदों के नियमों का तप करना पड़ता था तो ब्राह्मण करते थे , राष्ट्र पर संकट आता और युद्ध होता था तो क्षत्रिय मरते थे , पर शूद्रों को न कभी किसी ब्राह्मण ने तप कराया न किसी क्षत्रिय राजा ने युद्ध में मरवाया ।

ये प्रकृति का नियम है कि प्राणी को अपने सेवक पर सदैव विशेष प्रीति होती है । शूद्र जिन ब्राह्मण और क्षत्रियों की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे , उन अपने परम आत्मीय जनों को ये वर्ण इतना प्रेम से पाल – पोष के लाये , उन को कुछ कथित विदेशी स्लीपर सेल #दलित बोलकर क्या स्वयं उनके स्वाभिमान का अपमान नहीं करते हैं?

ऋग्वेद का मन्त्र देखिये –

ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।
उरु तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोsजायत ।।

मन्त्र से स्पष्ट है कि वेदों की रक्षा करने वाले ब्राह्मण को यदि एक ओर मुख की संज्ञा बतायी गयी है तो समाज सेवा का अपना धर्म निभाने वाले शूद्र को भी दूसरी ओर ईश्वरीय शक्ति के चरणों की संज्ञा बतायी गयी है ।

ब्राह्मण व शूद्र का सम्बन्ध एक ही शरीर के मुख और चरण की भॉति रहा । चरण व मुख का क्या सम्बन्ध होता है ?

पैर में कॉटा चुभता है तो ऑख से ऑसू निकलता है , ये होता है चरण और मुख का सम्बन्ध । नेत्र देखते हैं और चरण चलते हैं , यदि चलते समय नेत्र नहीं देखेंगे तो पैरों को ठोकर लगेगी , रक्त पैरों से बहेगा और उसका संज्ञान मस्तिष्क को ही होगा । जब शयन का समय आता है तो पुरुष चादर से पहले अपने चरण को ढकता है , फिर अपने उदर को फिर हाथों को और मुख तो प्रायः चादर के बाहर ही रखता है । सनातन वैदिक समाज में जब भी आपत्ति आयी , तो यहॉ सर्वप्रथम शूद्र की रक्षा की गयी , क्योंकि वह वर्ग ही तो वह प्रजा था , जिसकी रक्षा करना अन्य वर्गों का प्रथम धर्म था ।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ।।

इस प्रकार युगों से परस्पर प्रीतिपूर्वक सनातन वैदिक समाज चल के आया । इतनी आत्मीयता जहॉ के सिद्धान्त में गुम्फित रही , वहॉ पर कुछ छद्म बुद्धिजीवी बार – बार जोर देकर कान भरते जाते हैं कि शूद्र दलित हैं ! किमाश्चर्यमतः परम् !

।। जय श्री राम ।।

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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