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उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे। असाधुजनसंपर्के य: पलायति स जीवति।।


चाणक्य नीति: जब हो जाए ऐसी 4 बातें तो तुरंत भाग जाना चाहिए:हमें उस जगह रहना चाहिए जहां हों ये पांच बातें

शशिकांत साल्वी |
चाणक्य नीति: जब हो जाए ऐसी 4 बातें तो तुरंत भाग जाना चाहिए
उज्जैन। जीवन में कभी-कभी ऐसे हालात निर्मित हो जाते हैं, जब यदि हम त्वरित निर्णय न लें तो किसी भयंकर परेशानी में फंस सकते हैं। आचार्य चाणक्य ने चार ऐसे हालात बताए हैं, जब व्यक्ति को तुरंत भाग निकलना चाहिए। यहां जानिए ऐसे चार हालात कौन-कौन से हैं और वहां से भागना क्यों चाहिए…

आचार्य चाणक्य कहते हैं-
उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।
असाधुजनसंपर्के य: पलायति स जीवति।।
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यदि किसी स्थान पर दंगा या उपद्रव हो जाता है तो उस स्थान से तुरंत भाग जाना चाहिए। यदि हम दंगा क्षेत्र में खड़े रहेंगे तो उपद्रवियों की हिंसा का शिकार हो सकते हैं। साथ ही, शासन-प्रसाशन द्वारा उपद्रवियों के खिलाफ की जाने वाली कार्यवाही में भी फंस सकते हैं। अत: ऐसे स्थान से तुरंत भाग निकलना चाहिए।
आचार्य चाणक्य का परिचय- प्राचीन समय में आचार्य चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के आचार्य थे। अर्थशास्त्र के साथ ही राजनीति और कूटनीति के क्षेत्र में भी आचार्य की गहरी पकड़ थी। अपनी नीतियों के बल पर ही चाणक्य ने विदेशी शासक सिंकदर को भारत छोड़ने पर मजबूर किया था। एक सामान्य बालक चंद्रगुप्त को भारत का सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य बनाया।
हालात- 2
इस श्लोक में चाणक्य कहते हैं कि यदि हमारे राज्य पर किसी दूसरे राजा ने आक्रमण कर दिया है और हमारी सेना की हार तय हो गई है तो ऐसे राज्य से भाग जाना चाहिए। अन्यथा शेष पूरा जीवन दूसरे राजा के अधीन रहना पड़ेगा या हमारे प्राणों का संकट भी खड़ा हो सकता है।
यह बात चाणक्य के दौर के अनुसार लिखी गई है, जब राजा-महाराजाओं का दौर था। उस काल में एक राजा दूसरे राज्य पर कभी भी आक्रमण कर दिया करता था। तब हारने वाले राज्य के आम लोगों को भी जीतने वाले राजा के अधीन रहना पड़ता था।
आज के दौर में ये बात इस प्रकार देखी जा सकती है कि यदि हमारा कोई शत्रु है और वह हम पर पूरे बल के साथ एकाएक हमला कर देता है तो हमें उस स्थान से तुरंत भाग निकलना चाहिए। शत्रु जब भी वार करेगा तो वह पूरी तैयारी और पूरे बल के साथ ही वार करेगा, ऐसे में हमें सबसे पहले अपने प्राणों की रक्षा करनी चाहिए। प्राण रहेंगे तो शत्रुओं से बाद में भी निपटा जा सकता है।
हालात-3
यदि हमारे क्षेत्र में अकाल पड़ गया हो और खाने-पीने, रहने के संसाधन समाप्त हो गए हों तो ऐसे स्थान से तुरंत भाग जाना चाहिए। यदि हम अकाल वाले स्थान पर रहेंगे तो निश्चित ही प्राणों का संकट खड़ा हो जाएगा। खान-पीने की चीजों के बिना अधिक दिन जीवित रह पाना असंभव है। अत: अकाल वाले स्थान को छोड़कर किसी उपयुक्त पर चले जाना चाहिए।
हालात-4
चाणक्य कहते हैं यदि हमारे पास कोई नीच व्यक्ति आ जाए तो उस स्थान से किसी भी प्रकार भाग निकलना चाहिए। नीच व्यक्ति की संगत किसी भी पल परेशानियों को बढ़ा सकती है। जिस प्रकार कोयले की खान में जाने वाले व्यक्ति के कपड़ों पर दाग लग जाते हैं, ठीक उसी प्रकार नीच व्यक्ति की संगत हमारी प्रतिष्ठा पर दाग लगा सकती है। अत: ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए।
हमें उस जगह रहना चाहिए जहां हों ये पांच बातें

हमें कैसे स्थान को अपना निवास, घर बनाना चाहिए इस संबंध में आचार्य चाणक्य ने 5 बातें बताई हैं। जिस स्थान पर ये बातें उपलब्ध हों, वहां रहना सर्वश्रेष्ठ है। आचार्य चाणक्य कहते हैं-
धनिक: श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पंचम:।
पंच यत्र न विद्यन्ते तत्र दिवसं वसेत्।।

इसका अर्थ है कि जिस स्थान कोई धनी हो, वहां व्यवसाय में बढ़ोतरी होती है। धनी व्यक्ति के आसपास रहने वाले लोगों को भी रोजगार प्राप्त होने की संभावनाएं रहती है। जिस स्थान पर कोई ज्ञानी, वेद जानने वाला व्यक्ति हो, वहां रहने से धर्म लाभ प्राप्त होता है। हमारा ध्यान पाप की ओर नहीं बढ़ता है।

जहां राजा या शासकीय व्यवस्था से संबंधित व्यक्ति रहता है, वहां रहने से हमें सभी शासन की योजनाओं का लाभ प्राप्त होता है। जिस स्थान पर नदी बहती हो, जहां पानी प्रचूर मात्रा में वहां रहने से हमें समस्त प्राकृतिक वस्तुएं और लाभ प्राप्त होते हैं। अंत में पांचवीं बात है, वैद्य का होना। जिस स्थान पर वैद्य हो, वहां रहने से हमें बीमारियों से तुरंत मुक्ति मिल जाती है। अत: आचार्य चाणक्य द्वारा बताई गई ये पांच बातें जहां हो, वहां रहना ही लाभकारी रहता है।
– कुछ लोग गुण के धनी होते हैं। कुछ लोग धन के धनी होते हैं। जो धन के धनी होते हुए भी गुणों के कंगाल हैं, ऐसे व्यक्तियों का साथ तुरंत छोड़ देना चाहिए।
– इस जीवन का कोई ठिकाना नहीं है। जिस काम को करने के बाद खाट में बैठकर पछताना पड़े ऐसे काम को पहले से ही नहीं करना चाहिए।
– समुद्र में गिरी हुई वस्तु नष्ट हो जाती है। जो सुनता नहीं है उससे कही हुई बात नष्ट हो जाती है। अजितेंद्रिय पुरुष का शास्त्र ज्ञान नष्ट हो जाता है।
– बिना वजह कलह करना मूर्खों का काम है। बुद्धिमान लोगों को इससे बचना चाहिए। ऐसा करके वे लोक में यश पाते हैं और अनर्थ से बच जाते हैं।

– मित्र तो ऐसा होना चाहिए जो कृतज्ञ, धार्मिक, सच बोलने वाला, उदार, अनुराग रखने वाला, दृढ़, जितेंद्रिय और मर्यादा के अंदर रहने वाला हो।

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