Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

⁠⁠⁠⁠⁠एक बार एक दरोगा जी का मुंह लगा नाई पूछ बैठा –


⁠⁠⁠⁠⁠एक बार एक दरोगा जी का मुंह लगा नाई पूछ बैठा –

“हुजूर पुलिस वाले रस्सी का साँप कैसे बना देते हैं ?”

दरोगा जी बात को टाल गए।

लेकिन नाई ने जब दो-तीन
बार यही सवाल पूछा तो दरोगा जी ने मन ही मन तय किया कि इस भूतनी वाले को बताना ही पड़ेगा कि रस्सी का साँप कैसे बनाते हैं !

लेकिन प्रत्यक्ष में नाई से बोले – “अगली बार आऊंगा तब
बताऊंगा !”

इधर दरोगा जी के जाने के दो घंटे बाद ही 4 सिपाही नाई
की दुकान पर छापा मारने आ धमके – “मुखबिर से पक्की खबर मिली है, तू हथियार सप्लाई करता है। तलाशी लेनी है दूकान की !”

तलाशी शुरू हुई …

एक सिपाही ने नजर बचाकर हड़प्पा की खुदाई से निकला जंग लगा हुआ असलहा छुपा दिया !

दूकान का सामान उलटने-पलटने के बाद एक सिपाही चिल्लाया – “ये रहा रिवाल्वर”

छापामारी अभियान की सफलता देख के नाई के होश उड़ गए – “अरे साहब मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता ।

आपके बड़े साहब भी मुझे अच्छी तरह पहचानते हैं !”

एक सिपाही हड़काते हुए बोला – “दरोगा जी का नाम लेकर बचना चाहता है ? साले सब कुछ बता दे कि तेरे गैंग में कौन-कौन है … तेरा सरदार कौन है … तूने कहाँ-कहाँ हथियार सप्लाई किये … कितनी जगह लूट-पाट की …
तू अभी थाने चल !”

थाने में दरोगा साहेब को देखते ही नाई पैरों में गिर पड़ा – “साहब बचा लो … मैंने कुछ नहीं किया !”

दरोगा ने नाई की तरफ देखा और फिर सिपाहियों से पूछा – “क्या हुआ ?”

सिपाही ने वही जंग लगा असलहा दरोगा के सामने पेश कर दिया – “सर जी मुखबिर से पता चला था .. इसका गैंग है और हथियार सप्लाई करता है.. इसकी दूकान से ही ये रिवाल्वर मिली है !”

दरोगा सिपाही से – “तुम जाओ मैं पूछ-ताछ करता हूँ !”

सिपाही के जाते ही दरोगा हमदर्दी से बोले – “ये क्या किया तूने ?”

नाई घिघियाया – “सरकार मुझे बचा लो … !”

दरोगा गंभीरता से बोला – “देख ये जो सिपाही हैं न …साले एक नंबर के कमीने हैं …मैंने अगर तुझे छोड़ दिया तो ये साले मेरी शिकायत ऊपर अफसर से कर देंगे …
इन कमीनो के मुंह में हड्डी डालनी ही पड़ेगी …
मैं तुझे अपनी गारंटी पर दो घंटे का समय देता हूँ , जाकर किसी तरह बीस हजार का इंतजाम कर ..
पांच – पांच हजार चारों सिपाहियों को दे दूंगा तो साले मान जायेंगे !”

नाई रोता हुआ बोला – “हुजूर मैं गरीब आदमी बीस हजार कहाँ से लाऊंगा ?”

दरोगा डांटते हुए बोला – “तू मेरा अपना है इसलिए इतना सब कर रहा हूँ तेरी जगह कोई और होता तो तू अब तक जेल पहुँच गया होता …जल्दी कर वरना बाद में मैं कोई मदद नहीं कर पाऊंगा !”

नाई रोता – कलपता घर गया … अम्मा के कुछ चांदी के जेवर थे …चौक में एक ज्वैलर्स के यहाँ सारे जेवर बेचकर किसी तरह बीस हजार लेकर थाने में पहुंचा और सहमते हुए बीस हजार रुपये दरोगा जी को थमा दिए !

दरोजा जी ने रुपयों को संभालते हुए पूछा – “कहाँ से लाया ये रुपया?”

नाई ने ज्वैलर्स के यहाँ जेवर बेचने की बात बतायी तो दरोगा जी ने सिपाही से कहा – “जीप निकाल और नाई को हथकड़ी लगा के जीप में बैठा ले .. दबिश पे चलना है !”

पुलिस की जीप चौक में उसी ज्वैलर्स के यहाँ रुकी !

दरोगा और दो सिपाही ज्वैलर्स की दूकान के अन्दर पहुंचे …

दरोगा ने पहुँचते ही ज्वैलर्स को रुआब में ले लिया – “चोरी का माल खरीदने का धंधा कब से कर रहे हो ?”

ज्वैलर्स सिटपिटाया – “नहीं दरोगा जी आपको किसी ने गलत जानकारी दी है!”
दरोगा ने डपटते हुए कहा – “चुप ~ बाहर देख जीप में
हथकड़ी लगाए शातिर चोर बैठा है … कई साल से पुलिस को इसकी तलाश थी … इसने तेरे यहाँ जेवर बेचा है कि नहीं ? तू तो जेल जाएगा ही .. साथ ही दूकान का सारा माल भी जब्त होगा !”

ज्वैलर्स ने जैसे ही बाहर पुलिस जीप में हथकड़ी पहले नाई को देखा तो उसके होश उड़ गए,

तुरंत हाथ जोड़ लिए – “दरोगा जी जरा मेरी बात सुन लीजिये!

कोने में ले जाकर मामला एक लाख में सेटल हुआ !

दरोगा ने एक लाख की गड्डी जेब में डाली और नाई ने जो गहने बेचे थे वो हासिल किये फिर ज्वैलर्स को वार्निंग दी – “तुम शरीफ आदमी हो और तुम्हारे खिलाफ पहला मामला था इसलिए छोड़ रहा हूँ … आगे कोई शिकायत न मिले !”

इतना कहकर दरोगा जी और सिपाही जीप पर बैठ के
रवाना हो गए !

थाने में दरोगा जी मुस्कुराते हुए पूछ रहे थे – “साले तेरे को समझ में आया रस्सी का सांप कैसे बनाते हैं !”

नाई सिर नवाते हुए बोला – “हाँ माई-बाप समझ गया !”

दरोगा हँसते हुए बोला – “भूतनी के ले संभाल अपनी अम्मा के गहने और एक हजार रुपया और जाते-जाते याद कर ले …
हम रस्सी का सांप ही नहीं बल्कि नेवला .. अजगर … मगरमच्छ सब बनाते हैं .. बस असामी बढ़िया होना चाहिए”।
…………….हमारे देश का कटु सत्य
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संस्कृत


संस्कृत

भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतम् संस्कृतिस्तथा । ( भारत की प्रतिष्ठा दो चीजों में निहित है , संस्कृति और संस्कृत । )

इसकी पुरातनता जो भी हो , संस्कृत भाषा एक आश्चर्यजनक संरचना वाली भाषा है । यह ग्रीक से अधिक परिपूर्ण है और लैटिन से अधिक शब्दबहुल है तथा दोनों से अधिक सूक्ष्मता पूर्वक दोषरहित की हुई है । — सर विलियम जोन्स

सभ्यता के इतिहास में , पुनर्जागरण के बाद , अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से बढकर कोई विश्वव्यापी महत्व की दूसरी घटना नहीं घटी है । –आर्थर अन्थोनी मैक्डोनेल्

कम्प्यूटर को प्रोग्राम करने के लिये संस्कृत सबसे सुविधाजनक भाषा है । — फोर्ब्स पत्रिका ( जुलाई , १९८७ )

यह लेख इस बात को प्रतिपादित करता है कि एक प्राकृतिक भाषा ( संस्कृत ) एक कृत्रिम भाषा के रूप में भी कार्य कर सकती है , और कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में किया गया अधिकाश काम हजारों वर्ष पुराने पहिये ( संस्कृत ) को खोजने जैसा ही रहा है । — रिक् ब्रिग्स , नासा वैज्ञानिक ( १९८५ में )

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कल फोन आया था वो एक बजे ट्रेन से आ रही है – Umesh Parihar


Umesh Parihar

कल फोन आया था वो एक बजे ट्रेन से आ रही है. किसी को स्टेशन भेजने की बात चल ऱही थी आज रिया ससुराल से दुसरी बार दामाद जी के साथ आ रही हैं घर के माहौल में एक उत्साह सा महसूस हो रहा हैं
इसी बीच …..एक तेज आवाज आती हैं

“इतना सब देने की क्या जरूरत है ??
बेकार फिजूलखर्ची क्यों करना ??
और हाँ आ भी रही है तो कहो कि टैक्सी करके आ जाये स्टेशन से।”
(बहन के आने की बात सुनकर अश्विन भुनभुनाया )
माँ तो एक दम से सकते में आ गई
की आखिर यह हो क्या रहा हैं ????
माँ बोली …..

“जब घर में दो-दो गाड़ियाँ हैं तो टैक्सी करके क्यों आएगी मेरी बेटी ??

और दामाद जी का कोई मान सम्मान है कि नहीं ???

पिता जी ने कहा की ससुराल में उसे कुछ सुनना न पड़े।
मैं खुद चला जाऊंगा उसे लेने, तुम्हे तकलीफ है तो तुम रहने दो।”

पिता गुस्से से एक सांस में यह सब बोल गए

“और ये इतना सारा सामान का खर्चा क्यों? शादी में दे दिया न। अब और पैसा फूँकने से क्या मतलब।”
अश्विन ने बहन बहनोई के लिए आये कीमती उपहारों की ओर देखकर ताना कसा ….

पिता जी बोले बकवास बंद कर
“तुमसे तो नहीं माँग रहे हैं। मेरा पैसा है, मैं अपनी बेटी को चाहे जो दूँ। तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या जो ऐसी बातें कर रहे हो।” पिता फिर से गुस्से में बोले।

अश्विन दबी आवाज में फिर बोला

“चाहे जब चली आती है मुँह उठाये।”

पिता अब अपने गुस्से पर काबू नही कर पाये और चिल्ला कर बोले
“क्यों न आएगी ????
हाँ इस घर की बेटी है वो।
मेरी बेटी हैं वो ये उसका भी घर है। जब चाहे जितने दिन के लिए चाहे वह रह सकती हैं। बराबरी का हक है उसका।
आखिर तुम्हे हो क्या गया है जो ऐसा अनाप-शनाप बके जा रहे हो।”

अब बारी अश्विन की थी …

“मुझे कुछ नही हुआ है पिताजी। आज मैं बस वही बोल रहा हूँ जो आप हमेशा #बुआ के लिए बोलते थे।
आज अपनी बेटी के लिए आज आपको बड़ा दर्द हो रहा है लेकिन कभी #दादाजी के दर्द के बारे में सोचा हैं ?????
कभी बुआ की ससुराल और #फूफाजी के मान-सम्मान की बात नहीं सोची ???
माँ और पिता जी एक दम से सन्नाटे में चले गए …
अश्विन लगातार बोल जा रहा हैं

“दादाजी ने कभी आपसे एक ढेला नहीं मांगा वो खुद आपसे ज्यादा सक्षम थे फिर भी आपको बुआ का आना, दादाजी का उन्हें कुछ देना नहीं सुहाया….क्यों ???

और हाँ बात अगर बराबरी और हक की ही हैं तो आपकी बेटी से भी पहले बुआ का हक है इस घर पर।”

अश्विन की आवाज आंसूओ की भर्रा सी गई थी अफसोस भरे स्वर में बोला।

पिता की गर्दन शर्म से नीची हो गयी
पर अश्विन नही रूका

“आपके खुदगर्ज स्वभाव के कारण बुआ ने यहाँ आना ही छोड़ दिया।
दादाजी इसी गम में घुलकर मर गए …

और हाँ में खुद जा रहा हूँ स्टेशन रिया को लेने पर मुझे आज भी खुशी है कि मैं कम से कम आपके जैसा खुदगर्ज भाई तो नहीं हूँ।”

कहते हुए अश्विन कार की चाबी उठाकर स्टेशन जाने के लिए निकल गया।
पिता आसूँ पौंछते हुए अपनी बहन सरिता को फोन लगाने लगे।

दीवार पर लगी दादाजी की तसवीर जैसे 😊 मुस्कुरा रही थी…

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Borobudur


Top 50 Most Amazing Temples in the World. [Part 1/5] https://youtube.com/embed/GrnSwWCgux0?rel=0 The 5 Most Mysterious Temples https://youtube.com/embed/KETspdNjHEw?rel=0

via Most Amazing Temples in the World — niravrave નિરવ રવે-સહજ ભાવોના દ્યોતક*

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​ખુદની સાથે મળવાનું રહી ગયું


​ખુદની સાથે મળવાનું રહી ગયું, ભીતર તરફ વળવાનું રહી ગયું! ટીકા કરતો રહ્યો હું હંમેશા અન્યની, અને ખુદને પરખવાનું રહી ગયું! દૂરના સંબંધોમાં વ્યસ્ત રહ્યો સદા, નિકટના સાથે ભળવાનું રહી ગયું! કાબાથી કાશી સુધી પથ્થર પૂજ્યા કર્યા, અને, ઈશ્વરને ઓળખવાનું રહી ગયું! ગણ્યા કર્યા પેલા મુઠ્ઠીભર સિક્કા વ્યર્થ, અને પેલું સુખ ગણવાનું રહી ગયું! બે […]

via એક ગઝલ — History & Literature