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वास्तुशास्त्र के मूल सिद्धांत


वास्तुशास्त्र के मूल सिद्धांत
हमारे ऋषियों का सारगर्भित निष्कर्ष है, ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ जिन पंचमहाभूतों से पूर्ण ब्रह्मांड संरचित है उन्हीं तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है और मनुष्य की पांचों इंद्रियां भी इन्हीं प्राकृतिक तत्वों से पूर्णतया प्रभावित हैं। आनंदमय, शांतिपूर्ण और स्वस्थ जीवन के लिए शारीरिक तत्वों का ब्रह्मांड और प्रकृति में व्याप्त पंचमहाभूतों से एक सामंजस्य स्थापित करना ही वास्तुशास्त्र की विशेषता है।
वास्तुशास्त्र जीवन के संतुलन का प्रतिपादन करता है। यह संतुलन बिगड़ते ही मानव एकाकी और समग्र रूप से कई प्रकार की कठिनाइयों और समस्याओं का शिकार हो जाता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के विधिवत उपयोग से बने आवास में पंचतत्व से निर्मित प्राणी की क्षमताओं को विकसित करने की शक्ति स्वत: स्फूर्त हो जाती है।
पृथ्वी मानवता और प्राणी मात्र का पृथ्वी तत्व (मिट्टी) से स्वाभाविक और भावनात्मक संबंध है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। इसमें गुरूत्वाकर्षण और चुम्बकीय शक्ति है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि पृथ्वी एक विशालकाय चुम्बकीय पिण्ड है। एक चुम्बकीय पिण्ड होने के कारण पृथ्वी के दो ध्रुव उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं। पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणी, सभी जड़ और चेतन वस्तुएं पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से प्रभावित होते हैं। जिस प्रकार पृथ्वी अनेक तत्वों और अनेक प्रकार के खनिजों जैसे लोहा, तांबा, इत्यादि से भरपूर है उसी प्रकार हमारे शरीर में भी अन्य धातुओं के अलावा लौह धातु भी विद्यमान है। कहने का तात्पर्य है कि हमारा शरीर भी चुम्बकीय है और पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति से प्रभावित होता है। वास्तु के इसी सिद्धांत के कारण यह कहा जाता है कि दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए। इस प्रकार सोते समय हमारा शरीर ब्रह्मांड से अधिक से अधिक शक्ति को ग्रहण करता है और एक चुम्बकीय लय में सोने की स्थिति से मनुष्य अत्यंत शांतिप्रिय नींद को प्राप्त होता है और सुबह उठने पर तरोताजा महसूस करता है।
वास्तुशास्त्र में पृथ्वी (मिट्टी) का निरीक्षण, भूखण्ड का निरीक्षण, भूमि आकार, ढलान और आयाम आदि का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। मात्र पृथ्वी तत्व ही एक ऐसा विशेष तत्व है, जो हमारी सभी इंद्रियों पर पूर्ण प्रभाव रखता है।
जल
पृथ्वी तत्व के बाद जल तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है। इसका संबंध हमारी ग्राह्य इंद्रियों, स्वाद, स्पर्श, दृष्टि और श्रवण से है। मानव के शरीर का करीब सत्तर प्रतिशत भाग जल के रूप में और पृथ्वी का दो तिहाई भाग भी जल से पूर्ण है। पुरानी सभ्यताएं अधिकतर नदियों और अन्य जल स्त्रोतों के समीप ही बसी होती थी। वास्तुशास्त्र जल के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जैसे कि कुएं, तालाब या हैडपंप की खुदाई किस दिशा में होनी चाहिए, स्वच्छ और मीठा पानी भूखंड के किस दिशा में मिलेगा, नगर को या घर को पानी के स्त्रोत के सापेक्ष में किस दिशा में रखा जाए या पानी की टंकी या जल संग्रहण के साधन को किस स्थान पर स्थापित किया जाए इत्यादि। पानी के भंडारण के अलावा पानी की निकासी, नालियों की बनावट, सीवर और सेप्टिक टैंक इस प्रकार से रखे जाएं, जिससे जल तत्व का गृहस्थ की खुशहाली से अधिकतम सामंजस्य बैठे।
अग्नि
सूर्य अग्नि तत्व का प्रथम द्योतक है। सूर्य संपूर्ण ब्रह्मांड की आत्मा है, क्योंकि सूर्य उर्जाऔर प्रकाश दोनों का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत है। रात्रि और दिन का उदय होना और ऋतुओं का परिवर्तन सूर्य के संदर्भ में पृथ्वी की गति से ही निर्धारित होता है। अग्नितत्व हमारी श्रवण, स्पर्श और देखने की शक्ति से संबंध रखता है। सूर्य के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है। सूर्य की ऊर्जा रश्मियां और प्रकाश सूर्योदय से सूर्यास्त तक पल-पल बदलता है। उषाकाल का सूर्य सकारात्मक शक्तियों का प्रतीक है और आरोग्य वृद्धि करता है। भवन का पूर्व दिशा में नीचा रहना और अधिक खुला रहना सूर्य की इन प्रभावशाली किरणों को घर में निमंत्रित करता है। इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिम में ऊंचे और बड़े निर्माण दोपहर बाद के सूर्य की नकारात्मक और हानिकारक किरणों के लिए अवरोधक हैं।
सूर्य की किरणों का विभाजन (7+2) नौ रंगों में किया जा सकता है। सर्वाधिक उपयोगी पूर्व में उदित होने वाली परा-बैगनी किरणें हैं, जिसका ईशान कोण से सीधा संबंध है। इसके बाद सूर्य के रश्मि-जाल में बैगनी, गहरी नीली, नीली, हरी, पीली, संतरी, लाल तथा दक्षिण-पूर्व में रक्ताभ किरणों में विभक्त किया जा सकता है। सूर्य रश्मिजाल के परा-बैगनी और ठंडे रंग स्वास्थ्य पर अत्यंत लाभदायक और शुभ प्रभाव छोड़ते हैं। इसलिए ईशान कोण में अधिक से अधिक जगह खाली रखी जानी चाहिए। जब इन किरणों का संबंध जल से होता है, तो यह और भी बेहतर है। इसलिए पानी के भंडारण के लिए ईशान कोण का प्रयोग करने का सुझाव दिया जाता है।
उत्तरपूर्व में दीवार बनाना या इस तरफ शौचालय इत्यादि बनाना भी भवन की सबसे पवित्र दिशा को दूषित करता है। इस दोष से इस दिशा का सही उपयोग और लाभ नहीं मिल पाता, बल्कि घर में कलह और बीमारी के करण बन सकते हैं।
उषाकाल के सूर्य की परा-बैगनी किरणें शरीर के मेटाबॉलिज़्म को संतुलित रखते हैं। भारतीय जीवन में सूर्य नमस्कार और सुबह सूर्य को जल चढ़ाने जैसे उपाय परा-बैगनी किरणों के शुभ प्रभावों में वृद्धि करने वाले होते हैं। सूर्य की किरणें जल में से पारदर्शित होकर और भी सशक्त और उपयोगी हो जाती हैं।
दोपहर बाद और शाम के सूर्य की रक्ताभ किरणें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और इनका बहिष्कार अति उत्तम है। वास्तु के अनुसार दक्षिण दिशा में ऊंचे और बड़े वृक्ष लगाए जाने चाहिए, जिससे दूषित किरणों से बचाव हो सके या यह किरणें परावर्तित हो सके।
वायु
वायु जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी तत्व है। वायु का हमारी श्रवण और स्पर्श इंद्रियों से सीधा संबंध है। पृथ्वी और ब्रह्मांड में स्थित वायु नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन और हीलियम जैसी गैसों का सम्मिश्रण है। जीवन के लिए इन सभी गैसों की सही प्रतिशतता, सही वायुमंडलीय दबाव और आर्द्रता का सही अनुपात होना आवश्यक है। वास्तुशास्त्र में जीवनदायिनी वायु के शुभ प्रभाव के लिए दरवाज़े, खिड़कियां, रोशनदानों, बालकनी और ऊंची दीवारों को सही स्थान और अनुपात में रखना बहुत आवश्यक है। इसी के साथ घर के आसपास लगे पेड़ और पौधे भी वायुतत्व को संतुलित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आकाश
वास्तुशास्त्र में आकाश को एक प्रमुख तत्व की संज्ञा दी गई है। पाश्चात्य निर्माण कला में अभी तक आकाश को एक प्रमुख तत्व की मान्यता नहीं दी गई थी, इसलिए वास्तुशास्त्र आधुनिक और प्राचीन निर्माण कला में सबसे श्रेष्ठ है। आकाश अनंत और असीम है, इसका संबंध हमारी श्रवण शक्ति से है। एक घर में आकाश तत्व की महत्ता घर के मध्य में होती है। घर में प्रकाश और ऊर्जा के स्वछंद प्रवाह के लिए इसे हवादार और मुक्त रखा जाना चाहिए। आकाश तत्व में अक्रोधकता घर या कार्य स्थल में वृद्धि में बाधक हो सकती है। घर या फैक्ट्री को या उसमें रखे सामान को अव्यवस्थित ढंग से रखना आकाश तत्व को दूषित करना है। मकान में अपनी ज़रूरत से अधिक अनावश्यक निर्माण और फिर उन फ्लोर या कमरों को उपयोग में न लाना, बेवजह के सामान से कमरों को ठूंसे रखना भवन के आकाश तत्व को दूषित करता है। नकारात्मक शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए सुझाव है कि भवन में उतना ही निर्माण करें जितना आवश्यक हो।
वास्तुशास्त्र भवन में पंचमहाभूतों का सही संतुलन और सामंजस्य पैदा कर घर के सभी सदस्यों के लिए सौहार्दपूर्ण वातावरण पैदा करता है। आजकल घरों में साज-सज्जा के बेहतरीन नमूने और अत्याधुनिक उपकरणों की कोई कमी नहीं पाई जाती। अगर कमी होती है, तो प्राकृतिक प्रकाश, वायु और पंचतत्वों के सही संतुलन की। एक घर में सही स्थान पर बनी एक बड़ी खिड़की की उपयोगिता कीमती और अलंकृत साजसज्जा से कहीं ज्यादा है।
वास्तुविद्या मकान को एक शांत, सुसंस्कृत और सुसज्जित घर में तब्दील करती है। यह घर परिवार के सभी सदस्यों को एक हर्षपूर्ण, संतुलित और समृद्धि जीवन शैली की ओर ले जाता है।

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उनके ऊंट की पूंछ पर लटकता था ब्रिटिश आर्मी का झन्डा


उनके ऊंट की पूंछ पर लटकता था ब्रिटिश आर्मी का झन्डा

http://www.gyandarpan.com/2017/01/blog-post_18.html

सीकर जिले के पटोदा गांव के भूरसिंह शेखावत अति साहसी व तेज मिजाज रोबीले व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे उनके रोबीले व्यक्तित्व को देखकर अंग्रेजों ने भारतीय सेना की आउट आर्म्स राइफल्स में उन्हें सीधे सूबेदार के पद पर भर्ती कर लिया था| भूरसिंह शेखावत जो शेखावाटी में भूरजी के नाम से जाने जाते है एक अच्छे निशानेबाज व बुलंद हौसले वाले फौजी थे| स्वाभिमान उनमें कूट कूटकर भरा था | अंग्रेज अफसर अक्सर भारतीय सैनिकों के साथ दुर्व्यवहार करते थे ये भेदभाव भूरजी को बर्दास्त नहीं होता था सो एक दिन वे इसी तरह के विवाद पर एक अंग्रेज अफसर की हत्या कर सेना से बागी हो गए और अंग्रेज समर्थित शासकों व व्यापारियों को लूटकर उनका धन गरीबों में बाँटना शुरू कर दिया| उनके इस अभियान में उनके बड़े भाई बलसिंह शेखावत जिन्हें स्थानीय लोग आज भी बलजी कहते है शामिल हो गए|


उनका यह समूह बलजी-भूरजी के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है| इन अनोखे स्वतंत्रता सेनानियों की एक अनोखी बात इन पर म्यूजिकल एलबम बनाने वाले गजेन्द्र दाधीच ने बताई कि- बलजी को गूंग (कुछ खास करने की जिद) चढ़ती थी| चूँकि वे अंग्रेजों की आउटर आर्म्स राइफल के बागी थे| अंग्रेज सेना व पुलिस उन्हें पकड़ने को उनके पीछे लगी रहती थी| सो एक दिन भूरजी को गूंग चढ़ी कि क्यों ना आउटर आर्म्स राइफल वालों को फिर सबक सिखाया जाय और इसी उद्देश्य को लेकर बलजी-भूरजी ने अपने क्रांतिकारी समूह के साथ आउटर आर्म्स राइफल के नसीराबाद स्थित मुख्यालय पर हमला किया और उनका झंडा लूट कर फरार हो गए| दाधीच बताते है कि वे आउटर आर्म्स राइफल के झंडे को अपने ऊंट की पूंछ पर बांध कर उसे लटकाये रखते थे|

ज्ञात हो गजेन्द्र दाधीच की दादी को बलजी-भूरजी ने एक दिन एक चांदी का रुपया भेंट किया था| दाधीच ने बचपन में अपनी दादी के मुंह से बलजी भूरजी की वीरता के ढेरों किस्से सुने है, यही कारण था कि दाधीच बलजी-भूरजी को बचपन से अपना हीरो समझते थे और उन पर म्यूजिक एल्बम भी बनाया| दाधीच ने बलजी भूरजी पर फिल्म बनाने हेतु काफी शोध के बाद स्टोरी भी लिखी है पर आर्थिक समस्या के चलते अभी वे फिल्म नहीं बना सके|

आउटर आर्म्स राइफल को बाद में राजपुताना राइफल्स नाम दे दिया गया जिसका मुख्यालय दिल्ली में है| राजपुताना राइफल्स के जवान आज भी स्वीकार करते है कि बलजी भूरजी ने उनकी रेजीमेंट का झन्डा लूट लिया था| इस रेजीमेंट के एक पूर्व जवान ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि- बलजी भूरजी ने झन्डा लूटने का चैलेन्ज दे रखा था| कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच वे अधिकारीयों की ड्रेस में आये और आराम से झन्डा उतार कर गाड़ी में ले गए| सुरक्षा कर्मी उन्हें सैल्यूट देते रहे| पूर्व जवान के अनुसार आज भी जब हम कई रेजिमेंट्स के जवान एक साथ होते है तो दूसरी रेजीमेंट के जवान हमारे ऊपर व्यंग्य कसते है कि पहले अपनी रेजीमेंट का झन्डा तो बरामद कर लाओ|

स्थानीय जनता के साथ सेना में भी इस जनश्रुति के चलन के बाद यह साफ़ है कि बलजी भूरजी ने अंग्रेजों की नसीराबाद स्थित आउटर आर्म्स राइफल को नीचा दिखाने के लिए उनका झन्डा लूटा और उसे अपने ऊंट की पूंछ पर लटकाकर घूमते थे| इनकी क्रांतिवीरों की गतिविधियों से तंग आकर अंग्रेजों ने जोधपुर पुलिस को किसी भी अन्य राज्य में घुस कर उनका सफाया करने का आदेश दिया जिसके तहत जोधपुर पुलिस के जाबांज अधिकारी बख्तावर सिंह महेचा ने 300 सिपाहियों के साथ बलजी भूरजी व गणेश दरोगा को घेर लिया| बख्तावर सिंह के घेरे के बाद इन तीन वीरों ने 300 सिपाहियों का बहादुरी से सामना किया और वीरतापूर्वक लड़ते हुए 30 अक्तूबर 1926 शहीद हो गए|

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श्री रामचरित मानस के सिद्ध ‘मन्त्र’ – Vikram Prakash Raisoni


श्री रामचरित मानस के सिद्ध ‘मन्त्र’
नियम-
मानस के दोहे-चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है
कि किसी भी शुभ दिन
की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के
द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र-
जप की आवश्यकता हो, उसके लिये नित्य जप
करना चाहिये। वाराणसी में भगवान्
शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-
शक्ति प्रदान की है-इसलिये
वाराणसी की ओर मुख करके
शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से
जप करना चाहिये।
अष्टांग हवन सामग्री
१॰ चन्दन का बुरादा, २॰ तिल, ३॰ शुद्ध घी, ४॰
चीनी, ५॰ अगर, ६॰ तगर, ७॰ कपूर, ८॰
शुद्ध केसर, ९॰ नागरमोथा, १०॰ पञ्चमेवा, ११॰ जौ और १२॰
चावल।
जानने की बातें-
जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप
करना बताया गया है, उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन
की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई,
दोहा या सोरठा) १०८ बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल
एक दिन करना है। मामूली शुद्ध
मिट्टी की वेदी बनाकर उस
पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये।
प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में ‘स्वाहा’ बोल
देना चाहिये।
प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब
चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब
से १०८ आहुति के लिये एक सेर (८० तोला)
सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई
चीज कम-ज्यादा हो तो कोई
आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम, किशमिश
(द्राक्षा), अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई
चीज न मिले तो उसके बदले
नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध ४ आने
भर ही डालने से काम चल जायेगा।
हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता १०८
की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन
ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े
का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये।
मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई
या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे
काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन
हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं।
सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक
बार बोलकर जहाँ बैठे हों, वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर
रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये।
फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार १०८
आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न
भी खींची जाये
तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के
लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन
करके करना होगा।
एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद
जब तक कार्य सफल न हो, तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा)
आदि का प्रतिदिन कम-से-कम १०८ बार प्रातःकाल या रात्रि को, जब
सुविधा हो, जप करते रहना चाहिये।
कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन
चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर
उन चौपाइयों को पहले अलग-अलग हवन करके सिद्ध कर
लेना चाहिये।
१॰ विपत्ति-नाश के लिये
“राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।”
२॰ संकट-नाश के लिये
“जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु
गावा।।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट
होहिं सुखारी।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम
संकट भारी।।”
३॰ कठिन क्लेश नाश के लिये
“हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥”
४॰ विघ्न शांति के लिये
“सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम
सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥”
५॰ खेद नाश के लिये
“जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥”
६॰ चिन्ता की समाप्ति के लिये
“जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥”
७॰ विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥”
८॰ मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये
“हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर
भाजे।।”
९॰ विष नाश के लिये
“नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु
दीन्ह अमी को।।”
१०॰ अकाल मृत्यु निवारण के लिये
“नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।”
११॰ सभी तरह की आपत्ति के विनाश
के लिये / भूत भगाने के लिये
“प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥”
१२॰ नजर झाड़ने के लिये
“स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी।
निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।”
१३॰ खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए
“गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब
रघुराजू।।”
१४॰ जीविका प्राप्ति केलिये
“बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।”
१५॰ दरिद्रता मिटाने के लिये
“अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।”
१६॰ लक्ष्मी प्राप्ति के लिये
“जिमि सरिता सागर महुँ जाही।
जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील
पहिं जाहिं सुभाएँ।।”
१७॰ पुत्र प्राप्ति के लिये
“प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।’
१८॰ सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये
“जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।”
१९॰ ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये
“साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।”
२०॰ सर्व-सुख-प्राप्ति के लिये
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।
२१॰ मनोरथ-सिद्धि के लिये
“भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।”
२२॰ कुशल-क्षेम के लिये
“भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर
बिआहू।।”
२३॰ मुकदमा जीतने के लिये
“पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।”
२४॰ शत्रु के सामने जाने के लिये
“कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥”
२५॰ शत्रु को मित्र बनाने के लिये
“गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।”
२६॰ शत्रुतानाश के लिये
“बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥”
२७॰ वार्तालाप में सफ़लता के लिये
“तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥”
२८॰ विवाह के लिये
“तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई
हँकारि कै॥”
२९॰ यात्रा सफ़ल होने के लिये
“प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर
राजा॥”
३०॰ परीक्षा / शिक्षा की सफ़लता के
लिये
“जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर
नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु
कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”
३१॰ आकर्षण के लिये
“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु
संदेहू॥”
३२॰ स्नान से पुण्य-लाभ के लिये
“सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।”
३३॰ निन्दा की निवृत्ति के लिये
“राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद
गोहारी।।
३४॰ विद्या प्राप्ति के लिये
गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई॥
३५॰ उत्सव होने के लिये
“सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।”
३६॰ यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के
लिये
“जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।”
३७॰ प्रेम बढाने के लिये
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
३८॰ कातर की रक्षा के लिये
“मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ
होऊ।।”
३९॰ भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये
रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु
त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥
४०॰ विचार शुद्ध करने के लिये
“ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।”
४१॰ संशय-निवृत्ति के लिये
“राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग
उड़ावनिहारी।।”
४२॰ ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये
” अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।।”
४३॰ विरक्ति के लिये
“भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।
सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।”
४४॰ ज्ञान-प्राप्ति के लिये
“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम
सरीरा।।”
४५॰ भक्ति की प्राप्ति के लिये
“भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।”
४६॰ श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने
के लिये
“सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।”
४७॰ मोक्ष-प्राप्ति के लिये
“सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।”
४८॰ श्री सीताराम के दर्शन के लिये
“नील सरोरुह नील
मनि नील नीलधर श्याम ।
लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥”
४९॰ श्रीजानकीजी के
दर्शन के लिये
“जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय
करुनानिधान की।।”
५०॰ श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के
लिये
“केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील
निधान।
देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।”
५१॰ सहज स्वरुप दर्शन के लिये
“भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।”

Posted in संस्कृत साहित्य

कपूर प्र्वज्लित ( जलाकर ) देवी – देवताओं की आरती क्यों की जाती है ?


कपूर प्र्वज्लित ( जलाकर ) देवी – देवताओं की आरती क्यों की जाती है ?


प्रचीन काल से ही हमारे देश में देशी देसी घी के दीपक से और कपूर से देवी देवताओं की आरती करने का प्रचलन चला आ रहा है ! धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी – देवता आरती करने से प्रसन्न होते है और साधक की मनोकामना पूर्ण करते है ! कपूर जलाने से देवदोष तथा पितृ दोष का शमन होता है !

Posted in संस्कृत साहित्य

|| आखिर पूजा में क्यों जलाते है कपूर, जानिए ||


|| आखिर पूजा में क्यों जलाते है कपूर, जानिए ||


* कपूर को अंग्रेजी में कैंफर नाम से जाना जाता है। इसे पूजन में अधिक मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है। हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा करते समय कपूर का इस्तेमाल किया जाता है, जो कि सदियों से चला आ रहा है। जो कि अब एक परंपरा बन चुकी है। आरती आदि धार्मिक कार्यों में कर्पूर का विशेष महत्व बताया गया है।
* लेकिन आप जानते है कि इस परंपरा के पीछे कई अध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण भी है। जिनके बारें में आप जानते भी नहीं है। आज हमआपको अपनी खबर में बताएगे कि कपूर के पीछे क्या अध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण है।
* माना जाता है कि कपूर जलाने से वायुमण्डल शुद्ध होता है। साथ ही हानिकारक संक्रामक बैक्टीरिया नष्ट होती है। माना जाता है कि जिस घर में रोजाना कपूर जलाई जाती है। वहां की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है और सकारात्मक उर्जा पैदा होती है।
* अगर आप चाहते है कि आपके घर में कोई बुरी शक्ति प्रवेश न करें तो इसके लिए रोजाना शाम के समय घर पर गोबर के उपले में कपूर या गूगल रख कर जलाएं।
* शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि अगर आप पितृदोष और देवदोष को शांत करना चाहते है तो घर में कपूर जलाएं।
* सोते समय घर में कपूर जलाने से आसपास का वातावरण ठीक हो जाता है। जिससे आपको बुरे सपने नहीं आते है।
* कपूर को जलाने के वैज्ञानिक महत्व भी है। इसके अनुसार इसको जलाने से वातावरण में मौजूद बैक्टीरिया नष्ट हो जाते है। साथ ही कई बीमारियों से आप बच जाते है।
* कपूर आपको कई बीमारियों से भी बचा सकता है। जैसे कि कफ, मांसपेशियों में खिंचाव, गर्दन में दर्द, आर्थराइटिस आदि बीमारियों से निजात मिल जाता है।

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आप लोगों ने पढ़ा ही होगा कि एक बड़े माओवादी अपराधी ने आत्म समर्पण किया है, जिसने कई हत्याएं की थी. उसने पुलिस को अपने बयान में बताया है कि  दिल्ली विवि के दो अध्यापिकाएं सीधे जंगल में जा कर माओवादी दरिंदों से मिलती थी और सीधे सीधे राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त थीं. उन दोनों का नाम है नलिनी सुन्दर और बेला भाटिया। 
यहां तक तो है ही अब आगे की बात ये शायद सबने ध्यान न दी हो – नलिनी सुन्दर के पति हैं सिद्धार्थ वरदराजन जो कि अब अमरीकी नागरिक हैं और हिन्दू अखबार के पूर्व सम्पादक। बेला भाटिया के पति हैं जॉन द्रेज़ (Jean Drèze) जो बेल्जियम मूल के अब भारतीय नागरिक हैं और अर्थशास्त्री हैं, अमर्त्य सेन से इनके घनिष्ठ सम्बन्ध हैं.  

ये यूपीए सरकार के सुपर कैबिनेट जिसको हम NAC के नाम से जानते हैं उसके महत्वपूर्ण सदस्य थे और यूपीए सरकार के दस सालों में भारत के लगभग हर महत्वपूर्ण आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया। NAC की अध्यक्षा सोनिया गाँधी जी थीं जिनका जन्मस्थान और हम भारतीयों का तीर्थ स्थान (महान साहित्यकार उदय प्रकाश जी के शब्दों में) इटली में है. NAC की अध्यक्षा को कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा प्राप्त था (इसीलिए कोई कहे कि सोनिया गाँधी सरकार में नहीं थी तो या तो वो स्वयं परम है या फिर आपको बनाने के जुगाड़ में  लगा है). अमर्त्य सेन की पत्नी रोथ्स्चाइल्ड परिवार की हैं और रोथ्स्चाइल्ड के बारे में आपको पता ही होगा।
कुल मिला के ये कि दुनिया एकदम गोल है और ये कि आप सोच रहे थे कि भारत सरकार की नीतियाँ यहीं स्वतंत्र रूप से बन रही थीं तो आप भोले बच्चे हैं और अगर ये सोचा कि लाल आतंक ऐसे ही अमीरों के शोषण के खिलाफ उठा खड़ा हुआ  स्वतःस्फूर्त विद्रोह है तो मतलब आप के दूध के दांत भी नहीं टूटे अभी.

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​हमेशा से हिंदू विरोधी है कांग्रेस, 10 सबसे बड़े सबूत


हमेशा से हिंदू विरोधी है कांग्रेस, 10 सबसे बड़े सबूत
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील और कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने दलील दी है जिस तरह से राम हिंदुओं के लिए आस्था का सवाल हैं उसी तरह तीन तलाक मुसलमानों की आस्था का मसला है। भगवान राम की तुलना तीन तलाक और हलाला जैसी घटिया परंपराओं से करना लोगों को बहुत चुभ रहा है। माना जा रहा है कि कपिल सिब्बल ने सोच-समझकर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नीयत से ये बयान दिया है। लेकिन कपिल सिब्बल का बयान इस लंबे सिलसिले की एक कड़ी भर है। हम आपको बताते हैं उन 10 बयानों और घटनाओं के बारे में जो इस बात का सबूत हैं कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से हिंदू विरोध की नीति पर चली है और आज भी वो इसी नीति पर मजबूती के साथ कायम है।
1. वंदेमातरम से थी दिक्कत: आजादी के बाद यह तय था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया और कहा कि वंदे मातरम से मुसलमानों के दिल को ठेस पहुंचेगी। जबकि इससे पहले तक तमाम मुस्लिम नेता वंदे मातरम गाते थे। नेहरू ने ये रुख लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों को शह दे दी। जिसका नतीजा देश आज भी भुगत रहा है। आज तो स्थिति यह है कि वंदेमातरम को जगह-जगह अपमानित करने की कोशिश होती है। जहां भी इसका गायन होता है कट्टरपंथी मुसलमान बड़ी शान से बायकॉट करते हैं।
2. सोमनाथ मंदिर का विरोध: गांधी और नेहरू ने हिंदुओं के सबसे अहम मंदिरों में से एक सोमनाथ मंदिर को दोबारा बनाने का विरोध किया था। गांधी ने तो बाकायदा एतराज जताते हुए कहा था कि सरकारी खजाने का पैसा मंदिर निर्माण में नहीं लगना चाहिए, जबकि इस समय तक हिंदू मंदिरों में दान की बड़ी रकम सरकारी खजाने में जमा होनी शुरू हो चुकी थी। जबकि सोमनाथ मंदिर के वक्त ही अगर बाबरी, काशी विश्वनाथ और मथुरा कृष्ण जन्मभूमि के विवादों को भी हल किया जा सकता था। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं होने दिया।
3. बीएचयू में हिंदू शब्द से एतराज: नेहरू और गांधी को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदू शब्द पर आपत्ति थी। दोनों चाहते थे कि इसे हटा दिया जाए। इसके लिए उन्होंने महामना मदनमोहन मालवीय पर दबाव भी बनाया था। जबकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से दोनों को ही कोई एतराज नहीं था।
4. हज के लिए सब्सिडी शुरू की: ये कांग्रेस सरकार ही थी जिसने हज पर जाने वाले मुसलमानों को सब्सिडी देने की शुरुआत की। दुनिया के किसी दूसरे देश में ऐसी सब्सिडी नहीं दी जाती। जबकि कांग्रेस सरकार ने अमरनाथ यात्रा पर खास तौर पर टैक्स लगाया। इसके अलावा हिंदुओं की दूसरी धार्मिक यात्राओं के लिए भी बुनियादी ढांचा कभी विकसित नहीं होने दिया गया। अब मोदी सरकार के आने के बाद उत्तराखंड के चारों धाम को जोड़ने का काम शुरू हुआ है।
5. 26/11 के पीछे हिंदुओं का हाथ: मुंबई हमले के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इसके पीछे हिंदू संगठनों की साजिश का दावा किया था। दिग्विजय के इस बयान का पाकिस्तान ने खूब इस्तेमाल किया और आज भी जब इस हमले का जिक्र होता है तो पाकिस्तानी सरकार दिग्विजय के हवाले से यही साबित करती है कि हमले के पीछे आरएएस का हाथ है। दिग्विजय के इस बयान पर उनके खिलाफ कांग्रेस ने कभी कोई कार्रवाई या खंडन तक नहीं किया।
6. मंदिर जाने वाले छेड़खानी करते हैं: राहुल गांधी ने कहा था कि जो लोग मंदिर जाते हैं वो लड़कियां छेड़ते हैं। यह बयान भी कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व की हिंदू विरोधी सोच की निशानी थी। यह अलग बात कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद खुद राहुल गांधी कई मंदिरों के चक्कर काट चुके हैं। हालांकि उनकी मां सोनिया अब भी ऐसा कुछ नहीं करती हैं जिससे यह मैसेज जाए कि उनका हिंदू धर्म से कोई नाता है।
7. राम सेतु पर हलफनामा: 2007 में कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि चूंकि राम, सीता, हनुमान और वाल्मिकी वगैरह काल्पनिक किरदार हैं इसलिए रामसेतु का कोई धार्मिक महत्व नहीं माना जा सकता है। जब बीजेपी ने इस मामले को जोरशोर से उठाया तब जाकर मनमोहन सरकार को पैर वापस खींचने पड़े। हालांकि बाद के दौर में भी कांग्रेस रामसेतु को तोड़ने के पक्ष में दिखती रही है।
8. हिंदू आतंकवाद शब्द गढ़ा: इससे पहले हिंदू के साथ आतंकवाद शब्द कभी इस्तेमाल नहीं होता था। मालेगांव और समझौता ट्रेन धमाकों के बाद कांग्रेस सरकारों ने बहुत गहरी साजिश के तहत हिंदू संगठनों को इस धमाके में लपेटा और यह जताया कि देश में हिंदू आतंकवाद का खतरा मंडरा रहा है। जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। इस केस में जिन बेगुनाहों को गिरफ्तार किया गया वो इतने सालों तक जेल में रहने के बाद बेकसूर साबित हो रहे हैं।
9. राम की तुलना इस्लामी कुरीति से: तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने इसकी तुलना भगवान राम से की। यह तय है कि कपिल सिब्बल ने यह बात अनजाने में नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर कही है। उनकी नीयत भगवान राम का मज़ाक उड़ाने की है। कोर्ट में ये दलील देकर कांग्रेस ने मुसलमानों को खुश करने की कोशिश की है।
10. सेना में फूट डालने की कोशिश: सोनिया गांधी के वक्त में भारतीय सेना को जाति और धर्म में बांटने की बड़ी कोशिश हुई थी। तब सच्चर कमेटी की सिफारिश के आधार पर सेना में मुसलमानों पर सर्वे की बात कही गई थी। बीजेपी के विरोध के बाद मामला दब गया, लेकिन इसे देश की सेनाओं को तोड़ने की गंभीर कोशिश के तौर पर आज भी देखा जाता है।
यह बात भी ऐतिहासिक तथ्य है कि राजनीति में सोनिया गांधी के बढ़ते असर के साथ देश में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं। पहले राजीव गांधी और बाद में मनमोहन सिंह के काल में ईसाई मिशनरियों को उन इलाकों में भी गतिविधियां चलाने की इजाज़त दी गई जो आदिवासी होने के कारण संरक्षित माने जाते हैं। नतीजा ये निकला कि बीते करीब 3 दशक में देश के तमाम आदिवासी इलाके ईसाई मिशनरियों के चंगुल में फंस चुके हैं। जबकि इसी दौरान हिंदू संगठनों के लिए इन इलाकों में काम करना लगभग नामुमकिन बना दिया गया