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द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान – Shri Krishan Jugnu


द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान

जलस्रोतों में “कुंड” एक विशेष प्रकार की रचना है तो उसमें भी एक निर्माण शैली है पद्मकुंड की। इसे कमल कुंड भी कहा जाता है। इसे कमलखेत के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह पद्म उत्पन्न करता है।

पुष्करिणी, दीर्घिका, पोखरी, पोखरणी वगैरह भी इसके पर्याय हैं। हालांकि अपराजित, राजवल्लभ आदि शिल्प ग्रंथों में अनेक प्रकार के कुंडों का नामवार विवरण मिल जाता है और पुराणों में मत्स्य और सांबपुराण में इनका सुंदर विवरण है। इससे यह तो लगता ही है –

1. ये कुंड कृत्रिम बनाए जाते थे,
2. कुंडों की रचना पाषाणों से होती है,
3. पुष्पादि रूप में उनका संयोजन होता
4. कोणादि रूपों को भी दिखाया जाता।

भारतीय परंपरा में स्नान और देवालयों में स्नात्र आदि विधानों के लिए बड़े-बड़े कुंड उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए गए हैं। कई नाम, कई रूप और उनके निर्माण की भी अपनी अपनी कहानियां और इतिहास है।

श्रीलंका तक कुंडों का वैभव देखा जा सकता है। वहां राजधानी के पास ही जेतवनराम परिसर में एक सुंदर कुंड है : पद्मपोखरी ( Lotus pond) यह करीब आठ सौ साल पुराना है। राजा पराक्रमबाहू (1153-86 ई.) के शासनकाल में इसका निर्माण हुआ। इसके प्रारंभिक अवशेष जेतवन की खुदाई में मिले।

इसकी रचना पद्म के आकार की है और नज़र एेसे आता है जैसे भूमिस्थ कमलाकार मंच हो जबकि यह बहुत पवित्र जलस्रोत रहा है। महावंश के उद्योग-निर्देश के मुताबिक इसका निर्माण हुआ। यह जानकर रोचक लगेगा यह पद्मकुंड अष्टकोण की रचना से बना हुआ है।

भूमितल से नीचे तक पांच प्रस्तर की तहें हैं और पुष्प के रूप में कुछ इस तरह गड़े हुए पत्थरों का संयोजन किया गया है वे मुकुलित पंखड़ियों से लेकर आंतरिक रूप तक को दिखाई दे।
इसकी रचना का नियम है :
360 ÷ 8 = 45°
इस तरह पांचों स्तर के पाषाणों को 45-45 डिग्री में सुघड़ बनाकर ऊपर से नीचे तक न्यून करते हुए संयोजित किया गया है। इससे यह वृताकार भी है और उसमें पंखुडी-पंखुड़ी पद्म प्रदर्शित करती है। दरअसल ये सीढ़ियां भी सिद्ध होती है। अंदर ही मोखी रूप में जलभरण और निकास रूप में जल निकालने का उपाय भी प्राचीन स्नानागार की तरह दिखाई देता है।

है न जलस्रोतों का अपना रचना विधान ! आपके आसपास भी तो कुछ एेसा जल कौतुक होगा, बताइयेगा। आदरणीयYogendra Pratap Singhh जी का आभार कि चित्र भेजकर इस स्थापत्य को विश्लेषित करने का अवसर सुलभ करवाया।…. जय जय

– श्रीकृष्ण “जुगनू”

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