Posted in ज्योतिष - Astrology

आपके घर में वास्तुदोष होने पर भी डायबिटीज परेशान न करे तो इसके लिए आप नीचे लिखे उपाय जरूर अपनाएं-


आपके घर में वास्तुदोष होने पर
भी डायबिटीज परेशान न करे तो इसके
लिए आप नीचे लिखे उपाय जरूर अपनाएं-
– घर के दक्षिण-पश्चिम भाग का वास्तु सुधार कर
डायबिटीज से बचा जा सकता है।
– अपने बेडरूम में कभी भी भूल कर
भी खाना ना खाएं।
-अपने बेडरूम में जूते चप्पल नए या पुराने बिलकुल
भी ना रखें।
– मिटटी के घड़े का पानी का इस्तेमाल करे
तथा घडे में प्रतिदिन सात तुलसी के पत्ते डाल कर
उसे प्रयोग करे।
– दिन में एक बार अपनी माता के हाथ का बना हुआ
खाना अवश्य खाएं।- अपने पिता को तथा जो घर का मुखिया हो उसे
पूर्ण सम्मान दे।- प्रत्येक मंगलवार को अपने मित्रों को मिष्ठान
जरूर दे।
– रविवार भगवान सूर्य को जल दे कर यदि बन्दरों को गुड़ खिलाये
तो आप स्वयं अनुभव करेंगे की मधुमेह शुगर
कितनी जल्दी जा रही है।
– ईशानकोण से लोहे की सारी वस्तुए
हटा लें।

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

बंदर कभी बीमार नहीं होता – विट्ठलव्यास


 

बंदर कभी बीमार नहीं होता
#विट्ठलव्यास
किसी भी चिडिया को डायबिटीस
नही होता है ।
किसी भी बंदर को हार्ट अटैक
नहीं आता ।

कोई भी जानवर ना तो आयोडीन
नमक खाता है और ना ब्रश करता
है फिर भी किसी को थायराइड
नहीं होता और ना दांत खराब
नहीं होता है ।

बंदर मनुष्य के सबसे नजदीक है, शरीर संरचना में बस बंदर और
आप में यही फर्क है की बंदर के
पूँछ है आपके नहीं है बाकी सब
कुछ समान है।

तो फिर बंदर को कभी भी हार्ट
अटैक, डायबिटीस,high BP,
क्यों नहीं होता है?

एक पुरानी कहावत है बंदर कभी बीमार नहीं होता और यदि वीमार होगा तो जिंदा नहीं बचेगा मर
जाएगा ?

क्यों बंदर बीमार क्यों नहीं होता?

राजीव भाई बताते हैं कि एक बहुत बडे,प्रोफेसर है,मेडिकल कॉलेज में काम करते है ।

उन्होंने एक बडा गहरा रिसर्च
किया कि बंदर को बीमार बनाओ !

तो उन्होने तरह – तरह के virus
और वैक्टीरिया बंदर के शरीर मे डालना शुरू किया, कभी इंजेक्शन
के माध्यम से कभी किसी और माध्यम से ।
वो कहते है,मैं 15 साल असफल
रहा,लेकिन बंदर को कुछ नहीं
हुआ ।

*राजीव भाई ने प्रोफेसर से कहा
कि आप यह कैसे कह सकते है
कि बंदर को कुछ नहीं हो सकता ?

तब उन्हांने एक दिन यह रहस्य की बात बताई वो आपको भी बता देता
हूँ कि बंदर का जो RH factor दुनिया है वह दुनियाँ में सबसे
आदर्श है ।

कोई डॉक्टर जब आपका RH factor नापता है ना !

तो वो बंदर के ही RH Factor
से तुलना करता है,वह डॉक्टर
आपको बताता नहीं यह अलग
बात है*।

उसका कारण यह है कि,उसे कोई बीमारी आ ही नहीं सकती ।

उसके ब्लड में कभी कॉलेस्टेरॉल
नहीं बढता,कभी ट्रायग्लेसाईड नहीं बढती,ना ही उसे कभी डायबिटीज होती है ।

शुगर को कितनी भी बाहर से उसके शरीर में इंट्रोडयूस करो,वो टिकती
नहीं ।

तो वह *प्रोफेसर साहब कहते है कि, यार यह यही चक्कर है कि बंदर सवेरे सवेरे ही भरपेट खाता है ।

जो आदमी नहीं खा पाता है,इसीलिए उसको सारी विमारियां होती है ।

सूर्य निकलते ही सारी चिड़िया,
सारे जानवर खाना खाते हैं ।

*जबसे मनुष्य इस ब्रेकफास्ट,
लंच,डिनर के चक्कर में फंसा
तबसे मनुष्य ज्यादा बीमार रहने
लगा है ।

*तो वह प्रोफेसर रवींद्रनाथ शानवाग
ने अपने कुछ मरींजों से कहा की देखो भैया,सुबह सुबह भरपेट खाओ ।

उनके कई मरीज है तो उन्होंने सबको बताया कि सुबह – सुबह भरपेट भोजन करो ।

उनके मरीज बताते है की,जबसे उन्हांने सुबह भरपेट खाना शुरू
किया तबसे उन्हें डायबिटीज
यानि शुगर कम हो गयी,किसी
का कॉलेस्टेरॉल कम हो गया,
किसी के घटनों का दर्द कम
हो गया,किसी का कमर का
दर्द कम हो गया गैस बनाना
बंद हो गई,पेट मे जलन होना,
बंद हो गयी नींद अच्छी आने लगी ….. वगैरह ..वगैरह ।

और यह बात बागभट्ट जी 3500
साल पहले कहते हैं कि सुबह का किया हुआ भोजन सबसे अच्छा है ।

माने जो भी स्वाद आपको पसंद लगता है वो सुबह ही खाईए*।

*तो सुबह के खाने का समय तय करिये ।

तो समय मैने आपका बता दिया
कि सूरज निकलने से ढाई घंटे
तक यानि 9.30 बजे तक,
ज्यादा से ज्यादा 10 बजे तक
आपका भरपेट भोजन हो जाना चाहिए ।

और ये भोजन तभी होगा जब आप नाश्ता बंद करेंगे ।

यह नास्ता का प्रचलन हिंदुस्थानी नहीं है,ये अंग्रेजो की देन है,और रात्रि का भोजन सूर्य अस्त होने से पहले आधा पेट कर लें ।

तभी बीमारियों से बचोगे ।

सुबह सूर्य निकलने से ढाई घंटे तक हमारी जठराग्नि बहुत तीव्र होती है ।

हमारी जठराग्नि का संबंध सूर्य से है, हमारी जठराग्नि सबसे अधिक तीव्र स्नान के बाद होता है ।

स्नान के बाद पित्त बढ़ता है इसलिए सुबह स्नान करके भोजन कर लें ।

तथा एक भोजन से दूसरे भोजन
के बीच ४ से ८ घंटे का अंतराल
रखें बीच में कुछ ना खाएं ।

और दिन डूबने के बाद बिल्कुल
ना खायें।

Posted in संस्कृत साहित्य

जानियें, चार-युग और उनकी विशेषताएं* -‎विकास खुराना‎


| *जानियें, चार-युग और उनकी विशेषताएं* |
*’युग’* शब्द का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि ।
यहाँ हम चारों युगों का वर्णन करेंगें। युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई, एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना। प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है –
*सत्ययुग* – यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 17,28,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 1,00,000 वर्ष होती है ।
मनुष्य की लम्बाई – 32 फिट (लगभग) [21 हाथ]
सत्ययुग का तीर्थ – पुष्कर है ।
इस युग में पाप की मात्र – 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है ।
इस युग के अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है ।
अवतार होने का कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए।
इस युग की मुद्रा – रत्नमय है ।
इस युग के पात्र – स्वर्ण के है ।
.
*त्रेतायुग* – यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 12,96,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 10,000 वर्ष होती है ।
मनुष्य की लम्बाई – 21 फिट (लगभग) [ 14 हाथ ]
त्रेतायुग का तीर्थ – नैमिषारण्य है ।
इस युग में पाप की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।
इस युग के अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)
अवतार होने के कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए ।
इस युग की मुद्रा – स्वर्ण है ।
इस युग के पात्र – चाँदी के है ।
.
*द्वापरयुग* – यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 8.64,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 1,000 होती है ।
मनुष्य लम्बाई – 11 फिट (लगभग) [ 7 हाथ ]
द्वापरयुग का तीर्थ – कुरुक्षेत्र है ।
इस युग में पाप की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।
इस युग के अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण), बुद्ध (राजा के घर)।
अवतार होने के कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए ।
इस युग की मुद्रा – चाँदी है ।
इस युग के पात्र – ताम्र के हैं ।
.
*कलियुग* – यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –
इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 4,32,000 वर्ष होती है ।
इस युग में मनुष्य की आयु – 100 वर्ष होती है ।
मनुष्य की लम्बाई – 5.5 फिट (लगभग) [3.5 हाथ]
कलियुग का तीर्थ – गंगा है ।
इस युग में पाप की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।
इस युग के अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) ।
अवतार होने के कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए।
इस युग की मुद्रा – लोहा है।
इस युग के पात्र – मिट्टी के है।

Posted in ज्योतिष - Astrology

डायबिटीज परेशान न करे तो इसके लिए आप नीचे लिखे ज्योतिषीय उपाय अपनाएं-


डायबिटीज परेशान न करे तो इसके लिए आप
नीचे लिखे ज्योतिषीय उपाय अपनाएं-
मधुमेह होने पर शुक्रवार को सफेद कपड़े में श्रद्धानुसार सफेद
चावल का सोलह शुक्रवार तक दान करना चाहिए। यह दान
किसी मंदिर या जरूरतमंद व्यक्ति को करना चाहिए।
साथ ही त्नú शुं शुक्राय नम:त्न मंत्र
की एक माला निरंतर करनी चाहिए।
इसी प्रकार बृहस्पति व
चंद्रमा की वस्तुओं का दान किया जाना चाहिए। शाम
को या रात्रि में महामृत्युंजय मंत्र
की माला करनी चाहिए। पुष्य नक्षत्र में
संग्रह किए गए जामुन का सेवन करने व करेले का पाउडर सुबह
दूध के साथ लेने से लाभ होता है। शुभ नक्षत्रों में औषधि सेवन
और हवन :नवीन औषधि का आरंभ
अश्विनी, पुष्य, हस्त और अभिजीत
नक्षत्रों में करना शुभ है। गोचरीय
ग्रहों की अशुभता को शुभ करने के लिए
औषधीय स्नान करना चाहिए। ग्रहों के दूषित होने
पर हवन करवाना शुभ है। सूर्य की शांति के लिए
समिधा, आक या मंदार की डाली ग्रहण
करनी चाहिए। चंद्रमा के लिए पलाश, मंगल के लिए
खदिर या खैर, बुध के लिए अपामार्ग या चिचिढ़ा, गुरु के लिए
पीपल, शुक्र के लिए उदुम्बर या गूलर, शनि के लिए
खेजड़ी या शमी, राहु के लिए
दूर्वा तथा केतु के लिए कुशा की समिधा, सरल, स्निग्ध
डाली हवन के लिए ग्रहण
करनी चाहिए और ग्रहों के मंत्रों के साथ
यज्ञाहुतियां देनी चाहिए।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

सुल्तान बेघारा का सीना फाड़ दिया था इस रानी ने,वाघेला राजपूत की शेरनी राणी रुदाबाई के अदम्य साहस की ये कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी


सुल्तान बेघारा का सीना फाड़ दिया था इस रानी ने,वाघेला राजपूत की शेरनी राणी रुदाबाई के अदम्य साहस की ये कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी

http://www.navbharatkhabar.com/bakhel-rajpoot-rani/

भारत की मिट्टी कण कण से शेर,शेरनियो को जन्म दिया हैं समय समय पर अश्शूरो का दमन करने भारत माता को मुक्त करवाने एवं भारत  की संस्कृति कला मंदिरों की रक्षा के लिए नर से लेकर नारी तक योद्धा बनी इसलिए भारत भूमि को कहा जाता हैं वीर भोग्य वसुंधरा ।

आधुनिकता का दंभ भरने वाली पीड़ी

कौन कहता है हिन्दु धर्म मे स्त्रीयों को स्वातंत्र्यता नही थी ?इतिहास न पढनेवालो कमअक्ल लोग ही ऐसा कह सकते है

रानी रुदाबाई को शस्त्र उठाने कि स्वातंत्र्यता थी, इससे ज्यादा और क्या स्वातंत्र्यता किसी मनुष्य को दि जा सकती है ?मेरा तो यही मत है

कि आजकल की मिलनेवाली स्वातंत्र्यता (-नैतिकता=छूट) से यह स्वातंत्र्यता जो बहुजन हिताय एवं बहुजन सुखाय थी वह काफी अच्छी है !

क्यो क्या कहते हो ?

जिसने सुल्तान बेघारा की सीने को फाड़ कर दिल निकाल कर कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया था एवम दूसरी ओर धर से सर अलग करके पाटन राज्य की बीचो बिच टांग दिया था :

१५वी शताब्दी इसवी सन १४६०-१४९८ पाटन राज्य गुजरात से कर्णावती (वर्तमान अहमदाबाद) के राजा थे राणा वीर सिंह वाघेला, यह वाघेला राजपूत राजा की एक बहुत सुन्दर रानी थी जिनका नाम था रुदाबाई (उर्फ़ रूपबा) पाटन राज्य बहुत  ही वैभवशाली राज्य था । इस राज्य ने कई तुर्क हमले झेले थे,पर कामयाबी किसी को नहीं मिली.सन १४९७ पाटन राज्य पे हमला किया राणा वीर सिंह वाघेला के पराक्रम के सामने सुल्तान बेघारा की ४०००० से अधिक संख्या की फ़ौज २ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाई ।

राणा वीर सिंह की फ़ौज २६०० से २८०० की तादात में थी क्योंकि कर्णावती और पाटन बहुत ही छोटे छोटे दो राज्य थे इनमे ज्यादा फ़ौज की आवश्यकता उतनी नहीं होती थी राणा जी के रणनीति ने ४०००० की जिहादी लूटेरो के फ़ौज को धुल चटाया थी, परन्तु द्वितिय युद्ध में राणा जी के साथ रहनेवाले निकटवर्ती मित्र घन्नू साहूकार ने राणा वीर सिंह को धोका दिया एवं सुल्तान बेघारा के साथ मिलकर राणा वीरसिंह वाघेला को मारकर उनकी स्त्री एवं धन लूटने की योजना बनाई , सुल्तान बेघारा ने साहूकार को बताया अगर जीत गए युद्ध में तो जो मांगोगे दूंगा तब साहूकार की दृष्टि राणा वाघेला की सम्पत्ति पर थी और सुल्तान बेघारा की नज़र रानी रुदाबाई को अपने हरम में रखने की एवं पाटन राज्य की राजगद्दी पर आसीन होकर राज करने की थी ।

साहूकार जा मिला सुल्तान बेघारा से और सारी गुप्त जानकारी उसे प्रदान करदी । जिस जानकारी से राणा वीर सिंह को परास्त कर रानी रूपबा एवं पाटन की गद्दी को हड़प जा सकता था । सन १४९८ इसवी (संवत १५५५) दो बार युद्ध में परास्त होने के बाद सुल्तान बेघारा ने तीसरी बार फिरसे साहूकार से मिली जानकारी के बल पर दुगनी सैन्यबल के साथ आक्रमण किया, राणा वीर सिंह की सेना ने अपने से दुगनी सैन्यबल देख कर भी रणभूमि नहीं त्यागी और असीम पराक्रम और शौर्य के साथ लढाई की, जब राणा जी सुल्तान बेघारा के सेना को खदेड कर सुल्तान बेघारा की और बढ़ रहे थे तब उनके भारोसेमंद साथी साहूकार ने पीछे से वार कर दिया,जिससे राणा जी की रणभूमि में मृत्यु होगयी ।

साहूकार ने जब सुल्तान बेघारा को उसके वचन अनुसार राणा जी की धन को लूटकर उनको देने का वचन याद दिलाया तब सुल्तान बेघारा ने कहा “एक गद्दार पर कोई ऐतबार नहीं करता हैं गद्दार कभी भी किसी से भी गद्दारी कर सकता हैं” । सुल्तान बेघारा ने साहूकार को हाथी के पैरो के तले फेंककर कुचल डालने का आदेश दिया और साहूकार की पत्नी एवं साहूकार की कन्या को अपने सिपाही के हरम में भेज दिया।(और हर गद्दार का यही हाल होता जिहादी यवनों के लिए हर गैर मुसलमान काफ़िर ही होता है चाहे कितना वी उनके तलवे चाटलो आजकल के नेताओ)

सुल्तान बेघारा रानी रूपबा को अपनी वासना का सिकार बनाने हेतु राणा जी के महल की ओर १०००० से अधिक लश्कर लेकर पंहुचा। रानी रूपबा के पास शाह ने अपने दूत के जरिये निकाह प्रस्ताव रखा। रानी रूपबा जी ने महल के ऊपर छावणी बनाई थी जिसमे २५०० धनुर्धारी वीरंगनाये थी,जो रानी रूपबा जी का इशारा पाते ही लश्कर पर हमला करने को तैयार थी । रानी रूपबा जी न केवल सौंदर्य की धनि नहीं थी बल्कि शौर्य और बुद्धि की भी धनि थी उन्होंने सुल्तान बेघारा को महल द्वार के अन्दर आने को कहा सुल्तान बेघारा वासना ने अंधा होकर वैसा ही किया जैसा राणी जी ने कहा, और राणी जी ने समय न गवाते हुए सुल्तान बेघारा के सीने में खंजर उतर दिया और उधर छावनी से तीरों की वर्षा होने लगी जिससे शाह का लश्कर बचकर वापस नहीं जा पाया । सुल्तान बेघारा को मारकर रानी रूपबा ने सीने को फाड़ कर दिल निकाल कर कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया था और उसके सर को धड से अलग करके पाटन राज्य के बिच टंगवा दिया साथ ही यह चेतावनी वी दी की गई की कोई भी अताताई भारतवर्ष पर या हिन्दू नारी पर बुरी नज़र डालेगा तो उसका यही हाल होगा ।

रानी रूपबा जी इस युद्ध के बाद जल समाधी ले ली ताकि उन्हें कोई और आक्रमणकारी अपवित्र ना कर पाए रानी रुदाबाई की २५०० धनुर्धारी वीरांगनाओं ने सुल्तान बेघारा के १०००० के लश्कर को परास्त किया था इस भयंकर युद्ध को इतिहास से मिटा दिया गया एवं मनगढ़ंत कहानी को इतिहास बना दिया गया ।

सुल्तान बेघारा के निकाह के प्रस्ताव को रानी रुदाबाई जी ने अडालज बावड़ी नामक पानी संग्रह करने का कुआँ बनाने के लिए मान लिया था,जिससे कृषि एवं राज्य में पानी की समस्या कभी ना आये. परन्तु यह इतिहास सम्पूर्ण गलत हैं क्यूंकि अडालज बावड़ी में मोहनजोदरो कला का इस्तेमाल किया हुआ हैं मोहनजोदारो सभ्यता कालीन कला केवल हिन्दू इस्तेमाल करते थे । रानी रूपबा से सुल्तान बेघारा के साथ हुए युद्ध को शादी में परिवर्तित कर दिया गया पर कहते हैं ना हर झूठ का अंत होता हैं वैसे ही इस झूठ का भी अंत यही होता हैं ।

 

( वेद , पुराण हर जगह यह लिखा हैं हिन्दू धर्म की उत्थान एवं पतन दोनों नारी के हाथो हैं इसलिए हमारे धर्म में नारी अर्थात देवीतुल्य होते हैं )

संदर्भ-:

The Rajputs of Saurashtra- पृष्ठ 151

Educational Britannica Educational (2010).<em> </em>The Geography of India: Sacred and Historic Places. The Rosen Publishing Group. pp. 269

http://hindutva.info/

By: छत्रपतीची वाघिन मनीषा सिंह

Posted in भारत के भव्य नगर - Bharat ke Nagar

द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान – Shri Krishan Jugnu


द्मकुण्ड : विशिष्ट स्थापत्य विधान

जलस्रोतों में “कुंड” एक विशेष प्रकार की रचना है तो उसमें भी एक निर्माण शैली है पद्मकुंड की। इसे कमल कुंड भी कहा जाता है। इसे कमलखेत के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह पद्म उत्पन्न करता है।

पुष्करिणी, दीर्घिका, पोखरी, पोखरणी वगैरह भी इसके पर्याय हैं। हालांकि अपराजित, राजवल्लभ आदि शिल्प ग्रंथों में अनेक प्रकार के कुंडों का नामवार विवरण मिल जाता है और पुराणों में मत्स्य और सांबपुराण में इनका सुंदर विवरण है। इससे यह तो लगता ही है –

1. ये कुंड कृत्रिम बनाए जाते थे,
2. कुंडों की रचना पाषाणों से होती है,
3. पुष्पादि रूप में उनका संयोजन होता
4. कोणादि रूपों को भी दिखाया जाता।

भारतीय परंपरा में स्नान और देवालयों में स्नात्र आदि विधानों के लिए बड़े-बड़े कुंड उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाए गए हैं। कई नाम, कई रूप और उनके निर्माण की भी अपनी अपनी कहानियां और इतिहास है।

श्रीलंका तक कुंडों का वैभव देखा जा सकता है। वहां राजधानी के पास ही जेतवनराम परिसर में एक सुंदर कुंड है : पद्मपोखरी ( Lotus pond) यह करीब आठ सौ साल पुराना है। राजा पराक्रमबाहू (1153-86 ई.) के शासनकाल में इसका निर्माण हुआ। इसके प्रारंभिक अवशेष जेतवन की खुदाई में मिले।

इसकी रचना पद्म के आकार की है और नज़र एेसे आता है जैसे भूमिस्थ कमलाकार मंच हो जबकि यह बहुत पवित्र जलस्रोत रहा है। महावंश के उद्योग-निर्देश के मुताबिक इसका निर्माण हुआ। यह जानकर रोचक लगेगा यह पद्मकुंड अष्टकोण की रचना से बना हुआ है।

भूमितल से नीचे तक पांच प्रस्तर की तहें हैं और पुष्प के रूप में कुछ इस तरह गड़े हुए पत्थरों का संयोजन किया गया है वे मुकुलित पंखड़ियों से लेकर आंतरिक रूप तक को दिखाई दे।
इसकी रचना का नियम है :
360 ÷ 8 = 45°
इस तरह पांचों स्तर के पाषाणों को 45-45 डिग्री में सुघड़ बनाकर ऊपर से नीचे तक न्यून करते हुए संयोजित किया गया है। इससे यह वृताकार भी है और उसमें पंखुडी-पंखुड़ी पद्म प्रदर्शित करती है। दरअसल ये सीढ़ियां भी सिद्ध होती है। अंदर ही मोखी रूप में जलभरण और निकास रूप में जल निकालने का उपाय भी प्राचीन स्नानागार की तरह दिखाई देता है।

है न जलस्रोतों का अपना रचना विधान ! आपके आसपास भी तो कुछ एेसा जल कौतुक होगा, बताइयेगा। आदरणीयYogendra Pratap Singhh जी का आभार कि चित्र भेजकर इस स्थापत्य को विश्लेषित करने का अवसर सुलभ करवाया।…. जय जय

– श्रीकृष्ण “जुगनू”

Posted in स्मरण शक्ति - Memory power

बुद्धि बढ़ाने और पढ़ा हुआ न भूलने का मंत्र


बुद्धि बढ़ाने और पढ़ा हुआ न भूलने का मंत्र

 

मंत्र :: ॐ नमो भगवती सरस्वती परमेश्वरी वाक्य वादिनी है विद्या देही भगवती हंसवाहिनी बुद्धि में देही प्रज्ञा देही,देही विद्या देही देही परमेश्वरी सरस्वती स्वाहा।

 

विधी- यह मंत्र अत्यन्त तीव्र एवं प्रभावी होता है। बसंत पंचमी के दिन या किसी भी रविवार को सरस्वती माता के चित्र के समक्ष दूध से बना प्रसाद चढ़ाकर उक्त मंत्र का विधि पूर्वक
11माला जप करें तथा खीर का भोजन करें तो यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। फिर जब भी पढ़ने बैठे इस मंत्र का 7 बार जप करें तो पढ़ा हुआ तुरंत याद हो जाता है और बुद्धि तीव्र हो जाती है।
Posted in बॉलीवुड - Bollywood

जस्टिन बीबर – Thakur Ram Kumar Rana


ये था वो चमगादड़ जिसको देखने के लिए ₹75000 का टिकट था….!

जस्टिन बीबर की आधी उतरी पेण्ट देखने के लिए भारतियों ने खर्च डाले 250 करोड़ ? इनमें से अधिकतर बॉलीवुड, उच्च वर्ग के सेकुलर प्रगतिशील बुद्धिजीवी | और यही लोग हिन्दू धर्म पे कटाक्ष करते बोलते हैं कि शिवलिंग में आधा किलो दूध चढ़ाना पैसे की बर्बादी है ।

जस्टिन बीबर को एक टिकट के 75000 में खरीदकर हम उसे एक रात में 250 करोड़ लेकर भेज देते हैं | वहीं जब बाढ़ राहत कोष, सैनिक सहायता कोष या विधवा राहत फंड के नाम पर सौ रूपए देने में साँस फूल जाती है, फेफड़ों में पानी भर जाता है हमारे |

90 मिनट होठ हिलाकर 250 करोड़ ले गया, ये वही देश है जहाँ बीस रूपए किलो के प्याज अगर 30 के हो जाए तो अच्छे अच्छो के गणित गड़बड़ा जाते हैं |

ध्यान से सोचिए प्राथमिकता किसे देनी चाहिए ? मेरे इस संदेश को आपसे साधुवाद की अपेक्षा नहीं है ! फिर भी गौर करना.

Posted in संस्कृत साहित्य

वैदिक वर्ण व्यवस्था में शूद्र किसे माना है ? – नीरज आर्य जन्धेडी


प्रश्न :- वैदिक वर्ण व्यवस्था में शूद्र किसे माना है ?
उत्तर :- “ शोचनीयः शोच्यां स्थितिमापन्नो वा सेवायां साधुर अविध्द्यादिगुणसहितो मनुष्यो वा “ अर्थात शूद्र वह व्यक्ति होता है जो अपने अज्ञान के कारण किसी प्रकार की उन्नत स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाया और जिसे अपनी निम्न स्थिति होने की तथा उसे उन्नत करने की सदैव चिंता बनी रहती है अथवा स्वामी के द्वारा जिसके भरण पोषण की चिंता की जाती है |
“शूद्रेण हि समस्तावद यावत् वेदे न जायते” अर्थात जब तक कोई वेदाध्ययन नहीं करता तब तक वह शूद्र के सामान है वह चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो |
“जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्यते” अर्थात प्रत्येक मनुष्य चाहे किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ हो वह जन्म से शूद्र ही होता है | उपनयन संस्कार में दीक्षित होकर विदध्याध्ययन करने के बाद ही द्विज बनता है |
जो मनुष्य अपने अज्ञान तथा अविद्ध्या के कारण किसी प्रकार की उन्नत स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता वह शूद्र रह जाता है | महर्षि मनु ने शूद्र के कर्म इस प्रकार बताये हैं –
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत | एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ||
अर्थात परमात्मा ने शूद्र वर्ण ग्रहण करने वाले व्यक्तियों के लिए एक ही कर्म निर्धारित किया है वो यह है कि अन्य तीनों वर्णों के व्यक्तियों के यहाँ सेवा या श्रम का कार्य करके जीविका करना | क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति शूद्र होता है अतः वह सेवा या श्रम का कार्य ही कर सकता है इसलिए उसके लिए यही एक निर्धारित कर्म है |
अब यदि कोई यह कुतर्क दे कि शूद्र को सेवा कार्य क्यों दिया उसे अन्य कार्य क्यों नहीं दिया, यह तो शूद्र के साथ पक्षपात है; तो विचार कीजिये कि शूद्र कहा किसे है ? उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि शूद्र वह व्यक्ति होता है जो अशिक्षित एवं अयोग्य होता है| जो अशिक्षित व अयोग्य है क्या उसे सेवा के अलावा अन्य कोई जिम्मेदारी दी जा सकती है ? आधुनिक प्रशासन व्यवस्था में भी चार वर्ग निश्चित किये गए हैं – प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तृतीय श्रेणी और चतुर्थ श्रेणी | यदि कुतर्क की दृष्टि से सोचा जाये तो यह भारत सरकार का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के साथ पक्षपात है; सरकार को हर अशिक्षित व्यक्ति को डॉक्टर, इंजीनियर और जज बना देना चाहिए | अब जरा विचार कीजिये कि यदि अशिक्षित व्यक्ति डॉक्टर बना दिया जाए तो वह कैसा इलाज करेगा ? अशिक्षित व्यक्ति को जज बना दिया जाए तो वह कैसा फैसला सुनाएगा ? इसलिए वैदिक वर्ण व्यवस्था में कर्म एवं योग्यतानुसार ही वर्ण निर्धारण किया गया है क्योंकि व्यक्ति योग्यतानुसार ही अपना अपना कार्य ठीक से कर सकता है इसीलिए यह कहावत है कि – “जिसका काम उसी को साजे, दूजा करे तो डंडा बाजे” |