Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

भारत के कुछ महान राजा जिनका इतिहास सभी हिन्दू को पढना चाहिए
1. *बप्पा रावल*- अरबो, तुर्को को कई हराया ओर हिन्दू धरम रक्षक की उपाधि धारण की
2. *भीम देव सोलंकी द्वितीय* – मोहम्मद गौरी को 1178 मे हराया और 2 साल तक जेल मे बंधी बनाये रखा
3. *पृथ्वीराज चौहान* – गौरी को 16 बार हराया और और गोरी बार बार कुरान की कसम खा कर छूट जाता …17वी बार पृथ्वीराज चौहान हारे
4. *हम्मीरदेव (रणथम्बोर)* – खिलजी को 1296 मे अल्लाउदीन ख़िलजी के 20000 की सेना में से 8000 की सेना को काटा और अंत में सभी 3000 राजपूत बलिदान हुए राजपूतनियो ने जोहर कर के इज्जत बचायी ..हिनदुओ की ताकत का लोहा मनवाया
5. *कान्हड देव सोनिगरा* – 1308 जालोर मे अलाउदिन खिलजी से युद्ध किया और सोमनाथ गुजरात से लूटा शिवलिगं वापिस राजपूतो के कब्जे में लिया और युद्ध के दौरान गुप्त रूप से विश्वनीय राजपूतो , चरणो और पुरोहितो द्वारा गुजरात भेजवाया तथा विधि विधान सहित सोमनाथ में स्थापित करवाया
6. *राणा सागां*- बाबर को भिख दी और धोका मिला ओर युद्ध . राणा सांगा के शरीर पर छोटे-बड़े 80 घाव थे, युद्धों में घायल होने के कारण उनके एक हाथ नही था एक पैर नही था, एक आँख नहीं थी उन्होंने अपने जीवन-काल में 100 से भी अधिक युद्ध लड़े थे.
7. *राणा कुम्भा* – अपनी जिदगीँ मे 17 युदध लडे एक भी नही हारे
8. *जयमाल मेड़तिया*- ने एक ही झटके में हाथी का सिर काट डाला था। चित्तोड़ में अकबर से हुए युद्ध में *जयमाल राठौड़* पैर जख्मी होने कि वजह से *कल्ला जी* के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे, ये देखकर सभी युद्ध-रत साथियों को चतुर्भुज भगवान की याद आयी थी, जंग में दोनों के सिर काटने के बाद भी धड़ लड़ते रहे और 8000 राजपूतो की फौज ने 48000 दुश्मन को मार गिराया ! अंत में अकबर ने उनकी वीरता से प्रभावित हो कर जयमाल मेड़तिया और पत्ता जी की मुर्तिया आगरा के किलें में लगवायी थी.
9. *मानसिहं तोमर*- महाराजा मान सिंह तोमर ने ही ग्वालियर किले का पुनरूद्धार कराया और 1510 में सिकंदर लोदी और इब्राहीमलोदी को धूल चटाई
10. *रानी दुर्गावती*- चंदेल राजवंश में जन्मी रानी दुर्गावती राजपूत राजा कीरत राय की बेटी थी। गोंडवाना की महारानी दुर्गावती ने अकबर की गुलामी करने के बजाय उससे युद्ध लड़ा 24 जून 1564 को युद्ध में रानी दुर्गावती ने गंभीर रूप से घायल होने के बाद अपने आपको मुगलों के हाथों अपमान से बचाने के लिए खंजर घोंपकर आत्महत्या कर ली।
11. *महाराणा प्रताप* – इनके बारे में तो सभी जानते ही होंगे … महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था और कवच, भाला, ढाल, और हाथ मे तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था.
12. *जय सिंह जी* – जयपुर महाराजा ने जय सिंह जी ने अपनी सूझबुज से छत्रपति शिवजी को औरंगज़ेब की कैद से निकलवाया बाद में औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उनकी हत्या विष देकर करवा डाली
13. *छत्रपति शिवाजी* – मराठा वीर वंशज छत्रपति शिवाजी ने औरंगज़ेब को हराया तुर्को और मुगलो को कई बार हराया
14. *रायमलोत कल्ला जी* का धड़ शीश कटने के बाद लड़ता- लड़ता घोड़े पर पत्नी रानी के पास पहुंच गया था तब रानी ने गंगाजल के छींटे डाले तब धड़ शांत हुआ उसके बाद रानी पति कि चिता पर बैठकर सती हो गयी थी.
15. सलूम्बर के नवविवाहित *रावत रतन सिंह चुण्डावत* जी ने युद्ध जाते समय मोह-वश अपनी पत्नी हाड़ा रानी की कोई निशानी मांगी तो रानी ने सोचा ठाकुर युद्ध में मेरे मोह के कारण नही लड़ेंगे तब रानी ने निशानी के तौर

पैर अपना सर काट के दे दिया था, अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृ भूमि के लिए शहीद हो गये थे.
16. औरंगज़ेब के नायक तहव्वर खान से गायो को बचाने के लिए पुष्कर में युद्ध हुआ उस युद्ध में *700 मेड़तिया राजपूत* वीरगति प्राप्त हुए और 1700 मुग़ल मरे गए पर एक भी गाय कटने न दी उनकी याद में पुष्कर में गौ घाट बना हुआ है
17. एक राजपूत वीर जुंझार जो मुगलो से लड़ते वक्त शीश कटने के बाद भी घंटो लड़ते रहे आज उनका सिर बाड़मेर में है, जहा छोटा मंदिर हैं और धड़ पाकिस्तान में है.
18. जोधपुर के *यशवंत सिंह* के 12 साल के पुत्र *पृथ्वी सिंह* ने हाथो से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था.
19. *करौली के जादोन राजा* अपने सिंहासन पर बैठते वक़्त अपने दोनो हाथ जिन्दा शेरो पर रखते थे.
20. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 राजपूत सैनिक थे और अकबर की और से 85000 सैनिक थे फिर भी अकबर की मुगल सेना पर हिंदू भारी पड़े
21. राजस्थान पाली में आउवा के *ठाकुर खुशाल सिंह* 1857 में अजमेर जा कर अंग्रेज अफसर का सर काट कर ले आये थे और उसका सर अपने किले के बाहर लटकाया था तब से आज दिन तक उनकी याद में मेला लगता है

इसके अतरिक्त बहुत से योद्धा हुए है इस धरती पर जिनका नाम यहाँ नहीं किन्तु इससे उनका भारत को दिया योगदान कम नहीं होगा |

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रोमानिया में 11वीं कक्षा में पढ़ाये जाते हैं रामायण, महाभारत के अंश


रोमानिया में 11वीं कक्षा में पढ़ाये जाते हैं रामायण, महाभारत के अंश

भारत में रोमानिया के राजदूत डोबरे ने विशेष बातचीत में कहा, ‘‘ दोनों देशों के पहले से चले आ रहे मजबूत संबंध हाल के वर्षो में काफी प्रगाढ़ हुए है।

http://www.jansatta.com/national/lasses-of-11th-class-in-romania-are-ramayana-part-of-the-mahabharata/318862/?utm_source=JansattaHP&utm_medium=referral&utm_campaign=update_story

भारत और रोमानिया के बीच बेहद करीबी और मजबूत संबंधों को रेखांकित करते हुए रोमानिया के राजदूत राडू ओक्टावियन डोबरे ने बताया कि दोनों देशों के करीबी सांस्कृतिक संबंध हैं और इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे यहां 11वीं कक्षा में बच्चों को रामायण और महाभारत के अंश पढ़ाये जाते हैं।

भारत में रोमानिया के राजदूत डोबरे ने विशेष बातचीत में कहा, ‘‘ दोनों देशों के पहले से चले आ रहे मजबूत संबंध हाल के वर्षो में काफी प्रगाढ़ हुए हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच सम्पर्क पहले से ज्यादा बढ़े हैं । दोनों देशों के बीच करीबी सांस्कृतिक संबंध हैं । उन्होंने कहा, ‘‘ हमारे संबंध काफी करीबी हैं और इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रोमानिया में 11वीं कक्षा में बच्चों को रामायण और महाभारत के अंश पढ़ाये जाते हैं। इंटरनेशनल कल्चर खंड में बच्चों को यह पढ़ाया जाता है।

राडू ओक्टावियन डोबरे ने कहा कि हमारे देश में दो बालीवुड चैनल 24 घंटे प्रसारित होते हैं । हम दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत बनाना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की भारत की दावेदारी के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि रोमानिया, भारत को सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में देखना चाहता है । उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच संबंधों को बढ़ावा देने में पर्यटन का महत्वपूर्ण स्थान है और हम रोमानिया को भारत के पर्यटन के नक्शे पर देखना चाहते हैंं।

रोमानिया के राजदूत ने कहा कि आज दुनिया में देशों के बीच आर्थिक संबंधों को काफी महत्व दिया जाता है, ऐसे में रोमानिया, भारत के साथ आर्थिक सहयोग को प्रगाढ़ बना रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध पहले से ही अच्छे रहे हैं और अब ये शानदार हो गए हैं । आर्थिक स्तर पर सहयोग बढ़ाने की हमेशा गुंजाइश होती है और इस संदर्भ में पर्यटन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। रोमानिया दूतावास ने हाल ही में अस्का टुअरिज्म कंसल्टिंग लिमिटेड के साथ मिलकर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया है ।

रोमानिया को पर्यटन के लिए एक बेहतर स्थान बताते हुए राडू ओक्टावियन डोबरे ने कहा कि सुंदर शहर, आध्यात्मिक पवर्तीय क्षेत्र, स्वच्छ हवा, शानदार भोजन के साथ समुद्र किनारों के परिपूर्ण दर्शनीय स्थलों के साथ डेन्यूब नदी पर्यटकों को काफी लुभाती है। इसके साथ ही प्राचीन सभ्यता से जुड़े स्थानों के साथ कई यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं ।उन्होंने कहा कि रोमानिया के एक लेखक मिर्सिया इलिएड की पश्चिम बंगाल से जुड़ी प्रेम कहानी और इस पर आधारित पुस्तक मैत्रेय काफी लोकप्रिय रही है।

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क्या वेदों में जादू-टोना आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं?


क्या वेदों में जादू-टोना आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं?

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वेदों के विषय में एक भ्रान्ति प्रचलित हो गई है कि वेदों में जादू-टोने आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं। इसका मुख्य कारण सायणाचार्य, महीधर आदि द्वारा वेदों के कुछ प्रकरणों में जादू-टोना को अन्धविश्वास के रूप में अपने भाष्य में वर्णन हैं। विदेशी लेखकों जैसे ब्लूमफील्ड[i] आदि भी इस मान्यता का समर्थन करते दीखते हैं। अनेक भारतीय लेखक भी उन्हीं का अनुसरणकर इसी मान्यता का समर्थन करते प्रतीत होते हैं[ii]। वैदिक विद्वान श्री प्रियरत्न आर्ष[iii] के अनुसार जादू शब्द वेद के “यातु” शब्द का रूपान्तर या अपभ्रश है। यातु शब्द का अर्थ निघण्टु 2/19 के अनुसार हिंसा है। अथर्ववेद 8/8/6/18 में जादू, इंद्रजाल आदि का प्रयोग शत्रु सेना को नष्ट करने के लिए हुआ हैं जो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक एवं सत्य है। जबकि तांत्रिक ग्रंथों में जादू-टोने के नाम पर कल्पित और अवैज्ञानिक वर्णन मिलते हैं। इस विषय में रामदास गौड़ की हिंदुत्व नामक पुस्तक में लिखते है कितंत्रोक्त, मरणोच्चाटन, वशीकरण, अभिचारिक क्रिया का प्रसंग अथर्ववेद संहिता में पाया जाता है सही, किन्तु तन्त्र के अन्यान्य प्रधान लक्षण नहीं मिलते। ऐसी दशा में तंत्र को हम अथर्व संहितामूलक नहीं कह सकते”। अथर्ववेद के विभिन्न मन्त्रों में शारीरिक और मानसिक रोगों का उपचार , शत्रु घात,अपने अंदर के रोगों और दोषों को हटाकर स्वास्थ्य एवं अच्छे गुणों कोग्रहण करने का सन्देश दिया गया हैं। इन मन्त्रों के मूल सन्देश को न समझ पाने के कारण इस भ्रान्ति का प्रचलन हुआ।
 
हम यहाँ अथर्ववेद के कुछ सूक्तो एवं मंत्रो पर विचार कर यह सिद्ध करेगे की वेदों में जादू टोना याअश्लीलता नहीं है। अथर्ववेद के सूक्तों में मणि शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर हुआ है। सायण आदि भाष्यकारों ने मणि का अर्थ वह पदार्थ किया हैं जिसेशरीर के किसी अंग पर बांधकर मंत्र का पाठ करने से अभिष्ट फल के प्राप्ति अथवा किसी अनिष्ट का निवारण किया जादू टोने से किया जा सकता हैं। मणि अथवा रत्न शब्द किसी भी अत्यंत उपयोगी अथवा मूल्यवान वस्तु के लिए प्रयोग हुआ हैं। उस वस्तु को अर्थात मणि को शरीर से बांधने का अर्थ है उसे वश में कर लेना, उसका उपयोग लेना, उसका सेवन करना आदि।
कुछ मणि सूक्त इस प्रकार हैं
1. पर्णमणि- अथर्ववेद 3/5 सूक्त का अर्थ करते हुए सायण आचार्य लिखते हैंजो व्यक्ति तेज, बल, आयु और धन आदि को प्राप्त करना चाहता हो, वह पर्ण अर्थात दाक के वृक्ष की बनी हुई मणि को त्रयोदशी के दिन दही और सहद में भिगोकर तीन दिन रखे और चौथे दिन निकलकर उस मणि को इस सूक्त के मंत्रो का पाठ करके बांध ले और दही और शहद को खा ले। इसी सूक्त में सायण लिखते हैं की यदि किसी राजा का राज्य छीन जाये तो काम्पील नमक वृक्ष की टहनियों से चावल पकाकर मंत्र का पाठ कर ग्रहण करे तो उसे राज्य की प्राप्ति हो जाएगी।
सायण का अर्थ अगर इतना कारगर होता तो भारत के लोग जो की वेदों के ज्ञान से परिचित थे कभी भी पराधीन नहीं बनते, अगर बनते तो जादू टोना करके अपने आपको फिर से स्वतंत्र कर लेते। पर्ण का अर्थ होता हैं पत्र और मणि का बहुमूल्य इससे पर्णमणि का अर्थ हुआ बहुमूल्य पत्र। अगर कोई व्यक्ति राज्य का राजा बनना चाहता है तो राज्य के नागरिको का समर्थन (vote or veto) जो की बहुमूल्य है, उसे प्राप्त हो जाये तभी वह राजा बन सकता हैं। इसी सूक्त के दुसरे मंत्र में प्रार्थना हैं की राज्य के क्षत्रियो को मेरे अनुकूल कर, तीसरे मंत्र में राज्य के देव अर्थात विद्वानों को अनुकूल कर, छठे में राज्य के धीवर, रथकार लोग, कारीगर लोग, मनीषी लोग हैं उनके मेरे अनुकूल बनाने की प्रार्थना करी गई हैं। इस प्रकार इस सूक्त में एक अभ्यर्थी की राष्ट्र के नेता बनने की प्रार्थना काव्यमय शैली में पर्ण-मणि द्वारा व्यक्त करी गयी हैं। जादू टोने का तो कहीं पर नामो निशान ही नहीं है।
2. जांगिडमणि
अथर्ववेद 2/4 सूक्त तथा 19/34-35 सूक्तों में जांगिडमणि की महिमा बताते हुए सायण लिखते हैं जो व्यक्ति कृत्या (हिंसा) से बचना चाहता हो, अपनी रक्षा चाहता हो तथा विघ्नों की शांति चाहता हो, वह जांगिड पेड़ से बनी विशेष प्रकार की मणि को शण (सन) के धागे में पिरोकर मणि बांधने की विधि से इस सूक्त के मंत्रो को पड़कर बांध ले।उसका मंतव्य पूर्ण हो जायेगा।
अथर्ववेद के इन सूक्तों का ध्यान से विश्लेषण करने पर पता चलते हैं की जांगिड किसी प्रकार की मणि नहीं हैं, जिसको बांधने से हिंसा से रक्षा हो सके अपितु एक औषधि है जो भूमि से उत्पन्न होने वाली वनस्पति हैं , जो रोगों का निवारण करने वाली है। (अथर्व 19/34/9) रोगों की चिकित्सा करने वाली हैं (अथर्व 19/35/1,अथर्व 19/35/5, अथर्व 2/4/3) इस सूक्त में जो राक्षसों को मारने की बात कहीं गयी हैं। वो रोगजनक कृमिरूप (Microbes) शत्रु हैं जो रोगी बनाते हैं।
यहाँ भी कहीं जादू टोने का नहीं अपितु आयुर्वेद का वर्णन हैं
3. शंखमणि
अथर्ववेद 4/10 सूक्त में शंखमणि का वर्णन हैं. सायण के अनुसार उपनयन संस्कार के पश्चात बालक की दीर्घ आयु के लिए शंख को इस सूक्त के मंत्रो के साथ बांध दे तथा यह भी लिखा हैं बाढ़ आ जाने पर रक्षा करने के लिए भी शंख बांध लेने से डूबने का भय दूर हो जाता हैं।
सायण का मंतव्य विधान रूप से असंभव हैं अगर शंख बांधने से आयु बढ़ सकती हैं तो सायण ने स्वयं अपनी आयु क्यों नहीं बढाकर 100 वर्ष से ऊपर कर ली होती। अगर शंख बांधने से डूबने का खतरा नहीं रहता, तब तो किसी की भी डूबने से मृत्यु ही नहीं होती। सत्य यह है शंख को अथर्ववेद 4/10/3 में विश्व भेसज अर्थात अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/1 में रोगों को दुर्बल करने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/2 में शंख को कृमि राक्षस को मरने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/4 में शंख को आयु बढाने वाली औषधि बताया गया है। आयुर्वेद में शंख को बारीक़ पिस कर शंख भस्म बनाए का वर्णन हैं जिससे अनेक रोगों से मुक्ति मिलती हैं।
4. शतवारमणि
अथर्ववेद 19/36 सूक्त का भाष्य करते हुए सायण लिखते हैं जिस व्यक्ति की संताने मर जाती हो और इस प्रकार उसके कुल का क्षय हो रहा हो , वह इस सूक्त के मंत्रो को पढकर शतवारमणि को बांध ले तो उसका यह संकट दूर हो जाता है।
शतवारमणि कोई जादू टोने करने वाली वस्तु नहीं हैं अपितु एक औषधी है जिससे शरीर को बल मिलता है और रोगों का नाश होता हैं।
ऊपर की पंक्तियो में हमने चार मणियो की समीक्षा पाठको के सम्मुख दी गई है। इनमे किसी में भी जादू टोने का उल्लेख नहीं है। प्रत्युत चार गुणकारी औषधियो का वर्णन हैं। जिनसे रोगनिवारण में बहुत उपयोगी होने के कारण मूल्यवान मणि कह दिया गया हैं।
5. कृत्या और अभिचार
अथर्ववेद में बहुत से स्थलों (19/34/4,2/4/6,8/5/2) पर कृत्या-अभिचार के प्रयागों का वर्णन मिलता है। सायण के भाष्य को पढ़ कर लगता हैं की अभिचार शब्द का अर्थ हैं किसी शत्रु को पीड़ा पहुचाने के लिए, उसे रोगी बनाने के लिए अथवा उसकी मृत्यु के लिए कोई विशेष हवन अथवा कर्म काण्ड का करना। कृत्या का अर्थ हैं ऐसे यज्ञ आदि अनुष्ठान द्वारा किसी की हिंसा कर उसे मार डालना।
अभिचार का अर्थ बनता हैं विरोधी द्वारा शास्त्रों से प्रहार अथवा आक्रमण तथा कृत्या का अर्थ बनता हैं उस प्रहार से हुए घाव बनता हैं। मणि सूक्त की औषधियो से उस घाव की पीड़ा को दूर किया जा सकता हैं। यही इन मन्त्रों का मूल सन्देश हैं।
इस प्रकार जहाँ भी वेदों में मणि आदि का उल्लेख हैं। वह किसी भी प्रकार जादू टोने से सम्बंधित नहीं हैं। आयुर्वेद के साथअथर्ववेद का सम्बन्ध कर के विभिन्न औषधियो को अगर देखे तो मणि शब्द से औषधी का अर्थ स्पष्ट हो जाता हैं।
अथर्ववेद को विनियोगो की छाया से मुक्त कर स्वंत्र रूप से देखे तो वेद मंत्र बड़ी सुंदर और जीवन उपयोगी शिक्षा देने वाले दिखने लगेगे और अथर्ववेद में जादू टोना होने के मिथक की भ्रान्ति दूर होगी।
डॉ विवेक आर्य
[i] Hymns of the Atharva Veda translated by Maurice Bloomfield Sacred Books of the East, Vol. 42,1897
[ii] The Atharva Veda is the chief source of our knowledge of popular magic, hypnotism, black magic etc. P.6 Hinduism: Analytical Study by Amulya Mohapatra, Bijaya Mohapatra
[iii] अथर्ववेदीय मन्त्रविद्या पृष्ठ 2