Posted in हास्यमेव जयते

वाह रे पैसा! तेरे कितने नाम?


वाह रे पैसा! तेरे कितने नाम?

मंदिर मे दिया जाये तो ( चढ़ावा )

स्कुल में ( फ़ीस )

शादी में दो तो ( दहेज )

तलाक देने पर ( गुजारा भत्ता )

आप किसी को देते हो तो ( कर्ज )

अदालत में ( जुर्माना )

सरकार लेती है तो ( कर )

सेवानिवृत्त होने पे ( पेंशन )

अपहर्ताओ के लिएं ( फिरौती )

होटल में सेवा के लिए ( टिप )

बैंक से उधार लो तो ( ऋण )

श्रमिकों के लिए ( वेतन )

मातहत कर्मियों के लिए ( मजदूरी )

अवैध रूप से प्राप्त सेवा ( रिश्वत )

और मुझे दोगे तो (गिफ्ट)
मैं पैसा हूँ:!

मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते; मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूँ।

मैं पैसा हूँ:!

मुझे पसंद करो सिर्फ इस हद तक कि लोग आपको नापसन्द न करने लगें।

मैं पैसा हूँ:!
मैं भगवान् नहीं मगर लोग मुझे भगवान् से कम नहीं मानते।

मैं पैसा हूँ:!

मैं नमक की तरह हूँ; जो जरुरी तो है मगर जरुरतसे ज्यादा हो तो जिंदगी का स्वाद बिगाड़ देता है।

मैं पैसा हूँ:!

इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके पास मैं बेशुमार था; मगर फिरभी वो मरे और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था।

मैं पैसा हूँ:!

मैं कुछ भी नहीं हूँ; मगर मैं निर्धारित करता हूँ; कि लोग आपको कितनी इज्जत देते है।

मैं पैसा हूँ:!

मैं आपके पास हूँ तो आपका हूँ:! आपके पास नहीं हूँ तो; आपका नहीं हूँ:! मगर मैं आपके पास हूँ तो सब आपके हैं।

मैं पैसा हूँ:!

मैं नई नई रिश्तेदारियाँ बनाता हूँ; मगर असली औऱ पुरानी बिगाड़ देता हूँ।

मैं पैसा हूँ:!

मैं सारे फसाद की जड़ हूँ; मगर फिर भी न जाने क्यों सब मेरे पीछे इतना पागल हैं:?।

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सिकंदर भी हार गया था नागा साधुओं से!


सिकंदर भी हार गया था नागा साधुओं से!

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करने योग्य कहानियों से भरा पड़ा है. एक खूबसूरत तिलिस्म है जो आपको अपनी ओर खींचता है और उसमें आप खो जाते हैं. एक सिरा पकड़िए और उसके सहारे अतीत के सुहाने सफर पर निकल जाइए. इतिहास के मोतियों से वर्तमान की माला सजा सकते हैं आप.
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ये किस्सा है नागा साधुओं का. सिकंदर महान से उनकी मुलाकात का. यूनानी राजा सिकंदर पूरी दुनिया को जीतने के इरादे से अपनी सेना लेकर निकला. तुर्की, ईरान को जीतकर आगे बढ़ते हुए वह 326 ईसा पूर्व में भारत आ पहुंचा. सिकंदर ने प्रण किया था कि वह दुनिया के आखिरी छोर तक अपना राज कायम करेगा, भले उसकी सेना उसका साथ न दे. खैर, उसकी ये महत्वकांक्षा कभी पूरी नहीं हो पाई. भारत में युद्ध के दौरान घायल सिकंदर बेबीलोन में एक दर्दनाक मौत मर गया, 323 ईसा पूर्व में.

अपने पूरे शरीर पर भभूत लगाए, बिना वस्त्र के घूमने वाले नागाओं को आपने जरूर देखा होगा. कुंभ के मेले में, तस्वीरों में या खबरों में. दुनियावी झमेलों से कोसों दूर ये नागा साधु परमात्मा की तलाश में अपना जीवन गुजार देते हैं.

इतिहास में भी इन नागा साधुओं का जिक्र आया है. चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, सिकंदर के भारत आक्रमण के दौरान, सिकंदर की मुलाक़ात नागा साधुओं से हुई थी और वह उनके ज्ञान, दर्शन और जीवन के प्रति समझ को देखकर हैरान रह गया था.

प्लूटार्क, एक ग्रीक जीवनी लेखक और निबंधकार था. बाद में उसने रोम की नागरिकता ले ली. उसने नागा साधुओं के लिए ‘Gymnosophists’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले किया. इसका अर्थ होता है ‘ज्ञानी नागा’. प्लूटार्क ने सिकंदर और दस नागा दार्शनिकों के बीच सिंधु नदी के तट पर हुई मुलाकात का जिक्र किया है.

उसने लिखा है कि सिकंदर ने दस नागाओं को गिरफ्तार किया जिन्होंने यूनानी सेना के खिलाफ विद्रोह को बढ़ावा दिया था. ये नागा चालाक थे और किसी भी तरह के सवालों के जवाब देने के लिए प्रसिद्ध थे. इसलिए सिकंदर उनसे मुश्किल सवाल पूछना चाहता था. सिकंदर ने शर्त रखी थी कि गलत जवाब देने वाले को तुरंत ही मार दिया जाएगा. नागाओं ने सभी सवालों के सही जवाब दिए. सिकंदर अचंभित था. उसने सभी नागाओं को इनाम देकर विदा किया.

एक और किस्सा है, सिकंदर को सिंधु के तट पर एक नागा वैरागी मिला. बहुत देर से वह एक पत्थर पर बैठकर आसमान की तरफ देख रहा था. सिकंदर ने पूछा, ‘तुम क्या कर रहे हो?’
जवाब मिला, ‘शून्य को महसूस कर रहा हूं.’
साधु ने वही सवाल सिकंदर से पूछा. सिकंदर ने कहा कि मैं दुनिया जीत रहा हूं. दोनों जोर से हंसे. सिकंदर को लगा कि ये संन्यासी मुर्ख है जो एक जगह बैठा हुआ है. संन्यासी इसलिए हंसा क्योंकि दुनिया में अंतिम तो कुछ भी नहीं.

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सिकंदर की मौत की भविष्यवाणी भी कालानोस नामक एक नागा साधु ने ही की थी. उसी ने सिकंदर को डंडमिस नामक नागा दार्शनिक के बारे में बताया. सिकंदर ने अपने नौकर को डंडमिस को बुलाने के लिए भेजा. डंडमिस बेफिक्र होकर पत्तों के बिस्तर सोया हुआ था. नौकर ने धन का लालच और मारने का डर दिखाया. लेकिन डंडमिस ने सिकंदर के पास जाने से साफ़ मना कर दिया. कहते हैं कि सिकंदर खुद डंडमिस के पास जंगल में आया. इस मुलाकात को यूनानी साहित्य में सिकंदर-डंडमिस वार्तालाप के नाम से जाना जाता है.

सिकंदर से मिलने वाले नागाओं के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वे जैन दिगंबर या फिर ब्राह्मण थे. लेकिन इसका पुख्ता सबूत प्राप्त नहीं होता. भारत की इस पावन भूमि को अपने वैराग्य, ज्ञान, चातुर्य से परिपूर्ण बनाने वाले इन नागा दार्शनिकों का इतिहास पढ़ने और ग्रहण करने योग्य है.

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लुप्त होने की कगार पर ये किला, पृथ्वीराज चौहान ने इस किले से लड़े थे 17 युद्ध


लुप्त होने की कगार पर ये किला, पृथ्वीराज चौहान ने इस किले से लड़े थे 17 युद्ध

http://hindi.news18.com/haryana/karnal-news-the-fort-made-by-pritviraj-chauhan-on-the-verge-of-extinction-983153.html

लुप्त होने की कगार पर ये किला, पृथ्वीराज चौहान ने इस किले से लड़े थे 17 युद्ध

बचपन से ही पराक्रमी योद्धा रहे पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर में सन 1149 में हुआ था. पृथ्वीराज चौहान ने तरावड़ी में अपना किला बनवाया था. करनाल के कस्बा तरावड़ी जिसका पहला नाम तराईन था. धीरे धीरे इसका नाम तरावड़ी पड़ गया. इस किले में प्रवेश के दो रास्ते थे.
बचपन से ही पराक्रमी योद्धा रहे पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर में सन 1149  में हुआ था. पृथ्वीराज चौहान ने तरावड़ी में अपना किला बनवाया था. करनाल के कस्बा तरावड़ी जिसका पहला नाम तराईन था. धीरे धीरे इसका नाम तरावड़ी पड़  गया.  इस किले में प्रवेश के दो रास्ते थे.

पृथ्वीराज चौहान के पास एक  बड़ी सेना थी जिसे कोई भी पराजित नहीं कर सकता था. क्योकि इस सेना का नेतृत्व पृथ्वीराज चौहान खुद करते थे. तरावड़ी के किले से पृथ्वीराज ने लगभग सत्रह युद्ध लड़े जिनमे सोलह बार पृथ्वीराज चौहान की जीत हुई. आखिर में धोखे से मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान  को मात दी. क्योकि पृथ्वीराज चौहान गउओं  की पूजा करता था मुहम्मद गोरी ने युद्ध में सैकड़ों गउओं  को खड़ा कर दिया .

पृथ्वीराज चौहान ने गौ  माता को युद्ध में देखकर अपने हथियार डाल  दिए और इस तरह पृथ्वीराज चौहान इस युद्ध में हार गया और पृथ्वीराज चौहान को सन 1192 में इसी किले में मौत  के  घाट  उतार  दिया गया. इस तरह एक महान पराक्रमी शूरवीर योद्धा का अंत हुआ.

उसके बाद मुहम्मद गोरी ने इस किले पर राज किया. पृथ्वीराज का यह किला अब खंडर हो चूका है किले के नाम पर केवल दो द्वार ही बचे है . अंदर क्लॉनिया काट कर लोग रह रहे हैं. सन 1947 में भारत पाकिस्तान बनने के बाद इस किले को पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों के लिए कैम्प के रूप में प्रयोग किया गया था जिसके बाद से यह लोग यही पर रह रहे है.

किले को पूरी तरह से लोगों ने ध्वस्त कर दिया है. परन्तु मुख्य गेट के द्वार पर आज भी गोलियों के निशान  देखे जा सकते है. किले की दीवारे जो थोड़ी बहुत बची है आज भी वह उस महान योद्धा के इतिहास को संजोये हुए है.

स्थानीय लोग बताते है की पुरातत्व विभाग की लापरवाही के कारण एक एतिहासिक धरोवर लुप्त होने के कगार पर है. हर पार्टी और सरकार ने वोट बैंक की खातिर इस ऐतिहासिक धरोहर को लुप्त होने की कगार पर पहुंचा दिया.

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लिज्जत पापड़-जसवंती बेन


80 रूपये उधार लेकर सात महिलाओं ने शुरू किया था ‘लिज्जत पापड़’ का कारोबार

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“बहुत सी महिलाओं को अपनी खुद की ताकत बनते देख मुझे ऐसा लगता है की मेरा जीवन सफल हो गया। मैं यह महसूस करती हूँ कि मेरी सारी कोशिशों का प्रतिफल मुझे मिल गया।”-जसवंती बेन

15 मार्च 1959 की गर्मियों की दोपहर में जब साफ आसमान में सूरज अपनी चमक बिखेर रहा था। तब दक्षिणी मुंबई के एक भीड़-भाड़ वाले इलाके गिरगोम के एक पुराने घर की छत पर जसवंती बेन अन्य छह महिलाओं के साथ मिलकर महिला सशक्तिकरण की एक नयी इबारत लिखने को तैयार थी। यह सात महिलाएं उस दोपहर छत पर जो काम कर रही थीं, उसका अंजाम चार पैकेट पापड़ के रूप में सामने आया और सामने आया एक संकल्प की ये काम वो करती रहेंगी।

90 का दशक वह दौर था जब पापड़ का समानअर्थी शब्द लिज्जत पापड़ माना जाता था। आइए आज जानते हैं कि आखिर कैसे जसवंती बेन के साथ मिलकर अन्य छह ग्रामीण महिलाओं ने नारी सशक्तिकरण की एक बेमिसाल गाथा लिख डाली।

शुरुआत से जसवंती बेन ने प्रण किया था कि वो अपने इस व्यवसाय के लिए किसी से चंदा नही मांगेगी, चाहे उनका वो व्यवसाय घाटे में ही क्यों ना चला जाये।

सात महिलाओं द्वारा 80 रुपये कर्ज लेकर शुरू किया गया लिज्जत पापड़ का सफर आज 301 करोड़ रुपये तक के सालाना कारोबार की एक बेमिसाल कहानी कहती है। इस व्यवसाय के माध्यम से आज 40000 से ज्यादा महिलाओं को अपनी पहचान प्राप्त हुई है।  इन महिलाओं का आभा भारतभर में 81 शाखाओं और 27 डिविजनों से छनकर दूर विदेश तक नारी सशक्तिकरण को रोशनी प्रदान कर रही है।

जसवंती बेन

जसवंती बेन के उद्योग का नाम श्री महिला गृह उद्योग है। इसमें काम करने वाली अधिकतर महिलाएं गरीब, अशिक्षित हैं और अपने परिवारों की आमदनी बढ़ाती हैं। पापड के अलावा इस उद्योग से अप्पालम, मसाला, गेंहू आटा, चपाती, कपड़ा धोने का पाउडर और साबुन, और लिक्विड  डिटरजेंट आदि उत्पाद भी तैयार किया जाता है।

सात बहनों से शुरू हुआ ये सफर आज देश भर में 43 हजार बहनों तक फैल गया है।

संस्थान अपनी बहनों की कठिन मेहनत से लगातार आगे बढ़ रहा है जो कठिन से कठिन समय में महिलाओं की शक्ति पर विश्वास करते हुए उन्हे मजबूती प्रदान कर रहा है।

जसवंती बेन की उपलब्धी इसलिए भी खास मानी जाती है क्योंकि वो न केवल गरीब परिवार से ताल्लुकात रखती हैं, बल्कि उनकी शिक्षा भी कुछ खास नहीं थी।

संस्थान के सफर में पहला महत्वपूर्ण पड़ाव 1966 में तब आया, जब संस्था को बांबे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 के तहत और सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकरण प्राप्त हुआ और खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग ने कुटीर उद्योग के तौर पर संस्थान को मान्यता दी।

इस संगठन की खूबी यह है कि हर कोई सबसे नीचे वाले स्तर से काम शुरु करता है और सहकारिता के आधार पर काम करते हुए तरक्की पाता है।

संस्था का मकसद महिलाओं को रोजगार देना और अच्छी आय के जरिए सम्मानित आजीविका उपलब्ध कराना है। कोई भी महिला किसी भी जाति, वंश या रंग की हो, जो संस्थान के मूल्यों और मकसद के साथ खुद को खड़ा करती है, उस दिन से ही इस संस्थान की सदस्य हो जाती है, जिस दिन वो यहां काम की शुरूआत करती है। सुबह साढ़े चार बजे पापड़ उत्पादन का काम शुरू होता है।

लिज्जत अपनी सदस्य बहनों की बच्चों को दसवीं और बारहवीं परीक्षा पास करने के बाद स्कॉलरशिप भी प्रदान करती है।

संगठन की कार्यशैली और उनके उत्पाद की गुणवत्ता को खादी एवं कुटीर उद्योग आयोग ने साल 1998-99 और साल 2000-01 में सर्वोत्तम कुटीर उद्योग के अवार्ड से भी सम्मानित किया है। यही नहीं कॉर्पोरेट एक्सीलेंस के लिए साल 2002 का इकानॉमोकि टाइम्स का बिजनेसवुमन ऑफ द इयर अवार्ड भी मिला। साल 2003 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वोत्तम कुटीर उद्योग के सम्मान से संस्था को सम्मानित किया। 2005 में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली के विज्ञान भवन में संस्थान को ब्रांड इक्विटी अवार्ड से भी सम्मानित किया। भारत के उपभोक्ताओं ने 2010-11 में लिज्जत पापड को पॉवर ब्रांड के रूप में चयनित किया, जिसका सम्मान संस्थान को नई दिल्ली में प्रदान किया गया।

टॉपयाप्स जसवंती बेन और उनकी इस संस्था को सलाम करती है, जो सालों से अपने बेहतरीन कार्यों के जरिए देश की महिलाओं को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने की दिशा में रोशनी दिखाती है। निसंदेह लिज्जत ने देश की तमाम महिलाओं को समाज में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने और सम्मान से जीने का अवसर प्रदान किया है।