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मेंहदी (लासोनिया इनर्मिस)

 

 आयुर्वेद के पुराने ग्रन्थों में मेंहदी को ‘नखरजंनी’ एवं ‘मदयन्तिका’ की संज्ञा दी गई है। अथर्ववेद में इस मदावति के नाम से पुकारा गया है। मेंहदी की व्यावसायिक खेती पद्रिचमी राजस्थान के पाली जिले में (लगभग 70,000-80,000 हैक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल में ) की जा रही है तथा जिले की ‘सोजत’ तहसील पूरे विद्रव की प्रमुख मण्डी बन गई है। इसकी खेती पंजाब व गुजरात में भी होती है व हरियाणा, मध्य प्रदेद्रा व उत्तर प्रदेद्रा की जलवायु भी इसके लिए काफी उपयुक्त है। इसके फूलों की अत्यधिक मीठी सुगन्ध मन को अत्यन्त भाति है।

उपयोगः मेंहदी के पत्तों, छाल, फल और बीजों का उपयोग विभिन्न अंगों पर लेप करने से रक्त का तापक्रम नियंत्रित किया जा सकता है। औद्गाधीय रूपों में मेंहदी कफ-पित नाद्राक, द्राोथहर तथा व्रणद्राोधक होती है। इसके पुद्गप निद्राजनक, ज्वरहन होते हैं। इसके बीज स्तम्भक, अतिसार एवं प्रवाहिका में उपयोगी होते है। यह सिरदर्द, पीलिया और कुद्गठ रोग में भी काफी उपयोगी है। जली हुई चमड़ी पर द्राीतलता पहुँचाती है। हाथों और पैरों पर श्रृंगार के रूप में व बालों को रंगने में भी मेंहदी काफी उपयोगी है।

जलवायुः इसकी खेती कहीं भी समद्राीतोद्गण जलवायु में की जा सकती है।

भूमिः सभी प्रकार की भूमियों-कंकरीली, पथरीली, हल्की, भारी एवं दूसरी प्रकार की कृद्गिा के लिए अनुपयुक्त भूमियों में भी इसकी खेती संभव है। अत्यधिक पानी जमा होने वाली, क्षारीय एवं लवणीय भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं है। 

भूमि की तैयारीः गर्मी में गहरी जुताई करके छोड़ दें। मानसून की प्रथम वद्गर्ाा होने पर खेत में 2-3 जुताइयाँ और करें तथा फिर पाटा लगाकर छोड़ दें।

बिजाई की विधिः एक एकड़ के लिए 2 कि.ग्रा. बीज की नर्सरी तैयारी करनी चाहिए। मार्च-अप्रैल के महीने में छायादार जगह पर जहाँ सिंचाई की व्यवस्था हो, ऊपर उठे हुए बैड बनाकर मेंहदी के बीजों का छिड़काव करें व निद्रिचत समय पर पानी लगाते रहें। बीज का 15-20 दिन के बाद अंकुरण हो जाता है। नर्सरी में साथ-2 खरपतवार भी निकालते रहना चाहिए। अगस्त मास में नर्सरी 16-20 ईंच तक बड़ी हो जाती है तब इसकी रोपाई खेतों में 45 सें.मी. की दूरी पर हल द्वारा सीधी लाईनों में की जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 30 सें.मी. रखें। रोपाई के बाद सिंचाई अवद्रय करें।

निराई-गुड़ाईः रोपाई के एक महीने बाद निराई करना आवद्रयक होता है। यदि आवद्रयकता हो तो अक्तूबर में भी गुड़ाई करें।

खादः इसकी जड़ें काफी गहरी होती है तथा इसमें किसी प्रकार के खाद की आवद्रयकता नहीं होती।

सिंचाईः जड़ों की गहराई के कारण इसमें सिंचाई की भी जरूरत नहीं होती तथा सिंचाई करने पर इसके पत्तों की गुणवत्ता में भी कमी आती है। यह पूर्णतः असिंचित फसल ही लाभदायक है।

कटाईः पहली कटाई मार्च-अप्रैल माह में जमीन से दो-तीन ईंच ऊपर से करें। अगले वद्गर्ाों में दो कटाइयाँ अक्तूबर-नवम्बर तथा मार्च माह में करनी चाहिए। मेंहदी की कटाई करके इसे छोटी-2 ढेरियों में इसे सुखायें। सूख जाने पर पत्तों को झाड़ लेवे और डंठल अलग कर लेवें व बोरियों में भर कर बेचा जा सकता है।

उत्पादनः प्रति वर्द्गा एक एकड़ में 600 से 800 कि.ग्रा. पत्तों का उत्पादन होता है।

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