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वैदिक ज्योतिष »—-ज्योतिष–कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम

वैदिक ज्योतिष »—-ज्योतिष–कसौटी पर खरे उतरते
वैज्ञानिक नियम
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ज्योतिष को संसार में विज्ञान का दर्जा देने से कितने
ही विज्ञान-कर्ता कतराते है. कारण और निवारण
का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत
की श्रेणी मे ज्योतिष
को तभी रखा जा सकता है, जब उसे
पूरी तरह से समझ लिया जाये. वातावरण के परिवर्तन
जैसे तूफ़ान आना,चक्रवात का पैदा होना और हवाओं का रुख
बदलना,भूकम्प आना,बाढ की सूचना देना आदि मौसम
विज्ञान के अनुसार कथित किया जाता है.
पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के
द्वारा ब्रहमाण्ड से आने वाली अनन्त
शक्तियों का प्रवाह का कथन पुराणो मे भी मिलता है.
जिन्हे धनात्मक शक्तियों का रूप प्रदान किया गया है और
दक्षिणी ध्रुव से नकारात्मक शक्तियों का प्रवाह
पृथ्वी पर प्रवाहित होने से
ही वास्तु-शास्त्र को कथित करने में
वैज्ञानिकों को सहायता मिली है.कहावत है कि जब
हवायें थम जाती है तो आने वाले
किसी तूफ़ान का अंदेशा रहता है. यह सब प्राथमिक
सूचनायें भी हमें ज्योतिष
द्वारा ही मिलती है. वातावरण
की जानकारी और वातावरण के
द्वारा प्रेषित सूचनाओं के आधार पर
ही प्राचीन समय से
ही वैज्ञानिक अपने कथनो को सिद्ध करते आये
है,जो आज तक
भी सत्यता की कसौटी पर
सौ प्रतिशत खरे उतरते है. अगर आज का मानव अनिष्ट सूचक
घटनाओ को इस विज्ञान के माध्यम से जान ले तो वह मानव
की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि होगी.
ब्रह्माजी से जब सर्व प्रथम यह विद्या गर्ग
ऋषि ने प्राप्त की और उसके बाद अन्य लोग इस
विद्या को जान सके. प्राचीन काल से
ही ऋषियों-मुनियों ने
अपनी खोजबीन और पराविज्ञान
की मदद से इस विद्या का विकास किया, उन
रहस्यों को जाना जिन्हे आज का मानव अरबों-खरबों डालर खर्च
करने के बाद भी पूरी तरह से प्राप्त
नही कर सका है. तल,वितल,सुतल,तल
ातल,पाताल,धरातल और महातल को ऋषियों ने पहले
ही जान
लिया था उनकी व्याख्या “सुखसागर” आदि ग्रंथों में
बहुत ही विस्तृत रूप से की गई है.
प्राकृतिक रहस्यों को सुलझाने के लिये परा और अपरा विद्याओं
को स्थापित कर दिया था. परा विद्याओं का सम्बन्ध वेदों में निहित
किया था. ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत खगोलशास्त्र,पदार्थ
विज्ञान,आयुर्वेद और गणित का अध्ययन प्राचीन
काल से ही किया जाता रहा है. उस समय के एक
डाक्टर को ज्योतिषी और अध्यापक होना अनिवार्य
माना जाता था और
ज्योतिषी को भी डाक्टरी और
अध्यापन मे प्रवीण होना जरूरी था.
कालान्तर के बाद आर्यभट्ट और बाराहमिहिर ने शास्त्र
का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किये.
“भास्कराचार्य” ने तो न्यूटन से बहुत पहले
ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण-
शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था,जिसे उन्होने अपने ग्रंथ
“सिद्धान्तशिरोमणि” में प्रस्तुत किया है. “आकृष्ट शक्ति च
महीतया,स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या” अर्थात
पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है,जिससे वह अपने
आस पास की वस्तुओं को आकर्षित
करती है.
आज से २२०० साल पहले बाराहमिहिर ने २७ नक्षत्रों और ७
ग्रहों तथा ध्रुव तारे का को वेधने के लिये एक बडे जलाशय में
स्तम्भ का निर्माण
करवाया था,जिसकी चर्चा “भागवतपुराण” मे
की गई है. स्तम्भ मे सात ग्रहों के लिये सात
मंजिले,और २७ नक्षत्रों के लिये २७ रोशनदान काले पत्थरों से
निर्मित करवाये थे. इसके चारों तरफ़ २७ वेधशालायें मन्दिरों के रूप में
बनी थीं. प्राचीन
भारतीय शासक कुतुब्द्दीन ऐबक ने उन
सब वेधशालाओं को तुडवाकर वहाँ मस्जिद
बनवा दी थी और
रही सही कसर
अन्ग्रेजी शासन नें निकाल दी, जिन्होने
इस स्तम्भ के ऊपरी भाग
को भी तुडवा दिया था. हालॉकि आज
भी वह ७६ फ़ुट शेष है. यह
वही दिल्ली की प्रसिद्ध
“कुतुबमीनार” है, जिसे
सारी दुनिया जानती है.
ज्योतिष विज्ञान आज
भी उतना ही उपयोगी है,जितना कि कभी पुरातन
काल में था. मुस्लिम ज्योतिषी इब्बनबतूता और
अलबरूनो ने भारत मे रह कर संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त
किया और अनेक ज्योतिष ग्रंथों का अरबी भाषा में
अनुवाद किया और अरब देशों में इसका प्रचार प्रसार किया.
“अलबरूनो” ने “इन्डिका” नामक ग्रन्थ लिखा जिसका अनुवाद बाद
में जर्मन भाषा में किया गया था. जर्मन विद्वानो ने जब यह
पुस्तक पढी तो उनका ध्यान भारत
की ओर आकर्षित हुआ और उन लोगो ने यहां के
अनेक प्राचीन ग्रन्थों का अनुवाद किया. यूनान के
प्रसिद्ध “यवनाचार्य” ने भारत मे ही रह कर कई
ग्रन्थ ज्योतिष के लिखे.
लन्दन के प्रसिद्ध विद्वान “फ़्रान्सिस हचिंग” ने शोध द्वारा यह
सिद्ध किया कि मिश्र के “पिरामिड” और उनमे रखे जाने वाले
शवों का स्थान ज्योतिषीय रूप रेखा के
द्वारा ही तय किया जाता था
कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम:—
ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव
भी पृथ्वी पर पडता है. सूर्य और
चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख
और समझ सकते है. सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के
प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख
सकते है. जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और
पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार
का आना इसी प्रभाव का कारण है.
पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है.
मनुष्य के अन्दर
भी पानी की मात्रा अधिक
होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानवी प्रकृति पर
भी पडता है. पूर्णिमा के दिन होने
वाली अपराधों में बढोत्तरी को देखकर इसे
आसानी से समझा जा सकता है. जो लोग मानसिक रूप
से विक्षिप्त होते हैं,
उनकी विक्षिप्तता भी इसी तिथि को अधिक
रहती है. आत्महत्या वाले कारण
भी इसी तिथि को अधिक देखने को मिलते
है. इस दिन सामान्यत: स्त्रियों में मानसिक तनाव
भी कुछ अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक तीव्रता से
बढती है. सूर्योदय के पश्चात वन्स्पतियों और
प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है. आयुर्वेद
भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत
वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है.
कहा भी जाता है कि “संसार का प्रत्येक अक्षर
एक मंत्र है. प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है और प्रत्येक
मनुष्य एक अपना गुण रखता है. बस आवश्यकता महज उसे
पहचानने की होती है”.
’ग्रहाधीन जगत सर्वम”. विज्ञान
की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग
का गोला है,जिससे सभी ग्रह पैदा हुए है.
गायत्री मन्त्र मे सूर्य
को सविता या परमात्मा माना गया है. रूस के वैज्ञानिक
“चीजेविस्की” ने सन १९२० में अन्वेषण
किया था कि हर ११ वर्ष के अन्तराल पर सूर्य में एक विस्फ़ोट
होता है जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर
होती है. इस विस्फ़ोट के समय
पृथ्वी पर उथल-पुथल, लडाई झगडे, मारकाट
होती है. युद्ध
भी इसी समय मे अधिक होते है.
पुरुषों का खून पतला हो जाता है. पेडों के तनों में पडने वाले वलय
बडे होते है. आमतौर पर आप देखें तो पायेंगें कि श्वास रोग
सितम्बर से नबम्बर तक अधिक रूप से बढ जाता है. मासिक धर्म
के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक
सम्भावना होती है.
बताईये क्या इतने सब कारण क्या ज्योतिष को विज्ञान कहने के
लिये पर्याप्त नही है?

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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