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मांसाहार और शाकाहार


ओशो ने मांसाहार और शाकाहार पर बहुत सटीक बातें कही हैं। उन्होंने कहा है कि फल और सब्जियाँ रंगदार और खुशबूदार होती हैं, वो आपको मोहक लगती हैं जबकि मांस देखने में भद्दा और बदबूदार होता है। किसी फल के बगीचे में चले जायें तो मन खिल जाता है। एक दो फल तोड़ कर खाने का मन करता है, वहीं किसी कत्लगाह में चले जाएँ तो अच्छा खासा स्वस्थ मन भी खराब हो जाए। फल या सब्ज़ी तोड़ने या काटने पर आपको कोई ग्लानि नहीं होती, उनकी पीड़ा, उनका रोना और चीखना आपको सुनाई या दिखाई नहीं देता, वहीं किसी पशु की हत्या करना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए देखा जाए तो प्रकृति ने आपकी इंद्रियों को ऐसा बनाया है कि जिव्हा के अलावा बाकी सभी इन्द्रियाँ मांसाहार के ख़िलाफ़ हैं। इससे आपको समझना चाहिए कि प्रकृति आपको क्या इशारा कर रही है। इस इशारे के समझकर ही अपना भोजन चुनें। चुनाव आपका है। 🙏

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​ब्राह्मण एक है !


ब्राह्मण एक है !

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ब्राह्मण, अपने त्याग और तपोमय जीवन, लोक कल्याण की भावना से अभिभूत परोपकारी वृति तथा अगाध ज्ञान के उदधि होने के कारण वन्दनीय माने गए साथ ही परोपकार के गुण के कारण आदर के साथ आमंत्रित किये गए और देश के विभिन्न भागो में राज्याश्रय और राजसम्मान से विभूषित हुए।
समस्त भारत में सभी ब्राह्मण चाहे पञ्च द्रविड़ हो, पञ्च गौड़ या अनके अनेक भेद या आस्पद, सभी ब्राह्मण एक ही है सामान है ना कोई ब्राह्मण छोटा है और ना बड़ा। 
ब्राह्मण कभी स्वार्थी नही रहा ना जातिवादी रहा। ब्राह्मण ने ही क्षतिय भगवान् राम, यादव भगवान् कृष्ण, औघड़ शिव, वानर हनुमान, रीछ जामवंत, केवट को निषाद राज अर्थात समाज का हर वर्ग जो किसी भी प्रकार से प्रसंशनीय था उसे ईश्वर और पूजनीय माना। 
नारी को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती को रूप में पूजा तथा सबको उनके मार्ग पर चलने को प्रेरित किया। ब्राह्मण ही था जिसने तुलसी, बरगद, पीपल, नीम आदि  दि ना जाने कितने पेड़ पौधों, पशु पक्षियों को पूजनीय बताकर सभी के जीवन के लिए उनके महत्त्व को बताने और पेड़पौधों को बचाने का प्रयास किया। नदी-तालाबों और जलाशयों को सभी धार्मिक कृत्यों से जोड़ा ताकि लोग उसे गन्दा ना कर सकें और उसकी महत्ता को समझें। 
अग्नि, वायु, जल, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र, पर्वत अर्थात प्रकृति और ब्रह्माण्ड से जुड़ी हर चीज के महत्त्व को सबसे पहले जाना और सबको सबकी महत्वता तथा ताकत से परिचित कराया।
पर आज भारत में बहुत ही कम प्रतिशत है ब्राह्मणों का, और उसमे भी करीब 80% की हालत अत्यंत दयनीय है, एक प्रतिष्ठित अखवार की शोध के अनुसार 6% ब्राह्मण की संख्या में गिरावट और 8% ब्राह्मण गरीवी रेखा के नीचे जा रहा है जो बहुत गंभीर बात है।
विश्वेदेवा शान्तिः और सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

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प्राचीनकाल में आवागमन के समुचित साधन ना होने के कारण प्रवासी ब्राह्मण जहाँ गये उसी स्थान पर बस गये। कालांतर में उस स्थान के आचार विचार, आहार विहार, रहन सहन, तथा भेष भूषा के प्रभाव में अपने मूल रूप से दूर हो गए। उत्तर भारत बसे ब्राह्मण का वर्ग गौड़ (गौ = पृथ्वी, स्थल + इल = गतौ, जाना, आगे बढ़ना, विजय करना) कहलाया जब की जल मार्ग द्वारा विन्ध्य पर्वतश्रेणी के दक्षिण भू भाग पर बसने बाले ब्राह्मण द्राविड (द्राव = जल की भांति, जल के द्वारा इड = गतौ, जाना, आगे बढ़ना, विजय करना) कहलाया। कालांतर में उत्तर भारत में दूर दूर फैले ब्राह्मण पांच विभाग पञ्च गौड़ में बाँट गए। महोदय प्रदेश के निवासी ‘कान्यकुब्ज’, सरस्वती नदी के तटवर्ती ‘सारस्वत’, गौड़ प्रदेश के निवासी ‘गौड़’, मिथिला के निवासी मैथिल तथा उत्कल प्रदेश के निवासी ‘उत्कल’ ब्राह्मण कहलाये जाने लगे। 
इसी प्रकार द्राविड ब्राह्मणों के पांच भेद तैलंग, द्राविड, कर्णाटक, महाराष्ट्र तथा गुर्जर। स्थान और वृति के कारण और विभेद प्रभेद हो गए कान्कुब्जो के फिर पांच भेद महत्तर, गोईत्रा, पञ्चादर, पञ्चादरेतर और उत्ररित और इसी प्रकार ब्राह्मण के भेद होते चले गए। अधिकांश भेद मात्र स्थान और रहने का क्षेत्र के अनुसार हुए है। पर इतना भेद होने के बाद भी आज भी हम पाने ऋषि वशिष्ठ, भरद्वाज, कश्यप, कात्यायन, गर्ग, गौतम, शांडिल्य, पराशर, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरस, आदि ऋषियों की संताने मानते है। 
एक और कश्यप गोत्रीय बैकुंठनाथ तिवारी (लखनऊ) दूसरी और कश्यप गोत्रीय रचुरी लक्ष्मी नरसिंह राव (आंध्र प्रदेश) और काली मोहन चटोपाध्याय (बंगाल) है। अब यदि कहा जाये की अलग अलग ब्राह्मण वर्ग और आस्पद के ब्राह्मण एक समय में कश्यप ऋषि के वंश के ही तो थे। तो फिर अगल कैसे रहे? क्यों की प्रवर ऋषियों में भिन्नता नही थी। 
आज जरुरी है की हम ब्राह्मण अपने बसने के स्थान को गौण मान कर ऋषियों के नाम की संताने मान कर गौरवान्वित हो। 
ब्राह्मण विरोध आज चरम पर है। वो ब्राह्मण जिसने समाज को संवारने के लिए अपना सर्वस्य लगा दिया आज अपमानित हो रहा है। आज बहुत आवश्यक है की हम एक दूसरे को सहयोग करे, एक दूसरे का साथ दे। 
ब्राह्मण वर्ग जैसे कान्यकुब्ज, सरयूपारी, गौड़, झिझोतिया आदि आदि को नकारते हुए शादी विवाह में परिवार और संस्कार देखे। 
एक और उपाय है – एक राजस्थान समारोह में मेने कहा था की मै कान्यकुब्ज गौड़ हूँ क्यों की कान्यकुब्ज क्षेत्र में पैदा हुआ और गौड़ प्रदेश में रह रहा हूँ तो मुझे कान्यकुब्ज गौड़ माना जाना चाहिए और यदि में बनारस जाता हूँ तो मै अपने आप ही कान्यकुब्ज गौड़ सरयूपारी हो जाता हूँ।
ब्राह्मण समान है एक है, ना कोई ब्राह्मण वर्ग उत्तम या निम्न, छोटा या बड़ा होते है इसका कोई विकल्प नही है। सभी ब्राह्मण वर्ग चाहे आप गौड़ है या सरयूपारी एक समान है।
हमारा धेय होना चाहिए की हम ब्राह्मण एक दुसरे के सम्बन्धी हो और अपने कृत्य से अपने आपको ब्रह्मा की संताने, वामन और परशुराम की कोटि में स्थापित कर सके !!! 
हम ब्राह्मण एक थे, एक है और एक रहेगे !!
जय ब्राह्मण, 

जय हिन्द, 

जय राष्ट्र
डॉ विजय मिश्र 

ॐ ॐ ॐ ॐ

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बॉलीवुड


षड़यंत्र
बॉलीवुड में घुसाये जा रहे पाकिस्तानी कलाकार व गायक और निकाले जा रहे हिन्दू कलाकार ।।
कुमार शानू ,उदित नारायण, अभिजीत, शान, सुखविंदर सिंह, सोनू निगम, अरजीत सिहं ।

*आपने कभी ध्यान दिया है कि फ़िल्मों मे 92 के बाद से गायकों का करियर ग्राफ़ कैसा रहा है ??*

याद है *कुमार शानू* जो करियर में पीक पर चढ़कर अचानक ही धुँध में खो गये ।

फिर आये *अभिजीत*, जिन्हे टाप पर पहुँचकर अचानक

ही काम मिलना बद हो गया

*उदित नारायण* भी उदय होकर समय से पहले अस्त हो गये।

उसके बाद *सुखविंदर* अपनी धमाकेदार आवाज से फलक पर छा गये और फिर अचानक ही ग्रहण लग गया

उसके बाद आये शान,और बुलंदियों को छूने के अचानक बाद ही कब नीचे आये पता ही नही लगा।

फिर *सोनू निगम* कब काम मिलना बंद हुआ, लोग समझ ही नही पाये ।

उसके बाद *अरजीत सिंह* जिनकी मखमली आवाज ने दिलो मे जगह बनानी शुरू ही

की थी कि 💥 *सलमान ने उनहे पब्लिकली माफ़ी माँगने के बाद भी फिल्म सुलतान में उनके द्वारा गाया हुआ ‘जग घूमया’ जैसा गाना बाहर निकलवा दिया अौर उसी गाने को पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान से गवाया*, अौर सिर्फ़ यही नहीं बाद में धीरे धीरे उसका करियर

खतम करने की साज़िश चल रही है।

सारे ही गायकों को असमय बाहर का रास्ता दिखा दिया गया ।

इसके उल्टा पहले चीख़ कर गाने वाले, क़व्वाली

गायक *नुसरत फ़तेह अली खान* क़व्वाली गाने के

लिये बुलाया जाता है, और पाकिस्तानी गायकों के लिये दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। उसके बाद राहत *फ़तेह अली खान* आते हैं और बॉलीवुड में उन्हे लगातार काम मिलने लगता है और बॉलीवुड की वजह से सुपरहिट हो जाते है।

फिर नये स्टाईल के नाम पर *आतिफ़ असलम* आते हैं जिनको एक के बाद एक अच्छे गाने मिलने लगते हैं।

*अली जाफ़र* जैसे औसत गायक को भी काम मिलने में कोई दिक़्क़त नही आती ।

धीरे धीरे *पाकिस्तानी हीरो*

*हीरोइन* को भी बॉलीवुड मे लाकर स्थापित किया जाने लगा और भारतियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा

*उरी हमले के बाद* बैक डोर से चुपके से उन्हे लाने की चाल, कुछ भारतियों की नज़र मे आ गया और उन्होंने निंदा करने की माँग करने की, हिमाक़त कर डाली जो उन्हे नागवार गुज़री और फिर  हमारे ही देश के गद्दार सेकुलर-वामपंथियों ने उन पाकिस्तानी कलाकारों  के पक्ष और अपने ही देश के विरोध में आकाश-पाताल एक कर दिया किंन्तु अन्ततोगत्वा उन्हें  *पाकिस्तान* वापस जाना ही पड़ा ।

क्या आपको लगता है कि यह महज इत्तिफ़ाक़ है तो आप से बडा भोला कोइ नही

*पूरा बॉलीवुड डी-कंपनी या पी-कंपनी (पाकिस्तान) के इशारों पर चलता है, और इसका इलाज है टोटल बॉयकाट ( *बहिष्कार*)

*सिर्फ़ देशभक्त कलाकारों का* *समर्थन करें ।।*

Manu kumar

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वैदिक ज्योतिष »—-ज्योतिष–कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम


वैदिक ज्योतिष »—-ज्योतिष–कसौटी पर खरे उतरते
वैज्ञानिक नियम
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ज्योतिष को संसार में विज्ञान का दर्जा देने से कितने
ही विज्ञान-कर्ता कतराते है. कारण और निवारण
का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत
की श्रेणी मे ज्योतिष
को तभी रखा जा सकता है, जब उसे
पूरी तरह से समझ लिया जाये. वातावरण के परिवर्तन
जैसे तूफ़ान आना,चक्रवात का पैदा होना और हवाओं का रुख
बदलना,भूकम्प आना,बाढ की सूचना देना आदि मौसम
विज्ञान के अनुसार कथित किया जाता है.
पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के
द्वारा ब्रहमाण्ड से आने वाली अनन्त
शक्तियों का प्रवाह का कथन पुराणो मे भी मिलता है.
जिन्हे धनात्मक शक्तियों का रूप प्रदान किया गया है और
दक्षिणी ध्रुव से नकारात्मक शक्तियों का प्रवाह
पृथ्वी पर प्रवाहित होने से
ही वास्तु-शास्त्र को कथित करने में
वैज्ञानिकों को सहायता मिली है.कहावत है कि जब
हवायें थम जाती है तो आने वाले
किसी तूफ़ान का अंदेशा रहता है. यह सब प्राथमिक
सूचनायें भी हमें ज्योतिष
द्वारा ही मिलती है. वातावरण
की जानकारी और वातावरण के
द्वारा प्रेषित सूचनाओं के आधार पर
ही प्राचीन समय से
ही वैज्ञानिक अपने कथनो को सिद्ध करते आये
है,जो आज तक
भी सत्यता की कसौटी पर
सौ प्रतिशत खरे उतरते है. अगर आज का मानव अनिष्ट सूचक
घटनाओ को इस विज्ञान के माध्यम से जान ले तो वह मानव
की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि होगी.
ब्रह्माजी से जब सर्व प्रथम यह विद्या गर्ग
ऋषि ने प्राप्त की और उसके बाद अन्य लोग इस
विद्या को जान सके. प्राचीन काल से
ही ऋषियों-मुनियों ने
अपनी खोजबीन और पराविज्ञान
की मदद से इस विद्या का विकास किया, उन
रहस्यों को जाना जिन्हे आज का मानव अरबों-खरबों डालर खर्च
करने के बाद भी पूरी तरह से प्राप्त
नही कर सका है. तल,वितल,सुतल,तल
ातल,पाताल,धरातल और महातल को ऋषियों ने पहले
ही जान
लिया था उनकी व्याख्या “सुखसागर” आदि ग्रंथों में
बहुत ही विस्तृत रूप से की गई है.
प्राकृतिक रहस्यों को सुलझाने के लिये परा और अपरा विद्याओं
को स्थापित कर दिया था. परा विद्याओं का सम्बन्ध वेदों में निहित
किया था. ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत खगोलशास्त्र,पदार्थ
विज्ञान,आयुर्वेद और गणित का अध्ययन प्राचीन
काल से ही किया जाता रहा है. उस समय के एक
डाक्टर को ज्योतिषी और अध्यापक होना अनिवार्य
माना जाता था और
ज्योतिषी को भी डाक्टरी और
अध्यापन मे प्रवीण होना जरूरी था.
कालान्तर के बाद आर्यभट्ट और बाराहमिहिर ने शास्त्र
का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किये.
“भास्कराचार्य” ने तो न्यूटन से बहुत पहले
ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण-
शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था,जिसे उन्होने अपने ग्रंथ
“सिद्धान्तशिरोमणि” में प्रस्तुत किया है. “आकृष्ट शक्ति च
महीतया,स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या” अर्थात
पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है,जिससे वह अपने
आस पास की वस्तुओं को आकर्षित
करती है.
आज से २२०० साल पहले बाराहमिहिर ने २७ नक्षत्रों और ७
ग्रहों तथा ध्रुव तारे का को वेधने के लिये एक बडे जलाशय में
स्तम्भ का निर्माण
करवाया था,जिसकी चर्चा “भागवतपुराण” मे
की गई है. स्तम्भ मे सात ग्रहों के लिये सात
मंजिले,और २७ नक्षत्रों के लिये २७ रोशनदान काले पत्थरों से
निर्मित करवाये थे. इसके चारों तरफ़ २७ वेधशालायें मन्दिरों के रूप में
बनी थीं. प्राचीन
भारतीय शासक कुतुब्द्दीन ऐबक ने उन
सब वेधशालाओं को तुडवाकर वहाँ मस्जिद
बनवा दी थी और
रही सही कसर
अन्ग्रेजी शासन नें निकाल दी, जिन्होने
इस स्तम्भ के ऊपरी भाग
को भी तुडवा दिया था. हालॉकि आज
भी वह ७६ फ़ुट शेष है. यह
वही दिल्ली की प्रसिद्ध
“कुतुबमीनार” है, जिसे
सारी दुनिया जानती है.
ज्योतिष विज्ञान आज
भी उतना ही उपयोगी है,जितना कि कभी पुरातन
काल में था. मुस्लिम ज्योतिषी इब्बनबतूता और
अलबरूनो ने भारत मे रह कर संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त
किया और अनेक ज्योतिष ग्रंथों का अरबी भाषा में
अनुवाद किया और अरब देशों में इसका प्रचार प्रसार किया.
“अलबरूनो” ने “इन्डिका” नामक ग्रन्थ लिखा जिसका अनुवाद बाद
में जर्मन भाषा में किया गया था. जर्मन विद्वानो ने जब यह
पुस्तक पढी तो उनका ध्यान भारत
की ओर आकर्षित हुआ और उन लोगो ने यहां के
अनेक प्राचीन ग्रन्थों का अनुवाद किया. यूनान के
प्रसिद्ध “यवनाचार्य” ने भारत मे ही रह कर कई
ग्रन्थ ज्योतिष के लिखे.
लन्दन के प्रसिद्ध विद्वान “फ़्रान्सिस हचिंग” ने शोध द्वारा यह
सिद्ध किया कि मिश्र के “पिरामिड” और उनमे रखे जाने वाले
शवों का स्थान ज्योतिषीय रूप रेखा के
द्वारा ही तय किया जाता था
कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम:—
ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव
भी पृथ्वी पर पडता है. सूर्य और
चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख
और समझ सकते है. सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के
प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख
सकते है. जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और
पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार
का आना इसी प्रभाव का कारण है.
पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है.
मनुष्य के अन्दर
भी पानी की मात्रा अधिक
होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानवी प्रकृति पर
भी पडता है. पूर्णिमा के दिन होने
वाली अपराधों में बढोत्तरी को देखकर इसे
आसानी से समझा जा सकता है. जो लोग मानसिक रूप
से विक्षिप्त होते हैं,
उनकी विक्षिप्तता भी इसी तिथि को अधिक
रहती है. आत्महत्या वाले कारण
भी इसी तिथि को अधिक देखने को मिलते
है. इस दिन सामान्यत: स्त्रियों में मानसिक तनाव
भी कुछ अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक तीव्रता से
बढती है. सूर्योदय के पश्चात वन्स्पतियों और
प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है. आयुर्वेद
भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत
वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है.
कहा भी जाता है कि “संसार का प्रत्येक अक्षर
एक मंत्र है. प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है और प्रत्येक
मनुष्य एक अपना गुण रखता है. बस आवश्यकता महज उसे
पहचानने की होती है”.
’ग्रहाधीन जगत सर्वम”. विज्ञान
की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग
का गोला है,जिससे सभी ग्रह पैदा हुए है.
गायत्री मन्त्र मे सूर्य
को सविता या परमात्मा माना गया है. रूस के वैज्ञानिक
“चीजेविस्की” ने सन १९२० में अन्वेषण
किया था कि हर ११ वर्ष के अन्तराल पर सूर्य में एक विस्फ़ोट
होता है जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर
होती है. इस विस्फ़ोट के समय
पृथ्वी पर उथल-पुथल, लडाई झगडे, मारकाट
होती है. युद्ध
भी इसी समय मे अधिक होते है.
पुरुषों का खून पतला हो जाता है. पेडों के तनों में पडने वाले वलय
बडे होते है. आमतौर पर आप देखें तो पायेंगें कि श्वास रोग
सितम्बर से नबम्बर तक अधिक रूप से बढ जाता है. मासिक धर्म
के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक
सम्भावना होती है.
बताईये क्या इतने सब कारण क्या ज्योतिष को विज्ञान कहने के
लिये पर्याप्त नही है?

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

जगन्नाथ मंदिर के 10 चमत्कार


जगन्नाथ मंदिर के 10 चमत्कार

  1. श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
  2. यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है।
  3. पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।
  4. सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।
  5. मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं।
  6. मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। है न चमत्कार!
  7. इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।
  8. यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं।
  9. यहा विश्‍व की सबसे बड़ी रथयात्रा निकलती है. यह रथयात्रा 5 किलो‍मीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है।

माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे।

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बाहूबली फिल्म मे जिस “महिष्मति राज्य” की बात हुई है उस पर “हैहय वंश” के क्षत्रियो का राज था


बाहूबली फिल्म मे जिस “महिष्मति राज्य” की बात हुई है उस पर “हैहय वंश” के क्षत्रियो का राज था

http://ayurvedicgharelunuskhe.com/bahubali-film/

बाहूबली फिल्म मे जिस महिष्मति रियासत की बात हुई है उस पर “हैहय वंश” के क्षत्रियो का राज था ।

चेदि जनपद की राजधानी ‘माहिष्मति’, जो नर्मदा के तट पर स्थित थी, इसका अभिज्ञान ज़िला इंदौर, मध्य प्रदेश में स्थित ‘महेश्वर’ नामक स्थान से किया गया है, जो पश्चिम रेलवे के अजमेर-खंडवा मार्ग पर बड़वाहा स्टेशन से 35 मील दूर है।

महाभारत के समय यहाँ राजा नील का राज्य था, जिसे सहदेव ने युद्ध में परास्त किया था ।

‘ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ।

तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभ:।।

राजा नील महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बौद्ध साहित्य में माहिष्मति को दक्षिण अवंति जनपद का मुख्य नगर बताया गया है। बुद्ध काल में यह नगरी समृद्धिशाली थी तथा व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्यात थी। तत्पश्चात उज्जयिनी की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ-साथ इस नगरी का गौरव कम होता गया।

गुप्त काल में 5वीं शती तक माहिष्मति का बराबर उल्लेख मिलता है। कालिदास ने ‘रघुवंश’ में इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में नर्मदा तट पर स्थित #माहिष्मति का वर्णन किया है और यहाँ के राजा का नाम ‘प्रतीप’ बताया है।

‘अस्यांकलक्ष्मीभवदीर्घबाहो

माहिष्मतीवप्रनितंबकांचीम् प्रासाद-जालैर्ज

लवेणि रम्यां रेवा यदि प्रेक्षितुमस्तिकाम:।’

इस उल्लेख में माहिष्मती नगरी के परकोटे के नीचे कांची या मेखला की भाति सुशोभित नर्मदा का सुंदर वर्णन है।

कालिदास का उल्लेख माहिष्मति नरेश को कालिदास ने अनूपराज भी कहा है जिससे ज्ञात होता है कि कालिदास के समय में माहिष्मति का प्रदेश “नर्मदा” नदीके तट के निकट होने के कारण अनूप कहलाता था। पौराणिक कथाओं में माहिष्मति को हैहय वंशीय कार्तवीर्य अर्जुन अथवा सहस्त्रबाहु की राजधानी बताया गया है। किंवदंती है कि इसने अपनी सहस्त्र भुजाओं से नर्मदा का प्रवाह रोक दिया था। महेश्वर में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने नर्मदा के उत्तरी तट पर अनेक घाट बनवाए थे, जो आज भी वर्तमान हैं। यह धर्मप्राणरानी 1767 के पश्चात इंदौर छोड़कर प्राय: इसी पवित्र स्थल पर रहने लगी थीं। नर्मदा के तट पर अहिल्याबाई तथा होल्कर वंश के नरेशों की कई छतरियां बनी हैं। ये वास्तुकला की दृष्टि से प्राचीन हिन्दू मंदिरों के स्थापत्य की अनुकृति हैं। भूतपूर्व इंदौर रियासत की आद्य राजधानी यहीं थी।

एक पौराणिक अनुश्रुति में कहा गया है कि माहिष्मति का बसाने वाला ‘महिष्मानस’ नामक चंद्रवंशी नरेश था। सहस्त्रबाहु इन्हीं के वंश में हुआ था। महेश्वरी नामक नदी जो माहिष्मति अथवा महिष्मान के नाम पर प्रसिद्ध है, महेश्वर से कुछ ही दूर पर नर्मदा में मिलती है।

हरिवंश पुराण की टीका में नीलकंठ ने माहिष्मति की स्थिति विंध्य और ऋक्ष पर्वतों के बीच में विंध्य के उत्तर में और ऋक्ष के दक्षिण में बताई है।

मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री वाले तिलमिला गए हैं। सारी इंडस्ट्री चिन्ता में है। और क्यों न हों? प्रतिस्पर्धा कोई एरे गेरे से थोड़ी ना है??

आजतक मद्रास ने कोई अधिक हानि नही पहुचाई थी परन्तु आंध्र फ़िल्म इंडस्ट्री मद्रास थोड़ी ना है?? यह मुम्बई बॉलीवुड को खा जायेगी और डकार भी नही लेगी। बॉलीवुड ने कभी योग्य व्यक्ति को उचित कार्य नही दीया है। बॉलीवुड में दाउद जैसे मुस्लीमों का राज चलता होने के कारण सभी फ़िल्म में अकारण मुस्लीम पात्र घुसेड़ा है। नायक-नायिका हिन्दू होने पर भी गीतों में खुदा और अल्ला-अल्ला गाना पड़ता था।

सारी फिल्मों में मुस्लीम सभ्यता को महान दिखाना और मुस्लिम पात्र को वीरत्व भरा ही दिखाना पड़ता था क्योंकि बॉलीवुड मुस्लीम साम्राज्य पर ही खड़ा था। परन्तु अब उनके पाप का घड़ा भर चूका है। सामने उनका बाप बाहुबली खड़ा है।

उस दौर में बर्बर यवनो, शकों, हुणों हमारे वैभव को देखकर खिंचे चले आते थे, उन बर्बरों के लगातार आक्रमणों को नकारते हुए, इस पुण्यभूमि के गौरव की गाथा को वही भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया जो उस समय होगा, इसे कल्मनिक मानकर नही अपितु इस पुण्यभूमि भारत का गौरव और वैभव को सजीव मान इस सबसे बहतरीन फिल्म बाहुबली को देखे और अपने पुरखों का स्वाभिमान मान गर्वित हो ।

#बाहूबली जिस फिल्म मे #क्षत्रियो की वीरता, युद्ध की रणनीती और मातृभूमि के लिए मर मिट जाने वाला शौर्य दिखाया गया है, जो हम इतिहास की किताबो मे पढते आए वो ही इस फिल्म मे दर्शाया है l

Posted in हिन्दू पतन

सीमा अवैध रूप से पार करते हैं


यदि आप “दक्षिण कोरिया”

की सीमा अवैध रूप से पार करते हैं तो,

आपको 12 वर्ष के लिये सश्रम कारागार में

डाल दिया जायेगा…. !!
         अगर आप “ईरान” की सीमा अवैध रूप से

पार करते हैं तो आपको अनिश्चितकाल तक

हिरासत में ले लिया जायेगा….!!
    अगर आप “अफ़गानिस्तान”

की सीमा अवैध रूप से पार करते हैं

तो आपको देखते ही गोली मार

दी जायेगी जायेगी….!!
    यदि आप “चीनी” सीमा अवैध रूप से पार

करते हैं तो, आपका अपहरण कर

लिया जायेगा और आप फिर

कभी नहीं मिलोगे…. !!
      यदि आप “क्यूबा” की सीमा अवैध रूप से

पार करते है तो… आपको एक राजनीतिक

षडयंत्र के जुर्म में जेल में डाल

दिया जायेगा….!!
     यदि आप “ब्रिटिश” बॉर्डर अवैध रूप से

पार करते हैं तो, आपको गिरफ्तार

किया जायेगा, मुकदमा चलेगा, जेल

भेजा जायेगा और अपने सजा पूरी करने के

बाद निर्वासित….!!

और

        यदि आप पड़ौसी देश से हैं और आप “भारतीय”

सीमा को अवैध रूप से पार करते पाए गए,

तो आपको  मिलेगा     

१ एक राशन कार्ड 

२ एक पासपोर्ट,

३ एक ड्राइवर का लाइसेंस,

४ मतदाता पहचान कार्ड,

५ क्रेडिट कार्ड,

६ सरकारी रियायती किराए पर आवास,

७ ऋण एक घर खरीदने के लिए,

८ मुफ्त शिक्षा,

९  मुफ्त स्वास्थ्य देखभाल,

१० नई दिल्ली में एक लाबीस्ट,

११ एक टेलीविजन. 

१२ और विशेषज्ञ मानव अधिकार

कार्यकर्ताओं के एक समूह के साथ

धर्मनिरपेक्षता की डफली बजाने

का अधिकार…..

१३ और बाकी  आप जो कहें….. Indians

को मारने की आजादी, बंम फोङने

की आजादी।…
      

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😣😣😣😣😣