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BUT IT’S HARD TRUTH – दही ले लो, दही। मीठा और ताज़ा दही। पेट को ठंडक पहुंचाने वाला दही

BUT IT’S HARD TRUTH

मेरे गांव में एक महिला सिर पर मटका ले कर घूमती थी और कहती, “दही ले लो, दही। मीठा और ताज़ा दही। पेट को ठंडक पहुंचाने वाला दही।”
मैं मां से पूछता था कि मां, ये दही सिर पर लेकर क्यों घूमती है? मां कहती कि ये दही बेच रही है, बेटा।
“मां, ये दही क्यों बेच रही है?”
“इसके पास गाय है। गाय दूध देती है। हमारे घऱ जो दूध आता है, वो भी यही बेचती है। तुमने देखा होगा, सुबह दूधवाला आता है बाल्टी में दूध लेकर। वो इस दही वाली का पति है। जब दूध बच जाता है, तो उसका दही बना देते हैं और फिर दही बेचते हैं।”
“और दही बच जाए तो?”
“तो उसका घी बना देते हैं। फिर घी बेचते हैं। यही बिजनेस है।”
मेरी मां ने अर्थशास्त्र की पढ़ाई नहीं की थी। पांच साल के . को बिजनेस का मतलब नहीं पता था। लेकिन उस साल गांव जाकर पहली बार मैं बिजनेस का मतलब समझ रहा था। मैं समझ रहा था कि जिसके पास गाय होती है, वो पहले दूध बेचता है। दूध से मुनाफा कम हो तो दही बेचता है और अधिक पैसे चाहिए तो वही घी भी बेचता है।
जैसे-जैसे थोड़ा बड़ा होता गया मैंने सुना कि दूधवाला दूध में अब पानी मिला कर दूध बेचने लगा है। इससे कम दूध ज़्यादा बन जाता है। वाह! क्या बिजनेस है।
यहां तक तो ठीक था। पर बहुत बाद में मैंने सुना कि दूध वाला दूध में यूरिया और पता नहीं क्या-क्या दूध में मिलाने लगा है, जिससे दूध की मात्रा और बढ़ने लगी थी।
मैंने मां से पूछा था कि “मां, क्या ये भी बिजनेस है?”
मां कहती कि नहीं बेटा, “ये चोरी है, बेईमानी है। अपराध है। दूध, दही, घी बेचना बिजनेस है, लेकिन झूठ बोल कर या उसमें मिलावट करके बेचना अपराध है।“
पहली बार मैंने अपराध का मतलब समझा था।
मां की पाठशाला में पढ़ते-पढ़ते ज़िंदगी के पाठ को समझ रहे थे।
“पर मां, दूधवाले का घर तो बहुत बड़ा हो गया है। उसने कई और गाय पाल ली हैं। अब वो दूध की मिठाई भी बनाने लगा है। उसका बिजनेस बढ़ गया है।”
मां कहती थी कि जिस पैसे को बेइमानी से कमाया जाता है, वो पैसा अच्छा नहीं होता। मां ये भी कहती थी कि अधिक की कोई सीमा नहीं होती है, संतोष की सीमा होती है। आदमी को संतोष के साथ जीना चाहिए। दूसरों को धोखा देकर कमाया गया पैसा कभी फलता नहीं।
वो मां थी। उसकी अपनी समझ थी। पर मां के दिए एक-एक ज्ञान को मैंने ज़िंदगी में आत्मसात कर लिया था। मैं गांव से शहर चला आया था। मुझे नहीं पता कि उस दूधवाले का क्या हुआ? बेइमानी से कमाया उसका पैसा उसे फला या उसे ले डूबा, ये भी मुझे नहीं पता।
पर कल मैं दफ्तर में बैठा था और मेरे पास एक रिपोर्ट आई जिसमें लिखा था कि भारत में स्वास्थ्य सेवा अगले सात वर्षों में करीब चार सौ अरब डॉलर का कारोबार हो जाएगा।
चार सौ अरब डॉलर कितने रूपए होते हैं, इसे आप अपने कैलकुलेटर पर कैलकुलेट करते रहिए, मैं तो नहीं कर पाऊंगा, लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि इस ख़बर को पढ़ने के बाद मैं सिहर उठा था।
मुझे नहीं पता कि ऐसे आंकड़े कौन जुटाता है, पर जिन लोगों को इस तरह के आंकड़े जुटाने की ज़िम्मेदारी दी गई है, उन लोगों के मुताबिक अगले तीन वर्षों में भारत में करीब तेरह करोड़ बूढ़े लोगों की संख्या ब़ढ़ जाएगी और तीस करोड़ से अधिक लोगों पर नई बीमारियों से मरने का खतरा मंडराने लगेगा। अस्पताल की मांग खूब बढ़ेगी और मेडिकल बीमा का कारोबार खूब फलेगा-फूलेगा।
मेडिकल क्षेत्र में ढेर सारी नौकरियों की गुंजाइश बढ़ेगी। भारत के पास ढेर सारी विदेशी मुद्रा भी आने लगेगी।
कोई भी इस रिपोर्ट को पढ़ेगा तो खुश होगा कि भारत मेडिकल के क्षेत्र में बहुत तरक्करी करने जा रहा है। पर मैं दुखी हो गया।
मैं मन मे सोचने लगा कि पहले एक आदमी डॉक्टर बना होगा। फिर उसने दवा की दुकान खोली होगी। फिर अस्पताल भी उसी ने खोला होगा। बहुत दिनों के बाद मुमकिन है कि दवा की फैक्ट्री भी उसी ने खोली होगी। बीमा का धंधा भी उसी ने शुरु किया होगा।
कुछ लोग बीमार पड़ते होंगे तो डॉक्टर के पास जाते होंगे। डॉक्टर उन्हें दवा देता होगा। धीरे-धीरे उसने अपने अस्पताल में मरीज़ों की भर्ती शुरू कर दी होगी। यहां तक तो सब ठीक रहा होगा।
पर एक ऐसा वक्त भी आ गया जब उसे लगा कि और पैसे कमाने चाहिए तो वो बीमारी बेचने लगा। ।
लोग पेट खराब होने पर उस डॉक्टर के पास गए, उसने कहा कि कैंसर हो गया है। गैस से छाती में दर्द की शिकायत लेकर गए तो कहने लगा कि हार्ट फेल होने वाला है।
आप सोच रहे होंगे कि -सुबह उठ कर गप मारने लगे हैं। बिल्कुल नहीं। मैंने आपको कालरा साहब की कहानी सुनाई है। वही कालरा साहब जिन्होंने पंद्रह साल पहले दिल्ली के एक नामी अस्पताल से मुझे फोन किया था कि उनकी बाईपास सर्जरी होने वाली है। मै चौंका था कि ऐसा क्या हो गया, तो कहने लगे कि रात में छाती में दर्द हुआ था, डॉक्टर के पास आया था। उन्होंने पूरी जांच की है और कहा है कि धमनियों में वसा जम गया है। ऑपरेशन होना ही एकमात्र उपाय है।
मैंने उन्हें उस दिन अस्पताल से बुला लिया था। कहा था कि जल्दी मत कीजिए। अगली सुबह उसी अस्पताल में उन्हें दुबारा भेजा था, कहा था कि अपना नाम कुछ और बताइएगा और कहिएगा कि इंश्योंरेंस नहीं है। ऑपरेशन के लिए पैसे नहीं हैं। उनकी रिपोर्ट तब बिल्कुल ठीक आई थी। पंद्रह साल बीत गए हैं। कालरा साहब एकदम मस्त हैं। न छाती में दर्द हुआ, न दिल का ऑपरेशन।
मेरी साली को ऐसे ही एक सुबह पेट में दर्द हुआ था तो दिल्ली के एक पांच सितारा अस्पताल ने कहा था कि अपेंडिसाइटिस हो गया है। तुरंत ऑपरेशन नहीं होने पर जान को खतरा है। वो अस्पताल में ही थी कि मैं वहां पहुंच गया। सेकेंड ओपिनियन के लिए मैं उसे वहां से अपने एक मित्र डॉक्टर के पास ले गया। उसने सारा चेकअप किया और कहा कि कुछ नहीं है, अपच की वज़ह से पेट में दर्द हुआ था। इस घटना को भी सत्रह साल बीत चुके हैं। मेरी साली भी एकदम मस्त है।
परसों मेरे घर एक परिचित आई थीं। बताने लगीं कि उनके एक जानने वाले के शरीर में कई गांठ बन गए थे, डॉक्टर ने कहा कि कैंसर हो गया है। वो इतना डरा रहे थे मरीज़ को कि कोई भी घबरा जाए। पर मरीज़ ने कहीं और पूरा चेकअप कराया तो पता चला कि वो ऐसे ही गांठ बन गए हैं, उनसे कोई खतरा नहीं।
इन बातों को सुन कर, देख कर, समझ कर और रिपोर्ट पर पढ़ कर मां की बहुत याद आती है।
जिस डॉक्टर ने ये रिपोर्ट तैयार की है कि भारत में मेडिकल का कारोबार चार सौ अरब डॉलर का हो जाएगा, लाखों लोगों को रोज़गार मिलेगा, विदेशी मुद्रा का फायदा होने लगेगा, उस पर मुमकिन है कि कोई तालियां बजाए, मैं तो नहीं बजाने वाला। मेरी निगाह में मेडिकल का कारोबार बढ़ना ही मानवता के लिए अपराध है। मेडिलक प्रोफेशन की कामयाबी इसमें है कि लोगों को असल में डॉक्टरों की ज़रूरत कम पड़ने लगे। पर ऐसा नहीं हो सकता है।
मुझे तो लगता है कि गांव में दूध बेचने वाले ने पहले दूध में पानी मिलाया। फिर गंदा पानी मिलाया। फिर यूरिया मिलाया। उसके दूध को पीकर हम बीमार पड़े तो उसने अपने एक बेटे को डॉक्टर बना दिया कि वो इलाज़ करेगा।
केवल डॉक्टर बनने से क्या होता है? उस दूध वाले ने घी में चर्बी मिलानी शुरू कर दी। इससे उसके घी का कारोबार बढ़ा और इधर उसके बेटे की डॉक्टरी का। अब उसी ने दवा भी बनानी शुरू कर दी। मरीज़ अधिक हो गए तो उसने अस्पताल भी खोल दिया। बीमा का धंधा भी उसी ने शुरु किया।
मुझे यकीन है कि ये चार सौ अरब डॉलर का कारोबार हज़ार अरब डॉलर के कारोबार में भी बदल जाएगा। आप खुश होइएगा कि भारत तरक्की कर रहा है, लेकिन मैं खुश नहीं होऊंगा। मै तो इस सत्य को जानता हूं कि ऐसे कमाया गया पैसा चोरी का पैसा होता है, अपराध का पैसा होता है। ऐसा पैसा कभी फलता नहीं।
इस रिपोर्ट को पढ़ कर कोई और खुश हो सकता है, में कल से आवाज़ गूंज रही है, “बीमारी ले लो, बीमारी। जानलेवा बीमारी।”

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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