Posted in संस्कृत साहित्य

गुरु


मिश्च के रहस्यवादी कहते हैं, जब शिष्य तैयार हो जाता है, तब गुरु प्रकट हो जाता है। गुरु के लिए तो यह पूरी तरह से एक होशपूर्ण बात है। एक सूफी कहानी इसे समझने में तुम्हारी सहायता करेगी। सत्य को जानने की गहन अभीप्सा में एक नवयुवक ने अपने परिवार, अपने संसार को त्याग दिया और गुरु की खोज में निकला। जब वह नगर के बाहर निकल रहा था, तभी उसने एक वृद्ध को देखा। उसकी आयु लगभग साठ वर्ष रही होगी। वह एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था।

वह इतना शांत, आनंदित और चुंबकीय आकर्षण वाला था कि युवक अपने आप उसकी ओर खिंचा चला गया। वह उसके समीप पहुंचकर बोला, ‘मैं एक गुरु की तलाश में हूं। मैं आपके ज्ञान की सुगंध को अनुभव कर सकता हूं। शायद आप मुझे बता सकेंगे कि मुझे कहां जाना चाहिए व गुरु की कसौटी क्या है.? मैं यह कैसे तय करूंगा कि यही मेरा गुरु है?’

उस वृद्ध ने कहा कि यह तो बहुत सरल है। उसने विस्तारपूर्वक बिल्कुल ठीक-ठीक वर्णन कर दिया कि वह व्यक्ति कैसा होगा, किस तरह का वातावरण उसके आसपास होगा, वह कितनी आयु का होगा। यहां तक कि वह कौन से वृक्ष के नीचे बैठा मिलेगा, वहां कौन सी खुशबू आ रही होगी यह भी बता दिया। युवक ने उस वृद्ध को धन्यवाद दिया। वृद्ध ने कहा, ‘मुझे धन्यवाद देने का समय अभी नहीं आया है।

तीस साल तक वह रेगिस्तानों, जंगलों, पहाड़ों में गुरु की तलाश करता रहा, पर वे कसौटियां कभी भी पूरी न हो सकीं। थक कर, पूरी तरह से निराश होकर वह अपने गांव वापस लौटा। अब वह जवान न था। जब वह घर छोड़ कर गया था, उसकी आयु तीस वर्ष के लगभग थी। अब वह करीब साठ वर्ष का हो गया था।

पर जैसे ही वह अपने गृहनगर में प्रवेश करने को था, उसने उसी वृद्ध को वृक्ष के नीचे बैठा हुआ देखा। वह अपनी आंखों पर विश्वास ही न कर सका। उसने कहा, ‘हे भगवान, इसी आदमी का तो उसने वर्णन किया था। उसने यह तक कहा था कि वह नब्बे साल का होगा. यही तो वह वृद्ध है। मैं कितना बेहोश रहा होऊंगा कि मैंने उस वृक्ष को भी नहीं देखा, जिसके नीचे वह बैठा हुआ था। और वह सुगंध, जिसका उसने जिक्र किया था, वह दीप्ति, वह उपस्थिति, वह उसके चारों ओर की जीवंतता.।वह वृद्ध के पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा, ‘यह कैसा मजाक है? तीस साल तक मैं भटकता रहा और आप सब जानते थे।उस वृद्ध आदमी ने कहा, ‘मेरे जानने से क्या अंतर पड़ता है। सवाल यह है कि क्या तुम जानते थे? मैंने तो इसका एकदम ठीक-ठीक वर्णन कर दिया था, पर फिर भी तुम्हें भटकना पड़ा। केवल इस तीस साल के संघर्ष के बाद ही तुममें थोड़ा-सा होश आया है। उस दिन तुमने मुझे धन्यवाद देना चाहा था और मैंने तुमसे कहा था कि अभी समय नहीं आया है, एक दिन समय आएगा। तुम उसी दिन मुझे चुन सकते थे, लेकिन तुम्हारा भी दोष नहीं, तुम्हारे पास वे आंखें ही न थीं। तुमने मेरे शब्द तो सुने, पर तुम उनका अर्थ न समझ सके। मैं तुम्हारे सामने अपना ही वर्णन कर रहा था, पर तुम मेरी खोज कहीं और करने की सोच रहे थे।शिष्य गुरु को केवल संयोग से ही पाता है। वह चलता है, गिरता है, फिर-फिर उठ कर खड़ा होता है। धीरे-धीरे थोड़ी-थोड़ी जागरूकता उसमें आती जाती है। जहां तक गुरु का संबंध है, वह कुछ विशेष लोगों की होशपूर्वक प्रतीक्षा कर रहा होता है। वह उन लोगों तक पहुंचने का हरसंभव प्रयत्न भी करता है, लेकिन कठिनाई यह है कि वे सभी बेहोश हैं।

गुरु अस्तित्व देता है, ज्ञान नहीं। वह तुम्हारे अस्तित्व को, तुम्हारे जीवन को अधिक विस्तृत करता है, लेकिन ज्ञान को नहीं। वह तुम्हें एक बीज देता है और तुम भूमि बन कर उस बीज को अंकुरित होने, पनपने व खिलने दे सकते हो।

गुरु अस्तित्व देता है, ज्ञान नहीं। वह हमारी चेतना को विस्तृत करता है, ज्ञान को नहीं। वह मात्र एक बीज देता है और शिष्य भूमि बनकर उस बीज को अंकुरित होने, पनपने व खिलने देता है। गुरु पूर्णिमा (22 जुलाई) पर ओशो का चिंतन..

गुरु-शिष्य संबंध संयोग मात्र भी है और एक होशपूर्ण चुनाव भी। यह दोनों है। जहां तक गुरु का सवाल है, यह पूर्णत: होशपूर्ण (जागरूकतापूर्ण) चुनाव है। जहां तक शिष्य का प्रश्न है, यह संयोग ही हो सकता है, क्योंकि अभी होश उसके पास है ही नहीं।

मिश्च के रहस्यवादी कहते हैं, जब शिष्य तैयार हो जाता है, तब गुरु प्रकट हो जाता है। गुरु के लिए तो यह पूरी तरह से एक होशपूर्ण बात है। एक सूफी कहानी इसे समझने में तुम्हारी सहायता करेगी। सत्य को जानने की गहन अभीप्सा में एक नवयुवक ने अपने परिवार, अपने संसार को त्याग दिया और गुरु की खोज में निकला। जब वह नगर के बाहर निकल रहा था, तभी उसने एक वृद्ध को देखा। उसकी आयु लगभग साठ वर्ष रही होगी। वह एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था।

वह इतना शांत, आनंदित और चुंबकीय आकर्षण वाला था कि युवक अपने आप उसकी ओर खिंचा चला गया। वह उसके समीप पहुंचकर बोला, ‘मैं एक गुरु की तलाश में हूं। मैं आपके ज्ञान की सुगंध को अनुभव कर सकता हूं। शायद आप मुझे बता सकेंगे कि मुझे कहां जाना चाहिए व गुरु की कसौटी क्या है.? मैं यह कैसे तय करूंगा कि यही मेरा गुरु है?’

उस वृद्ध ने कहा कि यह तो बहुत सरल है। उसने विस्तारपूर्वक बिल्कुल ठीक-ठीक वर्णन कर दिया कि वह व्यक्ति कैसा होगा, किस तरह का वातावरण उसके आसपास होगा, वह कितनी आयु का होगा। यहां तक कि वह कौन से वृक्ष के नीचे बैठा मिलेगा, वहां कौन सी खुशबू आ रही होगी यह भी बता दिया। युवक ने उस वृद्ध को धन्यवाद दिया। वृद्ध ने कहा, ‘मुझे धन्यवाद देने का समय अभी नहीं आया है।

तीस साल तक वह रेगिस्तानों, जंगलों, पहाड़ों में गुरु की तलाश करता रहा, पर वे कसौटियां कभी भी पूरी न हो सकीं। थक कर, पूरी तरह से निराश होकर वह अपने गांव वापस लौटा। अब वह जवान न था। जब वह घर छोड़ कर गया था, उसकी आयु तीस वर्ष के लगभग थी। अब वह करीब साठ वर्ष का हो गया था।

पर जैसे ही वह अपने गृहनगर में प्रवेश करने को था, उसने उसी वृद्ध को वृक्ष के नीचे बैठा हुआ देखा। वह अपनी आंखों पर विश्वास ही न कर सका। उसने कहा, ‘हे भगवान, इसी आदमी का तो उसने वर्णन किया था। उसने यह तक कहा था कि वह नब्बे साल का होगा. यही तो वह वृद्ध है। मैं कितना बेहोश रहा होऊंगा कि मैंने उस वृक्ष को भी नहीं देखा, जिसके नीचे वह बैठा हुआ था। और वह सुगंध, जिसका उसने जिक्र किया था, वह दीप्ति, वह उपस्थिति, वह उसके चारों ओर की जीवंतता.।वह वृद्ध के पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा, ‘यह कैसा मजाक है? तीस साल तक मैं भटकता रहा और आप सब जानते थे।उस वृद्ध आदमी ने कहा, ‘मेरे जानने से क्या अंतर पड़ता है। सवाल यह है कि क्या तुम जानते थे? मैंने तो इसका एकदम ठीक-ठीक वर्णन कर दिया था, पर फिर भी तुम्हें भटकना पड़ा। केवल इस तीस साल के संघर्ष के बाद ही तुममें थोड़ा-सा होश आया है। उस दिन तुमने मुझे धन्यवाद देना चाहा था और मैंने तुमसे कहा था कि अभी समय नहीं आया है, एक दिन समय आएगा। तुम उसी दिन मुझे चुन सकते थे, लेकिन तुम्हारा भी दोष नहीं, तुम्हारे पास वे आंखें ही न थीं। तुमने मेरे शब्द तो सुने, पर तुम उनका अर्थ न समझ सके। मैं तुम्हारे सामने अपना ही वर्णन कर रहा था, पर तुम मेरी खोज कहीं और करने की सोच रहे थे।शिष्य गुरु को केवल संयोग से ही पाता है। वह चलता है, गिरता है, फिर-फिर उठ कर खड़ा होता है। धीरे-धीरे थोड़ी-थोड़ी जागरूकता उसमें आती जाती है। जहां तक गुरु का संबंध है, वह कुछ विशेष लोगों की होशपूर्वक प्रतीक्षा कर रहा होता है। वह उन लोगों तक पहुंचने का हरसंभव प्रयत्न भी करता है, लेकिन कठिनाई यह है कि वे सभी बेहोश हैं।

गुरु अस्तित्व देता है, ज्ञान नहीं। वह तुम्हारे अस्तित्व को, तुम्हारे जीवन को अधिक विस्तृत करता है, लेकिन ज्ञान को नहीं। वह तुम्हें एक बीज देता है और तुम भूमि बन कर उस बीज को अंकुरित होने, पनपने व खिलने दे सकते हो।

 

 

 

 

गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नम:।

गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं। आज गुरु पूर्णिमा यानी गुरु के पूजन का पर्व है। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति का सबसे पुरातन पहलू है। भारतीय वैदिक परंपरा का तो आधार ही गुरु-शिष्य थे। वेदों को श्रुति कहा जाता है, यानी जो गुरु के मुख से सुन कर शिष्यों ने आत्मसात किया और पीढ़ी दर पीढ़ी उसे आगे बढ़ाया। लिहाजा गुरु पर्व का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व है। आज भी आध्यात्मिक गुरु-शिष्य परंपरा बड़े पैमाने पर हमारे यहां प्रचलित है। गुरुपूर्णिमा के दिन पूरे भारत में लोगो अपने गुरु की आराधना करते हैं। संतों के आश्रमों में शिष्यों का तांता लग जाता है। दान, स्नान और पूजापाठ का इस दिन विशेष महत्व बताया गया है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरुपूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शाति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

हिन्दू पंचाग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा करने की परंपरा को गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व आत्मस्वरूप का ज्ञान पाने के अपने कर्तव्य की याद दिलाने वाला, मन में दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, सद्गुरु के प्रेम और ज्ञान की गंगा में बारंबार डूबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देने वाला है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भगवान वेद व्यास ने पंचम वेद महाभारत की रचना इसी पूर्णिमा के दिन की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्य ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेद व्यास जी का पूजन किया और तभी से व्यास पूर्णिमा मनाई जा रही है।

 

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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