Posted in ઉત્સવ

भगवान श्री परशुराम

विजय कृष्ण पांडेय
निति धर्म का पाठ पढ़ाया,,
सत्य मार्ग पर चलना सिखाया !
शस्त्र और शास्त्र दोनों हैं उपयोगी,,

हमें बता गए महान योगी !
भगवान विष्णु के आवेशावतार – 

“भगवान श्री परशुराम” जी की

पावन जयंती के शुभ अवसर पर

अनंत शुभकामनायें,,
निहित स्वार्थ के कारण सनातन समाज में मिथ्या धारणा प्रतिपादित हुई है

कि श्री परशु राम ने २१ बार क्षत्रियों का संहार किया था जबकि सत्य यह है कि

सहस्त्रार्जुनएक आततायी शासक था,,,

इसके शासन में सनातन धर्म का लोप हो रहा था,इसके एवं इनके वंशजों का

आचरण दानव कुल की भांति ही था,,,

इसके अत्याचार से पावन सनातन भूमि को मुक्त कराने के लिए श्री परशुराम

को सहस्त्रार्जुन एवं इसके वंशजों से २१ बार भयंकर युद्ध करना पड़ा था,,

तदुपरांत पुनः सत्य सनातन धर्म की अवधारणा स्थापित हो सकी।

सम्पूर्ण तथ्यों एवं साक्ष्यों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि श्री परशुराम क्षत्रिय

वर्ण विरोधी नहीं थे,,

क्षात्र धर्म को वे महान सनातन धर्म रक्षक मानते थे,,,

सहस्त्रार्जुन एवं उसके वंशजों के धर्मच्युत आचरण के कारण ही श्री परशुराम को

योगी होते हुए भी शस्त्र उठाकर धर्म की रक्षा करनी पड़ी थी।

प्राचीन काल में ”क्षत्रिय” शब्द का प्रयोग राजा के लिए होता था,किन्तु कालांतर में

इस शब्द का प्रयोग क्षत्रिय वर्ण के लिए होने लगा,,

यही इस भ्रम का कारण है।

”क्षत्रिय” शब्द के अर्थ संकुचन के कारण ही ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के संबंधों में

गहरी खाई उत्पन्न हो गयी है जो कि सर्वथा अनुचित है,,,

यह सनातन धर्म के लिए अहितकारी सिद्ध हुआ है।

क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है।

इसी समाज में एक राजा हुए थे सहस्त्रार्जुन।

परशुराम ने इसी राजा और इनके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके

लिए 21 बार युद्ध करना पड़ा था।

परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण,और कल्कि पुराण

इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है।

वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे।

कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये।

वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों

और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे।

वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे।

उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये

रखना था।

वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के

लिए जीवन्त रहे।

उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी

प्रजा से आज्ञापालन करवाना।

वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे।

उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही

अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु

वाले बालकोको दी जाती है)।

वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे।

यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन

जाते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी।

लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

उनके जाने-माने शिष्य थे –

भीष्म,द्रोण,कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं कर्ण।

कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है।

वह सदैव ही स्वयं को क्षूद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका।

जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका

सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक

आवश्यकता होगी।

इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह

अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का

ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।

प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे।

उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी।

राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया।

सत्यवती के विवाह के पश्चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को

आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा।

इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक

पुत्रकी याचना की।

सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम

और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर

पीपल का आलिंगन करे और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन

करना।

फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन

कर लेना।

इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान

होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल

दिया।

इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया।

योगशक्ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास

आकर बोले,

”पुत्री तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है।

इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी

और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी।”

इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण

का ही आचरण करे,भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे।

भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली।

समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ।

जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या

रेणुका से हुआ।

रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे – रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस

और परशुराम।

श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार

करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ

देर तक वहीं रुक गयीं।

हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा

विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता

रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।

अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित

परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे

आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला।

उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया

तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी

स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा।

कथानक है कि हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा

भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त

न होने का वर पाया था।

संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज

इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के

अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को

बलपूर्वक छीनकर ले गया।

कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को

धड़ से पृथक कर दिया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके

ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी।

रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं।

इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर

दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार युद्ध किया।

इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि

कश्यप को दान कर दी।

केवल इतना ही नहीं,उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और

सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।

सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त।

महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था।

इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े

कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला।

भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे।

भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे।

कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था।

कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है।

कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था।

भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त

करने का वरदान दिया था,जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा

जाने लगा।

सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी।

सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय

को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया।

जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु

वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया।

युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।

तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता

जमदग्नि को मार डाला।

परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट

हो सती हो गयीं।

इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-

“मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा”।

उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध

किया।

क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी

पर अधिकार किया तदुपरान्त कार्त्तवीर्यार्जुन का वध।

कार्त्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उनके पाँच पुत्र जयध्वज,शूरसेन,शूर,वृष

और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।

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रामायण काल;-

उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग

द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर क्रोधान्ध हो कर कहा,

“सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा”।

तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और

क्षमा याचना करते हुए कहा,

“अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता” और तपस्या के निमित्त

वन को लौट गये।

रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं-

“कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू”।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि

कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर

आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों

के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।

महाभारत काल;-

भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के

लिये परशुराम के पास आयी।

तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा।

उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला।

किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।

परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे,तब द्रोणाचार्य

उनके पास पहुँचे।

किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे।

तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा।

तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित

चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो,प्रयोग किया जा सके।

परशुरामजी ने कहा-“एवमस्तु!” अर्थात् ऐसा ही हो।

इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

परशुराम कर्ण के भी गुरु थे।

उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी

सिखाया था।

लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था,फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल

ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से

विद्या लेने का प्रयास किया।

परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं,लेकिन एक दिन

जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे,तब एक भौंरा

आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा,अपने गुरुजी की नींद मे कोई अवरोध न आये

इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा,भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था,

भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा।

वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा।

परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून

तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा।

इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर

रखकर सो रहे थे।

तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा।

किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो,इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा।

अचानक परशुराम की निद्रा टूटी,और ये जानकर की एक शूद्र पुत्र में इतनी

सहनशीलता नहीं हो सकती कि वो बिच्छू के दंश को सहन कर ले।

कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या

की सर्वाधिक आवश्यकता होगी,तब वह उसके काम नहीं आयेगी।

भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र

के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववन्द्य

महाबाहु परशुराम का जन्म हुआ था।

वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे।

भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे।

परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के

संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं।

वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है।

कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के

गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे।

वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने

के लिये कहेंगे।

पिता जी ऋषि यमदग्नि के नाम पर ही जौनपुर कभी यमदाग्निपुरम से जौनपुर

हो गया. आज भी इनकी माता जी का मंदिर यहाँ विराजमान है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में कुछ महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें आज भी अमर माना जाता है।

इन्हें अष्टचिरंजीवी भी कहा जाता है।

इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।

जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान,विभीषण,

कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं।

ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में भी कहीं तपस्या में लीन हैं।

भगवान परशुराम का वर्णन अनेक धर्म ग्रंथों में मिलता है जैसे रामायण,महाभारत, श्रीरामचरितमानस आदि।

रामायण तथा श्रीरामचरितमानस में भगवान परशुराम का श्रीराम व लक्ष्मण से

विवाद का वर्णन मिलता है वहीं महाभारत में भीष्म के साथ युद्ध का वर्णन है।

—- प्रत्यंचा सनातन संस्कृति

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सनातन धर्म द्रोहियों,गऊ हत्यारों एवं उनके समर्थकों तथा धर्म निरपेक्ष सनातन

धर्म की निंदा करने वालों को ”जय श्री परशुराम” उद्घोष का कोई अधिकार नही है।

ऐसे लोग क्षुद्र एवं क्षणिक स्वार्थ के लोभ में ”जय श्री परशुराम” का उद्घोष करते हैं,,

इनका महिमामंडन करते हैं।

ऐसे सभी द्रोही जनों का पूर्णतया बहिष्कार करें।

प्रभु श्री परशुराम हमारे आदर्श हैं एवं प्रभु श्री राम हमारे आदर्श होने के साथ साथ

पावन भूमि भारत के जन जन के आराध्य भी हैं।

दोनों ही अवतार थे,,हमारे लिए दोनों वन्दनीय हैं।

सनातन धर्म के संरक्षक सर्व प्रिय आचार्य श्री परशुराम की जय,,,

ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि !

तन्न: परशुराम: प्रचोदयात !

‘ॐ रां रां ॐ रां रां ॐ परशुहस्ताय नम:

=========

हम धर्म सापेक्ष है,,,

आस्तिक हैं,,,सनातन धर्मी हैं,,

हिंदू हैं,,,राष्ट्रवादी हैं,,,,,,
धर्म निरपेक्ष नहीं है,,,

नास्तिक नहीं हैं,,

सेकुलर नहीं हैं,,,
जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,

जयति पुण्य भूमि भारत,,,
सेकुलर मुक्त भारत,,,

धर्मनिष्ठ भारत,,,

सशक्त भारत,,,

समृद्ध भारत,,,

संस्कारित भारत,,,

अखंड भारत,,,
सदासुमंगल,,,

हर हर महादेव,,

जय श्री परशुराम,,

जयश्रीराम

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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