Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दन पुर गाव. या गावात लहु लोहाराच एक दुकान असतं. – bodhkatha zen


bodhkatha zen
दन पुर गाव. या गावात लहु लोहाराच
एक दुकान असतं. दिवस भर भाता
मारायचा, भट्टी पेटती ठेवायची
आणि ऐरणीवर भट्टीमधे तापलेल्या
लोखंडावर हातोड्याचे घाव घालुन
वेगवेगळ्या वस्तु बनवायच्या हा
त्याचा व्यवसाय. रोजच्या
प्रामाणे आज देखिल त्याच काम
जोरात आणि जोमात चालु असताना
त्याच्या घराबाहेरुन जाणा-या
एका भिक्कुला त्याने घातलेल्या
हातोड्याचे घाव ऐकु येतात.
कुतुहल म्हणुन तो भिक्कु
त्याच्या घरामधे येतो आणि
उत्सुकतापुर्ण नजरेने त्याच
काम न्याहाळु लगतो. त्या घराच्या
आडगळीच्या कोप-यामधे काही मोडके,
वेडेवाकडे, बिनकामचे हातोडे
पडलेले असतात. तो भिक्कु लहु
लोहारास विचारतो "मित्रा हे
हातोडे मोडायला किती ऐरणी
लागल्या? त्या मोडक्या ऐरणी
कश्याबर ईथे दिसत नाहीत?" लहु
उत्तरतो "ही एकच ऐरण मी गेली
कीत्येक वर्षे वापरतो आहे. या
ऐरणीनेच कीत्येक हातोडे तोडले
असतील. कारण हातोडे घाव घालतो तर
ऐरण तो घाव शातपणे सहन करते."
--------------------------------------------------------------------------एक
झेन कथा है। एक युवक अपने गुरु के
पास वर्षों रहा, और गुरु कभी उसे
कुछ कहा नहीं। बार-बार शिष्य
पूछता कि मुझे कुछ कहें, आदेश दें,
मैं क्या करूं? गुरु कहता, मुझे
देखो। मैं जो करता हूं, वैसा करो।
मैं जो नहीं करता हूं, वह मत करो,
इससे ही समझो। लेकिन उसने कहा,
इससे मेरी समझ में नहीं आता, आप
मुझे कहीं और भेज दें।
झेन-परंपरा में ऐसा होता है कि
शिष्य मांग सकता है कि मुझे कहीं
भेज दें, जहां में सीख सकूं। तो
गुरु ने कहा, तू जा, पास में एक
सराय है कुछ मील दूर, वहां तू रुक
जा, चौबीस घंटे ठहरना और सराय का
मालिक तुझे काफी बोध देगा। वह
गया। वह बड़ा हैरान हुआ। इतने
बड़े गुरु के पास तो बोध नहीं हुआ
और सराय के मालिक के पास बोध होगा!
धर्मशाला का रखवाला! बेमन से
गया। और वहां जाकर तो देखी उसकी
शक्ल-सूरत रखवाले की तो और हैरान
हो गया कि इससे क्या बोध होने
वाला है! लेकिन अब चौबीस घंटे तो
रहना था। और गुरु ने कहा था कि
देखते रहना, क्योंकि वह धर्मशाला
का मालिक शायद कुछ कहे न कहे, मगर
देखते रहना, गौर से जांच करना। तो
उसने देखा कि दिनभर वह धूल ही
झाड़ता रहा, वह धर्मशाला का
मालिक; कोई यात्री गया, कोई आया,
नया कमरा, पुराना, वह धूल झाड़ता
रहा दिनभर। शाम को बर्तन साफ
करता रहा। रात ग्यारह-बारह बजे
तक यह देखता रहा, वह बर्तन ही साफ
कर रहा था, फिर सो गया। सुबह जब
उठा पांच बजे, तो भागा कि देखें वह
क्या कर रहा है; वह फिर बर्तन साफ
कर रहा था। साफ किए ही बर्तन साफ
कर रहा था। रात साफ करके रखकर सो
गया था। इसने पूछा कि महाराज, और
सब तो ठीक है, और ज्यादा ज्ञान की
मुझे आपसे अपेक्षा भी नहीं, इतना
तो मुझे बता दें कि साफ किए बर्तन
अब किसलिए साफ कर रहे हैं? उसने
कहा, रातभर भी बर्तन रखें रहें तो
धूल जम जाती है। उपयोग करने से ही
धूल नहीं जमती, रखे रहने से भी धूल
जम जाती है। समय के बीतने से धूल
जम जाती है। यह तो वापस चला आया।
गुरु से कहा, वहां क्या सीखने में
रखा है, वह आदमी तो हद्द पागल है।
वह तो बर्तनों को घिसता ही रहता
है, रात बारह बजे तक घिसता रहा,
फिर सुबह पांच बजे से--और
घिसे-घिसायों को घिसने लगा। उसके
गुरु ने कहा, यही तू कर, नासमझ!
इसीलिए तुझे वहां भेजा था। रात
भी घिस, घिसते-घिसते ही सो जा, और
सुबह उठते ही से फिर घिस।
क्योंकि रात भी सपनों के कारण
धूल जम जाती है। समय के बीतते ही
धूल जम जाती है। विचार और स्वप्न
हमारे भीतर के मन की धूल हैं।
------------------------------------------------------------------------ झेन
कथा- ४ मूठभर चांदणं ठमादेवी | 10 March,
2011 - 02:30 रेकॉन हा झेन गुरू अत्यंत
साधेपणाने राहायचा... त्याच्या
झोपडीत काहीही नव्हतं... एके
रात्री त्याच्या झोपडीत चोर
शिरला. त्याला चोरण्यासाठी
काहीही मिळालं नाही... पण रेकॉनने
ते पाहिलं... म्हणाला, तू
माझ्याकडे खूपच दुरून आलेला
दिसतो आहेस... तेव्हा तू रिकाम्या
हाताने जाऊ नयेस... तुला मी भेट
म्हणून माझे कपडे देतो... असं
म्हणून त्याने अंगावरचे कपडे
उतरवले आणि त्या चोराला दिले...
चोर निघून गेला... तो गेल्यावर
गुरू नग्नावस्थेत विचार करत
बसला होता... त्याच्या झोपडीत
चांद्णं विखुरलं होतं... तो
म्हणाला, अरेरे, मी त्या चोराला
मूठभर चांदणं तर नक्कीच देऊ शकलो
असतो... --------------------------------------------- चहाचा
कप नान-इन या झेन धर्मगुरूला एक
प्राध्यापक भेटायला आला...
त्याला स्वतःच्या बुद्धीबद्दल
खूप अभिमान होता आणि स्वतःच्या
ज्ञानाबद्दलही. त्याला झेन
जाणून घ्यायचा होता. नान-इनने
त्याला चहा देऊ केला..
पाहुण्याच्या कपात चहा ओतताना
तो इतका ओतला की कप भरून वाहू
लागला. प्राध्यापकाला काही
राहवलं नाही. तो म्हणाला, कप भरून
वाहू लागलाय. त्यात आणखी चहा
मावणार नाही. नान-इन उत्तरला या
कपाप्रमाणेच तुझं मनही
स्वतःविषयीच्या मतांनी आणि
पूर्वग्रहांनी भरलेलं आहे..
तुझ्या मनाचा कप तू रिकामा
केल्याशिवाय मी तुला झेन कसा
दाखवणार? तात्पर्य- कोणतंही नवीन
काही शिकायचं असेल, ज्ञान हवं
असेल तर आधी मनाची पाटी कोरी
करावी लागेल. मनाची पाटी कोरी
केल्याशिवाय त्यावर नवीन
अक्षरं उमटणार नाहीत.
------------------------------------ “मुझे कोई मार्ग
नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन
चीज़ों के बारे में सोचता रहता
हूँ जिनका निषेध किया गया है.
मेरे मन में उन वस्तुओं को
प्राप्त करने की इच्छा होती रहती
है जो वर्जित हैं. मैं उन कार्यों
को करने की योजनायें बनाते रहता
हूँ जिन्हें करना मेरे हित में
नहीं होगा. मैं क्या करूं?” –
शिष्य ने गुरु से
उद्विग्नतापूर्वक पूछा. गुरु ने
शिष्य को पास ही गमले में लगे एक
पौधे को देखने के लिए कहा और पूछा
कि वह क्या है. शिष्य के पास उत्तर
नहीं था. “यह बैलाडोना का
विषैला पौधा है. यदि तुम इसकी
पत्तियों को खा लो तो तुम्हारी
मृत्यु हो जाएगी. लेकिन इसे
देखने मात्र से यह तुम्हारा कुछ
अहित नहीं कर सकता. उसी प्रकार,
अधोगति को ले जाने वाले विचार
तुम्हें तब तक हानि नहीं पहुंचा
सकते जब तक तुम उनमें वास्तविक
रूप से प्रवृत्त न हो जाओ”.
-------------------------------- पश्चिम में एक
विश्वप्रसिद्ध धनुर्विद हुआ
जिसका नाम था हैरीगेल. यूं तो
हैरीगेल को धनुर्विधा में महारत
हासिल थी मगर उसने सुना था की जब
तक कोई जापान जाकर झेन गुरुओं से
धनुर्विधा न सीख ले तब तक
धनुर्विधा अधूरी ही रहती है.
इसलिये वा जापान गया एक झेन गुरु
के पास. ओशो ने हैरीगेल के झेन
गुरु के साथ हुए अनुभव के माध्यम
से एक बड़ी ही महत्वपूर्ण घटना
का जिक्र किया है जिससे साधक को
मार्गदर्शन मिलता है कि कैसे
भीतर अपने केन्द्र की तरफ जाकर
अपने शुद्ध स्वरूप को जाना जाये.
ओशो ने इन छोटी-छोटी प्रेरक
कथाओं के माध्यम से बड़े गूढ़
सूत्रों को सरलता से पेश किया है
ताकि साधक इन्हे समझ कर ग्रहण कर
सकें. ओशो कहते हैं - 'हैरीगेल तीन
साल से गुरु के पास धनुर्विधा
सीख रहा था मगर गुरु जो कह रहा था
वह हैरीगेल की समझ से परे था.
जापान में झेन गुरु धनुर्विधा का
उपयोग साधकों को ध्यान सिखाने के
लिये करते हैं. झेन गुरु हैरीगेल
को कह रहा था की तू तीर तो चला
लेकिन ऐसे जैसे चलाने वाला तू
नही. तू तो बस तीर को चलने दे. मगर
यह बात हैरीगेल की समझ नही आ रही
थी. हैरीगेल तीर चलता, तीर सही
निशाने पर लगता मगर गुरु कहता
'नही इसमें झेन नही है' . हैरीगेल
कहता कि उसका निशाना निरंतर सही
लग रहा है मगर झेन गुरु का कहना था
कि जब तक हैरीगेल निशाना लगाते
वक्त मौजूद है तब तक निशाना भले
ही सही लगे लेकिन उसमे झेन नही हो
सकता. गुरु कह रहा था कि जब तक
कर्ता भाव है तब तक ध्यान नही हो
सकता. हैरीगेल का कहना था की अगर
मैं निशाना नही लगाऊं तो फिर
निशाना लगायेगा कौन. पश्चिमी
आदमी तकनीकी और तर्क को तो समझ
सकता है लेकिन जो बात तर्क और
तकनीक से परे हो उसे समझने में
उसे कठिनाई होती है और यही
हैरीगेल की कठिनाई थी. गुरु
हैरीगेल को समझा रहा था की
निशाना तो बाद में भी सिखाया जा
सकता है , निशाना तो गौण है लेकिन
झेन सबसे महत्वपूर्ण बात है.
आखिरकार जब गुरु को लगा कि यह बात
हैरीगेल की समझ नही आयेगी तो
उन्होने हैरीगेल से कहा कि वह
अपना भी समय नष्ट कर रहा है और
गुरु का भी इसलिये अच्छा होगा कि
हैरीगेल घर वापस चला जाये. इस
प्रकार हैरीगेल वापस घर जाने का
निर्णय करता है. आज उसका गुरु के
पास अंतिम दिन था इसलिये शाम को
वह गुरु से अंतिम मुलाकात करने
और गुरु को दक्षिणा स्वरूप अपने
निवास स्थान पर निमंत्रित करने
आया था. गुरु अपने शिष्यों को
निशाना लगाना सीखा रहे थे,
हैरीगेल पास पड़ी एक बेंच पर
बैठा यह सब देख रहा था. हैरीगेल ने
गुरु को निशाना लगते देखा और जो
बात उसकी समझ में इतने दिन से नही
आई थी वह बात आज उसकी समझ में आ
गयी. उसने देखा की गुरु के चेहरे
या हाथ की किसी माशपेशी में कोई
तनाव नही था ऐसा लगता था जैसे
गुरु तीर नही चला रहे थे बल्कि
तीर उनसे चल रहा था. हैरीगेल बेंच
से उठा , धीरे से उसने गुरु के हाथ
से धनुष लिये तीर प्रत्यंचा पर
चढ़ाया और निशाना मारा. गुरु
उसका निशाना देख कर उछल पड़ा और
कहा 'यही हैरीगेल, यही है झेन!' आज
हैरीगेल समझ सका क्योंकि आज उसे
कोई तनाव नही था, आज वह सीखने आया
भी नही था आज हैरीगेल बिल्कुल
प्रयास रहित था इसलिये वह झेन को
समझ सका. हैरीगेल ने गुरु को
निमंत्��ित क�����या था तो गुरु
अपने मित्रों सहित �����ाम को
हैरिगेक के निवास स्थान पर पधारे
जो एक बहुमंजिली इमारत की 9वी
मंजिल पर स्थित था. उनके बीच
वार्तालाप चल रहा था, गुरु कुछ
बता रहा था शिष्यों को की अचानक
भूकंप आया. सब लोग नीचे सीढियों
की तरफ भागे. हैरीगेल भी भागा मगर
जब वह सीढियों के पास पहुंच तो
उसने देखा की गुरु तो वहां था ही
नही. हैरीगेल वापस आया तो देखा कि
कमरे में गुरु आंख बंद किये
ज्यूं के त्यूं बैठे थे. तब तक
भूकंप जा चुका था और बाकी लोग भी
कमरे में वापस आ चुके थे. गुरु ने
अपनी आँखें खोली और भूकंप आने पर
जहाँ पर बात खत्म की थी वहीं से
शुरु कर दी. जैसे बीच में कुछ हुआ
ही नही हो. हैरीगेल ने गुरु से कहा
- 'छोड़िये यह बात और मेरे एक
प्रश्न का उत्तर दीजिये. भूकंप
आया, सब लोग नीचे की तरफ भागे मगर
आप क्यों नही भागे?' झेन गुरु ने
कहा - 'भागे तुम भी और भागा मैं भी
मगर तुम बाहर की तरफ भागे मैं
अंदर की तरफ भागा. ' गुरु ने कहा-
'हैरीगेल तुम मुझे एक बात बताओ,
तुम 9वी मंजिल से 8वी मंजिल पर गये
क्या वहां भूकंप नही था? 8वी से 7वी
पर गये क्या वहां भूकंप नही था,
इसी प्रकार छठी मंजिल पर, पाँचवी
मंजिल पर या पहली मंजिल पर और अंत
में जमीन पर क्या भूकंप नही था?
तुम कभी भी ऐसी जगह नही रहे जहाँ
भूकंप नहीं था मगर मैं भीतर अपने
केन्द्र की तरफ गया जहाँ कभी कोई
भूकंप नही जा सकता. वह ऐसा
केन्द्र है जहाँ सब शांत है.' ओशो
इसे समझाते हुए कहते हैं कि झेन
गुरु कह रहे हैं कि तुम्हारे
भीतर चेतना का एक ऐसा केन्द्र है
जहाँ काम, क्रोध, भय, लोभ, मोह या
ईर्ष्या की कोई लहर प्रवेश नही
करती. इसलिये जब कभी तुम्हारी
चेतना में वे लहरें उठें तो अपने
भीतर केन्द्र की तरफ सरक जाना.
केन्द्र पर सरकने से तुम बड़ी
आसानी से परिधि पर चल रहे कंपन के
साक्षी बन कर निर्लिप्त भाव को
उपलब्ध हो सकते हो. परिधि पर रह कर
तुम कभी भी परिधि पर चल रहे कंपन
के साक्षी नही हो सकते. केन्द्र
पर रहकर तुम आसानी से देख सकते हो
कि कैसे सतह पर काम, क्रोध, लोभ,
मोह की लहरें अपने स्वभाव से
उठती है और अपने स्वभाव के कारण
ही विलुप्त हो जाती हैं और तुम
इनसे बिल्कुल प्रभावित नही होते.
खोजो अपने भीतर उस केन्द्र को जो
शान्ति, आनन्द और बोध का केन्द्र
है. ------------------------------------------------------------- झेन
कथा झेन कथा एका गावात एक पाथरवट (
दगड फोड्या) राहत होता. तो रोज
भल्या पहाटे आपला डोंगरावर जाई
आणि मोठ्या शिळा फोडून, त्यांचे
तुकडे गावातील शिल्पकारांना
विकत असे. एकदा असाच तो शिळा फोडत
होता. दुपारची वेळ... वरुन सुर्य
आग ओकत होता. दगड फोड्याने थोडी
विश्रांती घ्यायचे ठरवले.
त्याने वरुन बघितल तर राजाचा एक
मोठा अधिकारी रस्त्यावरून
पालखितून मोठ्या मजेत चालला
होता. आजूबाजूला सेवक वर्ग
त्याची सेवा करत होते. त्याला ना
उंहाची पर्वा होती ना पाण्याची!
दगड फोड्या स्तिमित झाला.
म्हणाला "अहाहा!! काय सुंदर
जीवन आहे. काही त्रास नाही, काही
कष्ट नाहीत !! हा माझ्यापेक्षा
कितीतरी श्रेष्ठ आहे. मी जर हा
अधिकारी असतो तर काय मजा आली
असती." काय आश्चर्य!! तो दगड
फोड्या पुढच्याक्षणी तो
अधिकारी झाला. आता तो मजेत होता.
काही कष्ट नाहीत. फक्त आराम ! काही
तास जातात न जातात तोच त्याची
पालखि मोडली. तो नाइलाजानेच खाली
उतरला आणि पायी चालू लागला. वर
सूर्य होताच आग ओकत. याने विचार
केला, माझ्यापेक्षा हा सुर्य
किती श्रेष्ठ आहे. काही त्रास
नाही. काही कष्ट नाहीत. काय
आश्चर्य!! तो दगड फोड्या
पुढच्याचक्षणी सूर्य बनला. आता
तो खुशीत होता. मस्त आकाशात
विहार करायचा. काही कष्ट नाहीत.
फक्त आराम ! आता तो लोकाना छळत
होता. अशी त्याची मजा चालू
असताना त्याला गुदमरल्यासारखा
झाल. काही दिसेचना पुढच ! बघतो तर
काय ! अचानक एक ढग त्याला आडवा आला
होता. काही केल्या तो ढग हटेचना.
त्याने विचार केला हा ढग जर मला
अडवू शकतो तर हा माझ्यापेक्षा
नक्कीच श्रेष्ठ दिसतोय. जर मी ढग
झालो तर !! तर मग मीच सर्वात
श्रेष्ठ होईन. आणि
नेहेमीप्रमाणेच, तो ढग बनला. आता
त्याने सूर्यालाही नमविल होत.
आता तो सर्वाशक्तिमान होता. मजेत
आकाशात विहरत होता. सूर्याला
झाकोळून टाकत होता. इतक्यात तो
एका दिशेला खेचला जाउ लागला.
त्याला तिकडे जायच नव्हत. पण
वारा त्याला खेचत होता. त्याने
विचार केला हा वारा जर मला ढकलु
शकतो तर हा माझ्यापेक्षा नक्कीच
श्रेष्ठ दिसतोय. जर मी वारा झालो
तर !! तर मग मीच सर्वात श्रेष्ठ
होईन. आत्ता तो वारा बनला होता.
त्याला ना राजाची भीती , ना
सूर्याची, ना ढगाची !! तो मुक्ता
हस्ते बागडत होता. ढगाना हलवून
सूर्याला झाकत होता. दाणदिशी तो
एकठिकाणी येऊन आदळला. समोर बघतो
तो काय एक महाकाय पर्वत त्याच्या
समोर उभा होता. त्याला हलतही
येईना न पुढेही जाता येईना.
त्याने विचार केला हा पर्वत जर
मला ढकलु शकतो तर हा
माझ्यापेक्षा नक्कीच श्रेष्ठ
दिसतोय. जर मी पर्वत झालो तर !! तर
मग मीच सर्वात श्रेष्ठ होईन. आणि
तो पर्वत झाला. त्याला ना राजाची
भीती , ना सूर्याची, ना ढगाची, ना
वार्याची !! तो घट्ट मांडी ठोकून
बसला होता. सगळ्यावर हसत होता.
स्वतावरच खुश होत होता. तो जगात
आता सर्वश्रेष्ठ, सर्व शक्तिमान
होता. त्याने खाली बघितले.
त्याच्या पायाखालची जमिनच
सरकली... दुसरा कोणी एक पाथरवट
त्याची मांडी फोडत होता...
तात्पर्य: तुम्ही काढाल ते... मूळ
स्त्रोत: अनामिक - बोलघेवडा
----------------------------------------------------- सोने आणि
वीट (झेन कथा) प्रेषक लिखाळ (रवि.,
१५/१०/२००६ - १३:४६) विचार
प्रतिक्रिया कथा नमस्कार, काही
वर्षांपूर्वी, ओशोंच्या (बहुधा
अनुवादीत 'अंतर्यात्रा')
पुस्तकात वाचलेली झेन रूपक कथा,
आठवेल तशी लिहीत आहे. एकदा एक
तरुण संन्यासी प्रवास करीत
असताना, त्याला असाच एक
प्रवासासाठी बाहेर पडलेला
संन्यासी भेटतो. दोघे एकमेकांना
अभिवादन वगैरे करतात आणि पुढचा
प्रवास एकत्र करायचा ठरवतात.
दुसऱ्या संन्याशाच्या
झोळीमध्ये काहीतरी जड वस्तू
असते. तो ती झोळी सतत सांभाळतो
आहे असे पहिल्या संन्याशाच्या
लक्षात येते. रात्री झोपताना
सुद्धा तो ती झोळी दूर ठेवायचा
नाही. याचे पहिल्या संन्याशाला
राहून राहून आश्चर्य वाटत राहते.
त्यांचा प्रवास चालूच राहतो आणि
पहिल्या संन्याशाला जाणवते की
याचे जास्त अवधान त्या झोळीवरच
आहे. एकदा सायंकाळी दोघे एका
विहरीपाशी हातपाय धुवायला
थांबतात आणि तीच संधी पाहून
पहिला संन्यासी त्याच्या झोळीत
काय आहे ते पाहतो. त्यात एक
सोन्याने भरलेली लहान पेटी असते.
ती पेटी तो तिथेच टाकून देतो आणि
एक त्या आकाराची वीट झोळीत
ठेवतो. ते पुढे जायला निघतात, तर
दुसरा म्हणतो,"आता संध्याकाळ
झाली आहे आणि पुढे जंगल आहे.
चोराचिलटांची भीती आहे आपण येथे
कुठेतरी मुक्काम करू." त्यावर
पहिला संन्यासी म्हणतो,"अरे
आपण संन्यासी! आपल्याला काय फरक
पडतो?" फार आग्रह केल्यावर
शेवटी दुसरा जंगलातून पुढे
जायला तयार होतो. जंगलात रात्री
मुक्काम करताना तो झोळी अगदी
स्वतःच्या जवळ ठेवून झोपतो.
अधुनमधुन चाचपून खात्री करून
घेत असतो. दुसऱ्या दिवशी सकाळी
पहिला संन्यासी त्याला, झोळीची
इतकी काळजी का वाटते ते विचारतो.
त्यावर तो सांगतो की त्यात सोने
भरलेले एक पेटी आहे आणि तो ती
पेटी जपत आहे. काय जाणो संन्यासी
असलो तरी कधीकाळी ते सोने
उपयोगाला येईल? त्यावर पहिला
संन्यासी म्हणतो,"अरे
सोन्याचा मोह आपण का ठेवावा? आणि
तसेही तू काल सायंकाळपासून जे
वागवतो आहेस, इतक्या काळजीने जे
सांभाळतो आहेस, ज्यापायी तू
रात्रीची झोप निवांतपणे घेऊ
शकला नाहीस, ते सोने नसून एक वीट
आहे. पाहा." --- लिखाळ.
---------------------------------------------------------------------------------------------
वरील कथा मी जेव्हा वाचली
तेंव्हा माझ्यावर तिचा फारच
परिणाम झाला. मला ती गोष्ट वाचून
असे जाणवले की सोने म्हणून इतके
दिवस जवळ बाळगलेले असे बरेच काही
आपल्याकडे असू शकेल, की जे
जपण्यासाठी आपण जीवापाड धडपडतो,
खूप मानसिक ऊर्जा त्यापायी
व्यस्त करतो, जे वास्तवात सोने
नसून बदललेल्या परिस्थितीमध्ये
मातीच असू शकेल. आपण थोड्या
थोड्या अंतराने आपल्याला
तपासून पाहणे, आपले 'पान रिफ्रेश'
करणे हेच हितावह आहे. वर्तमानात
जगण्याचा जो उपदेश आपल्याला
तत्त्वज्ञ देत असतात, त्याकडे
जाण्याचा हा एक चांगला उपायच आहे
असे मला वाटले. आपल्याला काय
वाटले?
आपलाच,--------------------------------------------------------------------------
ऑगस्ट १४ २००६ दोन संन्यासी (झेन
कथा) प्रेषक लिखाळ (मंगळ.,
१५/०८/२००६ - ०९:४३) विचार कथा फार
फार वर्षापूर्वीची गोष्ट. दोन
संन्यासी मित्र तीर्थाटन करीत
फिरत असतात. दोघे अगदी विरागी
आणि निर्मोही असतात.
पावसाळ्याचे दिवस असतात. ते एका
गावाहून दुसऱ्या गावी जात असतात.
मध्ये एक ओढा लागतो. त्याचे पाणी
फारच वाढलेले असते. तेथेच
त्यांना, ओढा ओलांडण्याच्या
विवंचनेत बसलेली, एक युवती
दिसते. ती या दोन तरुण
संन्याशांच्या जवळ येते आणि
ओढ्या पलीकडे तिला नेऊन
सोडण्याची विनंती करते. त्यावर
एक संन्याशी तिला म्हणतो,"
आम्ही ब्रह्मचारी आहोत. आम्ही
स्त्रीस स्पर्श कसे बरे करणार."
पण दुसरा संन्यासी मात्र तिला
आश्वासन देतो आणि पाणी थोडे ओसरू
लागताच तिला खांद्यावर बसवून
पलीकडे सोडतो. ती त्याचे अनेक
आभार मानते आणि निघून जाते. या
दोघांचा प्रवास सुरू होतो आणि
सायंकाळी ते पुढच्या गावात
पोहोचतात. धर्मशाळेत
पोहोचल्यावर थोड्याच वेळात
दोघे पथाऱ्या पसरून गप्पा मारत
पडतात. थोड्यावेळाने पहिला
संन्यासी म्हणतो," मित्रा! आज
तुझे ब्रह्मचर्य मोडले." दुसरा
आश्चर्याने विचारतो, "ते कसे?"
त्यावर पाहिला म्हणतो की तू त्या
तरुणीला आज खांद्यावर बसवून
नेलेस म्हणून. त्यावर दुसरा
संन्यासी हसून म्हणतो," अरे!
ओढा ओलांडताच ती माझ्या
खांद्यावरून उतरली. पण इतका वेळ
झाला तरी ती तुझ्या खांद्यावरून
उतरलेली दिसत नाहीये !' (ओशोंच्या
पुस्तकात वाचलेली झेन
कथा.)------------------------------------------------------ जंग
जीतने के लिए हर लड़ाई जीतना
जरूरी है बड़ी ही प्रचलित झेन
कथा है . अपने शिष्यों के ज्ञान का
मूल्यांकन करने एक गुरु
अमावश्या की रात उन सभी को लेकर
एक विशाल पर्वत की तराई में
पहुंचे . रास्ते में कठिनाई न हो
इसीलिए गुरु ने सभी के हाथ में एक
एक लालटेन पहले से ही दे रखी थी .
पर्वत की ओर इशारा करके गुरु ने
शिष्यों को आदेश दिया कि आज रात
भर में उन्हें पर्वत कि चढ़ाई
चढ़ते हुए सूर्योदय के पहले
पर्वत के शिखर पर पहुंचना है .
अधिकांश शिष्यों को गुरु की बात
बड़ी अजीब सी लगी , उन्होंने तर्क
दिया की एक नन्ही सी लालटेन के
सहारे इतना विशाल पर्वत कैसे
चढ़ा जा सकता है . तभी एक शिष्य
साहस दिखाते हुए दल से बाहर आया
और बोला गुरूजी मैं इस पर्वत पर
चढ़ने के लिए तैयार हूँ . गुरु ने
यह परखने के लिए कि कहीं उसका
साहस खोखला तो नहीं है , उससे एक
प्रश्न किया कि यह भयावह अँधेरा
उसके मार्ग का बाधक तो नहीं
बनेगा . एक नन्ही सी लालटेन के
सहारे वह विशाल पर्वत का दुर्गम
मार्ग कैसे तय करेगा , उसे रास्ता
कैसे दिखाई देगा . तब बड़ी
विनम्रता पूर्वक शिष्य ने जवाब
दिया कि गुरु जी रात भर में पर्वत
को चढ़ना मेरा उद्देश्य है
किन्तु मैं यह भी जनता हूँ कि समय
दिन का हो या रात का एक बार में इस
विशाल पर्वत को नहीं देखा जा
सकता . उसने लालटेन को अपने सर कि
ऊचाई तक उठा कर कहा कि गुरु जी इस
तरह मैं एक बार में जहाँ तक
प्रकाश जा रहा है वहां तक का
मार्ग देख लूँगा फिर उसे ही अपना
तात्कालिक लक्ष्य बना कर केवल
मार्ग के उतना हिस्सा ही तय
करूंगा . एक बार अंतिम बिंदु तक
पहुँच जाने के बाद लालटेन को
पुनः उठाऊँगा फिर एक बार अंतिम
बिंदु तय करूंगा और उसे अपना
तात्कालिक लक्ष्य बना कर वहां तक
चढूँगा और इसी प्रक्रिया को
दोहराते हुए मैं सूर्योदय के
पूर्व पर्वत के शिखर तक पहुँच
जाऊंगा . वर्तमान समय में भी यह
कथा उतनी ही प्रासंगिक है . आज कोई
कप्तान यदि कोई विश्वकप जीतना
चाहता है तो आप उसके वक्तव्य में
भी यही सुनेंगे कि वे हर लीग मैच
को जीतकर क्वाटर फ़ाइनल में जगह
बनाना चाहेंगे फिर वहां से जीतते
हुए सेमीफाइनल और फिर फ़ाइनल पर
अपना कब्ज़ा करना चाहेंगे . और
शायद विश्वकप को जीतने की और कोई
नीति नहीं हो सकती . अतः आप भी
किसी बड़े उद्देश्य को पाना
चाहते हैं तो उसके लिए छोटे छोटे
लक्ष्य बनाएं . किसी एक बड़े TARGET को
पहले वार्षिक फिर छः माही , फिर
तिमाही , मासिक , साप्ताहिक तथा
दैनिक हिस्से तक तोड़ते हुए उस
आधार पर नियोजन करें तथा अपना 100%
देकर उसे अर्जित कर सफल हो जाएँ .
और आपको तो पता ही है कि जीवन के
हर मोड़ पर सफल व्यक्ति को ही
कहते हैं MAGIC MAN -------------------------------------------
‘’ मर्द वे , जिनका मस्तिष्क
ठंडा , खून गरम पुरुषार्थ प्रखर व
ह्रदय नरम --------------------------------------- गुरू
बंकेईला एका विद्यार्थ्याने
विचारलं, माझ्यातला क्रोध
जाण्यासाठी काहीतरी उपाय सुचवा.
गुरू म्हणाला, दाखव बरं कुठे आहे
तुझा तो क्रोध... विद्यार्थी
म्हणाला,,, आत्ता नाहीये तो
माझ्याजवळ... मग कसा दाखवू? गुरू-
तो जेव्हा तुझ्यात येईल ना
तेव्हा दाखव विद्यार्थी- तेही
नाही जमायचं.... कारण इथे
येईपर्यंत तो अदृश्यच होईल...
गुरू- म्हणजे? हा क्रोध तुझ्या
प्रकृतीचा अंश नक्कीच नाही.
बाहेरून येऊन तो तुझ्यात घुसतो
आणि तुला छळतो... पण यावर मी तुला
एक छान उपाय सांगतो... तो येईल
तेव्हा एक काठी घेऊन स्वत:ला
चांगलं झोडपून घे... हा आगंतुक
क्रोध मार न सोसून नक्कीच पळून
जाईल... --------------------------------------------------- अपने
भीतर के प्रकाश को देखो अपने
भीतर के प्रकाश को देखो एक
गुरूजी लंबे समय से अचेतावस्था
में थे। एक दिन अचानक उन्हें होश
आया तो उन्होंने अपने प्रिय
शिष्य को अपने नजदीक बैठे हुए
पाया। उन्होंने प्रेमपूर्वक
कहा - "तुम इतने समय तक मेरे
बिस्तर के नजदीक ही बैठे रहे और
मुझे अकेला नहीं छोड़ा?" शिष्य
ने रुंधे हुए गले से कहा -
"गुरूदेव मैं ऐसा कर ही नहीं
सकता कि आपको अकेला छोड़ दूं।"
गुरूजी - "ऐसा क्यों?"
"क्योंकि आप ही मेरे जीवन के
प्रकाशपुंज हैं।" गुरूजी ने
उदास से स्वर में कहा - "क्या
मैंने तुम्हें इतना चकाचौंध कर
दिया है कि तुम अपने भीतर के
प्रकाश को नहीं देख पा रहे हो?"
---------------------------------- नदी का पानी बिकाऊ
गुरू जी के प्रवचन में एक गूढ़
वाक्य शामिल था। कटु मुस्कराहट
के साथ वे बोले, "नदी के तट पर
बैठकर नदी का पानी बेचना ही मेरा
कार्य है"। और मैं पानी खरीदने
में इतना व्यस्त था कि मैं नदी को
देख ही नहीं पाया। "हम जीवन की
समस्याओं और आपाधापी के कारण
प्रायः सत्य को नहीं पहचान
पाते।" ---------------------
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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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