Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

सुमेरु सभ्यता की उदभवभूमि “मंदार ” –

सुमेरु सभ्यता की उदभवभूमि “मंदार ” –
अबतक के इतिहासकारों का यह मत है कि “प्राचीनकाल में जिस क्षेत्र में मैसोपोटामिया की सभ्यता का उदभव और विकास हुआ , उस क्षेत्र का नाम “सुमेर” था । “सुमेर” बहुत ही उपजाऊ क्षेत्र था । उपजाऊ होने के कारण ही बंजर प्रदेश और रेगिस्तान के क्षेत्र से बहुत सी जातियों के लोग यहां आकर बस गये और उनके सम्मलित प्रयासों से इस क्षेत्र में एक उच्च कोटि की सभ्यता का विकास हुआ । जिन लोगों ने इस सभ्यता का निर्माण और विकास किया , उन्हें ” सुमेरी” कहा जाता था । सुमेरियनों की जाति और निवास स्थान के संबंध में इतिहासकार एक मत नहीं है । उनमें गहरा मतभेद है और उन्होनें भिन्न भिन्न मत व्यक्त किया है ।
कुछ विद्वानों की मान्यता है कि “ऐलम के निवासियों और सुमेरियनों की जाति एक थी । कुछ लोग उन्हें मध्य एशिया के निवासी मानते हैं ।
इतिहासकार एच०आर०हॉल का मत है कि “सुमेरियन सम्भवत: भारतीय थे और जल और स्थल मार्ग द्वारा ईरान होते हुए ‘मेसोपोटामिया’ पहुंचे थें । वे अपने साथ भारतीय सभ्यता संस्कृति भी लेते गये । ” कुछ अन्य इतिहासकारों ने सुमेरियनों का संबंध द्रविड जाति से जोडा है । कई विद्वानों की मान्यता है कि “उनकी चित्रकारी और मूर्तियों को देखने से लगता है कि वे भारतीयों से बहुत मिलते जुलते थें । उनकी मुखाकृति दक्षिण भारत की द्रविड जाति के लोगों से मिलती थी । ” इलियट स्मिथ का मत है कि ” सुमेरियन सुमेर के ही मूल निवासी थें ।”
मत मतान्तर के कारण ‘सुमेरियन’ की जाति और उनके मूल निवास स्थान के संबंध में अभी भी विवाद बना हुआ है ।

महाभारत में भारत के एक प्रांत का नाम “सुराष्ट्र” और उसके निवासियों को “सुवर्ण” बताया गया है । यह सुवर्ण “सुमेर” थे। सुमेर का अर्थ है “अच्छी” जाति । यही अर्थ सुवर्ण का भी होता है । उन दिनों भयंकर बाढें एवं भारी वर्षा आयी , जिसमें “सुमेर सभ्यता “के महत्वपूर्ण दुर्ग धराशायी हो गये । अब ‘किश’ और ‘उर’ क्षेत्रों में ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनसे उस क्षेत्र में बसी हुई ‘सुमेर’ जाति की समुन्नत स्थिति का पता चलता है और प्रतीत होता है कि वे भारतीय धर्मानुयायी थें , सूर्य पूजा करते थें । निप्पुर में विशालकाय सूर्य मंदिर था । विष्णु वाहन ‘गरुड’ की भी प्रतिमायें उस क्षेत्र में मिली है । इच्छवाकु राजा की मुद्रायें भी उस खुदाई में पाये गये हैं । “वोगजकोई” नामक स्थान पर खुदाई के दौरान वरुण देवता की मूर्ति मिली है । खुदाई में पाये गये रथ उसी प्रकार की है , जैसे कि भारत में चलते थें । यहां मृतकों के दाह संस्कार के भी प्रमाण मिले हैं ।
मेरे अनुसंधान के अनुसार ‘किश’ और ‘उर’ सभ्यता को जन्मदेनेवाली ‘सुवर्ण’ जाति ही थी । ‘सुमेरु’ सभ्यता का साक्ष्य ‘सुमेर पहाड ‘ (गिरिडीह , झारखंड) सम्मेद गिरि , जमुई के सिकंदरा प्रखण्ड का ” सिमरिया ” व अमृति पहाड व अमृती नदी आर्य सभ्यता व सुमेरु सभ्यता के साक्ष्य हैं ।
” सुमेरु” शब्द का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि “सृष्टि का वह भाग जहां पर सर्वप्रथम अग्नि से ब्रह्माण्ड सहित सूर्य , चंद्रमा एवं सौर ग्रहों की उत्पति हुई ।” सुमेरु में स+उ+म+ऐ+र+उ है । यहां ‘स’ सृष्टि का प्रतीकात्मक शब्द है , ‘उ’ उत्पति का प्रतीक है , ‘म’ मध्य का प्रतीक है , ‘ऐ ‘ सृष्टिमूलक शब्द है , ‘र’ अग्नि का बीज मंत्र है, ‘उ’ अग्नि उत्पति का प्रतीक है ।

सुमेरु की उदगमस्थली : मंदार
________________________

पद्मपुराण में यह स्पष्ट उल्लेख है कि ” ब्रह्माजी ने सृष्टि का सर्जन करने के लिए सर्वप्रथम रत्नमय महान पर्वत का सृजन किया , जो इसी पृथ्वी मंडल के मध्यभाग में स्थित है और वह मंदार उदयाचल त्रिकूट पर्वत ही है, जो विश्व की सृष्टि के आदि में उत्पन्न हुआ । ”
अग्निपुराण में इसी मंदार त्रिकूट को “मेरु सुमेरु ” कहकर पुकारा गया है , जो भूमंडल के मध्य अवस्थित है ।आगे कहा गया है कि “इसके तीन शिखर पर स्वर्ग बसा हुआ है। इस मेरुगिरि के पश्चिम शिखर पर ब्रह्माजी , पूर्व शिखर पर साक्षात भगवान विष्णु और मध्य श्रृंग पर भगवान आदिदेव रहते हैं ।
वामनपुराण , नृसिंह पुराण, श्रीमदभागवतपुराण, भविष्यपुराण, कूर्मपुराण व विष्णुपुराण ने एक स्वर से मंदार को ही मेरु , कैलाश व स्वर्गपुरी का मूल भाग माना है । अग्निपुराण हाथ उठाकर कहता है कि ” इलावर्त के बीच में ही ‘मेरु’ नामक स्वर्णमय पर्वत है और यही ‘इलावर्त” क्षेत्र ही देवताओं की जन्मभूमि के रुप में प्रसिद्ध है।” जैन साहित्य में ‘ऐलवंश ‘के राज्य की स्थापना का इतिहास इतिहासकारों के आंख खोलनेवाले हैं । इसमें यह उल्लेख है कि ” इला पुत्र एलय ने “अंगदेश” में जंगल साफ कर “इलावर्त” एवं ईलावर्धन नामक नगर को बसाया और ऐलय उसका राजा बना ।”

Advertisements

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s