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मांस का मूल्य


*(मांस का मूल्य ) लघु कथा*
*मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि- “देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है? “*
*मंत्री-परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।*
*उसने मुस्कराते हुए कहा-“राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।”*
*सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।*
*श्रेणिक ने उससे कहा, “तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारे में क्या मत है?”*
*प्रधान मंत्री ने कहा, “यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।”*
*रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।*
*अभय ने द्वार खटखटाया।*
*सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।*
*प्रधान मंत्री ने कहा -*

*”संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।”*
*यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!*
*उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।*
*मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।*
*श्रेणिक ने पूछा, “ये मुद्राएं किसलिए हैं?”*
*प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बोले -*

*” दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?”*
*जीवन का मूल्य अनन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को अपनी जान प्यारी होती है ।*
*जियो और जीने दो हर किसी को  स्वेछा से जीने का अधिकार !!*,

?🐇?🐏🐐🐓🐋🐃🐂🐖🐕🐆🐪

*प्राणी मात्र की रक्षा हमारा धर्म है..!! .

शाकाहार अपनाओ… 

धन्यवाद!!जिओ और जिने दो!!

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शिवाजी हमारे नेतृत्व के लिए आज भी प्रेरक हैं


shivaji ugta bharat

 

 

 

 

 

 

 

 

http://ugtabharat.com/shivajis-leadership-is-inspiring-for-us-today-also/

    राकेश कुमार आर्य

शिवाजी भारतीय राष्ट्रवाद के उन्नायक थे। उनके हर निर्णय और हर कार्य में राष्ट्रवाद झलकता था। अक्टूबर 1664 ई. में उन्होंने बीजापुर से खवासखान की सहायता के लिए आये बाजी घोर पड़े की सेना को परास्त कर भगा दिया था। बाजी घोरपड़े को अपने भी प्राण गंवाने पड़ गये। भारत का राष्ट्र निर्माता शिवाजी इस जीत से अपने साम्राज्य का और भी अधिक विस्तार करने में सफल रहा। पुर्तगाली इतिहासकारों का कहना है कि शिवाजी ने डिचोली रामबाग और दक्षिण में कोंकण में फोंडा को छोडक़र शेष सारा भाग प्राप्त कर लिया। इसके अतिरिक्त आठ लाख सोने के सिक्के तथा 20 लाख सोने के रूपये लूट में प्राप्त हुए।

दिसंबर 1664 ई. में शिवाजी ने सिंधुदुर्ग नामक मालवण के पास समुद्री किनारे पर एक किले की स्थापना की। इसके नाम से ही पता चल जाता है कि यह समुद्री किनारे पर था। पर यह शिवाजी के राष्ट्र और संस्कृति प्रेम को झलकाने वाला तथा उनकी दूरदृष्टि को स्पष्ट करने वाला निर्णय भी था। इससे उनकी नौसेना को एक सुरक्षा कवच उपलब्ध हो गया।

इधर के क्षेत्र में विस्तार लेते शिवाजी ने कर्नाटक के बसरूर क्षेत्र पर हमला कर उसे लूट कर लगभग आठ करोड़ रूपया प्राप्त किये। यद्यपि डच इतिहासकार इस लूट में केवल 30,000 रूपया प्राप्त होना ही लिखते हैं।

जयपुर का राजा जयसिंह शिवाजी के विरूद्घ रण क्षेत्र में उतर आया। वह औरंगजेब का कृपा पात्र था और इसलिए अपने आपको बादशाह की दृष्टि में और भी अधिक ऊंचा स्थापित करने के लिए शिवाजी को परास्त करने के उद्देश्य से दक्षिण की ओर बढ़ा। उसने शिवाजी के अधिकारियों को बड़ी राशि रिश्वत में देकर उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया। ‘हेफत अंजुमन’ में रखे पत्रों में जयसिंह और औरंगजेब के मध्य हुए तत्कालीन पत्राचार से इस तथ्य का पता हमें चलता है। जयसिंह  ने बड़ी भारी-भारी तोपों और विशाल सैन्यदल के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। पूना से सांसवड़ पहुंचने में जयसिंह को 15 दिन का समय लगा। 29 मार्च 1665 को युद्घ हुआ। मराठों ने पुरंदर की ओर बढ़ जाने का निर्णय लिया। जयसिंह के साथ दिलेर खां भी युद्घ में उपस्थित था, उसने किले के ऊपर स्थित कुछ झोंपडिय़ों में आग लगा दी। दिलेर की सहायता के लिए जयसिंह का पुत्र कीरतसिंह भी अपने तीन हजार सैनिकोंं के साथ युद्घ में विद्यमान था।

14 अप्रैल 1665 को जयसिंह ने रूद्रामल को अपने आधीन कर लिया। शिवाजी की ओर से नेताजी पालकर ने परेण्डा पर आक्रमण किया परंतु वह असफल रहा। मराठों ने 14 अप्रैल को पुरंदर के युद्घ में मुगल सेना से हार मान ली। जयसिंह ने भारी विनाश किया। पचास गांव जला डाले गये। अचल सिंह कछवाहा ने भी कई गांव नष्ट कर दिये। मुगलों की सेना जिधर भी जैसे भी बन पड़ा वैसे ही विनाश मचाने लगी।

मराठा अपने परंपरागत छापामार युद्घ पर उतर आये। वे भागे नही और अपने पूर्ण पराक्रम और साहस के साथ रात्रि में मुगल सेना पर आक्रमण करने लगे। मुगल सेना का रास्ता अवरूद्घ करने के लिए उन्होंने जंगलों में भी आग लगा दी, पर मुगल सेना का उत्साह भी देखने योग्य था, वह अभी उत्साहित थी और हर प्रकार से शत्रु को समाप्त कर देना चाहती थी। इस युद्घ में मराठा योद्घा मुरारबाज ने विशेष पराक्रम का प्रदर्शन किया था।

शिवाजी ने चेताया जयसिंह को

जयसिंह के अपने विरूद्घ अभियान पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए शिवाजी ने जयसिंह के लिए एक पत्र लिखा। जिसमें उसके भीतर देशभक्ति और धर्मभक्ति को जगाने का प्रयास किया गया था। प्रभाकर माचवे अपनी पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी’ में उस पत्र का अनुवाद करते हुए लिखते हैं :-‘‘हे राजाधिराज जयसिंह! आपके कारण राजपूतों की गर्दन ऊंची रही है। बाबर वंश की राजलक्ष्मी आपके कारण से प्रबल हुई है। जगज्जनक परमात्मा आपको धर्म और न्याय का मार्ग दिखायें। मैंने ऐसा सुना है कि आप मुझ पर हमला करके दखन जीतने में लाल मुंह के मुगलों को सफलता दिलाने की इच्छा कर रहे हों। पर आपके इस कार्य से आपके मुंह पर कालिख पुती है और देश और धर्म पर आपत्ति आ गयी है। यदि आप अपने बल पर दक्षिण दिग्विजय करने आ रहे हों तो यह सिर मैं आपके रास्ते में बिछाने के लिए तैयार हूं। बड़ी सेना लेकर मैं आपके साथ होकर सारा हिंदुस्तान जीतने में आपकी सहर्ष सहायता करूंगा। लेकिन सज्जनों को धोखा देने वाले औरंगजेब की मीठी बातों में आकर आप उनकी ओर से आये हैं। अब आपसे किस प्रकार का खेल खेला जाए, मैं नही जानता। आपसे मिल जाऊं तो मर्द जैसा व्यवहार नही। क्योंकि व्यक्ति को समय का मुख देखकर सेवा नही करनी चाहिए। तलवार लेकर लड़ाई के लिए आऊं तो दोनों ओर हिन्दू (शिवाजी का राष्ट्रवाद देखिए हिंदू शब्द प्रयोग कर रहे हैं, मराठा या राजपूत नही, हिंदुस्तान शब्द प्रयोग कर रहे हैं महाराष्ट्र या किसी क्षेत्र विशेष का नामोल्लेख नही) का ही नाश और क्षति होगी।

बड़े दुख की बात है कि विधर्मी शत्रुओं का रक्त पीने के अतिरिक्त और किसी भी काम के लिए (किसी हिंदू का रक्त पीने के लिए) मेरी तलवार म्यान से बाहर नही निकली। यदि इस लड़ाई के लिए कोई तुर्क आया होता तो हमें घर बैठे शिकार मिल जाता। अफजल खां और शाइस्ताखां से काम नही चला अत: अब आपको भेजा गया है, क्योंकि औरंगजेब स्वयं हमारा हमला नही सह पाएगा। उसकी ऐसी इच्छा है कि इस दुनिया में हिंदुओं की सेना में कोई बलशाली न रहे। सिंह परस्पर लडक़र घायल हो जाएं। हम लोगों से लडक़र हिंदुओं को धूल में मिलाने की आपकी  इच्छा नही होगी। यदि आपकी तलवार में पानी हो और घोड़े में दम हो तो हिंदुओं के शत्रु पर आक्रमण करो। यदि परमात्मा ने आपको बुद्घि प्रदान की है और आपको अपने पौरूष का प्रदर्शन करना ही है, तो अपनी मातृभूमि के क्रोध से अपनी शमशीर तृप्त करो और अत्याचारों से दुखी हुए लोगों को आंसुओं का पानी दो। यह समय हिंदुओं के परस्पर लडऩे का नही है क्योंकि उन पर कठिन आपत्ति आयी है। हमारे बाल-बच्चे देश, धर्म, देवालय सब पर आपत्ति आयी हुई है, ऐसा ही चलता रहा तो हमारा नामोनिशां इस जमीन पर नही रहेगा। शत्रु हमारे पैर हमारे ही पैरों में अटका रहे हैं। हमारी तलवार हमारे ही सिर पर चला रहे हैं। हमें इस समय तलवार चलाकर शत्रु को तुर्की-बतुर्की उत्तर देना चाहिए। देश के लिए खूब हाथ पैर चलाने होंगे। यदि आप मेवाड़ में राजसिंह से एका करके कपट छोड़ोगे तो बहुत बड़ा काम होगा। ऐसी आशा है। चारों ओर से हमला करके शत्रु का सिर सांप की भांति कुचल डालो। जिससे वह दखन में आकर अपना जाल न फैला सके। तब तक मैं भाला चलाने वाले वीरों को लेकर बीजापुर और गोलकुण्डा के दोनों बादशाहों को भगा देता हूं। दखन में इस सिरे से उस सिरे तक दुश्मन का नामोनिशान नही रहने दूंगा। दो दिल मिल जायें तो पथरीला पर्वत तोड़ सकते हैं और बड़े जमावड़े के ठीकरे किये जा सकते हैं। इसके विषय में मुझे आपसे बातचीत करनी है। वह खत में लिखनी ठीक नही है। आप चाहेंगे तो मैं आपसे मिलने आऊंगा। अपनी कार्यसिद्घि का रास्ता निकालिये और इहलोक में और परलोक में कीर्ति अर्जित कीजिए। तलवार, देश, घोड़ा और धर्म की कसम खाकर कहता हूं कि ऐसा करने से आप पर कभी कोई आपत्ति नही आएगी। अफजलखां के अंत से आप शंकित ना हो। क्योंकि उस जगह सचाई यही थी कि वह मुझे मारने के लिए 1200 हवश लाया था। यदि मैंने उस पर हाथ न चलाया होता तो यह पत्र तुम्हें कौन लिखता। मैं रात को आपसे मिलने आऊंगा। यदि यह पत्र आपको पसंद ना हो तो मैं और मेरी तलवार है, और आप की फौज है। कल सूर्यास्त से मेरी शमशीर म्यान से बाहर होगी।’’ एक ऐतिहासिक दस्तावेज है ये पत्र। शिवाजी की देशभक्ति आज भी देशविरोधी शक्तियों के प्रति देश के नेतृत्व को शिक्षा देती है, हमें आज भी देश को तोडऩे वाली शक्तियों से और शत्रु से हाथ मिलाने वाले लोगों से उसी प्रकार पेश आना होगा जैसे शिवाजी आया करते थे। शिवाजी हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के संदर्भ में हमारे नेतृत्व के लिए आज भी प्रेरक हैं।

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शिवाजी का पत्र-गद्दार मिर्जा राजा जयसिंह के नाम


शिवाजी का पत्र-गद्दार मिर्जा राजा जयसिंह के नाम

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भारतीय इतिहास में दो ऐसे पत्र मिलते हैं जिन्हें दो विख्यात महापुरुषों ने दो कुख्यात व्यक्तिओं को लिखे थे .इनमे पहिला पत्र “जफरनामा “कहलाता है .जिसे श्री गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब को भाई दया सिंह के हाथों भेजा था .यह दशम ग्रन्थ में शामिल है .इसमे कुल 130 पद हैं .दूसरा पत्र शिवाजी ने आमेर के राजा जयसिंह को भेजा था .जो उसे 3 मार्च 1665 को मिल गया था.इन दोनों पत्रों में यह समानताएं हैं की दोनों फारसी भाषा में शेर के रूप में लिखे गएहैं .दोनों की प्रष्ट भूमि और विषय एक जैसी है .दोनों में देश और धर्म के प्रति अटूट प्रेम प्रकट किया गया है .जफरनामा के बारे में अगली पोस्टों में लिखेंगे .
शिवाजी पत्र बरसों तक पटना साहेब के गुरुद्वारे के ग्रंथागार में रखा रहा ..बाद में उसे “बाबू जगन्नाथ रत्नाकर “ने सन 1909 अप्रेल में काशी में
काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित किया था.बाद में “अमर स्वामी सरस्वती ने उस पत्र का हिन्दी में पद्य और गद्य ने अनुवाद किया था.फिर सन 1985 में अमरज्योति प्रकाशन गाजियाबाद ने पुनः प्रकाशित किया था
राजा जयसिंह आमेर का राजा था ,वह उसी राजा मानसिंह का नाती था ,जिसने अपनी बहिन अकबर से ब्याही थी .जयसिंह सन 1627 में गद्दी पर बैठा था .और औरंगजेब का मित्र था.औरंगजेब ने उसे 4000 घुड सवारों का सेनापति बना कर “मिर्जा राजा “की पदवी दी थी .औरंगजेब पूरे भारत में इस्लामी राज्य फैलाना चाहता था.लेकिन शिवाजी के कारण वह सफल नही हो रहा था .औरंगजेब चालाक और मक्कार था .उसने पाहिले तो शिवाजी से से मित्रता करनी चाही .और दोस्ती के बदले शिवाजी से 23 किले मांगे .लेकिन शिवाजी उसका प्रस्ताव ठुकराते हुए 1664 में सूरत पर हमला कर दिया .और मुगलों की वह सारी संपत्ति लूट ली जो उनहोंने हिन्दुओं से लूटी थी
फिर औरंगजेब ने अपने मामा शाईश्ता खान को चालीस हजार की फ़ौज लेकर शिवाजी पर हमला करावा दिया .और शिवाजी ने पूना के लाल महल में उसकी उंगलियाँ काट दीं.और वह भाग गया
फिर औरंगजेब ने जयसिंह को कहा की वह शिवाजी को परास्त कर दे .जयसिंह खुद को राम का वंशज मानता था .उसने युद्ध में जीत हासिल करने के लिए एक सहस्त्र चंडी यग्य भी कराया .शिवाजी को इसकी खबर मिल गयी थी जब उन्हें पता चला की औरंगजेब हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाना चाहता है .जिस से दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे .तब शिवाजी ने जयसिंह को समझाने के लिए जो पत्र भेजा था ,उसके कुछ अंश हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है –
1 -जिगरबंद फर्जानाये रामचंद -ज़ि तो गर्दने राजापूतां बुलंद .
हे रामचंद्र के वंशज ,तुमसे तो क्ष त्रिओं की इज्जत उंची हो रही है .
2 -शुनीदम कि बर कस्दे मन आमदी -ब फ़तहे दयारे दकन आमदी .
सूना है तुम दखन कि तरफ हमले के लिए आ रहे हो
3 -न दानी मगर कि ईं सियाही शवद-कज ईं मुल्को दीं रा तबाही शवद ..
तुम क्या यह नही जानते कि इस से देश और धर्म बर्बाद हो जाएगा.
4 -बगर चारा साजम ब तेगोतबर -दो जानिब रसद हिंदुआं रा जरर.
अगर मैं अपनी तलवार का प्रयोग करूंगा तो दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे
5 -बि बायद कि बर दुश्मने दीं ज़नी-बुनी बेख इस्लाम रा बर कुनी .
उचित तो यह होता कि आप धर्म दे दुश्मन इस्लाम की जड़ उखाड़ देते
6 -बिदानी कि बर हिन्दुआने दीगर -न यामद चि अज दस्त आं कीनावर .
आपको पता नहीं कि इस कपटी ने हिन्सुओं पर क्या क्या अत्याचार किये है
7 -ज़ि पासे वफ़ा गर बिदानी सखुन -चि कर्दी ब शाहे जहां याद कुन
इस आदमी की वफादारी से क्या फ़ायदा .तुम्हें पता नही कि इसने बाप शाहजहाँ के साथ क्या किया
8 -मिरा ज़हद बायद फरावां नमूद -पये हिन्दियो हिंद दीने हिनूद
हमें मिल कर हिंद देश हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के लिए लड़ाना चाहिए
9 -ब शमशीरो तदबीर आबे दहम -ब तुर्की बतुर्की जवाबे दहम .
हमें अपनी तलवार और तदबीर से दुश्मन को जैसे को तैसा जवाब देना चाहिए
10 -तराज़ेम राहे सुए काम ख्वेश -फरोज़ेम दर दोजहाँ नाम ख्वेश
अगर आप मेरी सलाह मामेंगे तो आपका लोक परलोक नाम होगा .
इस पत्र से आप खुद अंदाजा कर सकते है .शिवाजी का देश और धर्म के साथ हिन्दुओ के प्रति कितना लगाव था .हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम उनके अनुयायी है .हमें उनके जीवन से सीखना चाहिए .तभी हम सच्चे देशभक्त बन सकते हैं

अपराधी को कितनी बार क्षमा कर सकते हैं?

देश में भारतीय मूल के कई धर्म प्रचलित हैं ,इनमे हिन्दू ,जैन ,बौद्ध और सिख धर्म मुख्य हैं .इनके अनुयायी अपने अपने धर्म पर गाढ श्रद्धा रखते हैं ,और अपने धर्म को मानते हैं.वैसे तो सभी अपने धर्म को मानते हैं ,परन्तु अधिकाँश अपने धर्म को ठीक से नहीं जानते .यही एक विडम्बना है.धर्म के बारे में विद्वानों ने कहा है कि “धर्मस्य त्वरितो गतिः “अर्थात धर्म की गति बड़ी तेज है.धर्म एक बहती हुई निर्मल जल की सरिता की तरह है.समाज को धर्म के साथ और धर्म को समाज के साथ चला चाहिए .नहीं तो धर्म के प्रवाह में गतिरोध हो जाएगा और कट्टरता आजायेगी .
भारत के सभी धर्मों में अहिंसा ,क्षमा,दया आदि अनेकों सद्गुणों को धर्म का अंग माना गया है.ल्र्किन लोग इन्हीं गुणों को हमारी कमजोरी समझकर हमें भीरु और निर्बल मानते है.हमारे जैन बंधुओं ने अहिंसा और क्षमा को पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया है ,यह जैन धर्म की विशेषता है.
भगवान महावीर का जन्म 599 ई पू हुआ था ,उनंके जन्म का नाम वर्धमान था .जैन ग्रंथों में उनका नाम महावीर होने के पीछे एक कथा है .जब वर्धमान लगभग 8 साल के थे तो वे अपने बाल मित्रो के साथ एक “तिन्दूसक “नामका खेल खेल रहे थे.इस खेल में बच्चे किसी भी वृक्ष को लक्ष्य करके उसकी तरफ दौड़ते थे ,जो बच्चा सबसे पहले उस पेड़ को पकड़ लेता था वही जीत जाता था .जब सारे बच्चे लौट रहे थे तो अचानक एक मायावी ने भयानक रूप धारण करके बच्चों को भयभीत करना प्रारंभ कर दिया .और वे डर से कांपने लगे .
उस समय बालक सिद्धार्थ ने उस दुष्ट के सर पर इतनी जोर से मुष्टिका प्रहार किया कि वह दुष्ट मायावी भूमि में धंस गया.
वर्धमान की यह वीरता देख कर इंद्र प्रसन्न हो गया .और बोला कि आज से आपका नाम “महावीर “होगा
अहिंसा वीरता का लक्षण है.-आवश्यक चूर्णी -भाग 1 पत्र 246
बाद में जब महावीर जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर बने तो उनके पहले 11 शिष्यों को गणधर कहा जाताहै प्रथम गणधर “गौतम “थे
भगवान महावीर ने अपने उपदेश में गौतम गणधर से इस तरह कहा –
“गोयमा ! उच्चं पासई उच्चं पणामम करेई नीयम पासेई नीयम पणामम करेई ,जं जहा पासति तस्स तहा पणामम करेई ”
हे गौतम उत्तम व्यक्तीं के साथ उत्तम व्यवहार करो और नीच लोगों के साथ उसी तारक का व्यवहार करो -भगवती सूत्र शतक 9 उद्देसा 6 सूत्र 383
क्षमा करना धर्म का लक्षण है परन्तु किसी दुष्ट को कितनी बार क्षमा करे यह समय के अनुसार निर्धारित होता रहा है ,जैसे जसी लोगों की सहनशीलता कम ,और दुष्ट बढ़तेगए क्षमा करने की संख्या कम होती गयी
1 -द्वापर युग में 100 अपराध माफ़ थे
महाभारत के अनुसार कृष्ण ने शिशुपाल की माँ को वचन दिया था कि मैं सिसुपाल के सौ अपराध माफ़ कर दूंगा .लेकिन जब शिसुपाल लगातार अपराध करता रहा और जैसे ही उसने सौ के बाद फिर अपराध किया ,कृष्ण ने उसका वध कर दिया
महाभारत -आदिपर्व अध्याय 100 श्लोक 20
2 -ईसा मसीह के समय 49 अपराध माफ़ थे
“पतरस ने पूछा कि हे प्रभु यदि कोई मेरा अपराध करता है तो मैं उसी कितनी बार माफ़ कर दूँ .क्या सात बार ?यीशु ने कहा नहीं .बल्कि सैट बार के सात गुने तक “बाइबिल नया नियम -मत्ती 18 21 और 22
3 -हज़रत अली के समय केवल 2 अपराध माफ़ थे
यही सवाल हज़रत अली से किसी ने पूछा कि या मौला हम अपने अपाधी को कितनी बार माफ़ कर सकते है .तो उन्हों ने कहा –
“सालिसुं हीलास्सैफ”यानी तीसरी बार तलवार से काम लो .नजहुल बलाग पेज 83 खुतबात
4 -गुरु गोविन्द सिंह जी के समय एक भी अपराध माफ़ नहीं
सिख इतिहास सब जानते हैं .गुरु गोविन्द जी ने धर्म के लिए अपने पिता और चार बच्चों के सहित कई महान वीरों को बलदान कर दिया था. वे जीवन भर अत्याचार और अन्याय से लड़ते रहे .आज हम उन्ही की बदौलत जीवित हैं .वरना देश में हिन्दू मिट गए होते .
गुरुजी ने सब उपाय कर लिए और देखा कि अत्याचारी अपना जुल्म कम नही कर रहे है .तो उन्हों ने अपने “जफरनामा “में यह लिखा.
“चूँ कार अज हमां हीलते दर गुजश्त ,हलालास्त बुर्दन बशमशीर दस्त ”
अर्थात हमने हर तरह से नरमी की नीति अपना कर देख ली .अब तलवार उठाना ही एक मात्र उपाय है .जफ़र नामा छंद 46
गुरुजी ने यह भी कहा कि
“चुन शेरे जिया ज़िंदा मानद हमे,जि इन्ताकामे सीतानद हमे .
यानी जब तक यह शेर वीर ज़िंदा रहेंगे ,हमेशा बदला लेते रहेंगे
इसी को पजाबी कवी ईसर सिंह इसर ने इस तरह लिखा है
“नहला उथ्थे दहला मार बदला चुका देंदे ,रखदा न किसीदा उधार तेरा खालसा .
सारा बकरा खा जांदा एक पलापल विच ,मारदा न एक भी डकार तेरा खालसा .
आज समय है कि गुरु गोविन्द सिंह जी की नीति का पालन किया जाये .तभी देश का कल्याण हो सकेगा
अंत में मेरा सभी मित्रों से निवेदन है कि वे यथा सम्बभ्व अभद्र भाषा का प्रयोग न करें .और न बेनामी कमेन्ट करें .
जब मैं सटीक उत्तर दे सकता हूँ तो आप बेकार ऎसी भाषा क्यों प्रयोग करें .आप खुद देख लेंगे कि ऐसे सब फर्जी लोगों का कैसे मुंह बंद किया जाता है .आप संयम रखें और धीरज के साथ अगली पोस्टें देखते रहिये

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गुरु गोविन्द सिंह जी का “ज़फरनामा “


गुरु गोविन्द सिंह जी का “ज़फरनामा “

 

भारत अनादि काल से हिन्दू देश रहा है. इस देश में जितने भी धर्म, संप्रदाय और मत उत्पन्न हुए हैं, उन सभी के अनुयायी, इस देश के वास्तविक उतराधिकारी हैं. लेकिन जब भारत पर इस्लामी हमलावरों का शासन हुआ तो उन्होंने हिन्दू धर्म और हिन्दुओं को मिटाने के लिए हर तरह के यत्न किये. आज जो हिन्दू बचे हैं, उसके लिए हमें उन महापुरुषों का आभार मानना चाहिए जिन्होंने अपने त्याग और बलिदान से देश और हिन्दू धर्म को बचाया था.

 

इनमे गुरु गोविन्द सिंह का बलिदान सर्वोपरि और अद्वितीय है. क्योंकि गुरूजी ने धर्म के लिए अपने पिता गुरु तेगबहादुर और अपने चार पुत्र अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतह सिंह को बलिदान कर दिया था. बड़े दो पुत्र तो चमकौर के युद्ध में शहीद हो गएथे. और दो छोटे पुत्र जोरावर सिंह (आयु 8) साल और फतह सिंह (आयु 5) साल जब अपनी दादी के साथ सिरसा नदी पार कर रहे तो अपने लोगों से बिछड़ गए थे. जिनको मुसलमान सूबेदार वजीर खान ने ठन्डे बुर्ज में सरहिंद में कैद कर लिया था. वजीर खान ने पहिले तो बच्चों को इस्लाम काबुल करने के लिए लालच दिया. जब बच्चे नहीं माने तो मौत की धमकी भी दी.

 

लेकिन बच्चों ने कहा कि हमारे दादा जी ने धर्मकि रक्षा के लिए दिल्ली में अपना सर कटवा लिया था. हम मुसलमान कैसे बन सकते हैं? हम तेरे इस्लाम पार थूकते हैं. (गुरु तेगबहादुर ने 16 नवम्बर 1675 को हिन्दू धर्म कि रक्षा के लिए अपना सर कटवा लिया था) बच्चों का जवाब सुनकर वजीर खान आग बबूला हो गया. उसने दौनों बच्चों को एक दीवाल में जिन्दा चिनवानेका आदेश दे दिया. और उन्हें शहीद कर दिया.यह सन 1705 की बात है. उस समय देश पर औरंगजेब की हुकूमत थी. वह इस्लाम का जीवित स्वरूप था. मुसलमान उसे अपना आदर्श मानते है.

 

यदि कोई औरंगजेब की नीतियों और उसके चरित्र को समझ ले तो उसे कुरान और शरीयत को समझने की कोई जरुरत नहीं होगी. आज भी मुसलमान उसका अनुसरण करते है. जब गुरूजी को बच्चों के दीवाल में चिनवाए जाने की खबर मिली तो वह हताश नहीं हुए. गुरुजी चाहते थे कि लोग अपनी कायरता को त्याग करके निर्भय होकर अत्याचारी मुगलों का मुकाबला करें. तभीधर्म कि रक्षा हो सकेगी.

 

इसके लिए गुरूजी ने अस्त्र -शस्त्र की उपासना कीरीति चलाई. — “वाह गुरूजी का भयो खालसा सु नीको. वाह गुरुजी मिल फ़तेह जो बुलाई है. धरम स्थापने को, पापियों को खपाने को, गुरु जपने की नयी रीति यों चलाई है .” गुरु गोविन्द सिंह जी ने लोगों को सशस्त्र रहने का उपदेश दिया. अस्त्र शस्त्र को धर्म का प्रमुख अंग बताया, ताकि लोगों के भीतर से भय निकल जाये. गुरूजी ने कहा कि-

 

 “नमो शस्त्र पाणे, नमो अस्त्र माणे. नमोपरम ज्ञाता, नमो लोकमाता. गरब गंजन, सरब भंजन, नमो जुद्ध जुद्ध, नमो कलह कर्ता. नमो नित नारायणे क्रूर कर्ता. – जाप साहब

 

फिर गुरूजी ने यह भी कहा – “चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, सवा लाख से एक भिडाऊं. तबही नाम गोविन्द धराऊँ “. गुरुजी ने अपने इस में आने का यह कारण खुद ही बता दिया था. “ इस कारण प्रभु मोहि पठाओ, तब मैं जगत जमम धर आयो. धरम चलावन संत उबारन, दुष्ट दोखियन पकर पछारन”.

 

गुरु गोविन्द सिंह जी एक महान योद्धा होने के साथ साथ महान विद्वान् भी थे. वह ब्रज भाषा, पंजाबी, संस्कृत और फारसीभी जानते थे. और इन सभी भाषाओँ में कविता भी लिख सकते थे. जब औरंगजेब के अत्याचार सीमा से बढ़ गए तो गुरूजी ने मार्च 1705 को एक पत्र भाई दयाल सिंह के हाथों औरंगजेब को भेजा. इसमे उसे सुधरने की नसीहत दी गयी थी. यह पत्र फारसी भाषा के छंद शेरों के रूप में लिखा गया है. इसमे कुल 134 शेर हैं. इस पत्र को “ज़फरनामा “कहा जाता है. यद्यपि यह .पत्र औरंगजेब के लिए था. लेकिन इसमे जो उपदेश दिए गए है वह आज हमारे लिए अत्यंत उपयोगी हैं . इसमे औरंगजेब के आलावा इस्लाम, कुरान, और मुसलमानों के बारे में जो लिखा गया है, वह हमारी आँखें खोलने के लिए काफी हैं. इसीलिए ज़फरनामा को धार्मिक ग्रन्थ के रूप में स्वीकार करते हुए दशम ग्रन्थ में शामिल किया गया है. जफरनामा से विषयानुसार कुछ अंश प्रस्तुत किये जा रहे हैं. ताकि लोगों को इस्लाम की हकीकत पता चल सके —

 

1 – शस्त्रधारी ईश्वर की वंदना – बनामे खुदावंद तेगो तबर, खुदावंद तीरोंसिनानो सिपर. खुदावंद मर्दाने जंग आजमा, ख़ुदावंदे अस्पाने पा दर हवा. उस ईश्वर की वंदना करता हूँ, जो तलवार, छुरा, बाण, बरछा और ढाल का स्वामी है. और जो युद्ध में प्रवीण वीर पुरुषों का स्वामी है. जिनके पास पवन वेग से दौड़नेवाले घोड़े हैं.

 

2 – औरंगजेब के कुकर्म – तो खाके पिदर रा बकिरादारे जिश्त, खूने बिरादर बिदादी सिरिश्त. वजा खानए खाम करदी बिना, बराए दरे दौलतेखेश रा. तूने अपने बाप की मिट्टी को अपने भाइयों के खून से गूँधा, और उस खून से सनी मिटटी से अपने राज्य की नींव रखी. और अपना आलीशान महल तैयार किया.

 

3 – अल्लाह के नाम पर छल – न दीगर गिरायम बनामे खुदात, कि दीदम …खुदाओ व् कलामे खुदात. ब सौगंदे तो एतबारे न मांद, मिरा जुज ब शमशीर कारे न मांद. तेरे खुदा के नाम पर मैं धोखा नहीं खाऊंगा, क्योंकि तेरा खुदा और उसका कलाम झूठे हैं. मुझे उनपर यकीन नहीं है .इसलिए सिवा तलवार के प्रयोग से कोई उपाय नहीं रहा.

 

4 – छोटे बच्चों की हत्या – चि शुद शिगाले ब मकरो रिया, हमीं कुश्त दो बच्चये शेर रा. चिहा शुद कि चूँ बच्च गां कुश्त चार, कि बाकी बिमादंद पेचीदा मार. यदि सियार शेर के बच्चों को अकेला पाकर धोखे से मार डाले तो क्या हुआ. अभी बदला लेने वाला उसका पिता कुंडली मारे विषधरकी तरह बाकी है. जो तुझ से पूरा बदला चुका लेगा

 

5 – मुसलमानों पर विश्वास नहीं – मरा एतबारे बरीं हल्फ नेस्त, कि एजद गवाहस्तो यजदां यकेस्त. न कतरा मरा एतबारे बरूस्त, कि बख्शी ओ दीवां हम कज्ब गोस्त. कसे कोले कुरआं कुनद ऐतबार, हमा रोजे आखिर शवद खारो जार. अगर सद ब कुरआं बिखुर्दी कसम, मारा एतबारे न यक जर्रे दम. मुझे इस बात पर यकीन नहीं कि तेरा खुदा एक है. तेरी किताब (कुरान) और उसका लाने वाला सभी झूठे हैं. जो भी कुरान पर विश्वास करेगा, वह आखिर में दुखी और अपमानित होगा. अगर कोई कुरान कि सौ बार भी कसम खाए, तो उस पर यकीन नहीं करना चाहिए.

 

6 – दुष्टों का अंजाम – कुजा शाह इस्कंदर ओ शेरशाह, कि यक हम न मांदस्त जिन्दा बजाह. कुजा शाह तैमूर ओ बाबर कुजास्त, हुमायूं कुजस्त शाह अकबर कुजास्त. सिकंदर कहाँ है, और शेरशाह कहाँ है, सब जिन्दा नहीं रहे. कोई भी अमर नहीं हैं, तैमूर, बाबर, हुमायूँ और अकबर कहाँ गए. सब का एकसा अंजाम हुआ.

 

7 – गुरूजी की प्रतिज्ञा – कि हरगिज अजां चार दीवार शूम, निशानी न मानद बरीं पाक बूम. चूं शेरे जियां जिन्दा मानद हमें, जी तोइन्ताकामे सीतानद हमें. चूँ कार अज हमां हीलते दर गुजश्त, हलालस्त बुर्दन ब शमशीर दस्त. हम तेरे शासन की दीवारों की नींव इस पवित्र देश से उखाड़ देंगे. मेरे शेर जबतक जिन्दा रहेंगे, बदला लेते रहेंगे. जबहरेक उपाय निष्फल हो जाएँ तो हाथों में तलवार उठाना ही धर्म है.

 

8 – ईश्वर सत्य के साथ है – इके यार बाशद चि दुश्मन कुनद, अगर दुश्मनी रा बसद तन कुनद. उदू दुश्मनी गर हजार आवरद, न यक मूए ऊरा न जरा आवरद. यदि ईश्वर मित्र हो, तो दुश्मन क्या क़रसकेगा, चाहे वह सौ शरीर धारण क़र ले. यदिहजारों शत्रु हों, तो भी वह बल बांका नहीं क़र सकते है. सदा ही धर्म की विजय होती है.

 

गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी इसी प्रकार की ओजस्वी वाणियों से लोगों को इतना निर्भय और महान योद्धा बना दिया कि अज भी मुसलमान सिखों से उलझाने से कतराते हैं. वह जानते हैं कि सिख अपना बदला लिए बिना नहीं रह सकते . इसलिए उनसे दूर ही रहो. पंजाबी कवि भाई ईसर सिंह ईसर ने खालसा के बारे में लिखा है –

 

 “ नहला उत्ते दहला मार बदला चुका देंदा, रखदा न किसीदा उधार तेरा खालसा, रखदा कुनैन दियां गोलियां वी उन्हां लयी, चाह्ड़े जिन्नू तीजेदा बुखार तेराखालसा. पूरा पूरा बकरा रगड़ जांदा पलो पल, मारदा न इक भी डकार तेरा खालसा.” 

 

इसी तरह एक जगह कृपाण की प्रसंशा में लिखा है – “हुन्दी रही किरपान दी पूजा तेरे दरबारविच, तूं आप ही विकिया होसियाँ सी प्रेमदे बाजार विच. गुजरी तेरी सारी उमर तलवार दे व्योपार विच, तूं आपही पैदा होईऊं तलवार दी टुनकार विच. तूं मस्त है, बेख़ौफ़ है इक नाम दी मस्ती दे नाल, सिक्खां दी हस्ती कायम हैतलवार दी हस्ती दे नाल. लक्खां जवानियाँ वार के फिर इह जवानी लाई है, जौहर दिखाके तेग दे, तेगे नूरानी लाई है. तलवार जे वाही असां पत्त्थर चों पानी काढिया, इक इक ने सौ सौ वीरां नूं वांग गाजर वाड्धीया.” 

 

इस लेख का एकमात्र उद्देश्य है कि आप लोग गुरु गोविन्द साहिब कि वाणी को आदर पूर्वक पढ़ें, और श्री गुरु तेगबहादुर और गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों के महान बलिदानों को हमेशा स्मरण रखें. और उनको अपना आदर्श मनाकर देश धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाएँ. वर्ना यह सेकुलर और मुस्लिम जिहादी एक दिन हिन्दुओं को विलुप्त प्राणी बनाकर मानेंगे…

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ગુજરાતી સાહિત્યકારો અને તેના ઉપનામો:


ગુજરાતી સાહિત્યકારો અને તેના ઉપનામો:

 

મુશાળીમા

ગિજુભાઈ બધેકા

વાસુકિ 

ઉમાશંકર જોશી

મરીઝ

અબ્બાસ અબ્દુલઅલી વાસી

અઝીઝ

ધનશંકર ત્રિપાઠી

સવ્યસાચી

ધીરુભાઈ ઠાકર

સુન્દરમ્

ત્રિભુવનદાસ લુહાર

સ્નેહરશ્મિ

ઝીણાભાઈ રતનજી દેસાઈ

માયડીયર જયુ

જયંતિલાલ રતિલાલ ગોહિલ

મધુરાય

મધુસુદન વલ્લભભાઈ ઠક્કર

અદલ,મોટાલાલ

અરદેશર ખબરદાર

અવળવાણીયા

જ્યોતિન્દ્ર દવે  

અશક્ય,નામુમકિન

પ્રીતિસેન ગુપ્તા

ચાંદામામા

ચંદ્રવદન મહેતા

અખાભગત

વેણીભાઈ પુરોહિત

આદિલ મન્સૂરી

ફકીર મુહમ્મદ ગુલામનબી મન્સૂરી

કથક

ગુલામદાસ બ્રોકર

કાઠીયાવાડી વિદુર

કે.કે.શાસ્ત્રી

ઈવા ડેવ

પ્રફુલ્લ દવે

તથાના

રાધેશ્યામ શર્મા

ચિત્રગુપ્ત

બંસીધર શુક્લ

શૂન્ય પાલનપુરી

અલીખાન બલુચ

નારકર

જગદીશભાઈ રમણભાઈ પટેલ

દિવાકર

હરિશંકર દવે

મરીઝ

અબ્બાસ અબ્દુલઅલી વાસી

બુલબુલ

ડાહ્યાભાઈ દેરાસરી

મહારાજ

રવિશંકર વ્યાસ

પ્રિયદર્શી

મધુસુદન પારેખ

વનમાળી વાંકો

દેવેન્દ્ર ઓઝા

વનમાળી

કેશવહર્ષદ ધ્રુવ

ભગીરથ

ભગવતીકુમાર શર્મા

બાદરાયણ

ભાનુશંકર વ્યાસ

મધુકર

વિશ્વનાથ મગલાલ ભટ્ટ

મૂષિકાર

રસિકલાલ પરીખ

મકરંદ

રમણભાઈ નીલકંઠ

નિરાલા

સૂર્યકાન્ત ત્રિપાઠી

પરમહંસ

સચ્ચિદાનંદ સ્વામી

ધૂનીરામ

ગૌરીશંકર પ્રભાશંકર ત્રિવેદી

સૌજન્ય

પીતાંબર પટેલ

યયાતિ 

જયેન્દ્ર દવે

સોપાન

મોહનલાલ મહેતા

શેખાદમ

શેખ આદમુલ્લા આબુવાલા

અકીંશન

ધનવંત ઓઝા

મિસ્કીન

રાજેશ વ્યાસ

સુંદરી

જયશંકર ભૂધરદાસ ભોજક

સાહિત્ય કવિ

ચૂનીલાલ શાહ

પ્રેમસખી

પ્રમાંનદ સ્વામી

સાહિત્યયાત્રી

ઝવેરચંદ મેધાણી

સવ્યચાસી

ધીરુભાઈ ઠાકર

શૂન્યમ

હમુખભાઈ પટેલ

લલિત

જમનાશંકર બૂચ

શંકર

ઈચ્છારામ દેસાઈ

જ્ઞાનબાલ  

નરસિંહરાવ દિવેટિયા

વૈશંમપાય

કરસનદાસ માણેક

મનહર

મનહરલાલ લક્ષ્મીશંકર રાવળ

મસ્તફકીર

હરિપ્રસાદ ભટ્ટ

પૂ.મોટા

ચુનીલાલ આશારામ ભગત

લોકાયતસૂરી

રધુવીર ચૌધરી

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हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार और उसकी वैज्ञानिकता


हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार और उसकी वैज्ञानिकता

http://reasontark.blogspot.com/2016/08/hindu-dharm-ke-solah-sanskar-aur-unki-vaigyanikta.html

हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार और उसकी वैज्ञानिकता

सोलह संस्कार क्यों बनाए गए?

Hindu Dharm ke Solah sanskar

हमारे पूर्वजों ने हर काम बहुत सोच समझकर किया है। जैसे जीवन के चार आश्रम मेंविभाजन, समाज का चार वर्णों में वर्गीकरण और सोलह संस्कार को अनिवार्य किया जाना।दरअसल, हमारे यहां पर परंपरा बनाने के पीछे कोई गहरी सोच छुपी है। सोलह संस्कार बनानेके पीछे भी हमारे पूर्वजों की गहरी सोच थी. प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन कीपरंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारोंका निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

संस्कार का अर्थ क्या है ?

इन सोलह संस्कार को जानने से पहले संस्कार के पर्यायवाची शब्दों  को जानना बहुत ही आवश्यक है , क्योकि यहाँ पर संस्कार शब्द का अर्थ अपने  आप में बहुत सारे अर्थो को छुपाये हुए है यानि इसका अर्थ व्यापक है , जो निम्न है :-

ठीक करना, दुरुस्ती, सुधार, दोष, त्रुटि का निकाला जाना, शुद्धि, सजाना, धो माँजकर साफकरना, परिष्कार, बदन की सफाई, शौच, मनोवृत्ति, स्वभाव का शोधन, मानसिक शिक्षामन मेंअच्छी बातों का जमाना, दिल पर जमा हुआ असर, पवित्र करना, धर्म की दृष्टि से शुद्ध करना,संस्कृति, संवर्धन, तहज़ीब, शिष्टता, रिवाज़, धार्मिक कृत्य, रस्म संबंधी, क्रियापद्धति, उपचार।

संदर्भ :-http://www.maxgyan.com/hindi/synonyms/sanskaar#sthash.H4xNRDyO.dpuf

सोलह संस्कार व्यक्ति को राष्ट्र, समाज और व्यक्तिगत जिम्मेदारी में निपुण या कार्यकुशल बनाती है।  जिसे हम आज की साधारण भाषा में प्रशिक्षित कह सकते है। संस्कार हमारेधार्मिक और सामाजिक जीवन की पहचान होते हैं। यह न केवल हमें समाज और राष्ट्र केअनुरूप चलना सिखाते हैं बल्कि हमारे जीवन की दिशा भी तय करते हैं।

भारतीय संस्कृति में मनुष्य को राष्ट्र, समाज और जनजीवन के प्रति जिम्मेदार और कार्यकुशलबनाने के लिए जो नियम तय किए गए हैं उन्हें संस्कार कहा गया है। इन्हीं संस्कारों से गुणों मेंवृद्धि होती है। हिंदू संस्कृति में प्रमुख रूप से 16 संस्कार माने गए हैं जो गर्भाधान से शुरूहोकर अंत्येष्टी पर खत्म होते हैं। व्यक्ति पर प्रभाव संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावितहोता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चरण आदि होता हैउसका वैज्ञानिक महत्व साबित किया जा चुका है।

कुछ जगह ४८ (48) संस्कार भी बताए गए हैं। महर्षि अंगिरा ने २५ (25) संस्कारों का उल्लेखकिया है। वर्तमान में महर्षि वेद व्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार १६ (16) संस्कार प्रचलित हैं।विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रममें गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म,कर्णवेध, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।

मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये अपने अथक प्रयासों और शोधों केबल पर ये संस्कार स्थापित किये हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण भारतीय संस्कृति अद्वितीय है।हालांकि हाल के कुछ वर्षो में आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण धर्मावलम्बीअब इन मूल्यों को भुलाने लगे हैं और इसके परिणाम भी चारित्रिक गिरावट, असामाजिकता याअनुशासनहीनता के रूप में हमारे सामने आने लगे हैं।

आज के समय में काफी अधिक ऐसे लोग हैं जो इन संस्कारों के विषय में जानते नहीं हैं। तोआइए जानते हैं कि जीवन में इन सोलह संस्कारों को अनिवार्य बनाए जाने का क्या कारण था?

  1. गर्भाधान संस्कार – Garbhdharan Sanskar :  –यह ऐसा संस्कार है जिससे योग्य,गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भधारण किस प्रकार करें? इसका विवरण दिया गया है। हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छारखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था। शास्त्रों के अनुसार गर्भाधान संस्कार को अति महत्वपूर्ण माना गया है, क्योकि न केवल अपने कुल अपितु यह पूरे समाज व राष्ट्र के लिए भविष्य का निर्माण करने में सहायक है दम्पत्ति को अपना दायित्व बहुत साबधानी पूर्ण करना चाहिये .  इस संस्कार में माता-पिता का तन व मन पूर्ण रूप से स्वस्थ व शुद्ध होना, शुभ समय,उचित स्थान, स्वस्थ आहार-विहार आवश्यक है।

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  1. पुंसवन संस्कार – Punsvan Sanskar : गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार,व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय ।हिन्दू धर्म में,संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक,मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प केसाथ ही संतान पैदा करने की पहल करें । उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित कियाजाता है। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इससमय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है ।
  1. सीमन्तोन्नयन संस्कार – Simantonnyan Sanskar :सीमन्तोन्नयन संस्कार हिन्दू धर्मसंस्कारों में तृतीय संस्कार है | यह संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है | इसका शाब्दिक अर्थ है- “सीमन्त” अर्थात् ‘केश और उन्नयन’ अर्थात् ‘ऊपर उठाना’ | संस्कार विधि के समय पति अपनीपत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम’सीमंतोन्नयन’ पड़ गया | यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है | इससंस्कार का फल भी गर्भ की शुद्धि ही है | इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल होजाता है | उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए माँ उसी प्रकार आचार-विचार,रहन-सहन और व्यवहार करती है | महाभक्त प्रह्लाद को देवर्षि नारद का उपदेश तथाअभिमन्यु को चक्रव्यूह प्रवेश का उपदेश इसी समय में मिला था | अतः माता-पिता को चाहिएकि वे इन दिनों विशेष सावधानी के साथ योग्य आचरण करें |

सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं |

सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना | गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशुएवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है | इस संस्कार के माध्यमसे गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं |

सनातन धर्म में स्त्रियों को शिक्षित होना अनिवार्य है इसी समय गर्भिणी को वेद एवं शास्त्रों काअध्ययन कराया जाता है | जब गर्भिणी शिक्षित, मानसिक बल एवं सकारात्मक विचारों  से युक्तहोगी तभी शिशु भी शक्तिशाली व् विद्वान होगा क्योंकि शिशु का लगभग 90 % बौद्धिकविकास गर्भ में हो जाता है |

इसमें कोई संदेह नहीं की गर्भस्थशिशु बहुत ही संवेदनशील होता है | सती मदालसा के बारे मेंकहा जाता है की वह अपने बच्चे के गुण, कर्म और स्वभाव की पूर्व घोषणा कर देती थी, फिरउसी प्रकार निरंतर चिंतन, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आहार-विहार और बर्ताव अपनाती थी,जिससे बच्चा उसी मनोभूमि ढल जाता है, जैसा कि वह चाहती थी |


उदाहरण :-

(क) भक्त प्रह्लाद की माता कयाधू को देवर्षि नारद भगवदभक्ति के उपदेश दिया करते थे, जोप्रहलाद ने गर्भ में ही सुने थे |

(ख) व्यासपुत्र शुकदेव ने अपनी माँ के गर्भ में सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था |

(ग) अर्जुन ने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूहभेदन की जो शिक्षा दी थी, वह सबगर्भस्थशिशु अभिमन्यु सीख ली थी | उसी शिक्षा के आधार पर सोलह वर्ष की आयु में हीअभिमन्यु ने अकेले सात महारथियों से युद्ध कर चक्रव्यूह-भेदन किया |

अलग अलग जगह इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है  जैसे छत्तीसगढ़ में इसे ” सधौरीखवाना ” कहते है।

  1. जातकर्म – Jatkarm Sanskar : जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नालकाटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क मेंआनेवाले बालक को मेधाoh, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र केउच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित करचटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करताहै। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है। ( यह स्तनपान विज्ञान  के अनुसार जन्म होने के आधे घंटे  अन्तर्गत कराये जाने वाला स्तनपान है, जिसको हिन्दू धर्म में हजारो वर्ष पहले से बताया जा चूका है। )
  1. नामकरण संस्कार – Namkaran Sanskar : कई जगह इसे “छठ्ठी” के नाम से जानाजाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य को जिस तरह के नाम से पुकारा जाता है,उसे उसी प्रकार की छोटी सी अनुभूति होती रहती है | यदि किसी को कूड़ेमल, घूरेमल,नकछिद्दा, नत्थो, घसीटा आदि नामों से पुकारा जायेगा, तो उसमें हीनता के भाव ही जाएगी |नाम सार्थक बनाने की कई हलकी, अभिलाषाएँ मन में जगती रहती है | पुकारने वाले भी किसीके नाम के अनुरूप उसके व्यक्तित्व की हल्की या भारी कल्पना करते हैं | इसलिए नाम काअपना महत्त्व है | उसे सुन्दर ही चुना और रखा जाए |

बालक का नाम रखते समय निम्न बातों का ध्यान रखें | गुणवाचक नाम रखे जाएँ, पुत्र एवं पुत्रीके नामों की एक बड़ी सूची बनाई जा सकती है | उसी में से छाँटकर लड़के और लड़कियों केउत्साहवर्धक, सौम्य एवं प्रेरणाप्रद नाम रखने चाहिए | समय-समय पर बालकों को यह बोध भीकराते रहना चाहिए कि उनका यह नाम है, इसलिए गुण भी अपने में वैसे ही पैदा करने चाहिए|

नक्षत्र या राशियों के अनुसार नाम रखने से लाभ यह है कि इससे जन्मकुंडली बनाने में आसानीरहती है | नाम भी बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रखना चाहिये | अशुभ तथा भद्दा नाम कदापि नहींरखना चाहिये |

शिशु कन्या है या पुत्र, इसके भेदभाव को स्थान नहीं देना चाहिए । भारतीय संस्कृति में कहीं भीइस प्रकार का भेद नहीं है । शीलवती कन्या को दस पुत्रों के बराबर कहा गया है । ‘दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता ।’ इसके विपरीत पुत्र भी कुल धर्म को नष्ट करने वाला होसकता है । ‘जिमि कपूत के ऊपजे कुल सद्धर्म नसाहिं ।’

आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है । उस दिन जन्म सूतिका कानिवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है । यह प्रसूति कार्य घर में ही हुआ हो, तो उस कक्ष कोलीप-पोतकर, धोकर स्वच्छ करना चाहिए । शिशु तथा माता को भी स्नान कराके नये स्वच्छवस्त्र पहनाये जाते हैं । यदि दसवें दिन किसी कारण नामकरण संस्कार न किया जा सके । तोअन्य किसी दिन, बाद में भी उसे सम्पन्न करा लेना चाहिए । घर पर, प्रज्ञा संस्थानों अथवा यज्ञस्थलों पर भी यह संस्कार कराया जाना उचित है ।

कई कर्मकांडी का  मानना है कि जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्योने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने काविधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कारको शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।

नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभावइसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यहकहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरणसंस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखातैयार करता है।

  1. निष्क्रमण् – Nishkraman Sanskar : निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इससंस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेजतथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछेमनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण कियाजाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु काशरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय:तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरीवातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज केसम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।
  1. अन्नप्राशन संस्कार – Annaprashan Sanskar : सनातन धर्म संस्कारों में अन्नप्राशनसंस्कार सप्तम संस्कार है | इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है | अब तक तोशिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त होता था, अब आगे स्वयं अन्न ग्रहण करके हीशरीर को पुष्ट करना होगा, क्योंकि प्राकृतिक नियम सबके लिये यही है | अब बालक कोपरावलम्बी न रहकर धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनना पड़ेगा | केवल यही नहीं, आगे चलकर अपनातथा अपने परिवार के सदस्यों के भी भरण-पोषण का दायित्व संम्भालना होगा | यही इससंस्कार का तात्पर्य है |

हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास मेंशुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु केअन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समानउत्तम माना गया है।

शास्त्रों में अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है | गीता में कहा गया है कि अन्न से ही प्राणीजीवित रहते हैं | अन्न से ही मन बनता है | इसलिए अन्न का जीवन में सर्वाधिक महत्तव है |

बच्चों को सफेद चीनी व् तामसिक भोजन नहीं खिलानी चहिए क्योंकि यह स्वास्थ के लिए हानिकारक है | यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6 – 7 महीने की उम्र में कियाजाता है

अलग अलग जगह इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है , जैसे छत्तीसगढ़ में इसे ” मुँह जुठारना ” कहते है।

8 मुंडन/चूड़ाकर्म संस्कार – Mundan/ Chudakarm Sanskar : चूड़ाकर्म को मुंडनसंस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इससंस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास कीपरिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समयउत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने केकारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होताहै। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिकमंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है। यह समारोह इसलिए महत्त्वपूर्ण है किमस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा पर इस सयम विशेष विचार किया जाता है और वह कार्यक्रमशिशु पोषण में सम्मिलित किया जाता है, जिससे उसका मानसिक विकास व्यवस्थित रूप सेआरम्भ हो जाए

  1. कर्णवेध संस्कार – Karnvedh Sanskar : इसका अर्थ है – कान छेदना। परंपरा में कानऔर नाक छेदे जाते थे। इसके दो कारण हैं, एक – आभूषण पहनने के लिए। दूसरा कान छेदनेसे एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है।हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है।कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि ( बीमारी )सेरक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कानहमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां ( बीमारी ) दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़तीहै। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है। यज्ञोपवीत के पूर्वइस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इससंस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।

10.विद्यारंभ संस्कार – Vidyarambh Sanskar : विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षाके प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तोबालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथागुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दियाकरते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है साविद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य कीआत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

11.यज्ञोपवीत/उपनयन संस्कार – Yagyopavit/ Upnayan Sanskar : यज्ञोपवीत (संस्कृतसंधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) उप यानी पास और नयन यानी ले जाना, गुरू के पास ले जाने काअर्थ है – उपनयन संस्कार। उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है । मुंडन और पवित्रजल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारीव्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है।

यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। इसमें सातग्रन्थियां लगायी जाती हैं । ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इसयज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णुऔर महेश के प्रतीक होते हैं। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।

हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधानदिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिकशक्तिशाली मंत्र है।

इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिकमहत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र मेंयज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुलजाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रममें आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिकविकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

  1. वेदारम्भ संस्कार – Vedarambh Sanskar : इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञानदिया जाता है। ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भके माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इससंस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है किप्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बादबालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पासगुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालनकरने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद हीवेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे।हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

13.केशान्त संस्कार – Keshant Sanskar : केशांत संस्कार का अर्थ है – केश यानी बालोंका अंत करना, गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्नकिया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने काउपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तनसंस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दीजाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

14.समावर्तन संस्कार – Samavartan Sanskar : समावर्तन संस्कार का अर्थ है – फिर सेलौटना। आश्रम में शिक्षा प्राप्ति के बाद ब्रहमचारी को फिर सांसारिक जीवन में लाने के लिएयह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रहमचारी मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षोंके लिए तैयार है।

गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्वब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नानसमावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुएवेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेषमन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसेयज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधिआचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाताथा। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण करअपने घर के लिये विदा होता था।

15.विवाह संस्कार – Vivah Sanskar : प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यहसर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन काहमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करनेकी क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभगपच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।

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हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर,गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनकास्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समयउच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाहसंस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आजउन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। विवाह के द्वारा सृष्टिके विकास में योगदान दिया जाता है। इसी से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है।

सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ीबनाने का भी कार्य करते हैं । वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों केसाधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं । ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है । युगनिर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगीसिद्ध हुए हैं ।

  1. अन्त्येष्टि संस्कार/श्राद्ध संस्कार – Antyeshti/ Shraddha Sanskar : हिंदूओं में किसीकी मृत्यु हो जाने पर उसके मृत शरीर को वेदोक्त रीति से चिता में जलाने की प्रक्रिया कोअन्त्येष्टि क्रिया अथवा अन्त्येष्टि संस्कार कहा जाता है। यह हिंदू मान्यता के अनुसार सोलहसंस्कारों में से एक संस्कार है।

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श्राद्ध, हिन्दूधर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता,पूर्वजों को नमस्कारप्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यहजीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। इस धर्म मॆं, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्षको पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध,तर्पण, मुक्ति हेतु विशेषक्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। यदि कोई कारण से उनकी आत्मा को मुक्तिप्रदान नहीं हुई है तो हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते है।

तो दोस्तों आपने जाना होगा की हमारी संस्कृति या परंपरा कितनी महान हैं।

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तो मित्रो मिलते है अगली पोस्ट में।

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बॉलीवुड से हिन्दुओ के खिलाफ षड्यंत्र चलाये जा रहे है, और हिन्दू जागरूक तक नहीं है : श्री श्री रविशंकर


बॉलीवुड से हिन्दुओ के खिलाफ षड्यंत्र चलाये जा रहे है, और हिन्दू जागरूक तक नहीं है : श्री श्री रविशंकर

પ્રહલાદ પ્રજાપતિ

बॉलीवुड से हिन्दुओ के खिलाफ षड्यंत्र चलाये जा रहे है, और हिन्दू जागरूक तक नहीं है : श्री श्री रविशंकर
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बॉलीवुड हिन्दुओ के खिलाफ गतिविधियों का अड्डा बना हुआ है
और ये बात सिर्फ हम ही नहीं बल्कि भारत ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में पहचान रखने वाले श्री श्री रविशंकर भी कह रहे है, और इसमें सच्चाई भी है
श्री श्री रविशंकर ने कहा है की, बॉलीवुड की फिल्मो से हिन्दुओ के खिलाफ षड्यंत्र चल रहे है, पर हिन्दू समाज इतना भी जागरूक नहीं की वो इन षडयंत्रो को समझ सके
श्री श्री रविशंकर ने कहा की, फिल्मो के द्वारा दिखाया जाता है की, तिलक लगाने वाला गुंडा है, चोटी रखने वाला बुरा आदमी है, वो ठग है श्री श्री रविशंकर ने कहा की ये सब इसलिए…

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