Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

कोर्ट में एक अजीब मुकदमा आया


कोर्ट में एक अजीब मुकदमा आया
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एक सिपाही एक कुत्ते को बांध कर लाया
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सिपाही ने जब कटघरे में आकर कुत्ता खोला
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कुत्ता रहा चुपचाप, मुँह से कुछ ना बोला..!
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नुकीले दांतों में कुछ खून-सा नज़र आ रहा था
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चुपचाप था कुत्ता, किसी से ना नजर मिला रहा था
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फिर हुआ खड़ा एक वकील ,देने लगा दलील
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बोला, इस जालिम के कर्मों से यहाँ मची तबाही है
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इसके कामों को देख कर इन्सानियत घबराई है
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ये क्रूर है, निर्दयी है, इसने तबाही मचाई है
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दो दिन पहले जन्मी एक कन्या, अपने दाँतों से खाई है
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अब ना देखो किसी की बाट
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आदेश करके उतारो इसे मौत के घाट
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जज की आँख हो गयी लाल
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तूने क्यूँ खाई कन्या, जल्दी बोल डाल
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तुझे बोलने का मौका नहीं देना चाहता
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लेकिन मजबूरी है, अब तक तो तू फांसी पर लटका पाता
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जज साहब, इसे जिन्दा मत रहने दो
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कुत्ते का वकील बोला, लेकिन इसे कुछ कहने तो दो
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फिर कुत्ते ने मुंह खोला ,और धीरे से बोला
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😔हाँ, मैंने वो लड़की खायी है😔
😔अपनी कुत्तानियत निभाई है😔
😔कुत्ते का धर्म है ना दया दिखाना😔
😔माँस चाहे किसी का हो, देखते ही खा जाना😔
😔पर मैं दया-धर्म से दूर नही😔
😔खाई तो है, पर मेरा कसूर नही😔
😔मुझे याद है, जब वो लड़की छोरी कूड़े के ढेर में पाई थी😔
😔और कोई नही, उसकी माँ ही उसे फेंकने आई थी😔
😔जब मैं उस कन्या के गया पास😔
😔उसकी आँखों में देखा भोला विश्वास😔
😔जब वो मेरी जीभ देख कर मुस्काई थी😔
😔कुत्ता हूँ, पर उसने मेरे अन्दर इन्सानियत जगाई थी😔
😔मैंने सूंघ कर उसके कपड़े, वो घर खोजा था😔
😔जहाँ माँ उसकी थी, और बापू भी सोया था😔
😔मैंने भू-भू करके उसकी माँ जगाई😔
😔पूछा तू क्यों उस कन्या को फेंक कर आई😔
😔चल मेरे साथ, उसे लेकर आ😔
😔भूखी है वो, उसे अपना दूध पिला😔
😔माँ सुनते ही रोने लगी😔
😔अपने दुख सुनाने लगी😔
😔बोली, कैसे लाऊँ अपने कलेजे के टुकड़े को😔
😔तू सुन, तुझे बताती हूँ अपने दिल के दुखड़े को😔
😔मेरी सासू मारती है तानों की मार😔
😔मुझे ही पीटता है, मेरा भतार😔
😔बोलता है लङ़का पैदा कर हर बार 😔
😔लङ़की पैदा करने की है सख्त मनाही😔
😔कहना है उनका कि कैसे जायेंगी ये सारी ब्याही😔
😔वंश की तो तूने काट दी बेल😔
😔जा खत्म कर दे इसका खेल😔
😔माँ हूँ, लेकिन थी मेरी लाचारी😔
😔इसलिए फेंक आई, अपनी बिटिया प्यारी😔
😔कुत्ते का गला भर गया😔
😔लेकिन बयान वो पूरे बोल गया….!😔
😔बोला, मैं फिर उल्टा आ गया😔
😔दिमाग पर मेरे धुआं सा छा गया😔
😔वो लड़की अपना, अंगूठा चूस रही थी😔
😔मुझे देखते ही हंसी, जैसे मेरी बाट में जग रही थी😔
😔कलेजे पर मैंने भी रख लिया था पत्थर😔
😔फिर भी काँप रहा था मैं थर-थर😔
😔मैं बोला, अरी बावली, जीकर क्या करेगी😔
😔यहाँ दूध नही, हर जगह तेरे लिए जहर है, पीकर क्या करेगी😔
😔हम कुत्तों को तो, करते हो बदनाम😔
😔परन्तु हमसे भी घिनौने, करते हो काम😔
😔जिन्दी लड़की को पेट में मरवाते हो😔
😔और खुद को इंसान कहलवाते हो😔
😔मेरे मन में, डर कर गयी उसकी मुस्कान
😔लेकिन मैंने इतना तो लिया था जान😔
😔जो समाज इससे नफरत करता है😔
😔कन्याहत्या जैसा घिनौना अपराध करता है😔
😔वहां से तो इसका जाना अच्छा😔
😔इसका तो मर जान अच्छा😔
😔तुम लटकाओ मुझे फांसी, चाहे मारो जूत्ते😔
😔लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते😔
😥लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते ..!! Please read and share.👏
👏…
मेरा सभी भारत वासियों से विन hiम्र निवेदन है
की
ऐसी कवितायेँ रोज रोज नहीं मिलतीं
इसलिये इस कविता को अधिक से अधिक शेयर करे
बेटी बचावौ बेटी पढावो

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

सरहुल जोहर


सारहुल वसंत के मौसम के दौरान मनाया जाता है और साल के पेड़ अपनी शाखाओं पर नए फूलों मिलता है. यह जनजातियों की रक्षक माना जाता है, जो गांव देवता की पूजा है. लोग गाते हैं और नए फूल दिखाई देते हैं जब एक बहुत नृत्य. देवताओं साल फूलों के साथ पूजा की जाती है. गांव पुजारी या पहन कुछ दिनों के लिए व्रत रखती है. सवेरे वह एक स्नान लेता है और कुंवारी कपास (कच्चा धागा) से बना नया एक धोती पर डालता है. पिछली शाम, पहन तीन नए मिट्टी के बर्तन ले जाता है और ताजा पानी के साथ उन्हें भरता है; अगली सुबह वह इन मिट्टी के बर्तन और अंदर पानी का स्तर देखने को मिलती है. जल स्तर कम हो जाती है, तो वह अकाल या कम बारिश होगी भविष्यवाणी की है कि, और जल स्तर सामान्य है, तो वह एक अच्छी बारिश का संकेत है. पूजा शुरू होने से पहले, पहन की पत्नी अपने पैर धोता है और उसके पास से आशीर्वाद हो जाता है. पूजा में पहन मुंडा, हो और ओरओंस क्रमशः उसे पता, सर्वशक्तिमान ईश्वर सिंगबोंगा या धर्मेश के लिए एक करने के लिए अलग अलग रंग के तीन जवान मुर्गों प्रदान करता है; गांव देवताओं के लिए एक और; और पूर्वजों के लिए तृतीय. इस पूजा के दौरान ग्रामीणों सरना जगह घेर.

 

Sarhul

 

पारंपरिक ड्रम “ढोल, नागरा और तुरही” खिलाड़ियों ढोल और पहन देवताओं की पूजा जप के साथ खेल रही. पूजा समाप्त होने पर, लड़कों को उनके कंधे और उसकी पत्नी अपने पैर धोने से उसे स्वागत करता है जहां उसे अपने घर ले आगे नाच लड़कियों पर पहन ले. फिर पहन उसकी पत्नी और ग्रामीणों को साल फूल प्रदान करता है. इन फूलों को ग्रामीणों के बीच भाईचारा और दोस्ती का प्रतिनिधित्व करते हैं और पुजारी पहन, हर ग्रामीण को साल फूल वितरित करता है. उन्होंने यह भी कहा, “फूल खोंसि” कहा जाता है जो हर घर की छत पर साल्स फूल डालता है. एक ही समय प्रसाद, हंडिया नामक चावल बनाया बियर में, ग्रामीणों के बीच वितरित किया जाता है. और पूरे गांव गायन और सारहुल के इस त्योहार नृत्य के साथ मनाता है. यह छोटानागपुर के इस क्षेत्र में सप्ताह के लिए चला जाता है. कोलहन क्षेत्र में यह फूल महोत्सव अर्थ “बा पोरोब” कहा जाता है. यह ग्रेसट खुशी का त्योहार है.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता ।


एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे
खरीदता ।

अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक
चखता और कहता,
“ये कम मीठा लग रहा है, देखो !”

बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती
“ना बाबू मीठा तो है!”

वो उस संतरे को वही छोड़,बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़
जाता।

युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था,

एक दिन पत्नी नें पूछा “ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह
नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?

“युवा ने पत्नी को एक मधुर मुस्कान के साथ बताया –

“वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती,

इस तरह मै उसे संतरा खिला देता हूँ ।

एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने
सवाल किया,

– ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है, पर संतरे तौलते
हुए मै तेरे पलड़े को देखती हूँ, तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे
ज्यादा संतरे तौल देती है ।

बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा –

“उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर
होती है,

वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम
देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।
.
मेरी हैसीयत से ज्यादा मेरी थाली मे तूने परोसा है.
तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक, मुझे तुझपे भरोसा है

एक बात तो पक्की है की…
छीन कर खानेवालों का कभी पेट नहीं भरता
और बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता…!!!
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दिल को छू जाएं तो शेयर करना न भूलें।
“ऊँचा उठने के लिए पंखो की जरूरत तो पक्षीयो को पड़ती है..
इंसान तो जितना नीचे झुकता है,
वो उतना ही ऊपर उठता जाता है..!

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वीरता का प्रतीक समझा जाता था गणगौर लूटना


वीरता का प्रतीक समझा जाता था गणगौर लूटना

http://www.gyandarpan.com/2017/03/blog-post_29.html

राजस्थान में गणगौर पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता रहा है| रियासत काल में गणगौर रियासत व शासक की प्रतिष्ठा से जुड़ी रही है, तो दूसरे की गणगौर को लूट लाना वीरों का शगल रहा है| वीर गणगौर को लूट कर लाने में अपनी आन, बान, शान व वीरता का प्रतीक समझते थे और जिसकी लूटी जाती थी उसकी प्रतिष्ठा को आघात लगता था| जोबनेर के सिंघपुरी का रामसिंह खंगारोत मेड़ता की गणगौर उठा लाया था, तो बलुन्दा ठिकाने के स्वामी राव चांदा बूंदी की गणगौर लूट लाये थे| उस काल में छोटे-मोटे ठिकाने की गणगौर लूटने की घटना होना आम बात थी, इसलिए 16 दिन चलने वाले गणगौर पूजन कार्यक्रम उपरांत गणगौर को कड़ी सुरक्षा के मध्य रखा जाता था|

गणगौर ही नहीं सोलह दिन तक गणगौर पूजने के लिए —-लाने के लिए खेतों में जाने वाली स्त्रियों की रक्षा का भी ख्याल रखना होता था| मालाणी के शासक जगमाल के समय उसकी अनुपस्थिति में अहमदाबाद का सूबेदार गणगौर पूजने गई स्त्रियों को उठा ले गया था| अगले वर्ष गणगौर के समय ही जगमाल के आदमी बदले की कार्यवाही करते हुए अहमदाबाद के बादशाह की पुत्री गिंदोली को उठा लाये| गणगौर पर्व के एक दिन पहले जब जगमाल स्त्रियों की सुरक्षा में तैनात था तभी उसके आदमियों ने आकर उसे गिंदोली भेंट की, जिसे जगमाल ने पत्नी के रूप में स्वीकार किया और उसके स्वागत में उपस्थित महिलाओं ने गीत गाये जो आज भी पर्व के एक दिन पहले गाकर महिलाएं गिंदोली को याद करती है|

एक बार बूंदी के राव जो मेड़ता के जवाई थे, सुसराल आये तो उन्होंने वहां बलुन्दा के राव चांदा की बहादुरी के किस्से सुने, जो उन्हें रास नहीं और अपने हाडा वंश पर घमंड करते हुए कह दिया कि राव चांदा जैसे तो मेरे दरबार में कई है, यदि चांदा ऐसा ही बहादुर है राव चांदा तो बूंदी की गणगौर लूट के दिखाए|”

राव चांदा को जब ये बात पता चली तो उन्होंने वेश बदलकर अपने अपने 24 घुड़सवारों के साथ गणगौर पर्व पर गणगौर की सवारी से पहले बूंदी में आ कर छुप गए, अपने साथियों से गणगौर की सवारी निकलने वाले मार्ग की अच्छे से छान- बीन कर योजना लूटने की बनाई|

नियत समय पर गणगौर की सवारी निकली, गणगौर माता को सोने के गहनों से सजाया हुआ था| सुरक्षा के लिए भारी भरकम सैन्य दल साथ था| सो चांदा ने भांप लिया कि रास्ते में गणगौर लूटना आसान नहीं है| चूँकि चांदा को पहले ही पता चल गया था कि गणगौर की सवारी को शहर के दूसरे हिस्से में ले जाने के लिए नाव के जरिये नदी पार कर ले जाया जायेगा| अत: राव चांदा अपने चुनिन्दा साथियों के साथ नदी में छुप कर बैठ गए और गणगौर की सवारी का इंतजार करने लगे|
जैसे ही गणगौर की नाव बीच नदी में आई, नदी में पहले से तैनात चांदा ने नाव पर हमला कर गणगौर लूट ली, और तैर कर नदी के अगले पड़ाव पर तैयार खड़े अपने घोड़ो पर सवार हो कर बूंदी से निकल लिए| इस तरह बूंदी के शासक द्वारा अपने ही एक वीर रिश्तेदार पर व्यंग्य कसना भारी पड़ा| एक व्यंग्य ने बूंदी के शासक की प्रतिष्ठा धूल में मिला दी और बलुन्दा के राव चांदा ने बूंदी के शक्तिशाली हाडाओं की गणगौर लूटकर अपनी वीरता का प्रदर्शन कर साबित कर दिया कि वह एक श्रेष्ठ वीर है|

बूंदी से लूटी वह गणगौर आज भी बलुन्दा ठिकाने में है| राव चंदाजी द्वारा बूंदी राज्य की गणगौर लूट लेने के प्रसंग पर आज भी एक कहावत प्रचलन में है- “हाडा ले डूब्या गणगौर”
इस घटना के बाद बूँदी से जुड़े सभी ठिकानों मे पूरी गणगौर न बनाकर केवल माता जी का चेहरा प्रतिक बनाकर पूजन किया जाता हैं क्योंकि बूँदी की गणगौर तो राव चांदा के महलों में पहुँच गई| ये राव चांदा का समय 1516 to 1585 AD रहा है, इस घटना का सही समय तो उपलब्ध नहीं है पर ये इसी समय के मध्य की घटना है, उस वक़्त बूंदी के शासक राव राजा सुरजन सिंह थे|

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तीज तीवाराँ बावड़ी ……


तीज तीवाराँ बावड़ी ले डूबी गणगौर ……………… राजस्थान में यह कहावत प्रचलित है, जिसका मतलब है की श्रावणी तीज अपने साथ त्योंहारों की शुरुवात लेकर आती है

तीज तीवाराँ बावड़ी ले डूबी गणगौर ……………… राजस्थान में यह कहावत प्रचलित है, जिसका मतलब है की श्रावणी तीज अपने साथ त्योंहारों की शुरुवात लेकर आती है, तो छै महीने बाद आने वाली गणगौर के साथ यह श्रृंखला पूरी होती है. सारे बड़े त्योंहार तीज के बाद ही आते हैं …….. रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, श्राद्ध-पर्व, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली का पञ्च-दिवसीय महापर्व जैसे सारे बड़े त्योंहार इसी बीच आतें है.

वैसे तो रंगीला राजस्थान हमेशा से ही तीज-त्यौहारों, रंग-बिरंगे परिधानों, मेलों, उत्सवों और अपनी जीवन्तता के लिए प्रसिद्ध रहा है, फिर भी तीज का त्यौहार राजस्थान के लिए एक अलग ही उमंग लेकर आता है, नयी नयी उमीदें लेकर आता है. बरसात का महत्व यूँ तो सभी के लिए है चाहे वह कोई भी देश हो या कोई भी प्राणी. परंतु मरुभूमि के लिए तो पानी अमृत के समान है. ऐसे में जब महीनों से तपती हुई मरुभूमि में रिमझिम करता सावन…

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गणगौर पूजा


गणगौर पूजा

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गणगौर राजस्थानेवं सीमावर्ती मध्य प्रदेश का एक त्यौहार है जो चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को आता है | इस दिन कुवांरी लड़कियां एवं विवाहित महिलायें शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं | पूजा करते हुए दूब से पानी के छांटे देते हुए गोर गोर गोमती गीत गाती हैं।

गणगौर राजस्थान में आस्था प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का सबसे बड़ा उत्सव है।

गण (शिव) तथा गौर(पार्वती) के इस पर्व में कुँवारी लड़कियां मनपसंद वर पाने की कामना करती हैं। विवाहित महिलायें चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजन तथा व्रत कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।

होलिका दहन के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक,१८ दिनों तक चलने वाला त्योहार है -गणगौर।यह माना जाता है कि माता गवरजा होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं तथा आठ दिनों के बाद ईसर (भगवान शिव )उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं ,चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है।

गणगौर की पूजा में गाये जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा हैं। इस पर्व में गवरजा और ईसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माध्यम से पूजा होती है तथा उन गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम लिए जाते हैं। राजस्थान के कई प्रदेशों में गणगौर पूजन एक आवश्यक वैवाहिक रस्म के रूप में भी प्रचलित है।

गणगौर पूजन में कन्यायें और महिलायें अपने लिए अखंड सौभाग्य ,अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि तथा गणगौर से हर वर्ष फिर से आने का आग्रह करती हैं।