Posted in संस्कृत साहित्य

वर्ण व्यवस्था

#वर्ण व्यवस्था”
कोई मुझे बताये अगर सनातन वर्णव्यवस्था गलत है तो आज के तथाकथित अति बुद्धिजीवियों द्वारा बनाई गई आधुनिक व्यवस्था में प्रथम श्रेणी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक कर्मचारियों को क्यों विभक्त किया गया है???

अगर आप सनातनधार्मियों को शूद्रों के शोषण का जिम्मेदार मानते हैं तो आप अपने कार्यालय के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के शोषक हैं..,

क्योंकि आप उसके साथ प्रथम श्रेणी कर्मचारी अथवा बॉस के जैसा व्यवहार नहीं करते..,,

उससे टॉयलेट साफ़ करवाते हैं /खाने की मेज साफ़ करवाते हैं /झाड़ू पोंछा लगवाते हैं/ गेट खुलवाते हैं /जी हुजूरी /सलामी करवाते हैं../

ड्राइविंग करवाते हैं

खुद अपने बराबर खड़ा होने लायक भी नहीं समझते..

“क्या तब आपको वो उसी परमपिता की संतान और एक जैसे खून वाला मनुष्य नहीं लगता,..तब तुम्हारी मानव मानव की बराबरी वाली थ्योरी कहाँ चली जाती है

आपके अनुसार केवल मनुस्मृति और ब्राह्मणों ने ही शूद्रों को पददलित और शोषित किया है उनपे जुल्म किये हैं.??

या फिर ये सोच तुम्हारे दोगलेपन को प्रदर्शित करती है..?

आज जो हर जगह किसी भी चीज जीव जंतु पेड़ पौधे मानव आदि को कई श्रेणियों में विभक्त कर के उनका वर्गीकरण किया जाता है वो क्या है..??

दीमकों में चार वर्ण..

चींटियों में चार वर्ण ..

मधुमक्खियों में चार वर्ण..

(रानी,सैनिक,श्रमिक,नर,)

क्या ये भी ब्राह्मणों ने बनाये हैं…??

या ये मानते हो की प्रकृति स्वयं गुण धर्मों के आधार पर वर्गीकरण कर देती है ,..

जैसे आज किसी भी सरकार /ससंस्थान /कार्यालय के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने हेतु कम से कम चार श्रेणी के कर्मचारियों की आवश्यकता होती है

ठीक उसी प्रकार हमारे सनातन धर्म और समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिये चार वर्णों की रचना की गयी ..

ध्यान रहे वर्णों। की न क़ी जातियों की,..

इसलिए जाति वर्ण आदि के मूल में हमारा हित ही छुपा था

विकृति तो अब आई है

याद रखें आज हम जो भी व्यवसाय रोजगार करते हैं उसके लिए हमे अपनी जिंदगी का एक चौथाई भाग उसकी पढ़ाई या डिग्री लेने में ही निकल जाता है..

पहले आपको बचपन से ही अन्य कार्यों के साथ पैतृक व्यवसाय जैसे ..बर्तन बनाना /जूते बनाना/ कपडे सिलना / दवाएं बनाना (वैद्यकीय)इत्यादि ज्ञान और कौशल घर पे ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मुफ़्त में प्रदान किया जाता था ,..जिससे धन और समय व्यर्थ नहीं जाता था ,और बड़े होकर रोजगार के लिए दर दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ती थी.. सब के हाथ में अपना पैतृक व्यवसाय था कोई भूखों नहीं मरता था.. सब सुखी और संपन्न थे

इसका उदाहरण आपको आजसे लगभग 25 वर्ष पहले भी देखने को मिल सकता था

मेरे गाँव के नाई / लुहार / कुंभार / या धोबी खेती बिलकुल नहीं करते थे ..

ये केवल अपना पैतृक व्यवसाय करते थे और वर्ष में केवल दो बार अपना मेहनताना जिसे हमारे अवध में

“खरिहक” अथवा खलिहान कहा जाता था लेते थे

अगर 500 घरों का गाँव है और एक एक घर से इन्हें

साल में 2 बार लगभग दो दो “मन” अर्थात 32 किलो अनाज मिलता था

जो लगभग 32 ×500= 16000 kg(160 कुंतल) अनाज

प्रति 6 महीनों में प्राप्त होता था,..

जो उस समय की एक बड़े किसान की उपज के समकक्ष था ,..

लोगों को लगभग एक क्विंटल अनाज में सालभर सारी सुविधाएँ मिलती थी और प्रजा को भरपूर अन्न वस्त्र

अब बताइये इस व्यवस्था में गड़बड़ी कहाँ थी..??

हमे वर्णव्यवस्था को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए न की उसे पूरी तरह समाप्त…

हमे गंगा की सफाई ही करनी चाहिए न की उसे ख़त्म करना,..
#copied
वर्णव्यवस्था के ऊपर इस बेहतरीन पोस्ट में यह और जोड़ना ज़रूरी है कि जातिप्रथा का विरोध करने वाले कहते हैं कि इस की वजह से किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसके जन्म के आधार पर तय होती है । अर्थात अगर वह ब्राह्मण के घर पैदा हुआ है तो सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी होगा मगर यदि वह शूद्र के घर पैदा हुआ तो सामाजिक उपेक्षा का ।
असल में सामाजिक वर्गीकरण कर्म के आधार पर हुआ परन्तु उस वर्ण व्यवस्था का जन्माधारित प्रणाली में बदलने की वजह परिवार का समाज की इकाई होना था । क्योंकि जिस जाति के परिवार में बच्चा पैदा होता है वह उसी के परिवेश में ढल जाता है । जैसे सुनार के घर में पैदा होने वाला बालक आभूषण गढ़ने की कला पारवारिक परिस्थितियों के कारण सीख जाएगा और उसी व्यवसाय को अपना लेगा । पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह सुनारों के परिवार बनते गए और एक जाति का जन्म हो गया जो जन्म के मुख्य कारण के साथ साथ पारवारिक परिस्थित के सहायक कारण से सुदृढ़ होती गईं । इसी बात को सोनाक्षी सिन्हा ने बहुत अच्छे तरीके से समझाया है (देखें फोटो) ।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि भारतीय जातिप्रथा में लाख बुराइयाँ हों पर समाज में इसके कारण  कभी बेरोज़गारी की समस्या नहीं रही । विभिन्न जातियों के जो काम नियत थे वे एक तरह के कुटीर उद्योग ही तो थे ।
यहाँ आपको यह बताना ज़रूरी है कि अंग्रेज़ों के प्रभाव में आकर कुछ लोग बहक गए और हिन्दू समाज में श्रम के आधार पर आधारित सामाजिक संरचना की मनमानी एवं ऊलजुलूल व्याख्या करने लगे । अंग्रेज़ों के पिठ्ठू एक व्यक्ति ने सम्मान के नाम पर इन कामों को हीन घोषित कर दिया और कालान्तर में उसके समाज के लोगों ने इन कुटीर उद्योगों का सर्वनाश कर दिया ।

इसका नतीजा यह निकला कि बढ़ई, चर्मकार, लुहार, तेली, कुम्हार इत्यादि अनेक जाति आधारित उद्योगों में काम करने वाला व्यक्ति अपने काम को निकृष्ट समझने लगा । आज सभी बाबू या अफ़सर बनने के चक्कर में हैं । भूखों मर जाऐंगे पर छोटा मोटा धंधा नहीं करेंगे । बस सरकारी नौकरी लग जाए चाहे आरक्षण से या पैसे दे कर । सब ब्राह्मण बनना चाहते हैं ।  अरे जरा इन से पूछो कि रिज़र्वेशन के वावजूद क्या इनकी जाति के सभी बच्चे इंजीनियर, डॉक्टर, अफ़सर बन जाएंगे ?
हमें ध्यान रखना चाहिए कि समाज में नाई, धोबी, मोची, बढ़ई सभी की जरूरत रहेगी और हमेशा रहेगी । हिन्दू बाबू बनने के चक्कर में ये काम नहीं करेंगे तो कोई और करेगा । ये बाबूगिरी के चक्कर में अपने कुटीर उद्योगों को छोड़ कर जो गेप पैदा कर रहे हैं उसको मुस्लिम लोग बख़ूबी भर रहे हैं । इन्हें पता नहीं कि जिन कामों को जाति के नाम पर ये हेय समझते हैं उनका टर्नओवर अरबों रुपए है जैसे मरी उठाने का धंधा । अब यह धंधा मुसलमानों के हाथों में है । यही क्या नाई, कारपेन्टरी, राज-मिस्त्री, पेन्टर, वेल्डर, मोटर मेकेनिक वग़ैरह अरबों के कारोबार मुस्लिम कारीगरों के हाथ में हैं । वे लोग बाबू बनने की दौड़ में नहीं हैं और उनमें बेरोज़गारी भी नहीं है।
सोचिए, अगले तीस साल में बेरोज़गारी की समस्या से मुक्त और अपनी दूनी आबादी के साथ साथ आपस में एकता रखने वाले समृद्ध मुस्लिम समाज के मुक़ाबले आरक्षण के पीछे भाग कर बाबूगिरी करने को लालायित बेरोज़गार, गरीब और बिखरे हुए हिन्दू समाज की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थित कितनी दयनीय होगी ।
अभी भी वक़्त है, हिन्दुओ । चेत जाओ । छोटे कामधंधों को और ऐसे कामगारों को इज़्ज़त देना सीखो । सब बाबू नहीं बन सकते, सब पढ़ लिख नहीं सकते, रिज़र्वेशन के वावजूद भी ।  यदि ऐसा होता तो सारी सुविधा होते हुए भी लालू की औलाद क्यों पढ़ नहीं सकी ।
हिन्दुओ, अपनी जाति और अपने पैतृक कला-कौशल्य पर गर्व करो । बच्चों की क़ाबलियत पहचानो, यदि पढ़ने में ढीले हैं तो पैतृक कामधंधों में निपुण करो । बेरोज़गारी से बचो । ध्यान रखो, कोई काम नीचा नहीं होता ।
चलते चलते एक बात और, अगर अगर पुरानी व्यवस्था इसलिए खराब थी क्योंकि वह जन्म आधारित थी तो जो नई जन्म आधारित आरक्षण व्यवस्था ठीक कैसे है ?
इसलिए आज जरूरत है कि जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को समाप्त किया जाय और सभी का संरक्षण किया जाए । सभी बच्चों को मुफ्त गुणवत्ता वाली शिक्षा दी जाए और जो बच्चे पढ़ने में रुचि नहीं रखते हों उन्हें कुटीर उद्योग-धंधों को स्थापित करने की ट्रेनिंग दी जाए और आर्थिक मदद से इन्हें जीवन में सफलतापूर्वक स्थापित किया जाए ।

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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