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ब्राह्मणो के लीऐ बहोत ही जरुरी एवं उपयोगी मार्गदर्शन एक बार जरुर पढे ओर अच्छा लगे तो शेयर जरुर करे

ब्राह्मणो के लीऐ बहोत ही जरुरी एवं उपयोगी मार्गदर्शन
एक बार जरुर पढे ओर अच्छा लगे तो शेयर जरुर करे

Praveen Kaushik

जप्ययेनैवतुसंसिद्धचेत् ब्राह्मणोनात्र संशयः ।।
कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।। -मनु 2- 97

अर्थात- ब्राह्मण चाहे कोई अन्य उपासना करे या न करे वह केवल गायत्री मन्त्र से ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है ।।

जैसा की हम सभी स्वजन जानते है कि जब भी ब्राह्मण संस्कारों की बात हो तो सनातन धर्म में निर्देशों की लंबी सूचि होती है। सनातन धर्म में हर एक धार्मिक कार्य को करने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। इनका उल्लंघन ब्राह्मण को करना वर्जित है। हम किस प्रकार से पूजा करें, पूजा की सामग्री, मंत्रों का सही उच्चारण, इत्यादि ऐसे बिंदु हैं जिन्हें बिना मार्गदर्शन के करना व्यर्थ है। क्या आप जानते हैं कि सनातन धर्म में दिए गए प्रत्येक ‘मंत्र’ का यदि सही एवं सम्पूर्ण रूप से उच्चारण नहीं किया जाए तो यह निष्फल होते हैं ?????

फिर आप चाहे उस मंत्र को एक बार या फिर सौ बार या हज़ारों बार क्यों ना पढ़ लें। इसीलिए शास्त्रों में प्रत्येक मंत्र को सही ढंग से पढ़ सकने के लिए दिशा-निर्देश प्रदान किए गए हैं। सनातन धर्म में समाहित किए गए सभी मंत्रों में एक मंत्र काफी पवित्र माना जाता है। इस मंत्र का स्थान उच्च है तथा इसका उच्चारण केवल पुरुष ही कर सकते हैं।

गायत्री मंत्र
यह मंत्र सूर्य भगवान को समर्पित है।

गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ओम के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3.62.10 के मेल से बना है।

इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है।

गायत्री एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं- गायत्री, उष्णिक अनुष्टुप बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई, जो इस प्रकार है

तत् सवितुर्वरेण्यंभर्गाेदेवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्

गायत्री मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों मे केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों मे इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ

(१) ॐ
(2) भूर्भवः स्वः
(3) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गाे देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।

मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है।

सर्व वेदमयी विद्या गायत्री पर देवता ।।
परस्य ब्रह्मणो माता सर्व वेदमयी सदा
महाभावमयी नित्या सच्चिदानंद रूपिणी ।। -स्कन्द पुराण ।।

अर्थात् — गायत्री सर्व वेदमयी परा विद्या है ।। यही ब्राह्मण की माता है ।। यही नित्य सच्चिदानंद स्वरूप तथा महा भावमयी है ।।

गायत्री वेद जननी गायत्री ब्राह्मणः प्रसूः ।।
गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते॥ स्कन्द पुराण 9/51

गायत्री वेदों की माता है, गायत्री ब्राह्मण की माता है ।। यह गायन करने वाले का त्राण- उद्धार करती है इसलिए गायत्री कहते हैं ।।

ओंकार पितृ रूपेण गायत्री मातरं तथा ।।
पितरौ यो न जानाती स विप्रस्त्वन्यरेतसः ।। -रुद्रयामल

ओंकार को पिता और गायत्री को माता रूप में जो नहीं जानता, वह ब्राह्मण वर्ण शंकर है ।।
ब्राह्मण की माता गायत्री और पिता वेद है ।।
कहा भी है-

मातात्वं च कुतः कश्च पिता एमात्समुद्भवः ।।
कुलात्कस्य समुत्पन्नातिद ब्रह्मेति ब्राह्मणः॥
गायत्री मातुमेवं तं पिता देवोपि सम्भवः ।।
ब्रह्मकुल समुत्पन्नमिदं ब्रह्मेति ब्राह्मणः ।। -महोपनिषद्

मेरी माता कौन? पिता कौन? कुल कौन? जो इस रहस्य को जानता है वह ब्राह्मण है ।। ब्राह्मण की गायत्री ही माता है, वेद ही पिता है, ब्रह्म ही कुल है ।।

ब्राह्मण के जीवन का लक्ष आत्म- बलं एवं ब्रह्मतेज को प्राप्त करना होता है ।। वह जानता है कि संसार में जो कुछ उत्तम है वह सभी आत्मबल और ब्रह्मतेज उपलब्ध करने पर प्राप्त किया जा सकता है ।। इसलिए वह सम्पूर्ण आनन्दों के लिए वेद जननी गायत्री का ही आश्रय लेता है

गायत्री मंत्र सूर्य भगवान से संबंधित होने के कारण ही ऐसा माना जाता है कि यह मंत्र सूर्याेदय और सूर्यास्त के समय पढ़ा जाना चाहिए।

ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व बहुत कुछ गायत्री उपासना पर निर्भर रहता हे, क्योंकि जो सद्गुण सामान्य लौकिक प्रयत्न करने पर बहुत कठिनाई से प्राप्त होते हैं वे मॉं गायत्री की उपासना के माध्यम से स्वयंमेव विकसित होने लगते हैं और उन अन्तः स्फुरणाओं के जागरण से उसका ब्राह्मणत्व दिन- दिन सुदृढ़ होता जाता है ।। आत्मा में पवित्रता का अंश दिन- दिन बढ़ता जाता है ।।

अतः प्रत्येक ब्राह्मण को जितना भी हो सके गायत्री मंत्र का जाप करना ही चाहिए । स्वयं के कल्याण के लिए, परिवार के कल्याण लिए, एवं विश्व के कल्याण के लिए

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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