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Virat Hindu Sangam Releases List of Mosques in Various States Which Were Built After Demolishing Hindu temples

Sita Ram Goel


We give below, state-wise and district-wise, the particulars of Muslim monuments which stand on the sites and/or have been built with the materials of Hindu temples, and which we wish to recall as witnesses to the role of Islam as a religion and the character of Muslim rule in medieval India. The list is the result of a preliminary survey. Many more Muslim monuments await examination. Local traditions which have so far been ignored or neglected have to be tapped on a large scale.

We have tried our best to be exact in respect of locations, names and dates of the monuments mentioned. Even so, some mistakes and confusions may have remained. It is not un-often that different sources provide different dates and names for the same monument. Many Muslim saints are known by several names, which create confusion in identifying their mazãrs or dargãhs. Some districts have been renamed or newly, created and a place which was earlier under one district may have been included in another. We shall be grateful to readers who point out these mistakes so that they can be corrected in our major study. This is only a brief summary. Click on either the state name or on the Description field to get more details.

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एक गूजरी दूध

एक गूजरी दूध बेच रही थी और सबको दूध नाप-नाप कर दे रही थी । उसी समय एक नौजवान दूध लेने आया तो गूजरी ने बिना नापे ही उस नौजवान का बरतन दूध से भर दिया ।

वहीं थोड़ी दूर पर एक फकीर हाथ में माला लेकर मनको को गिन-गिन कर माल फेर था । तभी उसकी नजर गूजरी पर पड़ी और उसने ये सब देखा और पास ही बैठे व्यक्ति से सारी बात बताकर इसका कारण पूछा, उस व्यक्ति ने बताया कि जिस नौजवान को बिना नाप के दूध दिया है वह उस नौजवान से प्यार करती है इसलिए जहा प्यार होता है, वहां हिसाब किताब नही होता ।

यह बात फकीर के दिल को छू गयी और उसने सोचा कि एक गुजरी जिससे प्यार करती है तो उसका हिसाब नही रखती और मैं जिस अपने परमात्मा से प्यार करता हूं उसके लिए सुबह से शाम तक मनके गिनगिन कर माला फेरता हूं । मुझसे तो अच्छी यह गुजरी ही है और उसने माला को तोड़कर फेंक दिया ।

जहां प्यार होता है वहां हिसाब-किताब नही होता है और जहां हिसाब-किताब होता है वहां प्यार नही होता है सिर्फ * व्यापार होता है ।

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The story of watermelons

The story of watermelons
“I am from the village of Parra in Goa, hence we are called Parrikars. My village is famous for its watermelons. When I was a child, the farmers would organise a watermelon-eating contest at the end of the harvest season in May.

All the kids would be invited to eat as many watermelons as they wanted. Years later, I went to IIT Mumbai to study engineering. I went back to my village after 6.5 years.

I went to the market looking for watermelons. They were all gone. The ones that were there were so small.

I went to see the farmer who hosted the watermelon-eating contest. His son had taken over. He would host the contest but there was a difference.

When the older farmer gave us watermelons to eat he would ask us to spit out the seeds into a bowl. We were told not to bite into the seeds.

He was collecting the seeds for his next crop. We were unpaid child labourers, actually. He kept his best watermelons for the contest and he got the best seeds which would yield even bigger watermelons the next year.

His son, when he took over, realised that the larger watermelons would fetch more money in the market so he sold the larger ones and kept the smaller ones for the contest.

The next year, the watermelons were smaller, the year later even small. In watermelons the generation is one year. In seven years, Parra’s best watermelons were finished. In humans, generations change after 25 years. It will take us 200 years to figure what we were doing wrong while educating our children.”

Unless we employ our best to train the next generation, this is what can happen to us. We must attract the best into teaching profession.

Great story indeed !! Each one of us are responsible to offer our best culture to next generation !!!

The whole world is looking to India as a Spiritual Leader.

Unfortunately, hardly few are aware of the great heritage we have carried!

If we don’t pass on right things to next generation, they will be misguided.
(Story by:Manohar Parrikar)

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जैसे के साथ तैसा,

Manubhai Suthar

मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से एक चौथाई सदी बीत चुकी थी। तोड़े गए मन्दिरों, मठों और चैत्यों के ध्वंसावशेष अब टीले का रूप ले चुके थे, और उनमे उपजे वन में विषैले जीवोँ का आवास था। कासिम ने अपने अभियान में युवा आयु वाले एक भी व्यक्ति को जीवित नही छोड़ा था, अस्तु अब इस क्षेत्र में हिन्दू प्रजा अत्यल्प ही थी। एक बालक जो कासिम के अभियान के समय मात्र “आठ वर्ष” का था, वह इस कथा का मुख्य पात्र है। उसका नाम था “तक्षक”।

तक्षक के पिता सिंधु पुन दाहिर के सैनिक थे जो इसी कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति पा चुके थे। लूटती अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से “खींच खींच” कर उनकी देह लूटी जाने लगी। भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें “भय” से कांप उठी थीं। तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का “सर” काट डाला। उसके बाद बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली और तलवार को अपनी “छाती” में उतार लिया।

आठ वर्ष का बालक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भागा। पचीस वर्ष बीत गए, तब का अष्टवर्षीय तक्षक अब बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी, उसकी आँखे सदैव अंगारे की तरह लाल रहती थीं।

उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम, विशाल सैन्यशक्ति और अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे “अरब” कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे, पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते।

युद्ध के “सनातन नियमों” का पालन करते नागभट्ट कभी उनका “पीछा” नहीं करते, जिसके कारण बार बार वे मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे, ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

आज महाराज की सभा लगी थी, कुछ ही समय पुर्व गुप्तचर ने सुचना दी थी, कि अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की “सीमा” पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी।

नागभट्ट का सबसे बड़ा गुण यह था, कि वे अपने सभी “सेनानायकों” का विचार लेकर ही कोई निर्णय करते थे। आज भी इस सभा में सभी सेनानायक अपना विचार रख रहे थे। अंत में तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला “महाराज, हमे इस बार वैरी को उसी की शैली में उत्तर देना होगा” महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।

तक्षक: महाराज, अरब सैनिक महा बर्बर हैं, उनके सतक्षकाथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ “घात” ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले- “किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक”।

तक्षक ने कहा “मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों, ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज, इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है। पर यह हमारा धर्म नही हैं, राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा।

देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना “अत्याचार” किया था।

ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह महाराज जानते हैं।”

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए। अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी।

अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था। वह अपनी तलवार चलाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था। सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा- लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया।

युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

“आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक…. भारत ने अब तक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।”

इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों में भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।
इसिलिये है
मेरा भारत महान

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अमरनाथ गुफा के अनसुलझे रहस्य।

अमरनाथ गुफा के अनसुलझे रहस्य।
Sanjay Gupta

एक बार भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर बैठकर कुछ वार्तालाप कर रहे थे तभी कुछ सोचते हुए माता पार्वती ने महादेव शिव से पूछा की आप तो अजर है , अमर है फिर ऐसा क्यों है की आप की अर्धांग्नी होने के बावजूद मुझे हर बार जन्म लेकर नए स्वरूप में आना पड़ता है, आपको प्राप्त करने के लिए बरसो कठिन तपस्या करनी पड़ती है. मुझे बताइए की आखिर आपको प्राप्त करने के लिए मेरी तपस्या और साधना इतनी कठिन क्यों ? तथा आपके कंठ में पड़ी इस नरमुंड माला और अमर होने का क्या रहस्य है।

महादेव शिव ने पहले तो यह जरूरी नहीं समझा की उन्हें देवी पार्वती के इन प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए, परन्तु उनके हठ के कारण शिव को कुछ गूढ़ रहस्य उनको बताने पड़े. शिव महापुराण में मृत्यु सहित अजर-अमर को लेकर कई बाते बताई गई है जिनमे एक साधना से जुडी अमरकथा पड़ी रोचक है . जिसे भक्तजन अमरत्व की कथा के रूप में जानते है।

हर साल बर्फ से ढके हिमालय के पर्वतो पर स्थित अमरनाथ , कैलाश और मानसरोवर तीर्थ स्थलों में लाखो भक्तो की भीड़ जुड़ती है. अनेको भक्त श्रद्धा भाव से इन पवित्र तीर्थ स्थलों में पहुंचने के लिए सेकड़ो किलोमीटर की पैदल यात्रा कर यहाँ पहुंचते है. शिव के प्रिय अधिकमास, अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास की पूर्णिमा के बीच अमरनाथ की यात्रा भक्तो को खुद से जुड़े रहस्यों के कारण प्रासंगिक लगती है।

शिव पुराण सहित अनेक हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में यह बताया गया है की अमरनाथ की गुफा ही वह स्थान था जहाँ भगवान शिव ने माता पार्वती को जन्म-मृत्यु व अमरता से जुड़े गहरे एवं गुप्त राज बताए थे. उस दिन उस गुफा में महादेव शिव और माता पार्वती के अलावा कोई अन्य प्राणी नहीं था. ना महादेव शिव के वाहन नंदी, ना उनके गले में सर्प था, ना उनके जटा में चन्द्र देव ना देवी गंगा और नहीं उनके समीप गणेश व कार्तिकेय।

जब महादेव शिव देवी पार्वती को गुप्त ज्ञान देने के लिए गुफा धुंध रहे थे तब उन्होंने सर्वप्रथम अपने वाहन नंदी को एक स्थान पर छोड़ा, जिस स्थान पर शिव ने नंदी को छोड़ा था वह स्थान पहलगाम कहलाया. पहलगाम से ही अमरनाथ की यात्रा आरम्भ होती है इसके बाद भगवान शिव ने अपनी जटाओं से चन्द्र देव को अलग किया. जहाँ चन्द्र देव शिव से अलग हुए वह स्थान चंदनवाड़ी कहलाती है. इसके बादगंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा.

अमरनाथ यात्रा में पहलगाम के बाद अगला पडा़व है गणेश टॉप, मान्यता है कि इसी स्थान पर महादेव ने पुत्र गणेश को छोड़ा. इस जगह को महागुणा का पर्वत भी कहते हैं. इसके बाद महादेव ने जहां पिस्सू नामक कीडे़ को त्यागा, वह जगह पिस्सू घाटी है।

इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को स्वंय से अलग किया. इसके पश्चात् पार्वती संग एक गुफा में महादेव ने प्रवेश किया. कोर्इ तीसरा प्राणी, यानी कोर्इ कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर घुस कथा को न सुन सके इसलिए उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर दी. फिर महादेव ने जीवन के गूढ़ रहस्य की कथा शुरू कर दी।

कहा जाता है की महादेव के कथा सुनाते सुनाते देवी पार्वती सो गई परन्तु इस बात का महादेव को पता नहीं चला और उन्होंने अपनी कथा सुनानी जारी रखी. तभी वहां दो कबूतर भगवान शिव के आँखो से बचते बचाते उस गुफा में आ गए और उन्होंने भी उन गुप्त रहस्यों को सुन लिया जो भगवान शिव देवी पार्वती को बता रहे थे. भगवान शिव अपनी कथा सुनाने में मग्न थे अतः उनका ध्यान बिलकुल भी उन दोनों कबूतरों पर नहीं गया।

दोनों कबूतर कथा सुनते रहे जब कथा समाप्त हुई और महादेव शिव का ध्यान देवी पार्वती पर गया तो उन्हें पता चला की वे तो सो रही है. तो आखिर कथा सुन कौन रहा था ? तभी भगवान शिव की नजर उन दोनों कबूतरों पर पड़ी जो भगवान शिव द्वारा सुनाये गये अमरत्व की कथा को सुन चुके थे।

वे दोनों जानते थे की उन्होंने चुपके से शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई यह गुप्त कथा सुन ली है और इस कारण शिव उन पर क्रोधित है अतः वे दोनों कबूतर शिव के चरणों पर गए तथा कहा हे ! भगवान हमने आपसे यह अमरकथा सुनी है अगर यदि आप हमे मारते है तो यह अमरकथा झूठी हो जायेगी. अतः हमे क्षमा कर हमारा मार्गदर्शन करें. महादेव शिव ने मुस्कराते हुए उन कबूतरों से कहा की में तुम्हे वरदान देता हु की तुम दोनों शिव और पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप इस गुफा में सदैव निवास करोगे. इस तरह ये दोनों कबूतर अमर हो गए और यह गुफा अमरकथा की साक्षी बनी. जिस कारण इस गुफा का नाम अमरनाथ पड़ा।

मान्यता है की आज भी इन दोनों कबूतरों के दर्शन अमरनाथ गुफा में होते है और यह भी प्रकृति का ही एक चमत्कार है की शिव की विशेष पूजा वाले दिन इस गुफा में बर्फ के शिवलिंग अपना आकार ले लेते है. इस गुफा में स्थित बर्फ से निर्मित शिवलिंग अपने आप में एक चमत्कार ही है. अमरनाथ गुफा के अंदर एक ओर देवी पार्वती और भगवान गणेश की बर्फ से निर्मित प्रतिमा भी देखी जा सकती है।

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ब्राह्मणो के लीऐ बहोत ही जरुरी एवं उपयोगी मार्गदर्शन एक बार जरुर पढे ओर अच्छा लगे तो शेयर जरुर करे

ब्राह्मणो के लीऐ बहोत ही जरुरी एवं उपयोगी मार्गदर्शन
एक बार जरुर पढे ओर अच्छा लगे तो शेयर जरुर करे

Praveen Kaushik

जप्ययेनैवतुसंसिद्धचेत् ब्राह्मणोनात्र संशयः ।।
कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।। -मनु 2- 97

अर्थात- ब्राह्मण चाहे कोई अन्य उपासना करे या न करे वह केवल गायत्री मन्त्र से ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है ।।

जैसा की हम सभी स्वजन जानते है कि जब भी ब्राह्मण संस्कारों की बात हो तो सनातन धर्म में निर्देशों की लंबी सूचि होती है। सनातन धर्म में हर एक धार्मिक कार्य को करने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। इनका उल्लंघन ब्राह्मण को करना वर्जित है। हम किस प्रकार से पूजा करें, पूजा की सामग्री, मंत्रों का सही उच्चारण, इत्यादि ऐसे बिंदु हैं जिन्हें बिना मार्गदर्शन के करना व्यर्थ है। क्या आप जानते हैं कि सनातन धर्म में दिए गए प्रत्येक ‘मंत्र’ का यदि सही एवं सम्पूर्ण रूप से उच्चारण नहीं किया जाए तो यह निष्फल होते हैं ?????

फिर आप चाहे उस मंत्र को एक बार या फिर सौ बार या हज़ारों बार क्यों ना पढ़ लें। इसीलिए शास्त्रों में प्रत्येक मंत्र को सही ढंग से पढ़ सकने के लिए दिशा-निर्देश प्रदान किए गए हैं। सनातन धर्म में समाहित किए गए सभी मंत्रों में एक मंत्र काफी पवित्र माना जाता है। इस मंत्र का स्थान उच्च है तथा इसका उच्चारण केवल पुरुष ही कर सकते हैं।

गायत्री मंत्र
यह मंत्र सूर्य भगवान को समर्पित है।

गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ओम के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3.62.10 के मेल से बना है।

इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है।

गायत्री एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं- गायत्री, उष्णिक अनुष्टुप बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई, जो इस प्रकार है

तत् सवितुर्वरेण्यंभर्गाेदेवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्

गायत्री मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों मे केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों मे इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ

(१) ॐ
(2) भूर्भवः स्वः
(3) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गाे देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।

मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है।

सर्व वेदमयी विद्या गायत्री पर देवता ।।
परस्य ब्रह्मणो माता सर्व वेदमयी सदा
महाभावमयी नित्या सच्चिदानंद रूपिणी ।। -स्कन्द पुराण ।।

अर्थात् — गायत्री सर्व वेदमयी परा विद्या है ।। यही ब्राह्मण की माता है ।। यही नित्य सच्चिदानंद स्वरूप तथा महा भावमयी है ।।

गायत्री वेद जननी गायत्री ब्राह्मणः प्रसूः ।।
गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते॥ स्कन्द पुराण 9/51

गायत्री वेदों की माता है, गायत्री ब्राह्मण की माता है ।। यह गायन करने वाले का त्राण- उद्धार करती है इसलिए गायत्री कहते हैं ।।

ओंकार पितृ रूपेण गायत्री मातरं तथा ।।
पितरौ यो न जानाती स विप्रस्त्वन्यरेतसः ।। -रुद्रयामल

ओंकार को पिता और गायत्री को माता रूप में जो नहीं जानता, वह ब्राह्मण वर्ण शंकर है ।।
ब्राह्मण की माता गायत्री और पिता वेद है ।।
कहा भी है-

मातात्वं च कुतः कश्च पिता एमात्समुद्भवः ।।
कुलात्कस्य समुत्पन्नातिद ब्रह्मेति ब्राह्मणः॥
गायत्री मातुमेवं तं पिता देवोपि सम्भवः ।।
ब्रह्मकुल समुत्पन्नमिदं ब्रह्मेति ब्राह्मणः ।। -महोपनिषद्

मेरी माता कौन? पिता कौन? कुल कौन? जो इस रहस्य को जानता है वह ब्राह्मण है ।। ब्राह्मण की गायत्री ही माता है, वेद ही पिता है, ब्रह्म ही कुल है ।।

ब्राह्मण के जीवन का लक्ष आत्म- बलं एवं ब्रह्मतेज को प्राप्त करना होता है ।। वह जानता है कि संसार में जो कुछ उत्तम है वह सभी आत्मबल और ब्रह्मतेज उपलब्ध करने पर प्राप्त किया जा सकता है ।। इसलिए वह सम्पूर्ण आनन्दों के लिए वेद जननी गायत्री का ही आश्रय लेता है

गायत्री मंत्र सूर्य भगवान से संबंधित होने के कारण ही ऐसा माना जाता है कि यह मंत्र सूर्याेदय और सूर्यास्त के समय पढ़ा जाना चाहिए।

ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व बहुत कुछ गायत्री उपासना पर निर्भर रहता हे, क्योंकि जो सद्गुण सामान्य लौकिक प्रयत्न करने पर बहुत कठिनाई से प्राप्त होते हैं वे मॉं गायत्री की उपासना के माध्यम से स्वयंमेव विकसित होने लगते हैं और उन अन्तः स्फुरणाओं के जागरण से उसका ब्राह्मणत्व दिन- दिन सुदृढ़ होता जाता है ।। आत्मा में पवित्रता का अंश दिन- दिन बढ़ता जाता है ।।

अतः प्रत्येक ब्राह्मण को जितना भी हो सके गायत्री मंत्र का जाप करना ही चाहिए । स्वयं के कल्याण के लिए, परिवार के कल्याण लिए, एवं विश्व के कल्याण के लिए

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प्रसंग है_ ताजा चुनाव के नतीजों के बाद बहुत ही उदास मन से एक छज्जे पर मायावती बैठी है,

प्रसंग है_

ताजा चुनाव के नतीजों के बाद बहुत ही उदास मन से एक छज्जे पर मायावती बैठी है,

केश खुले हुए हैं और उदास मुख मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली हैं

सोचिये विभिन्न कवि इस प्रसंग पर कैसे लिखते…..


मैथिली शरण गुप्त-

अट्टालिका पर बैठकर क्यों अनमनी सी हो अहो
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो ?
धीरज धरो संसार में, किसके नहीं है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, माया न भूतल पर गिरे।😀

काका हाथरसी-

माया बैठी छत पर, कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है, भली करे करतार
भली करे करतार, न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार, नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना
उधर कूदना मेरे ऊपर मत गिर पड़ना।😊


वो बरसों पुरानी ईमारत
आज कुछ गुफ्तगू करना चाहती थी
कई सदियों से
उसकी छत से कोई कूदा नहीं था।
और आज
तंग हालात
स्याह आँखों वाली
उस लड़की ने
ईमारत के सफ़े
जैसे खोल ही दिए
आज फिर कुछ बात होगी
सुना है ईमारत खुश बहुत है…😀

हरिवंश राय बच्चन-

किस उलझन से क्षुब्ध आज
निश्चय यह तुमने कर डाला
घर चौखट को छोड़ त्याग
चढ़ बैठी तुम चौथा माला
अभी समय है, जीवन सुरभित
पान करो इस का बाला
ऐसे कूद के मरने पर तो
नहीं मिलेगी मधुशाला 😊

प्रसून जोशी-

जिंदगी को तोड़ कर
मरोड़ कर
गुल्लकों को फोड़ कर
क्या हुआ जो जा रही हो
सोहबतों को छोड़ कर 😄


रहिमन कभउँ न फांदिये, छत ऊपर दीवार
हल छूटे जो जन गिरि, फूटै और कपार 😀


छत चढ़ नारी उदासी कोप व्रत धारी
कूद ना जा री दुखीयारी
सैन्य समेत अबहिन आवत होइहैं रघुरारी 😟


कबीरा देखि दुःख आपने, कूदिंह छत से नार
तापे संकट ना कटे , खुले नरक का द्वार” 😃

श्याम नारायण पांडे-

ओ घमंड मंडिनी, अखंड खंड मंडिनी
वीरता विमंडिनी, प्रचंड चंड चंडिनी
सिंहनी की ठान से, आन बान शान से
मान से, गुमान से, तुम गिरो मकान से
तुम डगर डगर गिरो, तुम नगर नगर गिरो
तुम गिरो अगर गिरो, शत्रु पर मगर गिरो।😃

गोपाल दास नीरज-

हो न उदास रूपसी, तू मुस्काती जा
चुनाव की हार में भी जिन्दगी के फूल खिलाती जा
जाना तो हर एक को है, एक दिन जहान से
जाते जाते मेरा, एक गीत गुनगुनाती जा 😀

राम कुमार वर्मा-

हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाट मत जोहो।
जानता हूँ चुनाव का
खो चुकि हो चाव तुम
और चढ़ के छत पे भरसक
खा चुकि हो ताव अब तुम
उसके उर के भार को समझो।
जीवन के उपहार को तुम ज़ाया ना खोहो,
हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाँट मत जोहो।😀

हनी सिंह-

कूद जा डार्लिंग क्या रखा है
मुख्यमंत्री बन जाने में
यो यो की तो सीडी बज री
डिस्को में हरयाणे में
रोना धोना बंद कर
कर ले डांस हनी के गाने में
रॉक एंड रोल करेंगे कुड़िये
फार्म हाउस के तहखाने में..


Posted in हास्यमेव जयते

एक कल्पना… सन 2050 छठी कक्षा…

एक कल्पना… सन 2050 छठी कक्षा…

Vishnu Arodaji


#प्रश्न !
भारत रत्न श्री पप्पू गाँधी जी के जीवन पर प्रकाश डालो।

आदरणीय पप्पू जी के जीवन की चारित्रिक विशेषताएं निम्न प्रकार हैं…

1,, #हंसमुख_और_जुझारू_नेता…
श्री पप्पू गाँधी जिन्हें लोग प्यार से युवराज भी कहते थे वो एक हँसमुख और जुझारू नेता थे। वो कठिन से कठिन कार्य सहजता से हँसते हँसते ही कर देते थे।

2,, #सादा_जीवन_उच्च_विचार…
उनका जन्म एक बहुत ही भ्रष्ट परिवार में हुआ। स्विस बैंकों में अरबो रुपयो की संपत्ति होने के बावजूद फटा हुआ कुरता पहनते थे…

3,, #मजबूत_इरादे…
युवावस्था में ही उन्होंने ठान लिया देश के विकास के लिए वो कांग्रेस मुक्त भारत का निर्माण करेंगे…। लोग भले ही मोदी जी को कांग्रेस मुक्त भारत का जनक माने, लेकिन इस शुभ काम में पप्पू जी का सहयोग नाकारा नही जा सकता… और तो और उन्होंने कभी घमंड भी नही किया।

4,, #लोकतंत्र_के_प्रति_सम्मान…
2024 में उनकी खुद की जमानत जब्त हो गयी… लेकिन उन्होंने भारतीय जनमानस के जनादेश को सहर्ष स्वीकार कर लिया… और चुपचाप परिवार सहित इटली निकल लिये।

5,, #अत्यन्त_बलशाली…
बल तो उनके अंदर कूट कूट के भरा हुआ था.. बोलते थे तो भूकंप आ जाता था.. वो अलग बात है कि उनके लाये भूकंप से किसी का बाल भी बाँका न हुआ। ये भी उनका मानवता के प्रति प्रेम ही था।

6,, #बच्चो_के_चहेते…
पप्पू जी बिना एक नया पैसा लिए पोगो चैनल के ब्रांड अम्बेसेडर भी बने रहे… और उनके जीवनकाल में चैनल की TRP अपने शिखर पर थी।

7, #अच्छे_वक्ता…
उनका भाषण देने का अंदाज ही निराला था… बीच बीच में चुटकुले छोड़ते रहते थे.. कभी कहते थे कि आलू की फैक्ट्री लगाऊंगा , तो कभी कहते कि मंदिर लोग लड़कियां छेड़ने जाते हैं…

8,, #घुमाक्कड़_प्रवृत्ति…
अपने पप्पू जी घूमने के शौक़ीन थे… अक्सर साल भर में दो दो महीने के लिये विदेशो में ज्ञानार्जन के लिए बिना बताये निकल जाते थे.. वो अलग बात है कि मोदी जी को विदेशो की सैर करने वाला प्रधानमंत्री कहते थे।

9,, #क्रांतिकारी_विचार…
क्या आप सोच सकते हैं…
आलू की फैक्ट्री के बारे में..? नहीं ना..
पप्पू जी सोच सकते थे… वो अलग बात है कि उनको मौका नही मिला.. वरना…

10, #सबको_एक_नज़र_से_देखना…
उनकी निगाहों में सबका बराबर सम्मान था.. वे भारत को एक विकसित देश बनाना चाहते थे.. वे विकसित देशों की ही तरह भारत में समलैंगिको के अधिकारों के लिए भी संघर्षरत थे।

11, #सत्ता_के_प्रति_उदासीन…
पप्पू जी जिस दिन चाहते किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बन सकते थे … लेकिन नही..
उन्होंने कभी भी किसी चमचे का हक़ नही मारा…

12, #गरीबो_के_मसीहा…
नोटबंदी के दौरान खुद लाइन में खड़े होकर 4000/- रूपये निकाले.. और उन रुपयो से विदेश टूर भी कर डाला…और उनमें से भी बचा लाये…
अब देश का गरीब ही उनसे ये कला न सीख पाया तो उनकी क्या गलती है..?

13, #मेहनत_के_कायल…
वे जीवनपर्यन्त लोगों को गंभीर समाचार सुनाकर हँसाते रहें। इसलिए अपने पुरखों के विपरीत उन्होंने भारत रत्न परिश्रम से कमाया।


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हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने वाली ईसाई संस्थाओं को कांग्रेस सरकार ने बांटें करोड़ों!

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