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चाणक्य -विजय कृष्ण पांडेय

चाणक्य –

विजय कृष्ण पांडेय

विश्व प्रसिद्ध महान विभूति को
शत् शत् नमन,,,,

नंद वंश का खात्मा कर लिया बदला,बच्चे को बना दिया था भारत का सम्राट
बिहार की धरती पर एक से बढ़कर एक महापुरुषों ने जन्म लिया है,उन्ही में से
एक ऐसे महापुरुष के बारे में हम चर्चा करेंगे जिसकी बनाई नीतियों पर आज भी
बड़े-बड़े सूरमा चलना चाहते हैं,
जिसने कूटनीति, अर्थनीति और राजनीति में ऐसे मानक स्थापित किए जो आज
भी लोगों के लिए आदर्श बने हुए हैं।

उसने राजा हो या रंक, स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध हर किसी के लिए कई
और महत्वपूर्ण नियम निर्धारित किए, जिन पर चलकर आज भी कोई किसी भी
मुकाम को हासिल कर सकता है।
उस महाज्ञानी और महाविद्वान का नाम है चाणक्य।
चाणक्य का नाम सुनते ही एक तेज-तर्रार व्यक्ति की छवि दिमाग में दौड़ जाती है।
दुनिया भर में चाणक्य को एक महान विचारक, कूटनीतिक, राजनीतिक और उच्च
कोटि के अर्थशास्त्री का दर्जा प्राप्त है।
चाणक्य ने सदियों पहले जिस अर्थशास्त्र की लिख डाला था उसे अभी भी अनुसरण
किया जाता है।
भारतीय विचारक मानते हैं कि चाणक्य उन लोगों में से एक हैं जिन्होने सबसे पहले
एकछत्र भारत की कल्पना की थी।
चाणक्य ने अपने जीवन में हमेशा उच्च विचारों और ऊंचे आदर्शों को अपनाए रखा।

—गुणों की खान थे चाणक्य
चाणक्य को एक ओर पारंगत और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में मौर्य साम्राज्य का
संस्थापक और संरक्षक माना जाता है,
तो दूसरी ओर उसे संस्कृति साहित्य के इतिहास में अपनी अतुलनीय एवं अद्भुत कृति
के कारण अपने विषय का एकमात्र विद्वान होने का गौरव प्राप्त है।
कौटिल्य की विद्वता, निपुणता और दूरदर्शिता का बखान भारत के शास्त्रों, काव्यों
तथा अन्य ग्रंथों में किया गया है।

—भरी सभा में कहा था नंद वंश का कर दूंगा समूल नाश
चाणक्य ने नंद वंश के राजा से कहा था कि व्यक्ति अपने गुणों से ऊपर बैठता है,
ऊंचे स्थान पर बैठने से कोई भी ऊंचा नहीं हो जाता है।
ये बातें चाणक्य ने तत्कालीन शक्तिशाली राजा महानंद के राजदरबार में कहीं थी।
तब मगध राज्य में किसी यज्ञ का आयोजन किया गया था।
उस यज्ञ में चाणक्य भी सम्मिलित हुए थे और जाकर एक प्रधान आसन पर बैठ
गए थे।
इनके काले कलूटे रंग को देखकर महाराज नंद इन्हे आसन से उठवा कर अपमानित किया था।
अपमान से क्रोधित होकर चाणक्य ने भरी सभा में प्रतिज्ञा की कि जबतक मैं नंद
वंश का समूल नाश नहीं कर दूंगा अपनी चोटी नहीं बाधूंगा।

—एकछत्र भारत का देखा था सपना
चाणक्य एक बहुत ही क्रोधी और बुद्धिमान ब्राम्हण थे जिन्हे कौटिल्य के नाम से
भी जाना जाता है।
चाणक्य को मौर्य साम्राज्य के संस्थापक के रूप में भी याद किया जाता है।
चाणक्य की सबसे बड़ी इच्छा थी कि भारत को एक गौरवशाली और विशाल राज्य
के रूप में देखना।

—चंद्रगुप्त के संग मिलकर लिया अपमान का बदला
उन दिनों राज्य से निकाले गए राजकुमार चंद्रगुप्त से मुलाकात चाणक्य की
मुलाकात हुई।
चाणक्य ने इस राजकुमार को शिक्षा-दीक्षा देकर योग्य राजकुमार बनाया।
जिसकी मदद से चाणक्य ने नंदवंश के ताबूत में आखिरी कील ठोकी थी।
चाणक्य ने जो अखंड़ भारत का सपना था उसे चंद्रगुप्त के साथ मिलकर पूरा किया। चंद्रगुप्त चाणक्य की मदद से संपूर्ण भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में
सफल हो गए थे।

—मौर्य वंश की नींव
मुद्रा राक्षस के मुताबिक चंद्रगुप्त मौर्य नंद वंश के राजा सर्वार्थसिद्धि के पुत्र थे,
चंद्रगुप्त की माता का नाम मुरा था जो कि एक शूद्र की पुत्री थी।
वहीं विष्णु पुराण से पता चलता है कि चंद्रगुप्त नंद वंश का ही राजकुमार था जो मुरा नामक दासी का पुत्र था।
नंद वंश की शुरुआत महापद्मानंद के द्वारा की मानी जाती है, जिसे मगध का पहला
शूद्र राजा कहा जाता है।

आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं
के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया।
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अ
र्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए।
इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और
नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन,चिंतन और
जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण
के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन
को सुचारू ढंग से बताई गई ‍नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं।
चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश –

1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती
उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष
सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना,दुस्साहस करना,छल-कपट करना,मूर्खतापूर्ण
कार्य करना,लोभ करना,अपवित्रता और निर्दयता – ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक
दोष हैं।
चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं।
हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा
सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना,उन्हें पचाने की शक्ति का होना,
सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन
देने की इच्छा होना।
ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है,जिसकी
पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से
पूरी तरह संतुष्ट रहता है।
ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है,जिसकी संतान उनकी आज्ञा का
पालन करती है।
पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे।
इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है,जिस पर विश्वास नहीं किया
जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य
को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है।
चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तनके समान है,जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है
परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख
असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है।
दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है।
निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता।
इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

8. ब्राह्मणों का बल विद्या है,राजाओं का बल उनकी सेना है,वैश्यों का बल उनका धन है
और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है।

ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें।
राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें।
वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ,
शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी
में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है।
परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है,उनका विकास
उसी प्रकार होता है।
इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें
उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी
शिक्षा नहीं दी।
क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे
हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है।
शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का
कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न
हो जाते हैं।
इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार
करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म
बहुत सौभाग्य से मिलता है,इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वे‍दादि शास्त्रों
के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं
करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं
करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है।
अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए।
उसे जो भी कार्य करना है,उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय
आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है,
क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं।
इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा
सकती है।
इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते,वह भी बहुत
समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह
मोड़ लेती है।
उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है।
इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं,
जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं।
अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को
छोड़ देता है।

18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर
रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए।
वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट
व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है।
सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना
आवश्यक है।
इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सुमंगल,,,
वन्देमातरम,,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम,,

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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