Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

रंग पंचमी


इस त्योहार के साथ जुड़े पौराणिक कथा का दावा है कि भगवान रामचंद्र फाल्गुन के महीने में अपने तेरह साल लंबे वनवास के दौरान चंदेरी को पार कर इस भूमि को पवित्र किया। इसी कारण, रंग पंचमी होली के पांच दिनों के बाद करीला की एक पहाड़ी के शीर्ष पर फाल्गुन के महीने में मनाया जाता है।

भोपाल। होली और रंगपंचमी से जुड़ी कई परम्पराएं और मान्यताएं है। ऐसी ही एक मान्यता है प्रदेश के अशोकनगर जिले के करीला में रंगपंचमी पर भरे जाने वाले मेले की। करीला स्थित मां सीता के दरबार में रंगपंचमी को होने वाला मेला आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है।
करीला में रंगपंचमी के दिन मां सीता के पुत्र लव-कुश का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसमें बेड़िया जाति की महिलाएं राई नृत्य कर उत्सव मनाती है।
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रामायण से जुड़ा है करीला के रंगपंचमी उत्सव का इतिहास
करीला में हर रंगपंचमी को भरे जाने वाले मेले के बारे में मान्यता है कि 14 साल के वनवास के बाद जब भगवान राम ने अयोध्या लौटकर सीता मां का परित्याग कर दिया तब मां सीता करीला में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आकर रही थीं। मां सीता गर्भवती थीं और महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया। कहा जाता है कि लवकुश के जन्म पर करीला में उत्सव मनाया गया था और अप्सराओं ने नृत्य किया था। जिस दिन खुशियां मनाई गई वह रंगपंचमी का दिन था। इसी मान्यता के चलते वर्तमान में बेड़िया जाति की महिलाएं जिनका पेशा राई नृत्य करना होता है वो दूर-दूर से करीला पहुंचकर मां सीता को याद कर राई नृत्य करती हैं।

मां सीता का इकलौता मंदिर
करीला में स्थित मां सीता के मंदिर के बारे में कहा जाता है कि ये देश का इकलौता मंदिर है जहां सीता भगवान राम के साथ नहीं है। मंदिर में लव-कुश के साथ मां सीता और महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति है। मां सीता का मंदिर आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। कहा जाता है कि यहां सच्चे मन से मनोकामना करने पर जरूर पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त राई नृत्य कर मां का आभार व्यक्त करते हैं। रंगपंचमी के दिन यहां हजारों लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं और राई नृत्य करवाते हैं।

राई नृत्य करने वाली महिलाओं की दुर्दशा
राई बुंदेलखण्ड का आकर्षक और मनमोहक लोकनृत्य है। इस नृत्य को सिर्फ बेड़िया जाति की महिलाएं ही करती है। आमतौर पर बुंदेलखंड अंचल में ग्रामीण इलाकों में शादी विवाह, जन्मोत्सव जैसे आयोजनों में राई नृत्य कराने की परम्परा है। लेकिन मां सीता को प्रसन्न करने के लिए राई नृत्य करने वाली बेड़िया जाति की महिलाओं को समाज में सम्मान से नहीं देखा जाता।

रंगपंचमी के दिन के अलावा राई नृत्य करने वाली इन महिलाओं को लोगों को खुश करने के लिए भी राई नृत्य करना पड़ता है। राई नृत्य के साथ ज्यादातर महिलाओं को कद्रदानों को खुश करने के लिए वो सब भी करना होता है जिसे समाज वेश्यावृत्ति के बराबर मानती है। बेड़िया जाति की कम उम्र की लड़कियां और युवतियां मानव तस्करी के जरिए डांस बार या बड़े रेडलाइट एरिया तक भेजी जा रही है। हालांकि इन महिलाओं के उत्थान के लिए समाज और सरकार ने प्रयास भी किए लेकिन इन प्रयासों का फायदा सभी को नहीं मिल पाया।

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महाराष्ट्र में होली के बाद पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा है। यह रंग सामान्य रूप से सूखा गुलाल होता है। विशेष भोजन बनाया जाता है जिसमे पूरनपोली अवश्य होती है। मछुआरों की बस्ती मे इस त्योहार का मतलब नाच, गाना और मस्ती होता है। ये मौसम रिशते (शादी) तय करने के लिये मुआफिक होता है, क्योंकि सारे मछुआरे इस त्योहार पर एक दूसरे के घरों को मिलने जाते है और काफी समय मस्ती मे व्यतीत करते हैं।[1] राजस्थान में इस अवसर पर विशेष रूप से जैसलमेर के मंदिर महल में लोकनृत्यों में डूबा वातावरण देखते ही बनता है जब कि हवा में लाला नारंगी और फ़िरोज़ी रंग उड़ाए जाते हैं।[2] मध्यप्रदेश के नगर इंदौर में इस दिन सड़कों पर रंग मिश्रित सुगंधित जल छिड़का जाता है।[3] लगभग पूरे मालवा प्रदेश में होली पर जलूस निकालने की परंपरा है। जिसे गेर कहते हैं। जलूस में बैंड-बाजे-नाच-गाने सब शामिल होते हैं। नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है। जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्राय: महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है। प्राचीनकाल में जब होली का पर्व कई दिनों तक मनाया जाता था तब रंगपंचमी होली का अंतिम दिन होता था और उसके बाद कोई रंग नहीं खेलता था।
विकिपेडिया

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