Posted in भारत का गुप्त - Bharat Ka rahasyamay Itihaas

जानिए- महारानी लक्ष्मीबाई के वंशजों का हाल, कैसे गुजारा जीवन?

 

जानिए- महारानी लक्ष्मीबाई के वंशजों का हाल, कैसे गुजारा जीवन?

http://rajivdixitayurvedic.com/lakshmibai-great-grandson-typing-to-live-life/

भारत : रानी लक्ष्मीबाई (जन्म- 19 नवम्बर 1835 to 17 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।

1857 की क्रांति में अंग्रेजी सेना को लोहे के चने चबवाने वालीं अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के वंशज आजादी के बाद बेगाने हो गए।

आजाद भारत में उन्हें गुमनामी और बदहाली का जीवन जीना पड़ा। अंग्रेज तो दामोदर राव व उनके पुत्रों को पेंशन देते रहे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद अपनी ही सरकार से उन्हें एक पाई मदद के रूप में नहीं मिली।

आर्थिक तंगी के कारण रानी के प्रपौत्र इंदौर की कचहरी में टाइपिंग कर अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे, लेकिन सरकार ने मदद का हाथ तक नहीं बढ़ाया।

अंग्रेजों की राज्य हड़पो नीति को देखते हुए झांसी के राजा गंगाधर राव व रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र के निधन के बाद राज्य के तहसीलदार काशीनाथ हरिभाऊ के चचेरे भाई वासुदेव के पुत्र दामोदर राव को गोद ले लिया था।

वासुदेव ने इस उम्मीद के साथ दामोदर राव को रानी की गोद में दिया था कि उसका पुत्र आने वाले समय में झांसी का राजा बनेगा। लेकिन, भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।

ये भी पढ़े :   क्या सच में पूरा भारतवर्ष कभी गुलाम था ? एक बार पढ़ियेगा ज़रूर क्यूँकि सच्चाई कुछ और है !!

अंग्रेजों ने गोद परंपरा को नहीं माना। 1857 में हुई क्रांति में रानी की शहादत के बाद दामोदर राव की जान को भी खतरा हो गया। ऐसे हालात में रानी के अंगरक्षक देशमुख उनको बचते बचाते किसी तरह इंदौर ले गए।

दामोदर राव को वहीं पर पाला पोसा गया। वह इंदौर में ही रहने लगे। वहां माटोरकर की पुत्री के साथ उनका विवाह हो गया। 1872 में दामोदर राव की पत्नी का निधन हो गया, इसके बाद बलवंत राव की पुत्री से उनका दूसरा विवाह हुआ, जिससे लक्ष्मण राव पैदा हुए।

महाश्वेता देवी की पुस्तक ‘झांसी की रानी’ के अनुसार 1870 में इंदौर में अकाल पड़ा था। इस दौरान दामोदर राव एक सूदखोर महाजन के कर्ज में फंस गए। दामोदर राव ने सहायता के लिए इंदौर के रेजीडेंट जनरल से कई बार निवेदन किया, लेकिन मदद नहीं मिली।

इसके बाद दामोदर राव ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड नोर्थब्रुक से अनुरोध किया। उनके निर्देश पर रेजीडेंट ने उन्हें एक मुश्त दस हजार रुपये और दो सौ रुपये मासिक पेंशन देना स्वीकृत की। उनकी मृत्यु के बाद 100 रुपये मासिक पेंशन उनके पुत्र लक्ष्मण राव को भी मिली। आजाद भारत होते ही सारी सुविधाएं छीन ली गईं।

लक्ष्मण राव के प्रपौत्र योगेश राव के अनुसार देश की आजादी के बाद उनके परिजनों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित का प्रमाण पत्र भी नहीं मिला, इस कारण उन्हें वह सुविधाएं भी नहीं मिलीं जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों को मिल रही हैं।

स्थिति यह रही कि उनके दादाजी कृष्ण राव को आजाद भारत में इंदौर की कचहरी में टाइपिस्ट का कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करना पड़ा। योगेश राव अपने परिवार के साथ नागपुर में रहते हैं। वह लोकेशन गुरु सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर हैं।

Advertisements

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s