Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

रामायण कथा का एक अंश


*रामायण कथा का एक अंश*
जिससे हमे *सीख* मिलती है *”एहसास”* की… जो मुझे बहुत भाता है-

*श्री राम, लक्ष्मण एवम सीता’ मैया* चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत *पथरीली और कंटीली* थी !
कि यकायक *श्री राम* के चरणों में *कांटा* चुभ गया !

श्रीराम *रुष्ट या क्रोधित* नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध* करने लगे !
बोले- “माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना* है आपसे, क्या आप *स्वीकार* करेंगी?”

*धरती* बोली- “प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए!”

प्रभु बोले, “माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज में इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम* हो जाना!
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और काँटे छुपा लेना!
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव में *आघात* मत होने देना!”

श्रीराम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई!
पूछा- “भगवन, धृष्टता क्षमा हो! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार हैं?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नहीं कर पाँएगें?
फिर उनको लेकर आपके चित्त में ऐसी *व्याकुलता* क्यों?”

*श्री राम* बोले- “नहीं… नहीं… माते,
आप मेरे कहने का अभिप्राय नहीं समझीं!
भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नहीं बल्कि उसके *हृदय* को विदीर्ण कर देगा!”

*”हृदय-विदीर्ण*!! ऐसा क्यों प्रभु?”,
*धरती माँ* ने जिज्ञासा भरे स्वर में पूछा!

श्रीराम ने पृथ्वी माँ की जिज्ञासा को शाँत करने हेतु बताया-
“अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि… इसी *कंटीली राह* से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल* उनके पगों मे भी चुभे होंगे!
मैया, मेरा भरत कल्पना में भी मेरी *पीड़ा* सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति में आप *कमल पँखुड़ियों सी कोमल* बन जाना..!!”

अर्थात
*रिश्ते* अंदरूनी एहसास व आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं।
जहाँ *गहरी आत्मीयता* नहीं, वो रिश्ता *’रिश्ता’* नहीं *’दिखावा’* हो सकता है!

इसीलिए कहा गया है कि…
*’रिश्ते’…*
*खून* से नहीं…
*परिवार* से नहीं…
*मित्रता* से नहीं…
*व्यवहार* से नहीं…
बल्कि…
सिर्फ और सिर्फ
*आत्मीय “एहसास”* से ही…
*बनते और निर्वहन* किए जाते हैं।
जहाँ *एहसास* नहीं…
*आत्मीयता* नहीं…
वहाँ *अपनापन* कहाँ से आएगा…!

*हम सबके लिए प्रेरणास्पद लघुकथा।*

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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