Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दान भी दुःख का कारण बन सकता हैं। Vikram Prakash Raisoni


दान भी दुःख का कारण बन सकता हैं।
दान देने से पहले जरा सोच लें ?
दान करना हमारे समाज में अति शुभ माना गया है। लेकिन कई बार
यह दान दुःख का कारण भी बन जाता है। हमारे
आसपास ऐसे कई व्यक्ति है जो कि ज्यादा दान या ज्यादा धर्म में
लीन रहते है। फिर भी कष्ट उनका व
उनके परिवार का पीछा नहीं छोड़ता तब हम
अपने को सांत्वना स्वरूप यह कह कर संतोष करते है कि भगवान
शायद हमारी परीक्षा ले रहा है।
अरे भाई भगवान् कोई तुम्हारी परीक्षा-
वरीक्षा नही ले रहा, बल्कि वो तो तुम्हारे
ही कर्मो का फल तुम्हे दे रहा है। बहुत दान धर्म
करने के बाद भी सुख
नही मिलता क्योकि तुम्हारे द्वारा दिया दान
ही दुःख का कारण बन जाता है।
एक समय की बात है। एक बार एक गरीब
आदमी एक सेठ के पास जाता है और भोजन के लिए
सहायता मांगता है। सेठ बहुत धर्मात्मा होता है वो उसे पैसे
देता है। पैसे लेकर व्यक्ति भोजन करता है, और उसके पास कुछ
पैसे बचते है जिससे वो शराब पी लेता है। शराब
पीकर घर जाता है और
अपनी पत्नी को मारता है।
पत्नी दुखी होकर अपने दो बच्चो के साथ
तालाब में कूद कर आत्म हत्या कर लेती है।
कुछ समय बाद उस सेठ की भी असाध्य रोग
से मृत्यु हो जाती है। मरने के बाद सेठ जब ऊपर
जाता है तब यमराज बोलते है कि इसको नरक में फेंक दो। सेठ यह
सुनकर यमराज से कहता है कि आपसे गलती हुई
है, मैने तो कभी कोई पाप
भी नही किया है, बल्कि जब
भी कोई मेरे पास आया है मेने
उसकी हमेशा मदद
ही की है। इसलिये मुझे एक बार भगवान्
से मिला दो। तब यमराज उसे बोलते है कि हमारे
यहाँ तो गलती की कोई
संभावना नही है, गलतिया तो तुम लोग
ही करते हो। पर सेठ के बहुत कहने पर यमराज
उसे भगवान् के समक्ष पेश करते है।
भगवान् के सामने जाकर सेठ बोलता है प्रभु मैने तो कोई पाप
किया ही नही है तो मुझे नरक
क्यों दिया जा रहा है। तब भगवान् उसे उस गरीब
व्यक्ति को पैसे देने वाली बात बताते है कि उस
व्यक्ति की पत्नी और
दो बच्चो की जीव हत्या का कारण तू है।
तू उसे पैसे न देता तो वो शराब पीकर
अपनी पत्नी को दुःख
नही देता। सेठ बोलता है प्रभु मेने तो एक
गरीब को दान दिया है और शास्त्रों में
भी दान देने की बात लिखी है।
तब भगवान् ने कहा कि दान देने से पहले पात्र
की योग्यता तो परखनी चाहिए
की वो दान लेने के योग्य है या नहीं,
या उसे किस प्रकार के दान की जरुरत है। तुमने धन
देकर उसकी मदद क्यों की, तुम
उसको भोजन भी करा सकते थे। और
रही बात
उसकी दरिद्रता की तो उसे देना होता तो में
ही दे देता, वो जिस योग्य था उतना मैने उसे दिया, जब मैने
ही उसकी अयोग्यता के कारण उससे सब
कुछ नही दिया तो तुम्हे उसे क्या जरुरत
थी धन देने की, तुम उसे भोजन
भी करवा सकते थे। और तुम्हारे दिये हुए धन-दान के
कारण तीन जीव हत्याए हुई है और इन
हत्याओ के पाप का फल अब तुम्हे भुगतना पड़ेगा।
मित्रों इस कहानी से तात्पर्य ये हैं की दान
देने से पहले ये परखले की आप जो दान कर रहे है
उसका उपयोग किसी पाप कर्म में
तो नही हो रहा है। भले हि दान हेतु आपके भाव
श्रेष्ठ हो परन्तु आपके द्वारा दिये दान से कोई पाप कर्म फलित
होता है, तो आपको उस दिए दान के पुण्य के साथ-साथ उसके पाप
के फल को भी भोगना होगा।
एक छोटा सा उदाहरण और बताता हूँ।
कन्या दान सभी दानो में श्रेष्ठ दान है और माता-
पिता अपनी सूझ-बूझ से एक योग्य वर
को अपनी कन्या दान दे देते है, परन्तु फिर
भी माता-पिता की सूझ-बूझ में चूक रह
जाती हैं। और विवाह बाद वर
की अयोग्यता के कारण उस कन्या को दुःख होता है।
और कन्या के उस दुःख का दर्द जीवन भर माता-
पिता को भोगना पड़ता है।
तो दुःख क्यों आया ?
ज्ञान में कमी के कारण।
जहाँ हमारी सूझ-बूझ कमजोर हुई,
जहाँ हमारी परख कमजोर हुई, जहाँ हमारा अनुभव
कमजोर हुआ बस वही से दुःख वहीं से
शुरू ही गया।
तो जैसे गलत वर को किया गया कन्यादान का दुःख माता-
पिता को भोगना पड़ता है, वैसे ही जीवन में
किया गया एक छोटा सा गलत दान भी दुःख का कारण बन
सकता है।

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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