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प्राचीन हिन्दू समाज, हिन्दू शास्त्रों में स्त्री कि गरिमा का महिमामंडन – Sanjay Arun Arora


प्राचीन हिन्दू समाज, हिन्दू शास्त्रों में स्त्री कि गरिमा का महिमामंडन

हिन्दू समाज में महिलाओं के विशिष्ठ स्थान का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक हिन्दू देवता के साथ उस की पत्नी का नाम, चित्र, तथा प्रतिमा का भी वही महत्व होता है जो देवता के लिये नियुक्त है। पत्नियों का मान सम्मान भी देवता के समान ही होता है और उन्हें केवल विलास का निमित मात्र नहीं समझा जाता। पत्नियों को देवी कह कर सम्बोधित किया जाता है तथा उन के सम्मान में भी मन्त्र और श्लोक कहे जाते हैं। देवियों को भी उन के पतियों की भान्ति वरदान तथा श्राप देने का अधिकार भी प्राप्त है।

वेदों में नारी का गौरवमय स्थान इससे भी ज्ञात होता है कि नारी को ही घर कहा गया है –

जायेदस्तं मधवन्त्सेदु योनि
स्तदित्वा युक्ता हरयो वहन्तु॥ – ऋग्वेद 3।53।4

अर्थात् घर, घर नहीं है अपितु गृहिणी ही गृह है। गृहिणी के द्वारा ही गृह का अस्तित्व है। यही भाव एक संस्कृत सुभाषित में कहा गया है कि गृहिणी ही घर है

“न गृहं गृहमित्याहुः, गृहिणी गृहमुच्यते।”

यही नहीं स्त्री को सरस्वती का रूप मानते हुए कहा गया है –

प्रति तिष्ठ विराडसि, विष्णुरिवेह सरस्वति। सिनीवालि प्र जायताँ, भगस्य सुमतावसत्॥ अथर्ववेद – 14।2।15

हे नारी ! तुम यहाँ प्रतिष्ठित हो। तुम तेजस्विनी हो। हे सरस्वती ! तुम यहाँ विष्णु के तुल्य प्रतिष्ठित होना। हे सौभाग्यवती नारी ! तुम सन्तान को जन्म देना और सौभाग्य देवता की कृपा दृष्टि में रहना।

हिन्दू समाज में स्त्रियों के विशिष्ट स्थान को दर्शाने के लिये मनुस्मृति का निम्नलिखित श्लोक पर्याप्त हैः-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।। (मनु स्मृति 3-56)

जिस कुल में स्त्रीयाँ पूजित होती हैं, उस कुल से देवता प्रसन्न होते हैं। जहाँ स्त्रीयों का अपमान होता है, वहाँ सभी ज्ञानदि कर्म निष्फल होते हैं।

शिक्षा

ऋगवेद काल, उपनिषद काल में स्त्रियाँ भी, अपनी शैक्षणिक अनुशासन के अनुसार , ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती हुई शिक्षा ग्रहण करती थीं । तत्पश्चात अपना विवाह रचाती थीं ।

ईशा से ५०० साल पूर्व , वैयाकरण पाणिनि द्वारा पता चला है, नारी, वेद अध्ययन भी करती थी तथा स्तोत्रों की रचना करती थी ;जो ’ब्रह्म वादिनी’ कही जाती थी । इनमें रोमशा लोपामुद्रा, घोषा, इन्द्राणी नाम प्रसिद्ध हैं । ’पंतजलि’ में तो नारी के लिए ’शाक्तिकी’ शब्द का प्रयोग किया गया है; अर्थात ’ भाला धारण करने वाली’ । इससे प्रतीत होता है, कि नारी को सैनिक शिक्षाएँ भी लिया करती थी और पुरुषों की भांति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाती थी ।

व्यक्तिगत स्वतन्त्रता

आदि काल से ही सभी देशों और समाजों में स्त्रियां आँतरिक और पुरुष बाह्य जिम्मेदारियां निभाते चले आ रहे हैं। हिन्दू समाज में वैदिक काल से ही स्त्रियों को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त रही है। वह अपने व्यक्तित्व के विकास के लिये पुरुषों के समान वैदिक पठन पाठन, मनोरंजन के लिये संगीत, नृत्य, और चित्रकला आदि का अभ्यास कर सकती थीं। शास्त्र पठन के इलावा स्त्रियाँ अपनी सुरक्षा के लिये शस्त्र विद्या में भी निपुण हो सकती थीं। वह अध्यात्मिक उन्नति के लिये सन्यासाश्रम में भी रह सकती थीं। स्वतन्त्र आर्थिक निर्भरता के लिये कोई सा भी व्यवसाय अपने लिये चुन सकती थीं। अपनी रुचि अनुसार अध्यापन, चिकित्सा, नाटक, गणित, खगोलशास्त्र के क्षेत्र में अपना योगदान दे सकती थीं और समय पड़ने पर रानी कैकेयी की तरह अपने पति दशरथ के साथ युद्ध क्षेत्र में सहयोग भी कर सकती थीं। गृहस्थ अथवा संन्यास आश्रम में पति के साथ वनों में भी रह सकती थीं। सीता, अहिल्लया, अरुन्धाती, गार्गी, सावित्री, अनुसूईया आदि कई उल्लेखनीय स्त्रियों के नाम गिनाये जा सकते हैं जिन्हों ने विविध क्षेत्रों में अपना योग दान दिया है।

समाज में स्त्रियों के कल्याण के महत्व को समाजशास्त्र के जनक मनु महाराज ने इस प्रकार उजागर किया हैः-

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।

न शोचन्ति नु यत्रता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। (मनु स्मृति 3-57)

जिस कुल में बहू-बेटियां क्लेश भोगती हैं वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। किन्तु जहाँ उन्हें किसी तरह का दुःख नहीं होता वह कुल सर्वदा बढ़ता ही रहता है।

हिन्दू समाज की तुलना में अन्य समुदायों, धर्मों, सभ्यताओं और देशों में स्थिति पूर्णत्या इस के उलट है। वहाँ स्त्रियों को केवल मनोरंजन और विलास का साधन मान कर हरम के पर्दे के पीछे ही रखा जाता रहा है। उन्हें पुरुषों के समान विद्या पढ़ने से वँचित किया जाता है। और तो और वह सार्वजनिक तौर पर पूजा पाठ भी नहीं कर सकतीं। असमानतायें यहाँ तक हैं कि न्याय क्षेत्र में स्त्रियों की गवाही को पुरूषों के विरुध स्वीकारा भी नहीं जाता।

विवाहित सम्बन्ध

हिन्दू समाज में स्त्री-पुरुष का विवाहित सम्बन्ध केवन सन्तान उत्पति के लिये ही नहीं, बल्कि समस्त धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में योग दान देने के लिये होता है। कोई भी यज्ञ या अनुष्ठान पत्नी के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। इसी लिये पत्नी को धर्मपत्नी कह कर सम्बोधित किया जाता है। अन्य समाजों में प्रेमिका से विवाह करने का प्राविधान केवल शारीरिक सम्बन्धों का अभिप्राय प्रगट करता है किन्तु हिन्दू समाज में ‘जिस से विवाह करो-उसी से प्रेम करो’ का सिद्धान्त कर्तव्यों तथा अध्यात्मिक सम्बन्धों का बोध कराता है। हिन्दू धर्म में सम्बन्ध-विच्छेद (डाइवोर्स) का कोई प्रावधान नहीं। विवाह जीवन-मरण का साथ होता है और व्यवसायिक सम्बन्ध ना हो कर कई जन्मों का धर्मप्रायण सम्बन्ध होता है।

पति-पत्नि के अतिरिक्त विवाह के माध्यम से दो परिवारों के कई सदस्यों का समबन्ध भी जुडता है और समाज संगठित होता जाता है। विवाह की सफलता के लिये जरूरी है कि वर तथा वधु के बीच शरीरिक, वैचारिक, आर्थिक तथा सामाजिक रहनसहन में ऐकीकरण हो। थोडी बहुत ऊँच-नीच की कमी धैर्य, सहनशीलता, परिवर्तनशीलता आदि से पूरी करी जा सकती है किन्तु अगर विरोधाभास बहुत ज्यादा हों तो वैवाहिक जीवन और परिवारिक सम्बन्ध असंतोषजनक होते हैं। इसी लिये भावावेश में केवल सौन्दर्य या किसी ऐक पक्ष से प्रभावित होकर वर-वधु के आपस में विवाह करने के बजाये हिन्दू समाज में अधिकतर माता पिता ही यथार्थ तथ्यों की जाँच कर के ही अपनी सन्तान का विवाह संस्कार करवाते हैं। इसे ही जातीय विवाह या अरैंजड मैरिज कहते हैं। इसी कारण हिन्दू समाज में तलाक आदि बहुत कम होते हैं।

स्वयंवर प्रथा

हिन्दू कन्याय़ें प्राचीन काल से ही स्वयंवर प्रथा के माध्यम से अपने लिये वर का चुनाव करती रही हैं। उन्हें भरे बाजार नीलाम नहीं किया जाता था। साधारणतया माता पिता ही अपनी सन्तान का विवाह संस्कार करवाते हैं परन्तु कन्याओं को रीति रिवाज रहित गाँधर्व विवाह करने की अनुमति भी रही है जिस को हिन्दू समाज ने मान्यता प्राचीन काल से ही दी हुयी है। आज कल के परिवेश में इसे लव-मेरिज कहा जाता है। किन्तु हिन्दू समाज में निर्लज्जता अक्ष्म्य है। निर्लज औरत को शूर्पणखा का प्रतीक माना जाता है फिर चाहे वह परम सुन्दरी ही क्यों ना हो। सामाजिक सीमाओं का उल्लंघन करने वाली स्त्री का जीवन सरल नहीं है। इस तथ्य को रामायण की नायिका सीता के संदर्भ में भी देखा जा सकता है जिसे आदर्श पत्नी होते हुये भी केवल एक अपरिचित सन्यासी रूपी रावण को भिक्षा देने के कारण परिवार की मर्यादा का उल्लंधन करने की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और परिवार में पुनः वापिस आने के लिये अग्नि परीक्षा से उत्तीर्ण होना पड़ा था।

अन्तर्जातीय विवाह

हिन्दू इतिहास में अन्तर्जातीय विवाहों का चलन भी रहा है। वेदों के संकलन कर्ता महा ऋषि वेद व्यास अवैवाहित मछवारी कन्या सत्यवती, और पिता ऋषि पराशर की सन्तान थे। इसी सत्यवती से कालान्तर कुरु वंश के क्षत्रिय राजा शान्तनु ने विवाह किया था। शान्तनु की पहली पत्नी गंगा से उन के पुत्र भीष्म थे जिन्हों स्वेच्छा से प्रतिज्ञा कर के हस्तिनापुर के सिंहासन का त्याग कर दिया था ताकि सत्यवती से उत्पन्न पुत्र उत्तराधिकारी बन सके।

ब्राह्मण दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवय्यानी का विवाह क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ था। इसी प्रकार ब्राह्मण कन्या शकुन्तला का विवाह भी क्षत्रिय राजा दुष्यन्त से हुआ था। पाँडू पुत्र भीम का विवाह राक्षसी कन्या हिडम्बा से, अर्जुन का विवाह यादव वँशी सुभद्रा तथा नाग कन्या उलूपी के साथ हुआ था।

गृह लक्ष्मी की प्रतिमूर्ति

परिवार ही ऐसी संस्था है जो समाज के विकास को आगे बढ़ाती है। परिवार में स्त्रियों का योगदान सर्वाधिक तथा केन्द्रीय है। हिन्दू परिवारों में कीर्तिमान के तौर पर ऐक आदर्श गृहणी को ही दर्शाया जाता है। उस की छवि गृह लक्ष्मी, आदर्श सहायिका तथा आदर्श संरक्षिता की है। भारतीय स्त्रियों के आदर्श ‘लैला ’ और ‘ज्यूलियट’ के बजाय सीता, सावित्री, गाँधारी, दमयन्ती के चरित्र रखे जाते है। प्रतीक स्वरूप स्त्रियां अपने चरित्र निर्माण के लिये समृद्धि रूपणी लक्ष्मी, विद्या रूपणी सरस्वती या फिर वीरता रूपणी दुर्गा की छवि को कीर्तिमान बना सकती हैं। हमारे इतिहासों में कई शकुन्तला, सीता तथा जीजाबाई जैसी महिलाओं के उल्लेख हैं जिन्हों ने अपने पति से बिछुडने के पश्चात कठिनाइयों में अकेले रह कर भी अपनी सन्तानों को ना केवल पाला, बल्कि उन का मार्ग दर्शन कर के उन्हें वीरता का पाठ भी पढाया।

इस संदर्भ में शर्म की बात है कि आज भारत में मदर्स डे मनाने के लिये हमारी युवा पीढी भारत की आदर्श महिलाओं को भुला कर किसी अनजानी और अनामिक विदेशी ‘मदर ’ को ही प्रतीक मान पाश्चात्य देशों की भेड चाल में लग रही है। वास्तविक मदर्स डे तो अपनी माता की जन्म तिथि होनी चाहिये।

प्राकृतिक असमानतायें

हिन्दू मतानुसार स्त्री-पुरुष दोनो के जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष प्राप्ति के साधन भी दोनो के लिये समान हैं। जीवन शैली में पवित्रता, आत्म-नियन्त्रण, आस्था तथा सातविक्ता का होना स्त्री पुरुष दोनो के लिये आवश्यक है। किन्तु हिन्दू समाज स्त्री पुरुष के शरीर की प्राकृतिक विभिन्नताओं के प्रति भी जागरूक है। दोनो के बीच जो मानसिक तथा भावनात्मिक अन्तर हैं उन को भी समझा है। स्त्रियों के शरीर का प्रत्येक अंग उन विषमताओं का प्रगटीकरण करता है। उन्हीं शरीरिक, मानसिक तथा भावनात्मिक असमानताओं पर विचार कर के स्त्री-पुरुषों के लिये अलग अलग कार्य क्षेत्र तथा आचरण का प्रावधान किया गया है।

प्रतिदून्दी नहीं, जीवन संगिनी

समस्त विश्व में स्त्री पुरुष के आपसी कर्तव्यों में एक परम्परा रही है जिस के फलस्वरूप पुरुष साधन जुटाने का काम करते रहै हैं और स्त्रियाँ साधनों के सदोप्योग का कार्य भार सम्भालती रही हैं। आजकल पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण कुछ लोग स्त्री-पुरुषों में लैंगिक समान्ता का विवाद खडा कर के विषमता पैदा कर रहै हैं। वह इसलिये भ्रम पैदा कर रहै हैं ताकि भारतीय महिलायें पाश्चात्य संस्कृति को अपना लें। स्त्रियाँ पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करें और प्रतिदून्दी की तरह अपना अधिकार माँगें। स्त्रियाँ सहयोगिनी बनने के बजाय उन की प्रतिदून्दी बन जायें और हिन्दू समाज में परिवार की आधार शिला ही कमजोर हो जाये।

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नारी को समुन्नत किया जाए


नारी को समुन्नत किया जाए

 

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/January/v2.23

पुरुष विष्णु है स्त्री लक्ष्मी, पुरुष विचार हे स्त्री भाषा, पुरुष धर्म है स्त्री बुद्धि, पुरुष तर्क है स्त्री रचना, पुरुष धैर्य है स्त्री शान्ति, पुरुष प्रयत्न है स्त्री इच्छा, पुरुष दया है स्त्री दान, पुरुष मंत्र है स्त्री उच्चारण, पुरुष अग्नि है स्त्री ईंधन, पुरुष समुद्र है स्त्री किनारा, पुरुष धनी है स्त्री धन, पुरुष युद्ध है स्त्री शान्ति, पुरुष दीपक है स्त्री प्रकाश, पुरुष दिन है स्त्री रात्रि, पुरुष वृक्ष है स्त्री फल, पुरुष संगीत है स्त्री स्वर, पुरुष न्याय है स्त्री सत्य, पुरुष सागर है स्त्री नदी, पुरुष दण्ड है स्त्री पताका, पुरुष शक्ति है स्त्री सौंदर्य, पुरुष आत्मा है स्त्री शरीर।

उक्त भावों के साथ विष्णु पुराण में बताया है कि पुरुष और स्त्री की अपने-अपने स्थान पर महत्ता, एक से दूसरे के अस्तित्व की स्थिति, एक से दूसरे की शोभा आदि सम्भव है। एक के अभाव में दूसरा कोई महत्व नहीं रखता। स्त्री पुरुष की समान भूमिका का दर्शन वैदिक काल में बड़े ही व्यवस्थित रूप में था। पुरुषों की तरह ही स्त्रियाँ भी स्वतन्त्र थीं, साथ ही जीवन के सभी क्षेत्रों में भाग लेती थीं। राजनीति, समाज, धर्म सभी में नारी का महत्वपूर्ण स्थान था। कोई भी कार्य नारी के अभाव में पूर्ण नहीं माना जाता था। शिक्षा, संस्कृति में उनका समान अधिकार था। स्त्रियाँ यज्ञोपवीत धारण करती थीं, यज्ञ, वेदाध्ययन आदि में पूरा-पूरा भाग लेती थीं। इसी समय लोपा मुद्रा, धोबा, गार्गी, मैत्रेयी आदि वेदों की मन्त्र द्रष्टा, ब्रह्मवादिनी हुई।

इतना ही नहीं स्त्रियों को विशेष आदर सम्मान का अधिकार देते हुए मनु भगवान ने लिखा है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता”। जहाँ नारियों का सम्मान नहीं होता उन्हें पूज्य भाव से नहीं देखा जाता, वहाँ सारे फल, क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं।

“यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।”

दुर्व्यवहार की कुचेष्टा-

परिस्थितियों के बदलने के साथ ही नारी जीवन की दुर्दशा शुरू हो गई और कालान्तर में उसके स्वतन्त्रता, समानता, आदर के अधिकार छीन कर उसे घर की चहार दीवारी, पर्दों की ओट में बन्द कर दिया गया। बाह्य आक्रमणों के काल से भारतीय नारी जीवन की भारी दुर्दशा हुई और नारी का गौरव, सम्मान, अधिकार सब छीन लिए गये। नारी एक निर्जीव गुलाम की तरह पीड़ित की जाने लगी। उसका दमन होने लगा।

नारी का परिवार में जो गृहलक्ष्मी, गृहिणी का स्थान था, वहाँ उसे सास, ससुर, पति, देवर, नन्द, जिठानी के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, पति के मर जाने पर उसे राक्षसी, कुलटा, दुराचारिणी कहा जाने लगा, अथवा जीवित ही ज्वाला में झोंक दिया गया सती के नाम पर। समाज में किसी व्यक्ति का देख लेना, बात चीत कर लेना उसके चरित्र का कलंक समझा जाने लगा। पुरुष ने साम दाम दण्ड भेद से मनचाहा नारी पर शासन किया, अत्याचार किये उस पर।

फलतः मानव जीवन का अर्द्धांग बेकार, हीन, अयोग्य बन गया। आधे शरीर में लकवा दौड़ जाने पर सारे शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। ठीक यही बात हमारे जीवन के साथ हुई। हमारे सामाजिक पतन, का मुख्य कारण स्त्रियों की यह दुरवस्था भी रही है।

नारी का विकास आवश्यक-

राष्ट्र को विकास और स्वतन्त्रता की नई प्रेरणा देने वाले महापुरुषों ने इस कमी को अनुभव किया और समाज को सशक्त सबल बनाने के लिए स्त्रियों के अधिकारों की नई परिभाषा करनी पड़ी। उनकी दुरवस्था, शोषण, उत्पीड़न को बन्द करके पुरुष के समान अधिकार देने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई। महर्षि दयानन्द ने नारी के अधिकारों का व्यापक आन्दोलन ही चलाया। स्वामी विवेकानन्द के समाज को चेतावनी दी कि “जिस देश राष्ट्र में नारी की पूजा उसका सम्मान नहीं होगा, वह राष्ट्र, समाज कभी भी उन्नत और महान नहीं हो सकता। लाला लाजपतराय ने कहा “स्त्रियों का प्रश्न पुरुषों का प्रश्न है। दोनों का ही एक दूसरे के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। पुरुषों की उन्नति के लिए सदैव ही स्त्री के सहयोग की आवश्यकता है।” महामना मदन मोहन मालवीय ने विधिवत् विद्वानों का सम्मेलन करके स्त्रियों के लिए यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, यज्ञ आदि सामाजिक कृत्यों में पूर्ण अधिकारों की घोषणा की। शारदा एक्ट, मैरेज एक्ट आदि बने। विवाह आदि की मर्यादायें निश्चित की गईं। भारतीय संविधान में लड़की को भी उत्तराधिकार, आर्थिक क्षेत्र में तथा अत्याचार के विरुद्ध बोलने का अधिकार देकर नारी जाति की स्वतन्त्रता, सुरक्षा, विकास और उसकी समानता का प्रयत्न किया गया।

लक्ष्य से बहुत पीछे-

इन सब प्रयत्नों के बावजूद अभी भारतीय नारी अपने लक्ष्य से बहुत पीछे है। पर्दा प्रथा, दहेज लड़के-लड़की में असमानता का भाव आदि कुछ कम अभिशाप नहीं हैं नारी के लिए। अब भी भारतीय स्त्रियों की बहुत बड़ी संख्या घर की चहार दीवारी के भीतर कैद है। उन्हें सदाचार शील आदि का बहाना लेकर पर्दे बुर्का आदि में बन्द कर रखा है। जिस पौधे को पर्याप्त प्रकाश, हवा नहीं मिलती वह मुरझा जाता है। अधिकाँश स्त्रियों में भी पीले चेहरे, बीमारियाँ, रोग, कुछ कम नहीं फैल रहे हैं। अब भी स्त्री को वासना तृप्ति का साधन समझा जाता है। एक स्त्री के मरने पर ही नहीं, उसके जीवित रहते दूसरे ब्याह, दूसरी स्त्रियों से संपर्क किए जाते हैं। बड़े-बड़े नगरों, शहरों में वेश्याओं के केन्द्र नारी जीवन की दुर्गति और समाज के कलंक के रूप में अब भी प्रकट अथवा अप्रकट रूप में स्थित हैं।

हमारे पारिवारिक जीवन में नारी पर घर वालों के द्वारा होने वाले अत्याचार अब भी बने हुए हैं। उन्हें सताया जाता है। ताड़ना दी जाती है। गुलामों की तरह रहने को बाध्य किया जाता है। अन्य लोगों को खाने को अच्छा मिलता है जबकि सारा काम करने वाली बहू रूखा सूखा खाकर पेट भरती है। यह उन चन्द शहरी या शिक्षित घरानों की बात नहीं वरन् भारत के अस्सी प्रतिशत परिवारों की कहानी है जो गाँवों में बसे हैं। दहेज क्या नारी का अपमान नहीं है?

प्राचीन सम्मान पुनः मिले-

सुधार के विभिन्न प्रयत्नों के बावजूद भी यथार्थ की धरती पर भारतीय नारी का जीवन अभी बहुत बड़े क्षेत्र में अविकसित पड़ा है । यह हमारे सामाजिक जीवन, पुरुष के अर्द्धांग की विकृति है जिसने सारी प्रगति को ही अवरुद्ध कर रखा है। अन्ध परम्परा, अन्ध विश्वास, रूढ़िवाद, संकीर्णता व्यर्थ के अभिमान को त्याग कर नारी को उसके उपयुक्त स्थान पर प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। इसी में पुरुष और समाज तथा राष्ट्र को उन्नति निहित है नारी का उत्थान पुरुष का उत्थान है। नारी की प्रगति पुरुष की प्रगति है। दोनों का जीवन परस्पर आश्रित है।

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‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ इत्यादि – मनुस्मृति के वचन


‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ इत्यादि – मनुस्मृति के वचन

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते …’कहते हुए समाज में स्त्रियों को सम्मान मिलना चाहिए की बात अक्सर सुनने को मिलती हैं । सम्मान तो हर व्यक्ति को मिलना चाहिए, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, धनी हो या निर्धन, आदि । किंतु देखने को यही मिलता है कि व्यक्ति शरीर से कितना सबल है, वह कितना धनी है, बौद्धिक रूप से कितना समर्थ है, किस कुल में जन्मा है, आदि बातें समाज में मनुष्य को प्राप्त होने वाले सम्मान का निर्धारण करते हैं । सम्मान-अपमान की बातें समाज में हर समय घटित होती रहती हैं, किंतु स्त्रियों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की बात को विशेष तौर पर अक्सर उठाया जाता है । फलतः उक्त वचन लोगों के मुख से प्रायः सुनने को मिल जाता है ।

उक्त वचन मनुस्मृति के हैं जो एक विवादास्पद ग्रंथ माना जाता है, फिर भी जिस पर हिंदू समाज के नियम-कानून…

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“नारी” विनाशकारी या मंगलदायनी…….(राज शिवम)


“नारी” विनाशकारी या मंगलदायनी…….(राज शिवम)

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता

https://worldisahome.blogspot.com/2011/03/blog-post_08.html

जहाँ नारी की पूजा होती है,वहाँ देवताओं का निवास होता है।जर्मनी के महान कवि गेटे ने नारी के प्रतिअपनी श्रद्धाव्यक्त करते हुए कहा कि अपना घर और अच्छी नारी स्वर्ण और मुक्ताओं के समान है।डा.सेमुअल जानसनके शब्दों में नारी के बिना पुरुष की बाल्यावस्था असहाय है,युवावस्था सुखरहितहै,और वृद्धावस्थासांत्वना देने वाले सच्चे और वफादार साथी से रहित है।वास्तव में नारीशक्तिरुपीणी है,ये मूल प्रकृति औरजीवों की जननी है।माँ,बहन या पत्नी सभी रुपों में नारी हमारी शक्ति पुंजहै।समय के साथ नारी के कल्याणकारीस्वरुप का क्षरण होता गया और एक समय आया जब नारी कोसमस्त पापों का मूल मानकर सर्वथा निंदय औरत्याज्य बता दिया।

ऐसा कैसे सम्भव हुआ,कि नारी को नरक का द्वार कहा जाने लगा।नारी के शील,सम्मान का अपहरण होनेलगा।नारीसिर्फ भोग विलास का साधन या पुरुषों की गुलाम समझी जाने लगी।नारी को बहुत सी साधन सेवंचित किया गया।अंततः आज एक यह भी कारण है,कि हमारा देश,राष्ट्र,समाज और परिवार विनाशकारीकगार पर आकर खड़ा हो गयाहै।नारी जीवन की यह त्याग रही है,वह पुरुष को जन्म देकर तथा उसकोसर्वसमर्थ बना कर अपने को उसके प्रतिसमर्पित कर देती है,लेकिन यह हमारा पुरुष प्रधान समाज उसनारी को सदा तिरस्कृत करता रहा है।समाज केसमक्ष नारी अबला बन कर रहने लगी इसलिए तो कहागया-

अबला जीवन हाय!तुम्हारी यही कहानी।

आँचल में है दूध और आँखों में पानी॥

कवि जयशंकर प्रसाद जी नारी के सहज कल्याणकारी स्वरुप का दर्शन किया और समाज को सावधानकरते हुएकहा कि-

जिसे तुम समझे हो अभिशाप,

जगत की ज्वालाओं का मूल।

ईश का वो रहस्य वरदान,

कभी मत उसको जाओ भूल।

अवसर उपस्थित होने पर नारी ने अपने शक्तिशाली रुप को एक बार नहीं अनेक बार प्रकट किया है।अबलानारी केसबला रुप को दुर्गा,चण्डी,भवानी,रानी दुर्गावती,रानी लक्ष्मीबाई,इंदिरा गाँधी,श्रीमति भंडारनायकऔर मार्गरेट थैयरके रुप में हम देख सकते है।

सच कहा जाये तो नारी पुरुष की प्रेरणा होती है,वह ह्रदय की पहचान करती है।महादेवी वर्मा के शब्दों में-पुरुषविजय का भूखा होता है,तथा नारी समर्पण की,पुरुष लुटना चाहता है,नारी लुट जाना चाहतीहै।नारी केइस महान पक्ष की अवहेलना करके हम प्रायः नाना प्रकार से सताते है,उसका शोषण करते है।हम नारी को अपनेअहम तले दबाना चाहते है।यदि हर पुरुष अपने जीवन से नारी को कुछ क्षण के लिए दूरकर के देखे,तो उसे उसकीअहमियत पता चल जायेगी।वह असहाय होकर नारी को पुकारेगा।नारी सम्मानकी जननी है।मनुस्मृति में कहा गयाहै किजिस कुल में कुलवधुएँ शोकाकुल रहती है,वह कुल शीघ्र हीनष्ट हो जाता है।

वस्तुतः नारी स्नेह और सहिष्णुता की प्रतिमा है,इसी को लक्ष्य कर दार्शनिक राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने एकस्थान परलिखा है कि नारी का मधुर समपर्क पुरुष की जीवन के संघर्ष में एक प्रकार का रस प्रदानकरता है।क्याहम नहीं जानते है,कि नारी प्रेम के नाम पे अनेक वीरों ने आश्चर्यजनक कार्य किये और श्रेष्ठउपलब्धियाँ प्राप्त की है।एक प्रकार से नारी व्यक्तिओं का निर्माण कर के समाज और राष्ट्र का निर्माणकरती है।नारी की इसी शक्ति को लक्ष्यकर के दार्शनिक अरस्तु ने कहा था किनारी की उन्नति याअवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनतिआधारित है।स्वतंत्रता संग्राम के मध्य नारीयों के योगदान कोदेख कर महात्मा गाँधी ने कहा था कि- नारी कोअबला कहना उसका अपमान करना है।

आधुनिक काल में नारी का दुसरा पक्ष भी विषरुपी बाण से भी अति भयानक है।आज नारी भी अपनी इसशक्ति कोभूल कर मृगतृष्णाओं,कामनाओं से लद कर अपनों को अलंकृत कर रही है।यह हमारे लिएअभिशाप से कम नहीं है।नारी का यह रुप उनके संस्कारों को छल प्रपंच,कामवासनाओं से उनकी छवि मेंकालिख जैसा काम करता है।वहीआज भी विशिष्ट सुसंस्कृत नारी की कमी नहीं है।आजकल नारी का विशेषकर विषैला रुप ही नजर आता है।नारी केसम्बन्ध में एक लोकोक्ति काफी प्रचलित हैत्रिया चरित्र दैव्योंना जाने।इसी तथ्य को रखकर एक कहानी हैकि- एक बालब्रह्मचारी संन्यासी गाँव के बाहर कुटिया बनाकर रहने लगे।कुछ दिनों में बाबा के अनेक भक्त हो गयेऔर प्रतिदिन बाबा उन्हें अच्छी अच्छी ज्ञान की बातबताते थे।एक दिन एक भक्त बाबा से त्रियाचरित्र के विषय मेंपूछा तो बाबा ने अपने नारी भक्तों से ही उसकाजवाब देने को कहा।बात आयी गयी बीत गयी,कुछ दिन बाद एकऔरत बाबा की कुटिया पर आकर जोरजोर से रोने लगी।इस पर गाँव वाले वहाँ पहुँच गये।उस समय बाबा जमीन परलेट कर शवासन ध्यान कर रहेथे।औरत ने ग्रामीणों से बाबा की तरफ ईशारा किया,इस पर गाँव वाले कुछ दुसरा हीसमझकर बाबा कोमारने लगे।इस पर बाबा की ध्यान छुमंतर हो गयी।कुछ देर बाद औरत दौड़ कर गयी और गाँववालों कोमना की,कि इन्हें क्यों मार रहे है।इसपे वे अवाक रह गए और बोले तुमने ही तो इनकी तरफ ईशाराकियाहै,तो स्त्री बोली मै कुटिया में आयी तो देखी कि बाबा मुर्दा के समान जमीन पर लेटे हुए है।मुझे लगाकि बाबा किमृत्यु हो गयी इसलिए मै रो पड़ी हूँ।भूल के लिए बाबा से सबों ने क्षमा माँगी तो स्त्री ने कहा बाबायही त्रियाचरित्र है।अतएव आज भी ऐसी ही छल भरी भावना हो गयी है स्त्री कि।क्या यह पतन का मार्ग नहींहै?आज स्त्री और पुरुषदोनो को ही बदलना होगा।आज पुरुष भी कम लम्पट नहीं है।वापस अपने संस्कारोंमें आना होगा।मनीषियों केशब्दों में- नारी जीवन की सुलझन संतान है और उसकी चरम सार्थकतामातृत्व में है।इसलिएशक्तिरुपीणी,ममतारुपीणी है,नारी तुम सदा श्रद्धा और भक्ति की अथाह सागरकी तरह धीर,वीर,गम्भीरबनो।जयशंकर प्रसाद ने कहा है-

नारी तुम केवल श्रद्धा हो,

विश्वास रजत नगपगतल में ,

पीयुष श्रोत सी बहा करो,

जीवन के सुंदर समतल में।

वस्तुतः नारी वायदा नहीं करती परन्तु पुरुष के लिए सबकुछ न्योछावर कर देती है।वह महान अघातों कोक्षमा करदेती है,तुच्छ चोटों को नहीं।हे मंगलकारी नारी! शक्ति पुंज में प्रकट हो हमें फिर से प्रकाश दो।

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।


(मनुस्मृति अध्याय ३, श्लोक ५६-६०):

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।५६।।

[यत्र तु नार्यः पूज्यन्ते तत्र देवताः रमन्ते, यत्र तु एताः न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) ।]
जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।।५७।।

[यत्र जामयः शोचन्ति तत् कुलम् आशु विनश्यति, यत्र तु एताः न शोचन्ति तत् हि सर्वदा वर्धते ।]
जिस कुल में पारिवारिक स्त्रियां दुर्व्यवहार के कारण शोक-संतप्त रहती हैं उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है, उसकी अवनति होने लगती है । इसके विपरीत जहां ऐसा नहीं होता है और स्त्रियां प्रसन्नचित्त रहती हैं, वह कुल प्रगति करता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।)

जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ।।५८।।

[अप्रतिपूजिताः जामयः यानि गेहानि शपन्ति, तानि कृत्या आहतानि इव समन्ततः विनश्यन्ति ।]
जिन घरों में पारिवारिक स्त्रियां निरादर-तिरस्कार के कारण असंतुष्ट रहते हुए शाप देती हैं, यानी परिवार की अवनति के भाव उनके मन में उपजते हैं, वे घर कृत्याओं के द्वारा सभी प्रकार से बरबाद किये गये-से हो जाते हैं । (कृत्या उस अदृश्य शक्ति की द्योतक है जो जादू-टोने जैसी क्रियाओं के किये जाने पर लक्षित व्यक्ति या परिवार को हानि पहुंचाती है ।)

तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ।।५९।।

[तस्मात् भूतिकामैः नरैः एताः (जामयः) नित्यं सत्कारेषु उत्सवेषु च भूषणात् आच्छादन-अशनैः सदा पूज्याः ।]
अतः ऐश्वर्य एवं उन्नति चाहने वाले व्यक्तियों को चाहिए कि वे पारिवारिक संस्कार-कार्यों एवं विभिन्न उत्सवों के अवसरों पर पारिवार की स्त्रियों को आभूषण, वस्त्र तथा सुस्वादु भोजन आदि प्रदान करके आदर-सम्मान व्यक्त करें ।

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।।६०।।

[यस्मिन् एव कुले नित्यं भार्यया भर्ता सन्तुष्टः, तथा एव च भर्त्रा भार्या, तत्र वै कल्याणं ध्रुवम् ।]
जिस कुल में प्रतिदिन ही पत्नी द्वारा पति संतुष्ट रखा जाता है और उसी प्रकार पति भी पत्नी को संतुष्ट रखता है, उस कुल का भला सुनिश्चित है । ऐसे परिवार की प्रगति अवश्यंभावी है ।

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