Posted in संस्कृत साहित्य

जीवेम शरदः शतम् – योगेन्द्र जोशी


पश्येम शरदः शतम् … – अथर्ववेद की प्रार्थना

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2010/03/02/

 

वेदों में जहां एक ओर कर्मकांडों से जुड़े मंत्रों और लौकिक उपयोग की बातों का उल्लेख मिलता है, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक दर्शन से संबद्ध मंत्र एवं अदृश्य शक्तियों की प्रार्थनाएं भी उनमें देखने को मिलती हैं । मैंने अभी पूरा अथर्ववेद नहीं देखा है, किंतु जितना मुझे मालूम है वह २० कांडों में विभक्त है, और इन कांडों में अलग-अलग संख्या में कुछएक सूक्त सम्मिलित हैं । इन्हीं में एक सूक्त है जिसमें पूर्ण शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य एवं दीर्घायुष्य की कामना व्यक्त की गयी है । उक्त सूक्त वस्तुतः छोटे-छोटे आठ मंत्रों का समुच्चय है, जो यों शब्दवद्ध है:

पश्येम शरदः शतम् ।।१।।

जीवेम शरदः शतम् ।।२।।

बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।

रोहेम शरदः शतम् ।।४।।

पूषेम शरदः शतम् ।।५।।

भवेम शरदः शतम् ।।६।।

भूयेम शरदः शतम् ।।७।।

भूयसीः शरदः शतात् ।।८।।

(अथर्ववेद, काण्ड १९, सूक्त ६७)

जिसके अर्थ समझना कदाचित् पर्याप्त सरल है – हम सौ शरदों तक देखें, यानी सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे (१)। सौ वर्षों तक हम जीवित रहें (२); सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे, हम ज्ञानवान् बने रहे (३); सौ वर्षों तक हम वृद्धि करते रहें, हमारी उन्नति होती रहे (४); सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें पोषण मिलता रहे (५); हम सौ वर्षों तक बने रहें (वस्तुतः दूसरे मंत्र की पुनरावृत्ति!) (६); सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें, कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें (७); सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें (८)।

यहां यह ज्ञातव्य है कि शरद् शब्द सामान्यतः छः वार्षिक ऋतुओं में एक के लिए प्रयुक्त होता है । चूंकि प्रति वर्ष एक शरद ऋतु आनी है, अतः उक्त मंत्रों में एक शरद् का अर्थ एक वर्ष लिया गया है । भारतीय प्राचीन पद्धति में पूरे वर्ष को दो-दो मास की ऋतुओं में विभक्त किया गया हैः वसन्त (चैत्र या चैत एवं वैशाख), ग्रीष्म (ज्येष्ठ या जेठ तथा आषाढ या आषाढ़), प्रावृष् (श्रावण या सावन एवं भाद्रपद या भादों के मास से बनी पावस अथवा वर्षा ऋतु ), शरद् (आश्विन या क्वार तथा कार्तिक), हेमन्त (मार्गशीर्ष या अगहन एवं पौष या पूस), और शिशिर (माघ तथा फाल्गुन या फागुन)

उपर्युक्त मंत्रों से प्रतीत होता है कि वैदिक काल में सौ वर्ष की आयु को अच्छी आयु समझा जाता था । इसीलिए सौ वर्ष की आयु की कामना व्यक्त की गयी है, वह भी पूर्ण कायिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के साथ । उल्लिखित सूक्त में यह इच्छा व्यक्त की गयी है कि हमें पूर्ण स्वास्थ्य के साथ सौ वर्ष का जीवन मिले, और यदि हो सके तो सक्षम एवं सक्रिय इंद्रियों के साथ जीवन उसके आगे भी चलता रहे । अवश्य ही सौ वर्षों की आयु सबको नहीं मिलती होगी । इसीलिए सौ वर्ष की आयु को एक मानक के रूप में देखते हुए उसे चार बराबर आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) में भी वैदिक चिंतकों ने बांटा होगा । किंतु ये बातों की पौराणिक कथाओं से संगति नहीं बैठती है । पुराणों में अनेकों कथाएं पढ़ने को मिलती हैं जिनमें मनुष्य को हजारों-सैकड़ों वर्षों तक जीवित दिखाया गया है । कई ऋषि-मुनियों की हजारों वर्षों तक की तपस्या का भी उल्लेख देखने को मिलता है । वेद-मंत्रों तथा प्राचीन आश्रम व्यवस्था के मद्देनजर यही माना जा सकता है कि पुराणों की बहुत-सी बातें वस्तुतः अतिरंजित रही हैं । उनमें वर्णित बातें को शब्दशः न लेकर उनके निहितार्थ पर ही ध्यान दिया जाना चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

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