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मॅक्स मूलर का पत्र और संस्कृत की प्रेरणा -डॉ. मधुसूदन


मॅक्स मूलर का पत्र और संस्कृत की प्रेरणा -डॉ. मधुसूदन
Posted On December 10, 2012 by &filed under महत्वपूर्ण लेख.
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मॅक्स मूलर ने, I C S ( Indian Civil Service) की परीक्षा के हेतु तैय्यार होने वाले युवाओं के सामने १८८० के आस पास, केम्ब्रिज युनीवर्सीटी में ७ भाषण दिए थे।उन भाषणों के उपलक्ष्य़ में जो पत्र व्यवहार हुआ था, उसका अंश प्रस्तुत है। सभी भारतीय संस्कृत प्रेमी और अन्य भारतियों को यह जानकारी, संस्कृत अध्ययन की प्रेरणा ही दे कर रहेगी।

 

जब मॅक्स मूलर अंग्रेज़ युवा छात्रों को संस्कृत अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं,, जो उन छात्रों के लिए अवश्य अधिक कठिन ही होगा, तो हमारे युवा ऐसे आह्वान से कैसे मुह चुराएंगे, जिनके लिए निश्चित रूपसे संस्कृत अध्ययन अंग्रेज़ो की अपेक्षा कमसे कम तीनगुना तो सरल ही होगा।

 

(१) एक हमारी सभी भाषाएँ ७० से ८० प्रतिशत (तत्सम और तद्भव) संस्कृतजन्य शब्द रखती है।

 

अपवाद केवल तमिल है, जिसमें ४० से ५० प्रतिशत संस्कृतजन्य शब्द होते हैं।

 

पर अचरज यह है, कि, तमिलनाडु में ही वेद्पाठी गुरूकुल शालाएं आज भी अबाधित रूप से चल रही है।

 

(२) हमारी ६०-६५ प्रतिशत भाषी जनता देवनागरी जानती है। उपरान्त ३० प्रतिशत भारतियों की भाषाएँ, देवनागरी की ही भाँति ध्वन्यानुसारी रूप से व्यवस्थित और अनुक्रमित है।

 

(१) प्रोफेसर कॉवेल — युनीवर्सीटी ऑफ़ केम्ब्रिज मॅक्स मूलर, प्रोफेसर कॉवेल को, जो उस समय, युनीवर्सीटी ऑफ़ केम्ब्रिज में संस्कृत पढाते थे,लिखते हैं; …..”पर आप भी जानते हैं कि अभी तो संस्कृत साहित्य के विशाल-काय महाद्वीप की एक छोटी पट्टी (strip) भर ही खोजी गयी है, और कितना अज्ञात धरातल अभी भी बचा हुआ है।” टिप्पणी:{बस एक विशाल हिम शैल की शिखामात्र खोजी गयी थी।} जिन्हों ने ’PRIDE OF INDIA’– A glimpse into India’s scientific heritage,(2006), पढी होगी, उन्हें सहमत होने में कठिनाई नहीं होगी

 

(२) कठिन कष्टदायक काम मॅक्स मूलर कहते हैं: निःसंदेह, यह काम कठिन है, कष्टदायक भी, और बहुत बार हताश करने वाला भी है, पर युवा छात्रों को वे वचन जो डॉ. बर्नेल ने कहे थे, ध्यान में रखने चाहिए, —“जिस काम को करने से, अन्यों को (हमारी बाद की पीढियों को) सुविधा होगी, ऐसा कोई कठिन काम त्यागना नहीं चाहिए।” टिप्पणी: क्या हमें यह कठिन काम त्यागना चाहिए? और क्या हमारे लिए उनसे भी कठिन माना जाए? आप, टिप्पणी दीजिए।

 

) कठिन परिश्रमी युवा चाहिए (३)आगे, मॅक्स मूलर लिखते हैं: हमें ऐसे युवा चाहिए, जो कठिन परिश्रम करेंगे, जिनके परिश्रम का कोई पुरस्कार भी उन्हें शायद ही मिले, हमें ऐसे पुरूषार्थी और निडर युवाओं की आवश्यकता है, जो आँधी, बवंडरों से डरते नहीं है, समुद्री टीलों पर नौका की टक्कर से जिनकी नाव टूटती है, पर हताश होते नहीं है। वे नाविक बुरे नहीं होते, जिनकी नौका पथरीले टिलोंपर टकरा कर टूटती है, पर वें हैं, जो छोटे छोटे डबरों में नाव तैराकर उसी किचड में लोट कर ही संतोष मान लेते हैं। टिप्पणी: हमारे युवा, और युवामानस रखने वाले इन शब्दों पर विचार कर, अपनी टिप्पणी दें।

 

(४)आलोचना करना बंद करो:आगे, मॅक्स मूलर अंग्रेज़ युवाओं को लक्षित कर लिखते हैं: बहुत सरल है, आज, विलियम जोन्स, थॉमस कोलब्रुक, और एच. एच. विलसन इत्यादि विद्वानों के परिश्रम की आलोचना करना, पर संस्कृत के विद्वत्ता प्रचुर अगाध ग्यान का क्या होता, यदि इस क्षेत्र में, वे विद्वान आगे बढे न होते, जहाँ पग रख कर प्रवेश करने में भी आप सारे इतने डरते हो?

 

(५)संस्कृत में भरी पडी, विपुल जानकारी, आगे, मॅक्स मूलर लिखते हैं: और संस्कृत में भरी पडी, विपुल जानकारी का क्या होगा, यदि इस क्षेत्र की उपलब्धि के लिए, हम सदा के लिए इस विषय में हमारी मर्यादा में ही बँधे रह जाएँ? लेखक: क्या यह वाक्य हमारे लिए भी, लागू नहीं होता? शायद अंग्रेज़ों से भी अधिक ही होता है। लेखक: फिरसे जिन्हों ने ’PRIDE OF INDIA’– A glimpse into India’s scientific heritage,(2006), पढी होगी, उन्हें सहमत होने में कठिनाई नहीं होगी

 

(६) विशाल ज्ञान का भंडार आगे, मॅक्स मूलर लिखते हैं: आप निश्चितरूपसे जानते हैं, कि संस्कृत साहित्य और धर्म ग्रंथों में, में नल दमयन्ती और शाकुन्तल के नाटकों से बढकर भी बहुत विशाल ज्ञान का भंडार भरा पडा है, जो कई अधिक खोजने की आवश्यकता है; और जानने योग्य भी है। और अवश्य जो युवा प्रति वर्ष भारत जाते हैं, उनकी ऐसा साहस करने की क्षमता नहीं है; ऐसा मैं नहीं मान सकता। लेखक :तो क्या भारत का युवा, अंग्रेज़ युवा से कम क्षमता रखता है?

 

(७)लेखक: इस सुभाषित से भी हमारे युवा सीख ले सकते हैं।

 

योजनानां सहस्रं तु शनैर्गच्छेत् पिपीलिका।

 

आगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति॥

 

संधि विच्छेद कर:

 

योजनानां सहस्रं तु शनैः गच्छेत्‌ पिपीलिका।

 

आगच्छन वैनतेयः अपि पदम्‌ एकम्‌ न गच्छति॥

 

अर्थ: यदि चींटी भी यदि चले, तो धीरे धीरे हज़ारों योजन (मील) काट सकती है। पर गरूड यदि अपनी जगह से ना हीला तो एक पग भी आगे नहीं बढ सकता।

 

पिपीलिका: यह चींटी का एक पर्यायवाची नाम है। पीपल के वृक्ष पर पायी जाती है, इससे पिपीलिका कहलाती है। और गरूड विनता की सन्तान होने से उसे वैनतेय कहते हैं। यह प्रत्ययों का जादु है। कभी आगे विशद किया जाएगा।

 

कविता

 

जब चींटी चले धीरे धीरे, हजारों योजन कटे।

 

गरूड हिले न, अपनी जगह , एक भी पग ना बढे॥

 

चींटी की भाँति ही संस्कृत के ज्ञान में आगे बढें।

 

संस्कृत भारती का सम्पर्क कीजिए।
डॉ. मधुसूदन
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वाराणसी वैभव या काशी वैभव


http://ignca.nic.in/coilnet/kv_0002.htm

काशी की राजधानी वाराणसी का नामकरण


यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि काशी की राजधानी वाराणसी का नामकरण कैसे हुआ? बाद की पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार “वरणा’ और “असि’ नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। कनिधम भी इस मत की पुष्टि करते हैं, लेकिन एम. जूलियन ने इस मत के बारे में संदेह प्रकट किया था। उन्होंने “वरणा’ का प्राचीन नाम ही “वरणासि’ माना था पर इसके लिए उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया। विद्वानों ने इस मत की पुष्टि नहीं की, पर इस मत के पक्ष में बहुत से प्रमाण हैं।

अब हमें विचार करना पड़ेगा कि वाराणसी का उल्लेख साहित्य में कब से आया। काशी शब्द तो जैसा हम आगे देखेंगे सबसे पहले अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा से आया है और इसके बाद शतपथ में। लेकिन यह संभव है कि नगर का नाम जनपद में पुराना हो। अथर्ववेद (४/७/१) में वरणावती नदी का नाम आया है और शायद इससे आधुनिक बरना का ही तात्पर्य हो। अस्सी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा है। काशी खंड में कहा है कि संसार के सभी तीर्थ असिसंभेद को षोड़शांश के बराबर नहीं होते और यहां स्नान करने से सभी तीर्थों का फल मिल जाता है। (काशीखण्ड त्रि.से. पृ. १६१)। इस तीर्थ के संबंध में इतना ही कहा गया है। पौराणिक साहित्य में असि नदी का नाम वाराणसी की व्युत्पत्ति की सार्थकता दिखलाने को आया है। (अग्नि पु. ३५२०)। यहां एक विचार करने की बात है कि अग्निपुराण में असि नदी को नासी भी कहा गया है। वस्तुत: इसमें एक काल्पनिक व्युत्पत्ति बनाने की प्रक्रिया दिख पड़ती है। वरणासि का पदच्छेद करके नासी नाम की नदी निकाली गयी है, लेकिन इसका असि रुप संभवत: और बाद में जाकर स्थिर हुआ। महाभारत ६/१०/३० तो इस बात की पुष्टि कर देता है कि वास्तव में बरना का प्राचीन नाम वाराणसी था और इसमें से दो नदियों के नाम निकालने की कल्पना बाद की है। पद्यपुराणांतर्गत काशी महात्म्य में भी “वाराणसीति विख्यातां तन्मान निगदामि व: दक्षिणोत्तरयोर्नघोर्वरणासिश्च पूर्वत). जाऋवी पश्चिमेऽत्रापि पाशपाणिर्गणेश्वर:।।’ (प.प.वि.मि. १७५) लिखा है अर्थात् दक्षिण-उत्तर में वरुणा और अस्सी नदी है, पूर्व में जाऋवी (गंगा) और पश्चिम में पाशपाणिगणेश। मत्स्यपुराण में शिव वाराणसी का वर्णन करते हुए कहते हैं –

वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता।
प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये।।

अर्थात्- हे प्रिये, सिद्ध गंधर्वों� से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथगा गंगा आता है वह क्षेत्र मुझे प्रिय है। यहां अस्सी का उल्लेख नहीं है। वाराणसी क्षेत्र का विस्तार बताते हुए मत्स्यपुराण में एक और जगह कहा गया है-

वरणा च नदी यावद्यावच्छुष्कनदी तथा।
भीष्मयंडीकमारम्भ पर्वतेश्वरमन्ति के।।

(म.पु.कृ.क.त.पृ. ३९)

मत्स्यपुराण की मुद्रित प्रति में “”वाराणसी नदीमाय यावच्छुष्क नदी तवै” ऐसा पाठ है। पुराणकार के अनुसार पूर्व से पश्चिम दो योजन या ढ़ाई योजन लम्बाई वरणा से असी तक है, और चौड़ाई अर्द्ध योजन भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक है अर्थात् चौड़ाई के तीन परिमाप बताये हैं। वास्तव में यहां कोई विशेष विरोधाभास नहीं है- वाराणसी क्षेत्र वरणा नदी से असी तक है, पर गंगा अर्द्धचंद्राकार होने के कारण सीमा निर्देश पूरा नहीं होता। भीष्मचंड़ी से पर्वतेश्वर तक इसका विस्तार आधा योजन हे। इनमें भिष्म चंड़ी, शैलपुत्री दुर्गा के दक्षिण में और पर्वतेश्वर सेंधिया घाट पर है। पद्मपुराण में तो स्पष्टत: चौड़ाई सदर बाजार स्थित पाशपाणिगणेश तक बताई है। वरणा संगम के आगे कोटवां गांव के पास का भाग गंगा तक लगभग ढ़ाई कोस है (जिसे पद्मपुराण ने ढ़ाई योजन बताया है)।

उक्त उद्धरणों सी जांच पड़ताल से यह पता चलता है कि वास्तव में नगर का नामकरण वरणासी पर बसने से हुआ। अस्सी और बरणा के बीच में वाराणसी के बसने की कल्पना उस समय से उदय हुई जब नगर की धार्मिक महिमा बढ़ी और उसके साथ-साथ नगर के दक्षिण में आबादी बढ़ने से दक्षिण का भाग भी उसकी सीमा में आ गया।

लेकिन प्राचीन वाराणसी सदैव बरना पर ही स्थित नहीं थी, गंगा तक उसका प्रसार हुआ था। कम-से-कम पंतजलि के समय में अर्थात् ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तो यह गंगा के किनारे-किनारे बसी थी, जैसी कि अष्टाध्यायी के सूत्र “यस्य आया:’ (२/१/१६) पर पंतजलि ने भाष्य “अनुगङ्ग’ वाराणसी, अनुशोणं पाटलिपुत्रं (कीलहार्न ६,३८०) से विदित है। मौर्य और शुंगयुग में राजघाट पर गंगा की ओर वाराणसी के बसने का प्रमाण हमें पुरातत्व के साक्ष्य से भी लग चुका है।

वरणा शब्द एक वृक्ष का ही द्योतक है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे जैसे कोशंब से कोशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो।

वाराणसी नाम से उक्त विवेचन से यह न समझ लेना चाहिए कि काशी की इस राजधानी का केवल एक ही नाम था। कम-से-कम बौद्ध साहित्य में तो इसके अनेक नाम मिलते हैं। उदय जातक में इसका नाम सुर्रूंधन (सुरक्षित), सुतसोम जातक में सुदर्शन (दर्शनीय), सोमदंड जातक में ब्रह्मवर्द्धन, खंडहाल जातक में पुष्पवती, युवंजय जातक में रम्म नगर (सुन्दर नगर) (जा. ४/११९), शंख जातक में मोलिनो (मुकुलिनी) (जा. ४/१५) मिलता है। इसे कासिनगर और कासिपुर के नाम से भी जानते थे (जातक, ५/५४, ६/१६५ धम्मपद अट्ठकथा, १/६७)। अशोक के समय में इसकी राजधानी का नाम पोतलि था (जा. ३/३९)। यह कहना कठिन है कि ये अलग-अलग उपनगरों के नाम है अथवा वाराणसी के ही भिन्न-भिन्न नाम है।

यह संभव है कि लोग नगरों की सुन्दरता तथा गुणों से आकर्षित होकर उसे भिन्न-भिन्न आदरार्थक नामों से पुकराते हो। पंतजलि के महाभाष्य से तो यही प्रकट होता है। अष्टाध्यायी के ४/३/७२ सूत्र के भाष्य में (कीलहार्न ७/२१३) “नवै तत्रेति तद् भूयाज्जित्वरीयदुपाचरेत्’ श्लोक पर पंतजलि ने लिखा है- वणिजो वाराणसी जित्वरीत्युपाचरन्ति, अर्थात् ई. पू. दूसरी शताब्दी में व्यापारी लोग वाराणसी को जित्वरी नाम से पुकारते थे। जित्वरी का अर्थ है जयनशीला अर्थात् जहां पहुंचकर पूरी जय अर्थात् व्यापार में पूरा लाभ हो। जातकों में वाराणसी का क्षेत्र उस उपनगर को सम्मिलित कर बारह योजन बताया गया है- (जा. ४, ३७७, ५, १६०)। इस कथन की वास्तविकता का तो तभी पता चल सकता है जब प्राचीन वाराणसी और उसके उपनगरों की पूरी तौर से  खुदाई हो पर बारह योजन एक रुढिगत अंक सा विदित होता है।

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Meaning of your Zodiac Signs in Gujarati


Meaning of your Zodiac Signs in Gujarati

Aries ( March 21 – April 19 )
aries gujarati zodiac

HARAKPADUDA

Always excited to do something! Oh wait they just got distracted again for the 100th time. They think they are the most intelligent and think of everybody else as “ Daphod ”. Well you know who is it now right?
2) Taurus ( April 20 – May 20 )
taurus gujarati zodiac

AADSU NA PIR

All they care about is lying all day sleeping is their forte. Aakho vakhat PADEDA ni jem padya rehse. As much as they love lazing around they are also super practical. They are always “EKDAM MAJAMA” (bhale kharekhar ma hoy k na hoy)

3) Gemini ( May 21 – June 20 )
gemini gujarati zodiac

KHALI VAATO NA VADA

“Apdey kaik motu karsu ! ” Sounds cool but implementation is where a Gemini will say “ Java dey nathi karvu ! ”

4) Cancer ( June 21 – July 22 )
cancer gujarati zodiac

ROTAL RADHA

Ek number na moody maanaso ane plan CHOPAT karva ma expert! They might come out as needy because they do keep looking for security !

5) Leo ( July 23 – August 22 )
leo gujarati zodiac

GHAMAND NU POTLU

Zodiac symbol ma “SINH” che etle potani jaat ne kharekhar “Singham” samajse. “MAA LYF MAA RULEZZZ” vada namunao mota bhaage aa loko j hoy che !
6) Virgo ( August 23 – September 22 )
virgo gujrati zodiac

BADHA MA VANDHA VACHKA

Badhi vaat ma kat kat kare that is a Virgo! Being unhygienic is the perfect way to make them go “ Hey bhagwaaaan ! ” They are perfect examples of ” Shobhaa na gaathiya ! “

7) Libra ( September 23 – October 22 )
libra gujarati zodiac

NABDAA

Hotel na menu ma thi aa loko khavani item select kare ena pehla to divas aakho puro thai jaay. Kyarey emna jode shopping karva javu nahi !!! Shopping to thase nahi pan tame su leva avya te e pan bhuli jaso!

8) Scorpio ( October 23 – November 21 )
scorpio gujarati zodiac

MINDHAA

Kasauti Zindagi Kay ma KOMOLIKA jeva paatro etle aapda Scorpios. You can ever know what they are thinking (and what they will do to you 😛 ).

9) Sagittarius ( November 22 – December 21)
saggittarius gujrati zodiac

MBA – MANE BADHU AVADE

They know it all! Anything under the sun. (Evu emnu maanvu hoy che, kharekhar hoy nai 😀 ) If you have a Sagittarian friend be ready to hear “ Be aa to kasu j nathi, tu maru saambhad ! ”

10) Capricorn ( December 22 – January 19 )
capricorn gujarati zodiac

JIDDI

Nana teniyaao koi vastu maate jidd kare ane jamin par aarotva laage eva jiddi aa Capricorns hoy che. Emni JIDD jya sudhi puri na thy tya sudhi e loko jhape nai !

11) Aquarius ( January 20 – February 18 )
aquarius gujarati zodiac

VAYDA

Divas na bhar ajvada ma sapnao ma khovayela reh e Aquarius ! Paados na maasi etla judgemental nai hoy jetla aa loko hoy 😀

12) Pisces ( February 19 – March 20 )
pisces gujarati zodiac

BHULA BHATKELA

Ask them what they want and their favorite answer is “ umm.. maney nathi khabar yaar! ” Gullible and directionless. Potana ghar ma khovaai jaay etla bhatkela 😀

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:


क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:
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1. लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):

“हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है”।

2. हर्बर्ट वेल्स (1846 – 1946):

” हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही दिलशाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । सलाम हो उस दिन को “।

3. अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 – 1955):

“मैं समझता हूँ कि हिन्दूओ ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके । हिन्दुत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है”।

4. हस्टन स्मिथ (1919):

“जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी”।

5. माइकल नोस्टरैडैमस (1503 – 1566):

” हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा”।

6. बर्टरेंड रसेल (1872 – 1970):

“मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा “।

7. गोस्टा लोबोन (1841 – 1931):

” हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ”।

8. बरनार्ड शा (1856 – 1950):

“सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा “।

9. जोहान गीथ (1749 – 1832):

“हम सभी को अभी या बाद मे हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है ।मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।”

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एक पीपाड़ के लडके को


एक पीपाड़ के लडके को

जॉब नही मिली

तो उसने क्लिनिक खोला और
बाहर लिखा
तीन सौ रूपये मे ईलाज करवाये
ईलाज नही हुआ तो एक हजार रुपये वापिस

एक पंडित ने सोचा कि एक हजार रूपये कमाने का अच्छा मौका है
वो क्लिनिक पर गया
और बोला
मुझे किसी भी चीज का स्वाद नही आता I
पीपाड़ का लड़का :

बॉक्स नं. २२ से दवा निकालो
और 3 बूँद पिलाओ
नर्स ने पिला दी

पंडित : ये तो पेट्रोल है पीपाड़ का लड़का :

मुबारक हो आपको टेस्ट महसूस हो गया

लाओ तीन सौ रूपये
पंडित , को गुस्सा आ गया

कुछ दिन बाद फिर वापिस गया

पुराने पैसे वसुल करने
पंडित : साहव मेरी याददास्त

कमजोर हो गई है । पीपाड़ का लड़का :

बाँक्स नं, २२ से दवा निकालो और 3 बूँद पिलाओ
पंडित : लेकिन वो दवा तो जुबान की टेस्ट के लिए है पीपाड़ का लड़का

ये लो तुम्हारी याददास्त भी वापस आ गई

लाओ तीन सौ रूपए

इस बार पंडित गुस्से मे गया

-मेरी नजर कम हो गई है पीपाड़ का लड़का :

इसकी दवाई मेरे पास नही है I

लो एक हजार रुपये ।

पंडित -,यह तो सौ का नोट है ।, पीपाड़ का लड़का

आ गई नजर।
ला तीन सौ रूपये ।।
😜😜😁😁😁😁😁😛😛😂😂😂😃😂😂😂🙌🙌🙌₹🙆🙆🙆🙆💃💃

अगर पीपाड़ के हो
तो इसे आगे भेजते रहो
गुलाब का पेड़ चन्दन से कम नही ॥

हमारा पीपाड़ लन्दन से कम नही I।।।

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

ज.लाल नेहरू थे भारत में पहली बूथ केप्चरिंग के मास्टरमाइण्ड प्रधानमन्त्री


ज.लाल नेहरू थे भारत में पहली बूथ केप्चरिंग के मास्टरमाइण्ड प्रधानमन्त्री
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जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से पराजित घोषित हो चुके कांग्रेसी प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को किसी भी कीमत पर ज़बरदस्ती जिताने के आदेश दिये थे। उनके आदेश पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री पं. गोविन्द वल्लभ पन्त ने रामपुर के जिलाधिकारी पर घोषित हो चुके परिणाम बदलने का दबाव डाला और इस दबाव के कारण प्रशासन ने जीते हुए प्रत्याशी विशनचन्द्र सेठ की मतपेटी के वोट मौलाना अबुल कलाम की पेटी में डलवा कर दुबारा मतगणना करवायी और मौलाना अबुल कलाम को जिता दिया।

यह रहस्योदघाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सूचना निदेशक शम्भूनाथ टण्डन ने अपने एक लेख में किया है।

उन्होंने अपने लेख “जब विशनचन्द सेठ ने मौलाना आज़ाद को धूल चटाई थी भारतीय इतिहास की एक अनजान घटना” में लिखा है कि भारत में नेहरू ही बूथ कैप्चरिंग के पहले मास्टर माइंड थे। उस ज़माने में भी बूथ पर कब्ज़ा करके परिणाम बदल दिये जाते थे।

देश के प्रथम आम चुनाव में सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस के 12 हारे हुए प्रत्याशियों को जिताया गया। देश के बटवारे के बाद लोगों में कांग्रेस और खासकर नेहरू के प्रति बहुत गुस्सा था लेकिन चूँकि नेहरू के हाथ में अन्तरिम सरकार की कमान थी इसलिए नेहरू ने पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके जीत हासिल की थी।

देश के बटवारे के लिए हिन्दू महासभा ने नेहरू और गान्धी की तुष्टीकरण नीति को जिम्मेदार मानते हुए देश में उस समय ज़बरदस्त आन्दोलन चलाया था और लोगों में नेहरू के प्रति बहुत गुस्सा था इसलिए हिन्दू महासभा ने कांग्रेस के दिग्गज़ नेताओं के विरुद्ध हिन्दू महासभा के दिग्गज़ लोगों को खड़ा करने का निश्चय किया था। इसीलिए नेहरू के विरुद्ध फूलपुर से सन्त प्रभुदत्त ब्रम्हचारी और मौलाना अबुल कलाम के विरुद्ध रामपुर से विशनचन्द्र सेठ को लड़ाया गया।

नेहरू को अन्तिम राउण्ड में ज़बरदस्ती 2000 वोट से जिताया गया। वहीं सेठ विशनचन्द्र के पक्ष में भारी मतदान हुआ और मतगणना के पश्चात् प्रशासन ने बाक़ायदा लाउडस्पीकरों से सेठ विशनचन्द्र को 10000 वोट से विजयी घोषित कर दिया। जीत की ख़ुशी में हिन्दू महासभा के लोगों ने विशाल विजय जुलूस भी निकाला।

जैसे ही ये समाचार वायरलेस से लखनऊ फिर दिल्ली पहुँची तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अप्रत्याशित हार के समाचार से नेहरू तिलमिला उठे और उन्होंने तमतमा कर तुरन्त उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री पं. गोविन्द वल्लभ पन्त को चेतावनी भरा सन्देश दिया कि मैं मौलाना की हार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता, अगर मौलाना को ज़बरदस्ती नहीं जिताया गया तो आप अपना इस्तीफ़ा शाम तक दे दीजिए।

फिर पन्तजी ने आनन फानन में सूचना निदेशक (जो इस लेख के लेखक हैं) शम्भूनाथ टण्डन को बुलाया और उन्हें रामपुर के जिलाधिकारी से सम्पर्क करके किसी भी कीमत पर मौलाना अबुल कलाम को जिताने का आदेश दिया। फिर जब शम्भूनाथ जी ने कहा कि सर! इससे दंगे भी भड़क सकते हैं तो इस पर पन्तजी ने कहा कि देश जाये भाड़ में, नेहरू जी का हुक़्म है।फिर रामपुर के जिलाधिकारी को वायरलेस पर मौलाना अबुल कलाम को जिताने के आदेश दे दिये गये। फिर रामपुर का सिटी कोतवाल ने सेठ विशनचन्द्र के पास गया और कहा कि आपको जिलाधिकारी साहब बुला रहे हैं जबकि वो लोगों की बधाइयाँ स्वीकार कर रहे थे।

जैसे ही जिलाधिकारी ने उनसे कहा कि मतगणना दुबारा होगी तो विशनचन्द्र सेठ ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि मेरे सभी कार्यकर्ता जुलूस में गये हैं ऐसे में आप मतगणना एजेंट के बिना दुबारा मतगणना कैसे कर सकते हैं? लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी। जिलाधिकारी ने साफ़ साफ़ कहा कि सेठ जी! हम अपनी नौकरी बचाने के लिए आपकी बलि ले रहे हैं क्योंकि ये नेहरू का आदेश है।

शम्भूनाथ टण्डन जी ने आगे लिखा है कि चूँकि उन दिनों सभी प्रत्याशियों की उनके चुनाव चिन्ह वाली अलग-अलग पेटियाँ हुआ करती थीं और मतपत्र पर बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों में डाले जाते थे। इसलिए ये बहुत आसान था कि एक प्रत्याशी के वोट दूसरे की पेटी में मिला दिये जायें।

देश में हुए प्रथम आम चुनाव की इसी ख़ामी का फ़ायदा उठाकर अय्यास नेहरू इस देश की सत्ता पर काबिज़ हुआ था और उस नेहरू ने इस देश में भ्रष्टाचार के जो बीज बोये थे वो आज उसके खानदान के काबिल वारिसों की अच्छी तरह देखभाल करने के कारण वटवृक्ष बन चुके हैं।

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साभार:- शम्भूनाथ टण्डन (पूर्व सूचना निदेशक, यूपी) की पुस्तक:- *गान्धी और नेहरू : हिन्दुस्तान का दुर्भाग्य*

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एक औरत को आखिर क्या चाहिए होता है?


एक औरत को आखिर क्या चाहिए होता है?

जवाब में एक 10 हज़ार पन्नों की किताब दिखाई जाती है। पर सही जवाब असल में एक लाइन का है।
आप भी पढ़िए ये छोटी सी कहानी
राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए। हथकड़ियों में जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा – यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें।
प्रश्न है – एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है, हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ।
वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ।
महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो, हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया ।
जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा – मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी । जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी ।
हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया ।
तब जादूगरनी ने उत्तर बताया – “स्त्रियाँ, स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं | ”
यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया |इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा – चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ मैं दिन में रूपसी रहूं या रात में, क्या पसंद है ? सिद्धराज ने कहा – प्रिये, यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है । जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई, उसने कहा – चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है। बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था ।
अर्थात, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है, पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है। इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं , वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।

आप क्या कहते हैं ..?

Hari Chaudhari

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चेले की भूल


चेले की भूल

एक महात्मा बहुत ज्ञानी थे, पर अंतर्मुखी थे। अपनी ही साधना में लीन रहते थे। एक बार एक लडके की प्रार्थना पर उसे अपना चेला बना लिया। चेला बहुत चंचल प्रकृति का था। ज्ञान-ध्यान में उसका मन नहीं लगता था। गुरु ने कई बार उसे समझाने की चेष्टा की। पर सफलता नहीं मिली।
दुनिया चमत्कार को नमस्कार करती है -यह सोचकर एक दिन चेला महात्माजी से बोला -गुरुदेव! मुझे कोई चमत्कार सिखा दें। गुरु ने कहा, वत्स! चमत्कार कोई काम की वस्तु नहीं है। उससे एक बार भले ही व्यक्ति प्रसिद्धि पा ले, लेकिन अंततोगत्वा उसका परिणाम अच्छा नहीं होता।
पर चेला अपनी बात पर अड़ा रहा। बालहठ के सामने गुरुजी को झुकना पड़ा। उन्होंने अपने झोले में से एक पारदर्शी डंडा निकाला और चेले के हाथ में उसे थमाते हुए कहा, यह लो चमत्कार। इस डंडे को तुम जिस किसी की छाती के सामने करोगे, उसके दोष इसमें प्रकट हो जाएंगे। चेला डंडे को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। गुरु ने चेले के हाथ में डंडा क्या थमाया, मानो बंदर के हाथ में तलवार थमा दी। कोई भी व्यक्ति उस आश्रम में आता, चेला हर आगंतुक के सीने के सामने उस डंडे को घुमा देता। फलत: उसकी कमजोरियां उसमें प्रकट हो जातीं और चेला उनका दुष्प्रचार शुरू कर देता। गुरुजी सारी बात समझ गए। एक दिन उन्होंने चेले से कहा, एक बार डंडा अपनी ओर भी घुमाकर देख लो, इससे स्वयं का परीक्षण हो जाएगा कि आश्रम में आ कर अपनी साधना से तुमने कितनी प्रगति की है। चेले को बात जंची, उसने फौरन डंडा अपनी ओर किया। लेकिन देखा कि उसके भीतर तो दोषों का अंबार लगा है। शर्म से उसका चेहरा लटक गया। वह तत्काल गुरु के चरणों में गिर पड़ा और अपनी भूल की क्षमा मांगते हुए बोला, आज से मैं दूसरों के दोष देखने की भूल नहीं करूंगा।

Dinesh Kadel

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जो हिन्दू इस घमंड मे जी रहे है कि अरबों सालों से सनातन धर्म है और इसे कोई नहीं मिटा सकता


जो हिन्दू इस घमंड मे जी रहे है कि अरबों सालों से सनातन धर्म है और इसे कोई नहीं मिटा सकता, मैं उनसे केवल इतना विनम्र अनुरोध करता हूँ कि नीचे लिखे तथ्यों को एक बार ध्यान से अवश्य पढ़ें:

🌎आखिर अफगानिस्तान से हिन्दू क्यों मिट गया ?

🌎”काबुल” जो भगवान राम के पुत्र कुश का बनाया शहर था, आज वहाँ एक भी मंदिर नहीं बचा।

🌎”गांधार” जिसका विवरण महाभारत में है, जहां की रानी गांधारी थी, आज उसका नाम कंधार हो चुका है, और वहाँ आज एक भी हिन्दू नहीं बचा l

🌎”कम्बोडिया” जहां राजा सूर्य देव बर्मन ने दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर “अंकोरवाट” बनाया, आज वहाँ भी हिन्दू नहीं है l

🌎”बाली द्वीप” में 20 साल पहले तक 90% हिन्दू थे, आज सिर्फ 20% बचे हैं l

🌎”कश्मीर घाटी” में सिर्फ 25 साल पहले 50% हिंदू थे, आज एक भी हिन्दू नहीं बचा l

🌎”केरल” में 10 साल पहले तक 60% जनसंख्या हिन्दुओं की थी, आज सिर्फ 10% हिन्दू केरल में हैं l

🌎”नोर्थ ईस्ट” जैसे सिक्किम, नागालैंड, आसाम आदि में हिन्दू हर रोज मारे या भगाए जाते हैं, या उनका धर्म परिवर्तन हो रहा है l

🌎मित्रों, 1569 तक ईरान का नाम पारस या पर्शिया होता था और वहाँ एक भी मुस्लिम नहीं था, सिर्फ पारसी रहते थे l

🌎जब पारस पर मुस्लिमों का आक्रमण होता था, तब पारसी बूढ़े – बुजुर्ग अपने नौजवान को यही सिखाते थे कि हमें कोई मिटा नहीं सकता, लेकिन ईरान से सारे के सारे पारसी मिटा दिये गए l

धीरे – धीरे उनका कत्लेआम और धर्म – परिवर्तन होता रहा l

🌎एक नाव मे बैठकर 21 पारसी किसी तरह गुजरात के नौसारी जिले के उद्वावाडा गांव मे पहुंचे, और आज पारसी सिर्फ भारत में ही गिनती की संख्या में बचे हैं l

🌎हमेशा शांति की भीख मांगने वाले हिन्दुओं……
आज तक के इतिहास का सबसे बड़ा संकट अब हिन्दुओं पर आने वाला है l

🌎ईसाईयों के 80 देश और मुस्लिमों के 56 देश हैं l

🌎और हिन्दुओं का एक मात्र देश भारत ही अब हिन्दुओं के लिए सुरक्षित नहीं रहा l

🌎मैंने 10 लोगों को जो कि हिन्दू हैं, उनसे पूछा कि किस जाति के हो ?

🌎सभी ने अलग – अलग जवाब दिया……
किसी ने कहा राजपूत…
किसी ने कहा ब्राम्हण…
किसी ने कहा जाट…
किसी ने जैन कहा…
तो किसी ने अग्रवाल…… सब लोगों ने अलग – अलग बताया l

🌎लेकिन मैंने 10 मुसलमानोँ से पूछा कि कौन सी जाति के हो ?

सभी का एक जवाब आया…… “मुसलमान”

🌎मुझे बड़ा अजीब लगा, मैंने फिर से पूछा, फिर वही जवाब आया…… “मुसलमान”

🌎तब मुझे बहुत अफसोस हुआ, और लगा हम कितने अलग और वो कितने एक……

🌎कुछ समझ में आया हो तो आगे से कोई पूछे तो एक ही जवाब आना चाहिए……
॥ हिन्दू ॥

और अगर आप “हिन्दू” होने का गर्व करते हो तो इस मैसेज को इतना फैला दो यह मैसेज मुझे वापस किसी हिन्दू से ही मिले l

🌎पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में एक मुस्लिम भाई ने जनहित याचिका डाली थी कि पड़ोसी मुल्क में हज करने के लिए सब्सिडी मिलती है तो हमें भी मिलनी चाहिए l

🌎पाकिस्तान कोर्ट ने जनहित याचिका रिजेक्ट करते हुये कहा कि “कुरान” और “हदीस” के हिसाब से हज पसीने की कमाई से करना पड़ता है, दूसरों की कमाई से नहीं l

🌎सब्सिडी इस्लाम के खिलाफ है, पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से भारतीय मुसलमानों को मिल रही सब्सिडी हराम है l

🌎क्या नेता इस पर कुछ टिप्पणी देंगे ?

🌎अजीब कानून है भैया……
गाय का चारा खाया तो जेल भेज दिया……
और जो गाय को खा रहा है उसको हज के लिए भेजते हो l

🌎ये जो नीचे एक वाक़या (कश्मीर का) लिखा है वो कोई मज़ाक नहीं है, कल ये आपके शहर में भी हो सकता है l

🌎अगर ये अमेरिका, जापान या फिर चाइना में हुआ होता तो इन शांतिप्रिय मजहब वालों को काट कर गटर में फेंक देते l

🌎कुछ दिन पहले NDTV के रवीश कुमार ने RSS के सिन्हा सर से तल्ख़ मुद्रा में पूछा था कि अगर देश में मुस्लिम ज्यादा हो जायेंगें तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ?

इसका एक प्रायोगिक उत्तर कल के एक वाकये ने दिया l

🌎मुस्लिम बाहुल्य “काश्मीर विश्वविद्यालय” में एक फिल्म “हैदर” की शूटिंग चल रही थी, उसके एक दृश्य के फिल्मांकन के लिए तिरंगा झंडा लगाया गया, और कलाकारों को जय हिन्द बोलना पड़ा l

🌎इतना होना था कि विश्वविद्यालय के छात्र उस यूनिट पर टूट पड़े l

🌎फिल्म का सेट तोड़ दिया गया, काफी जद्दोजहद के बाद फिल्म के कलाकारों को बाहर निकाला जा सका l

🌎तिरंगे से उनकी नफरत और जय हिन्द पर आपत्ति इस सबका कारण थी l

🌎पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन कालेज प्रशासन के कहने पर छोड़ दिया गया l

🌎ध्यान रहे वो अनपढ़ लोग नहीं, विश्वविद्यालय के छात्र थे l

🌎हाथ जोड़ के विनती है, इसे शेयर करें ये कोई छोटी खबर नहीं है l

🌎ये हमारे देश के सम्मान की बात है एक सुन्दर संवाद……
(एक बार ज़रूर पढ़ें )

🌎बी एस सी के छात्र का कॉलेज का पहला दिन……
(गले में बड़े-बड़े रुद्राक्ष की माला)
प्रोफेसर– बड़े पंडित दिखाई देते हो, लेकिन कॉलेज में पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो…… पूजा पाठ घर में ही ठीक है l
(क्लास के सभी बच्चे ठहाका लगाते हैं)
छात्र (विनम्रता से)– सर, आप मेरे गुरु हैं, और सम्माननीय भी इसलिए आपकी आज्ञा से ही कुछ कहना चाहूँगा l

🌎शिक्षक कहते हैं– बोलो ?
छात्र– सर, जब ऐसे छोटे कॉलेज छोड़िये आई आई टी और मेडिकल कॉलेज तक में मुस्लिम छात्र दाढ़ियाँ बढ़ाकर या टोपी चढ़ाकर जाते हैं और कितनी भी बड़ी लेक्चर हो क्लास छोड़कर नमाज़ के लिए बाहर निकल जाते हैं तो शिक्षकों को वो धर्मनिष्ठता लगती है l

🌎जब क्रिश्चियन छात्र गले में बड़े बड़े क्रॉस लटकाकर घूमते हैं तो वो धर्मनिष्ठता हैं, और ये उनके मजहब की बात हुई l

🌎और आज आपके सामने इसी क्लास में कितनी ही लड़कियों ने बुर्का पहना है, और कितने ही बच्चों ने जाली – टोपी चढ़ा रखी है तो आपने उन्हें कुछ नहीं कहा तो आखिर मेरी गलती क्या है ?
क्या बस इतना कि मैं एक हिंदू हूँ l

🌎शिक्षक क्लास छोड़कर बाहर चला गया ।

🌎1 मिनट चैटिंग छोडकर इस पोस्ट को जरूर पढेँ… वर्ना सारी जिन्दगी चैट ही करते रह जाओगे l

Posted in हास्यमेव जयते

‘पादना’ बुरी बात नही है भाई !


‘पादना’ बुरी बात नही है भाई !!

आज मै “पाद” विषय पर बात कर रहा हूं, जिसका नाम लेना भी असभ्यता समझी जाती है, लेकिन पाद क्या अपनी मर्जी से आता है, वो तो खुद ही कभी भी, कहीं भी आ सकता है ! अगर प्रधानमंत्री को भी भरी सभा मे पाद आ जाये तो वे पादेंगे नही क्या..? इसलिये पाद पर किसी तरह का नियंत्रण संभव ही नही है !

यदि आपका डाक्टरी चेकअप हुआ होगा तो डाक्टर ने आपसे यह सवाल भी अवश्य किया होगा कि पाद ठीक से आता है ? क्योंकि डाक्टर जानता है कि पाद चेक करने की अभी तक कोई अल्ट्रासाउंड या MRI जैसी मशीन नही बनी !

ये तमाम चूरन – चटनी, हाजमोला जैसी गोलियों का करोड़ों रुपये का कारोबार केवल इसी बिन्दु पर तो निर्भर है कि जनता ठीक से पादती रहे !

यदि आपको दिन में 4 बार और रात को लगभग 10 बार अलग अलग तरह के पाद नही आते तो आपका सजना, संवरना सब बेकार है, क्योंकि अन्दर से आपका सिस्टम बिगड़ा हुआ है, यदि लीवर ही ठीक से काम नही कर रहा तो अन्य अंगो को पोषण कहां से मिलेगा !

इसलिये पादने मे संकोच न करें और खूब पादें ! क्योंकि पादना बुरी बात नही है भाई !

🚶💨पाद पांच प्रकार के होते हैं:-

1 – ‘भो पाद’ (पादों का राजा)
यह घोषणात्मक और मर्दानगी भरा होता है ! इसमे आवाज मे धमक ज्यादा और बदबू कम होती है, जितनी जोर आवाज, उतनी कम बदबू !

2 – ‘शहनाई’ –
हमारे पूर्वजो ने इसे मध्यमा भी कहा है ! इसमे से आवाज निकलती है ठें ठें या कहें पूंऊऊऊउऊ..!

3 – ‘खुरचनी’ –
इसकी आवाज पुराने कागज के सरसराहट जैसी होती है! यह एक बार मे नही निकलता है, बल्कि एक के बाद एक कई ‘पिर्र..पिर्र..पिर्र..पिर्र’ की आवाज के साथ आता है !

4 – ‘तबला’ –
तबला पाद एक फट की आवाज के साथ आता है ! यह अपने मालिक की इजाजत के बगैर ही निकल जाता है और अगर हम लोगों के बीच बैठे हों तो हास्य के पात्र बन जाते हैं !

5 – ‘फुस्की’ –
यह एक निःशब्द ‘बदबू बम’ है ! चूंकि इसमें आवाज नही होती है इसलिए ये पास बैठे व्यक्ति को बदबू का गुप्त दान देता है और दाता अपनी नाक को बंद कर के नही पादने का दिखावा करता है, लेकिन आप कुछ ना बोलें केवल जापानी कहावत ” जो बोला, सो पादा ” याद रखें, इससे दाता स्वयं ही पकड़ मे आ जायेगा !

अब अपने पाद की श्रेणी निर्धारित करते हुए पाद का आनन्द उठाइये तथा जम कर, बेझिझक और खुलकर पादिये…

नोट ;— इस मैसेज को केवल व्यंग्य के तौर पर या अन्यथा न लें, क्योंकि पादने से आपके शरीर मे होने वाली कई क्रियाओं का सम्बंध है, और उम्मीद है कि इस पोस्ट से पादने वालों (जो कि आप स्वयं भी हो सकते हैं) के प्रति आपका दृष्टिकोण बदलेगा…!!

😄😄😄💭💭💨🙊🙊😝😛
हँसी रोक पाओ तो बोलना

बहु बरामदे में बैठे ससुर के पास खाली चाय का कप लेने गई…तो कप लेने के लिए जैसे ही झुकी तो पाद निकल गया ।

बहु शर्म के मारे बिना कप उठाये वापस जाने लगी,

ससुर ने आवाज लगाई -“बहु यहाँ कुछ काम था कि सिर्फ पादने आई थी…???”