Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

निर्मल बाबा


निर्मल बाबा एक दिन दरबार में बैठे थे और भक्त अपनी दुखभरी कहानियाँ सुनाकर बाबा से सलाह मांग रहे थे ।

पप्पू : ” बाबा की जय हो।
बाबा मुझे कोई रास्ता दिखाओ , मेरी शादी तय नहीं हो रही , आपकी शरण में आया हूँ ।”

निर्मल बाबा: ” आप काम क्या करते हो ?”

पप्पू : ” शादी होने के लिए कौनसा काम करना उचित रहेगा ? ”

बाबा – ” तुम मिठाई की दूकान खोल लो। ”

पप्पू – ” बाबा , वो तो ३० सालों से खुली हुई है, मेरे पिताजी की मिठाई की ही दुकान है ।”

बाबा : ” शनिवार को सुबह ९ बजे दुकान खोला करो ।”

पप्पू – “शनि मंदिर के बगल में ही मेरी दूकान है और मैं रोज ९ बजे ही खोलता हूँ ।”

बाबा : ” काले रंग के कुत्ते को मिठाई खिलाया करो ।”

पप्पू – ” मेरे घर दो काले कुत्ते ही है, टोनी और बंटी . सुबह शाम मिठाई खिलाता हूँ ।”

बाबा : ” सोमवार को शिवमंदिर जाया करो ।”

पप्पू – ” मैं केवल सोमवार ही नहीं , रोज शिवमंदिर जाता हूँ । दर्शन के बगैर मैं खाने को छूता तक नहीं ।”

बाबा : ” कितने भाई बहन हो ?”

पप्पू – ” बाबा आपके हिसाब से शादी तय होने के लिए कितने भाई बहन होने चाहिए ? ”

बाबा – ” दो भाई एक बहन होनी चाहिए । ”

पप्पू – ” बाबा , मेरे असल में दो भाई एक बहन ही है । प्रकाश, दीपक और मीना । ”

बाबा : ” दान किया करो ।”

पप्पू – “बाबा मैंने अनाथ आश्रम खोल रखा है, रोज दान करता हूँ ।”

बाबा : ” एक बार बद्रीनाथ हो आओ ।”

पप्पू : ” बाबा आप के हिसाब से शादी होने के लिए कितने बार बद्रीनाथ जाना जरुरी है ?”

बाबा: “जिंदगी में एक बार हो आओ ।”

पप्पू : “मैं तीन बार जा चूका हूँ ।”

बाबा – “नीले रंग की शर्ट पहना करो ।”

पप्पू – “बाबा मेरे पास सिर्फ नीले रंग के ही कुर्ते है , कल सारे धोने के लिए दिए हैं , वापस मिलेंगे तो सिर्फ वही पहनूंगा! ”

बाबा शांत होकर जप करने लगते हैं ।
इस हरामजादे को क्या बोलू जो इसने नही किया हो

पप्पू ” बाबा , एक बात कहूँ ?”

बाबा ; “हां जरूर, बोलो बेटा जो बोलना है ।”

पप्पू : “मैं पहले से शादी शुदा हूँ ,
और तीन बच्चों का बाप भी हूँ
इधर से गुजर रहा था ,
सोचा तुम्हे उँगली करता चलूँ।

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

હવે મને ભટકવું નથી,


Sayani Kamal 

લઇ કદીય સરનામું મંદિરનું
હવે મને ભટકવું નથી,
જાણીલો, પ્રસાદ સિવાય
ત્યાં કઈજ મળતું નથી.
અમસ્તી થાય છે ભીડ,
તારા નામથી આ કતારમાં,
થાય કશોટી તારી,
એ પગથીયું કદી ચઢવું નથી.
હશે મન સાફ, તો
અંતરમાં બિરાજે છે તું આપોઆપ,
દીધું છેને દેશે જ,
ભલામણ જેવું કંઈજ કરવું નથી.
હજી માણસ જ સમજ્યો છે ક્યા,
માણસની ભાષા?
તારામાં લીન થાઉં,
એથી વિશેષ માણસ બનવું નથી..
Posted in हिन्दू पतन

हिंदूओ का वो इतिहास एक रणनीति के तहत छुपाया गया … देखिये आखिर क्या छिपाया गया हमसे ..और क्यों ??? ======================== आधुनिक भारत में अंग्रेजों के समय से जो इतिहास पढाया जाता है, वह चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश से आरम्भ होता है। उस से पूर्व के इतिहास को ‘प्रमाण-रहित’ कह कर नकार दिया जाता है. […]

via हिंदूओ का वो इतिहास एक रणनीति के तहत छुपाया गया … देखिये आखिर क्या छिपाया गया हमसे ..और क्यों ??? — પ્રહલાદ પ્રજાપતિ

Posted in PM Narendra Modi

भाजपा


1- जब *गुजरात* में 59 हिन्दू जिन्दा जला दिए गए तो सब दल खड़े थे हत्यारे मुस्लिमों के पक्ष में *हिंदुओं के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

2- जब *राम मंदिर* की बात आई, सब दल खड़े हुए बाबरी के पक्ष में *राम मंदिर के पक्ष पे खड़ी हुई भाजपा*

3- जब *मुजफ्फरनगर दंगे* हुए सब दल खड़े हुए दंगाई मुस्लिमों के पक्ष में, *हिंदुओं के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

4- जब *वन्देमातरम, भारत माता की जय की बात आई* सब दल खड़े हुए इनका विरोध करने वाले मुस्लिमों के पक्ष में *वन्देमातरम के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

5- जब *कश्मीरी पंडितों को मार काट के खदेड़ा गया* सब दल खामोश रहे, *कश्मीरी पंडितों के लिए खड़ी हुई भाजपा*

6- जब *कैराना* आदि से जबरन हिंदुओं को घर छोड़ने को मजबूर कर दिया गया तो सब दल मुस्लिमों के पक्ष में *हिंदुओं के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

7- *दादरी* में सब दल खड़े हुए गौमांस भक्षी, गौहत्यारे अख़लाक़ के पक्ष में *दादरी में हिंदुओं के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

8- जब *रामसेतु* तोड़ने की बात आई, सब उसको तोड़ने के पक्ष में *रामसेतु बचाने आई भाजपा*

9- *जब जब कहीं दंगा हुवा* सब दल खड़े हुए दंगाई मुस्लिमों के पक्ष में, *दंगा पीड़ित हिंदुओं के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

10- जब *हिन्दू असम, बंगाल, केरल में सताया गया* सब खामोश रहे लेकिन *हिंदुओं के पक्ष में खड़ी हुई भाजपा*

*तो आज समय है कि हर हिन्दू भाजपा के साथ खड़ा हो, भाजपा को वोट दे और दिलवाये वरना भविष्य में हिंदुओं के लिए कौन खड़ा होगा*

*विकास, स्वाभिमान, सुरक्षा व् आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए आज गर्व से भाजपा को वोट दें*

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संभाजी से थर्राते थे मुगल


संभाजी से थर्राते थे मुगल

http://panchjanya.com/Encyc/2014/11/24/1089923.aspx

हिन्दुस्थान में हिंदवी स्वराज एवं हिन्दू पातशाही की गौरवपूर्ण स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन को यदि चार पंक्तियों में संजोया जाए तो यही कहा जाएगा कि:
‘देश धरम पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।।’
संभाजी महाराज का जीवन एवं उनकी वीरता ऐसी थी कि उनका नाम लेते ही औरंगजेब के साथ तमाम मुगल सेना थर्राने लगती थी। संभाजी के घोड़े की टाप सुनते ही मुगल सैनिकों के हाथों से अस्त्र-शस्त्र छूटकर गिरने लगते थे। यही कारण था कि छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद भी संभाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज को अक्षुण्ण रखा था। वैसे शूरता-वीरता के साथ निडरता का वरदान भी संभाजी को अपने पिता शिवाजी महाराज से मानों विरासत में प्राप्त हुआ था। राजपूत वीर राजा जयसिंह के कहने पर, उन पर भरोसा रखते हुए जब छत्रपति शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा पहंुचे थे तो दूरदृष्टि रखते हुए वे अपने पुत्र संभाजी को भी साथ लेकर पहंुचे थे। कपट के चलते औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया था और दोनों पिता-पुत्र को तहखाने में बंद कर दिया। फिर भी शिवाजी ने कूटनीति के चलते औरंगजेब से अपनी रिहाई करवा ली, उस समय संभाजी अपने पिता के साथ रिहाई के साक्षी बने थे।
संभाजी महाराज का औरंगजेब की छल-कपट की नीति से बचपन में जो वास्ता पड़ा, दुर्भाग्यवश वह जीवन के अंत तक बना रहा और यही इतिहास बन गया। छत्रपति शिवाजी की रक्षा नीति के अनुसार उनके राज्य का किला जीतने की लड़ाई लड़ने के लिए मुगलों को कम से कम एक वर्ष तक अवश्य जूझना पड़ता। औरंगजेब जानता था कि इस हिसाब से तो सभी किले जीतने में 360 वर्ष लग जाएंगे। शिवाजी के बाद संभाजी महाराज की वीरता भी औंरगजेब के लिए अत्यधिक अचरज का कारण बनी रही। उन्होंने अपने पिता की जुझारु एवं दूरदर्शी रक्षा नीति को चार-चांद लगाने का कार्य उस समय कर दिखाया कि जब उनका रामसेज का किला औरंगजेब को लगातार पांच वर्षों तक टक्कर देता रहा।
इसके अलावा संभाजी महाराज ने औरंगजेब के कब्जे वाले औरंगाबाद से लेकर विदर्भ तक सभी सूबों से लगान वसूलने की शुरुआत कर दी जिससे औरंगजेब इस कदर बौखला गया कि संभाजी महाराज से मुकाबला करने के लिए वह स्वयं दक्खन पहंुच गया।
उसने संभाजी महाराज से मुकाबला करने के लिए अपने पुत्र शाहजादे आजम को तय किया। आजम ने कोल्हापुर संभाग में संभाजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनकी तरफ से आजम का मुकाबला करने के लिए सेनापति हमीबीर राव मोहिते को भेजा गया। उन्होंने आजम की सेना को बुरी तरह से परास्त कर दिया औरंगजेब को स्वीकार करना पड़ा कि मुगलांे पर विजय पाना तो दूर, उन्हें परास्त करने के लिए प्रभावी नीति चुनौती है। युद्ध में हार का मुंह देखने पर औरंगजेब इतना हताश हो गया कि बारह हजार घुड़सवारों से अपने साम्राज्य की रक्षा करने का दावा उसे खारिज करना पड़ा। संभाजी महाराज पर नियंत्रण के लिए उसने तीन लाख घुड़सवार और चार लाख पैदल सैनिकों की फौज लगा दी। लेकिन वीर मराठों और गुरिल्ला युद्ध के कारण मुगल सेना हर बार विफल होती गई।
औरंगजेब के मन में व्याप्त भय का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब बीजापुर के कुछ चुनिंदा मौलवी औरंगजेब के पास इस्लाम और मजहबी पैगाम के आधार पर सुलह करने पहंुचे तो उसने स्पष्ट कर दिया कि वह कुरान के आधार पर बीजापुर के आदिलशाह से कभी भी सुलह कर सकता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चिंता दक्खिन में संभाजी महाराज हैं जिनका वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा था।औरंगजेब ने बार-बार पराजय के बाद भी संभाजी से महाराज से युद्ध जारी रखा। इसी दौरान कोंकण संभाग के संगमेश्वर के निकट संभाजी महाराज के 400 सैनिकों को मुकर्रबखान के 3000 सैनिकों ने घेर लिया और उनके बीच भीषण युद्ध छिड़ गया।
इस युद्ध के बाद राजधानी रायगढ़ में जाने के इरादे से संभाजी महाराज अपने जांबाज सैनिकों को लेकर बड़ी संख्या में मुगल सेना पर टूट पड़े। मुगल सेना द्वारा घेरे जाने पर भी संभाजी महाराज ने बड़ी वीरता के साथ उनका घेरा तोड़कर निकलने में सफल रहे। इसके बाद उन्हांेने रायगढ़ जाने की बजाय निकट इलाके में ही ठहरने का निर्णय लिया। मुकर्रबखान इसी सोच और हताशा में था कि संभाजी इस बार भी उनकी पकड़ से निकलकर रायगढ़ पहंुचने में सफल हो गए, लेकिन इसी दौरान बड़ी गड़बड़ हो गई कि एक मुखबिर ने मुुगलों को सूचित कर दिया कि संभाजी रायगढ़ की बजाय एक हवेली में ठहरे हुए हैं। यह बात आग की तरह औरंगजेब और उसके पुत्रों तक पहंुच गई कि संभाजी एक हवेली में ठहरे हुए हैं। जो कार्य औरंगजेब और उसकी शक्तिशाली सेना नहीं कर सकी, वह कार्य एक मुखबिर ने कर दिया।
इसके बाद भारी संख्या में सैनिकों के साथ मुगल सेना ने हवेली की ओर कूच कर उसे चारों तरफ से घेर लिया। संभाजी को हिरासत में ले लिया गया, 15 फरवरी, 1689 का यह काला दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। संभाजी की अचानक हुई गिरफ्तारी को लेकर औरंगजेब और पूरी मुगलिया सेना हैरान थी। संभाजी का भय इतना ज्यादा था कि पकड़े जाने के बाद भी उन्हें लोहे की जंजीरों से बांधा गया। बेडि़यों में जकड़ कर ही उन्हें औरंगजेब के पास ले जाया गया। इससे पूर्व उन्हें ऊंट की सवारी कराकर काफी प्रताडि़त किया गया।
संभाजी महाराज को जब ‘दिवान-ए-खास’ में औरंगजेब के सामने पेश किया गया तो उस समय भी वे अडि़ग थे और उनके चेहरे पर किसी प्रकार के भय का भाव तक नहीं था। उन्हें जब औरंगजेब को झुक कर सलाम करने के लिए कहा गया तो उन्होंने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया और उसे निडरता के साथ घूरते रहे। संभाजी के ऐसा करने पर औरंगजेब स्वयं सिंहासन से उतर कर उनके समक्ष पहंुच गया। इस पर संभाजी के साथ कैद कवि कलश ने कहा-‘हे राजन, तुव तप तेज निहार के तखत त्यजो अवरंग।’
यह सुनकर औरंगजेब ने तुरंत कवि की जिह्वा (जीभ) काटने का आदेश दे दिया। साथ ही उसने संभाजी को प्रलोभन दिया कि यदि वे इस्लाम कबूल कर लें तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा और उनके सभी गुनाह माफ कर दिए जाएंगे। संभाजी महाराज द्वारा सभी प्रलोभन ठुकराने से क्रोधित होकर औरंगजेब ने उनकी आंखों में गरम सलाखें डाल कर उनकी आंखें निकलवा दीं। फिर भी संभाजी अपनी धर्मनिष्ठा पर अडि़ग रहे और उन्होंने किसी भी सूरत में हिन्दू धर्म त्याग कर इस्लाम को कबूल करना स्वीकार नहीं किया।
इस घटना के बाद से ही संभाजी ने अन्न-जल का त्याग कर दिया। उसके बाद सतारा जिले के तुलापुर में भीमा-इन्द्रायनी नदी के किनारे संभाजी महाराज को लाकर उन्हें लगातार प्रताडि़त किया जाता रहा और बार-बार उन पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला जाने लगा। आखिर में उनके नहीं मानने पर संभाजी का वध करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए 11 मार्च, 1689 का दिन तय किया गया क्योंकि उसके ठीक दूसरे दिन हिन्दू वर्ष प्रतिपदा थी। औरंगजेब चाहता था कि संभाजी महाराज की मृत्यु के कारण हिन्दू जनता वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर शोक मनाये।
उसी दिन सुबह दस बजे संभाजी महाराज और कवि को एक साथ गांव की चौपाल पर ले जाया गया। पहले कवि कलश की गर्दन काटी गई। उसके बाद संभाजी के हाथ-पांव तोड़े गए, उनकी गर्दन काट कर उसे पूरे बाजार में जुलूस की तरह निकाला गया।
एक बात तो स्पष्ट है कि जो कार्य औरंगजेब और उसकी सेना आठ वर्षों में नहीं कर सके, वह कार्य एक भेदिये ने कर दिखाया। औरंगजेब ने छल से संभाजी महाराज का वध तो कर दिया, लेकिन वह चाहकर भी उन्हें पराजित नहीं कर सका। संभाजी ने अपने प्राणों का बलिदान कर हिन्दू धर्म की रक्षा की और अपने साहस व धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने औरंगजेब को सदा के लिए पराजित कर दिया।
तुलापुर स्थित संभाजी महाराज की समाधि आज भी उनकी जीत और अहंकारी व कपटी औरंगजेब की हार को बयान करती है। इसका कवि योगेश ने इस प्रकार अपने शब्दों में वर्णन किया है:
‘देश धरम पर मिटने वाला
शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी
एक ही शंभू राजा था।।
तेजपुंज तेजस्वी आंखें
निकल गयीं पर झुका नहीं।
दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का
दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।
दोनों पैर कटे शंभू के
ध्येय मार्ग से हटा नहीं।
हाथ कटे तो क्या हुआ
सत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।
जिह्वा कटी खून बहाया
धरम का सौदा किया नहीं।
शिवाजी का ही बेटा था वह
गलत राह पर चला नहीं।।
वर्ष तीन सौ बीत गये अब
शंभू के बलिदान को।
कौन जीता कौन हारा
पूछ लो संसार को।।
मातृभूमि के चरण कमल पर
जीवन पुष्प चढ़ाया था।
है राजा दुनिया में कोई
जैसा शंभू राजा था।।’ -द. वा. आंबुलकर

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शिवाजी महाराज के बारे में 17 रोचक जानकारियां


शिवाजी महाराज के बारे में 17 रोचक जानकारियां

1. शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था।

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2. उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और माता का नाम जीजाबाई था। उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे।

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3. वह शुक्राचार्य और कौटिल्य को अपना आदर्श मानते थे।

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4. शिवाजी बचपन में अपने आयु के बालकों को इकट्ठा कर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे।

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5. परम संत रामदेव के संपर्क में आने के बाद वह पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए।

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6. शिवाजी उदार ह्रदय समर्पित हिन्दू थे। उनमें धार्मिक सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी थी। वह अपने अभियानों का आरम्भ अक्सर दशहरा के मौके पर करते थे।

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7. शिवाजी के साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। यही नहीं, उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे।

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8. मुगल बादशाह औरंगजेब को वह अपना प्रमुख शत्रु मानते थे। उन्होंने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी।

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9. शिवाजी के जीवन का अधिकतर भाग अपनी मातृभूमि की रक्षा में ही बीता था।

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10. उनकी सेना में 40 हजार से अधिक घुड़सवार सैनिक और 1260 हाथी थे। उनके पास अपना तोपखाना भी था।

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11. शिवाजी ने औरंगजेब को टक्कर देते हुए एक बड़े भू-भाग को उसके चंगुल से छुड़ाया था।

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12. उनके शासन में 250 से अधिक किले थे, जिनकी मरम्मत पर वह बड़ी रकम खर्च करते थे।

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13. शिवाजी को भारत में गुरिल्ला युद्ध का आविष्कारक माना जाता है। यह एक प्रकार का छापामार युद्ध है।

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14. उनकी इसी युद्धनीति से प्रेरित होकर वियतनामियों ने अमेरिका को धूल चटा दी थी।

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15. इस युद्ध का उल्लेख शिवाजी के काल में रचित शिव सूत्र में मिलता है।

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16. शिवाजी के उत्तराधिकारी उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी थे।

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17. संभाजी को दुनिया का प्रथम बाल-साहित्यकार माना जाता है। उन्होंने बुधभूषणम् (संस्कृत), नायिकाभेद, सातसतक, नखशिख (हिंदी) आदि ग्रन्थों की रचना की थी।

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छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरुभक्ति !


छत्रपति शिवाजी महाराज अपने गुरुदेव समर्थ रामदास स्वामीके एकनिष्ठ भक्त थे । इसलिए समर्थ भी अन्य शिष्योंकी अपेक्षा उनसे अधिक प्रेम करते थे । यह देख अन्य शिष्योंको लगा, ‘‘शिवाजीके राजा होनेसे ही समर्थ…

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छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरुभक्ति !


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छत्रपति शिवाजी महाराज अपने गुरुदेव समर्थ रामदास स्वामीके एकनिष्ठ भक्त थे । इसलिए समर्थ भी अन्य शिष्योंकी अपेक्षा उनसे अधिक प्रेम करते थे । यह देख अन्य शिष्योंको लगा, ‘‘शिवाजीके राजा होनेसे ही समर्थ उनसे अधिक प्रेम करते हैं !’’ समर्थ रामदासस्वामीने यह भ्रम त्वरित दूर करनेकासंकल्प लिया ।

वे अपने शिष्यगणोंके साथ वनोंमें गए । वहां वे रास्ता खो बैठे । इसके साथ समर्थ एक गुफामें पेटकी पीडाका नाटक कर कराहते हुए सो गए । आनेपर शिष्योंने देखा कि गुरुदेव पीडासे कराह रहे हैं । शिष्योंने इसपर उपाय पुछा । समर्थद्वारा उपाय बतानेपर सभी शिष्य एकदूसरेके मुंह देखने लगे । जिसप्रकार दुर्बल मानसिकता एवं ढोंगी भक्तोंकी अवस्था होती है, बिल्कुल ऐसा ही गंभीर वातावरण बन गया ।

छ. शिवाजी महाराज समर्थ रामदासस्वामीके दर्शन लेने निकल पडे । उन्हें जानकारी मिली कि समर्थ इसी वनमें कहीं होंगे । ढूंढते-ढूंढते वे एक गुफाकी ओर आए । गुफामें पीडासे कराहनेकी ध्वनि सुनाईदी…

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एक राजा ने


एक राजा ने अपने जीजा की सिफारिश पर एक आदमी को मौसम विभाग का मंत्री बना दिया – एक बार उसने शिकार पर जाने से पहले उस मंत्री से मौसम की भविष्य वाणी पूछी – मंत्री जी बोले ज़रूर जाइए मौसाम कई दिनो तक बहुत अच्छा है – राजा थोड़ी दूर गया था की रास्ते में कुम्हार मिला – वो बोला महाराज तेज़ बारिश आने वाली है कहाँ जा रहे हैं ? अब मंत्री के मुक़ाबले कुम्हार की बात क्या मानी जाती, उसे वही चार जूते मारने की सज़ा सुनाई और आगे बढ़ गये – वोही हुआ थोड़ी देर बाद तेज़ आँधी के साथ बारिश आई और जंगल दलदल बन गया , राजा जी जैसे तैसे महल में वापस आए , पहले तो उस मंत्री को बर्खास्त किया , फिर उस कुम्हार को बुलाया – इनाम दिया और मौसाम विभाग के मंत्रिपद की पेशकश की – कुम्हार बोला हुज़ूर मैं क्या जानू मौसम वौसम क्या होता है वो तो जब मेरे गधे के कान ढीले हो कर नीचे लटक जाते हैं मैं समझ जाता हूँ वर्षा होने वाली है , और मेरा गधा कभी ग़लत साबित नहीं हुआ-राजा ने तुरत कुम्हार को छोड़ कर उसके गधे को मंत्री बना दिया –
तब से ही गधो को मंत्री बनाने की प्रथा चली आ रही है.

अजय महिन्दरकर

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

आइये आज आपको भारत के मंदिर की अद्भ्ताए
१. “अमरनाथजी” में शिवलिंग अपने आप
बनता है
२. “माँ ज्वालामुखी” में
हमेशा ज्वाला निकलती है
३. “मैहर माता मंदिर” में रात को आल्हा अब
भी आते हैं
४. सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000
बम में से एक
का ना फूटना
५. इतने बड़े हादसे के बाद भी “केदारनाथ
मंदिर” का बाल ना बांका होना
६. पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ “रामसेतु के
पत्थर” पानी में तैरते हैं
७. “रामेश्वरम धाम” में सागर का कभी उफान
न मारना
८. “पुरी के मंदिर” के ऊपर से
किसी पक्षी या विमान का न निकलना
९. “पुरी मंदिर” की पताका हमेशा हवा के
विपरीत दिशा में उड़ना
१०. उज्जैन में “भैरोंनाथ” का मदिरा पीना
११. गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के
पानी का कभी खराब न होना
१२,श्री राम नाम धन संग्रह बॆंक में संग्रहीत इकतालीस अरब राम
नाम मंत्र पूरित ग्रंथों को (कागज होने पर भी) चूहों द्वारा नहीं
काटा जान। जबकि अनेक चूहे अंदर घुमते रहते हॆं।
13,चितोडगढ मे बाणमाताजी के मंदिर मे आरती के समय त्रिशूल का हिलना