Posted in PM Narendra Modi

मोदी


​आज कुछ तुलनात्मक अध्ययन किया कि –
एक समय था कि अफगानिस्तान में बौद्ध मंदिरों को तोपों से उड़ा दिया गया था । और आज वहां के राष्ट्रपति हमारे मुल्क के इतने पक्के दोस्त हैं कि हमारे देश पे आतंकवादी हमला हुआ तो उन्होंने दक्षेस सम्मलेन में पाक जाने से मना कर दिया ।
  एक समय था जब ईरान हमारी एक नहीं सुनता था, आज उन्हीने भारत को *चाबहार* बंदरगाह बनाने और ईरान में अपनी फौजें रखने की इज़ाज़त दे दी ।
   एक समय था कि नार्थ ईस्ट में terrorists हमला करके म्यांमार भाग जाते थे । आज वहां की सरकार के सहयोग से इंडियन आर्मी ने वहीँ जा के उनके terrorist capms तबाह कर दिए ।
   एक समय था जब खाड़ी देश पाक का साथ देते थे । दाऊद बरसों तक दुबई में शरण लिए रहा। आज सऊदी अरब ने दाऊद की संपत्ति ही जब्त कर ली ।
   एक समय था जब खाड़ी देश भारत को कमजोर और गरीब समझते थे,

आज अचानक क्या हुआ जो उन्हीने भारत के PM के आगमन पे अपने यहाँ पहला हिन्दू मंदिर बनाने के लिए जमीन देदी ।
आज अचानक क्या हुआ जो बुर्ज खलीफा तिरंगे में रंगा दिखने लगा ।
  आज अचानक क्या हुआ जो हमारी 26 जनवरी की परेड में UAE का फौजी दस्ता शामिल हुआ ।
  आज अचानक क्या हुआ जो भारत में इतनी हिम्मत आ गयी कि चीन के अरुणांचल के बॉर्डर में सड़कें बना ली, हवाई पट्टी बना ली, 100 मिसाइल भी तैनात कर दिए और टैंक की डीवीजन पोस्ट कर दी ।
आज अचानक क्या हुआ जो USA के नवनिर्वाचित प्रेजिडेंट ने सबसे पहले भारत के PM को फोन करके आभार व्यक्त किया ।
आज अचानक क्या हुआ जो ऑस्ट्रेलिया, इंडिया को यूरेनियम देने को राजी हो गया ।
आज अचानक जापान ने इंडिया के साथ युद्धाभ्यास किया ।
 तब मन ने जवाब दिया कि ये सब परिवर्तन आये मात्र ढाई साल में  *नरेंद्र मोदी*  के आगमन के साथ ।
 प्रश्न– क्या भारत में  *नरेंद्र मोदी*  के आलावा  वर्तमान नेताओं जैसे कि लालू, मुलायम, अखिलेश, सोनिया, ममता, केजरीवाल आदि में कोई नेता है इस कैलिबर का जो इस प्रकार विश्व को झुका ले ।

इसलिए बंधुओं :

*अब फैसला आपको करना है कि साइकिल पे घर में ही युद्ध करने वाले चाहिए*
या *घर द्वार त्याग के मातृभूमि को समर्पित ऐसा ओजस्वी नेता* चाहिए ?

Babulal prjapati

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14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?…http://www.ramayam.ramprasadmaharaj.org


14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?…

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प्रभु श्रीराम को 14 वर्षका वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा औरविद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह केभारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत कोउन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।
रामायणमें उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवासहुआ तब उन्होंने अपनी यात्राअयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम औरउसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमेंसे 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।
जाने-मानेइतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम औरसीता के जीवन की घटनाओं सेजुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पतालगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम औरसीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदिस्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैंकुछ प्रमुख स्थानों के बारे में…

    • केवट प्रसंग :रामको जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहलेतमसानदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमतीनदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वेश्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट परउन्होंने केवट सेगंगा पार करने को कहा था।
      सिंगरौर‘ :इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामकस्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञातथा। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटीके तट पर स्थितथा। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।
      कुरई‘ : इलाहाबादजिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट परस्थित है।गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पारकरने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।इसग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थानपर है, जहां गंगा को पार करने केपश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछदेर विश्राम किया था।
    • चित्रकूट के घाट पर :कुरईसे आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे।प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थलहै। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम केसमीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकोंमें शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।चित्रकूटवह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं।तब जब दशरथ का देहांत होजाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका लेजाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।
    • अत्रि ऋषि का आश्रम :चित्रकूटके पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रिचित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया।अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रिऋषि की पत्नी का नामहै अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।
      अत्रिपत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूटमें प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम सेप्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु वमहेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपनेतपोबल सेबालक बना दिया था। तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद हीतीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओंके वरदान सेउन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’। अत्रि ऋषि के दूसरेपुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासाऋषि को कौन नहीं जानता?
      अत्रिके आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माताअनुसूइया उन राक्षसों से भयभीतरहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों कावध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।
      प्रातःकालजब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकरराक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्योंको नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमयहीकाल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियोंकी रक्षा करो।’
      रामने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य काप्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करनेका वचन देखर सीता तथालक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलोंमें…
    • 4. दंडकारण्य :अत्रिऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़के घने जंगलोंको अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है।छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सोंपर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवंगुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर रामने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों सेभी अधिक समय तक रहे थे।
      ‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेशएवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों मेंनर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षोंतक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतनाकेआगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्णआश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तरऔर जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमानहैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।
      रामवहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर कीओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एकपर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट कीऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाताहै।यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओरबिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।
      वर्तमानमें करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम मेंअबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व मेंइसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं।दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिलहैं। इसकाविस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिमतक लगभग 480 किलोमीटर है।
      दंडकराक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण केसहयोगी बाणासुर का राज्य था। उसकाइन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर कीनींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था।यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापनाकी। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्रआजकल दंतेवाड़ा के नामसे जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवासकरती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।
      इसीदंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदीके तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्रमंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिरभद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछदिनइस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।
      स्थानीयमान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआथा और जटायु के कुछ अंगदंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है किदुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।
      दंडकारण्यक्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र कीउत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है।यहीं पर उनकामहाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।
    • पंचानां वटानां समाहार इति पंचवटी
      5. पंचवटी में राम :दण्डकारण्यमें मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रमगए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण वसीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।
      उसकाल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक सेगोदावरी का उद्गम स्थानत्र्यंम्बकेश्वर लगभग 20 मील (लगभग 32 किमी) दूरहै। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक मेंगोदावरी नदी केकिनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।
      अगस्त्यमुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक मेंश्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी केतट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक मेंगोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्षथे-पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा केपास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवटके नाम से जाना जाता है। मानाजाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।
      यहींपर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथयुद्ध किया था। यहां पर मारीच वधस्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है।नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप मेंविद्यमान है।
      मरीचका वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु सेश्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटीका मनोहर वर्णन मिलता है।
    • सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ‘ : नासिकक्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण नेसीताका हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूरताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।
      जटायुकी मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसीलके ताकेड गांव में मौजूद है। इसस्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी नेयहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण कियाथा। इसी तीर्थ पर लक्ष्मणरेखाथी।
      पर्णशाला : पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालयसे लगभग 1 घंटे की दूरी परस्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भीकहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है।पर्णशालागोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां सेसीताजी का हरण हुआ था।हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपनाविमान उतारा था।इसस्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी नेधरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविकहरण का स्थल यह माना जाता है। यहांपर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।
    • सीता की खोज : सर्वतीर्थजहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसकेबादश्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंचगए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वेसीता की खोजमें गए।
    • शबरी का आश्रम :तुंगभद्राऔर कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में।जटायु औरकबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते मेंवे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकलकेरल में स्थित है।
      शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा।
      पम्पानदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भीजाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौररजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यहस्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधाकी राजधानी के तौर पर कियागया है।केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।
    • हनुमान से भेंट :मलयपर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहांउन्होंने हनुमानऔर सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा औरश्रीराम ने बाली का वध किया।
      ऋष्यमूकपर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकटस्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम कीहनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमानने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबलीबाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत परही आकर छिपकर रहने लगा था।
      ऋष्यमूकपर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है।विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूकपर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहांतुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी मेंपौराणिकचक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है।पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसीपर्वत पर मतंग ऋषि काआश्रम था।
    • कोडीकरई :हनुमानऔर सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका कीओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं कोपार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहलेअपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।तमिलनाडुकी एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरईसमुद्र तट वेलांकनी केदक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ीऔर दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।
      लेकिनराम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र कोपार नहीं किया जा सकता और यहस्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तबश्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।
    • रामेश्‍वरम : रामेश्‍वरमसमुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंगके लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍यरामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवानशिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंगहै।
    • धनुषकोडी :वाल्मीकिके अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्रमें वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो।उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करनेका फैसला लिया।
      छेदुकराईतथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भीमौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम मेंधनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों कोरामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।
      धनुषकोडीभारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणीकिनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडीपंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है।धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।
      इसकानाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नलऔर नील ने जो पुल (रामसेतु)बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है।इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है।धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्रनदी की गहराई जितना है जिसमेंकहीं-कहीं भूमि नजर आती है।
      दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटानेके कई प्रयास किए गए।अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगोंमें भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल कोक्षतिग्रस्तनहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बादमें बंदरगाह बनाने के चलते इसपुल को क्षतिग्रस्त किया गया।
      30 मीललंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है।श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग कानिर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहतीहै।इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंकाके ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुएरामसेतु पर भारत औरश्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।
    • 13.’नुवारा एलियापर्वत श्रृंखला :वाल्मीकिय-रामायणअनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवाराएलिया’ पहाड़ियोंसे लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों केबीचोबीच सुरंगोंतथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कईपुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका कालनिकाला गयाहै।
    • श्रीलंकामें नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोकवाटिका, खंडहर हो चुकेविभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनकेरामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानोंकी भौगोलिकविशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायणमें वर्णित किए गएहैं।

श्रीवाल्मीकिने रामायण की संरचना श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वर्ष 5075 ईपू केआसपास की होगी (1/4/1 -2)। श्रुति स्मृति की प्रथा के माध्यम सेपीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचलित रहने के बाद वर्ष 1000 ईपू के आसपास इसकोलिखितरूप दिया गया होगा। इस निष्कर्ष के बहुत से प्रमाण मिलते हैं।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

केवट प्रसंग


dsc00245 kevat ram-sita-mainभगवान श्रीराम, जानकी व लखनलाल जी सरजू मैया को पार करने के लिए केवट को बुलवाकर सरजू नदी पार करने की इच्छा प्रकट की तो भोले केवट ने भगवान से अपनी नौका में बिठाने लाने से साफ इंकार कर दिया। केवट कहने लगा कि प्रभु में गरीब मल्लाह इस नौका से मेरा परिवार का भरण पोषण करता  हुंं। मेनें सूना है कि आपके चरण कमल की रज मात्र से एक पत्थर की शीता एक नारी में बदल गयी यदि नौका नारी बन गयी तो मेरे परिवार का क्या होगा। इसलिए आपके चरण प्राक्षलन करने के बाद ही आपको सरजू नदी पार करवा सकता हुं। केवट की इस शर्त को रघुकुलशिरोमणी भगवान राम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात केवट ने काठ  के कठौते  में भगवान श्रीराम, जानकी व लखन लालजी के चरण कमल को सरजू के पवित्र जल से प्रेम भाव से धोकर उसका चरणामृत का अपने पूरे परिवार को प्रसाद दिया। इसके बाद जब सरजू पार करवायी तो भगवान केवट को उतरायी देने लगे तो केवट ने बड़ी मार्मिक बात की तो भगवान में सोचने पर विवश हो गये कि जिस वेâवट को जितना भोला समझ रहे थे वह कितना चतुर है। केवट बोला प्रभु एक ही काम करने वाले एक ही जाति के दो लोग आपस में लेन देन नहीं किया करते। मैं आपस से उतराई नर्र्ही  लेकर कहां रखुंगा। इस बार आप आए हो हमरे घाट जब हम आवेंगे   तोरे घाट तो नाथ तुम हमको पार उतार देना। इतना सुनते ही भगवान  राम ने उनके सिर पर हाथ धर कर आशीर्वाद दे दिया। केवट की आंखों में अश्रुधार बहने लगी। इसके बाद भरत लाल जी अपने बड़े भैया श्रीराम से गले मिले और राम को महाराज दशरथ के देवलोक गमन का पता चला तो भगवान राम भरत से गले लगकर अश्रुधारा बहाने लगे। भरतलाल ने राम को अयोध्या चलने की लाख कोशिश की लेकिन पिता की आन के आगे भरत लालजी को चरण पाटुका लेकर अयोध्या लौटना पड़ा।

केवट रामायण का एक पात्र है जिसने वनगमन के समय राम, सीता और लक्ष्मण को अपने नाव में बिठा कर गंगा पार करवाया था। इस कथा का वर्णन रामायण के अयोध्याकाण्ड में किया गया है। केवट भोईवंश का था। केवट श्री रामचन्द्र का अनन्य भक्त था। कहा जाता है कि श्रृष्टि के आरम्भ में जब सम्पूर्ण जगत जलमग्न था केवट का जन्म कछुवे की योनि में हुआ। उस योनि में भी उसका भगवान के प्रति अत्यधिक प्रेम था। अपने मोक्ष के लिये उसने शेष शैया पर शयन करते हुये भगवान विष्णु के अँगूठे का स्पर्श करने का असफल प्रयास किया था। उसके बाद एक युग से भी अधिक काल तक अनेक जन्म लेकर उसने भगवान की तपस्या की और अन्त में त्रेता युग में केवट के रूप में जन्म लेकर भगवान विष्णु, जो कि राम के रूप में अवतरित हुये थे।

मांगी नाव न केवटु आना।

कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ।।

चरन कमल रज कहुं सबु कहई।

मानुष करनि मूरी कछु अहई ।।

छुअत सिला भइ नारि सुहाई ।

पाहन तें न काठ कठिनाई ।।

तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई ।

बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ।।

एहिं प्रतिपालऊँ सबु परिवारु ।

नहिं जानऊँ कछु अउर कबारू ।।

जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू ।

मोहि पद पदुम पखारन कहहू ।।

 

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शीघ्र विवाह के सरल ज्योतिष उपाय – Dev Sharma


शीघ्र विवाह के सरल ज्योतिष उपाय
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जन्मकुंडली में कई ऐसे योग होते हैं जिनकी वजह से कोई भी पुरुष या स्त्री विवाह की खुशी से वंचित रह सकते हैं … .कई बार ये रूकावट बाहरी बाधाओं की वजह से भी आती हैं । उम्र लगातार बढती जाती है और लाख प्रयास के बाद भी रिश्ते बन नहीं पाते हैं या मनचाहे रिश्तों का तो जैसे आकाल ही पड़ जाता है इस प्रकार की स्थिति होने पर शीघ्र विवाह के उपाय करने में समझदारी रहती है। इन उपाय को करने से शीघ्र विवाह के मार्ग बनते है, तथा विवाह मार्ग की समस्त बाधाएं दूर होती है। यहाँ पर हम 30 बहुत ही आसान किन्तु अचूक उपाय बता रहे है जिनको सच्चे मन से करने से वर एवं कन्या दोनों को ही निश्चित रूप से मनवांछित लाभ प्राप्त होगा।

1👉 शीघ्र विवाह के लिए सोमवार को 1200 ग्राम चने की दाल व सवा लीटर कच्चे दूध का दान करें । यह प्रयोग तब तक करते रहना है जब तक कि विवाह न हो जाय।
2👉 जिन लड़कों का विवाह नहीं हो रहा हो या प्रेम विवाह में विलंब हो रहा हो , उन्हें शीघ्र मनपसंद विवाह के लिए श्रीकृष्ण के इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
शीघ्र विवाह के लिए भगवान श्री कृष्ण का मन्त्र
“क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।”

3👉 कन्या जब किसी कन्या के विवाह में जाये और यदि वहाँ पर दुल्हन को मेहँदी लग रही हो तो अविवाहित कन्या कुछ मेहँदी उस दुल्हन के हाथ से लगवा ले इससे विवाह का मार्ग शीघ्र प्रशस्त होता है।

4👉 विवाह वार्ता के लिए घर आए अतिथियों को इस प्रकार बैठाएं कि उनका मुख घर में अंदर की ओर हो , उन्हें द्वार दिखाई न दे।

5👉 विवाह योग्य युवक-युवती जिस पलंग पर सोते हों उसके नीचे लोहे की वस्तुएं या कबाड़ का सामान कभी भी नहीं रखना चाहिए।

6👉 यदि विवाह के पूर्व लड़का-लड़की मिलना चाहें तो वह इस प्रकार बैठे कि उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर न हो।

7👉 कन्या सफेद खरगोश को पाले तथा अपने हाथ से उसे भोजन के रूप में कुछ दे।

8👉 कन्या के विवाह की चर्चा करने उसके घर के लोग जब भी किसी के यहाँ जायें तो कन्या खुले बालों से , लाल वस्त्र धारण कर हँसते हुए उन्हें कोई मिष्ठान खिला कर विदा करे, विवाह की चर्चा सफल होगी।

9👉 पूर्णिमा को वट वृक्ष की 108 परिक्रमा देने से भी विवाह बाधा दूर होती है।

10👉 गुरूवार को वट वृक्ष, पीपल, केले के वृक्ष पर जल अर्पित करने से विवाह बाधा दूर होती है।
मन्त्र-
गौरी आवे, शिव जो ब्यावे.अमुक का विवाह तुरंत सिद्ध करेँ,
देर ना करेँ, जो देर होए, तो शिव को त्रिशूल पड़े,
गुरु गोरखनाथ की दुहाई फिरै ..
अमुक के स्थान पर जिस लड़की का विवाह न हो रहा हो उसका नाम लिख सकते है!

11👉 जिन व्यक्तियों को शीघ्र विवाह की कामना हों उन्हें गुरुवार को गाय को दो आटे के पेडे पर थोड़ा हल्दी लगाकर खिलाना चाहिए। तथा इसके साथ ही थोड़ा सा गुड व चने की पीली दाल का भोग गाय को लगाना शुभ होता है।
12👉 किसी भी शुभ दिवस पर मिटटी का एक नया कुल्हड़ लाएँ तथा उसमे एक लाल वस्त्र , सात काली मिर्च एवं सात ही नमक की साबुत कंकड़ी रख दें , हांडी का मुख लाल कपडे से बंद कर दें एवँ कुल्हड़ के बाहर कुमकुम की सात बिंदियाँ लगा दे फिर उसे सामने रख कर निम्न मंत्र की 5 माला जप करेँ। मन्त्र जप के पश्चात हांडी को चौराहे पर रखवा देँ यह बहुत ही असरदायक प्रयोग है।

13👉 यदि कन्या की शादी में कोई रूकावट आ रही हो तो पूजा वाले 5 नारियल लें! भगवान शिव की मूर्ती या फोटो के आगे रख कर “ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नामः” मंत्र का पांच माला जाप करें फिर वो पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढा दें! विवाह की बाधायें अपने आप दूर होती जांयगी।

14👉 प्रत्येक सोमवार को कन्या सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर “ऊं सोमेश्वराय नमः” का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढाये और वहीं मंदिर में बैठ कर रूद्राक्ष की माला से इसी मंत्र का एक माला जप करे ! विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नज़र आयेगी।

15👉 शिव-पार्वती का पूजन करने स भी विवाह की मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं। इसके लिए प्रतिदिन शिवलिंग पर कच्चा दूध, बिल्व पत्र, अक्षत, कुमकुम आदि चढ़ाकर विधिवत पूजन करें।

16👉 विवाह योग्य लोगों को शीघ्र विवाह के लिये प्रत्येक गुरुवार को नहाने वाले पानी में एक चुटकी हल्दी डालकर स्नान करना चाहिए । भोजन में केसर का सेवन करने से विवाह शीघ्र होने की संभावनाएं बनती है।

17👉 विवाह योग्य व्यक्ति को सदैव शरीर पर कोई भी एक पीला वस्त्र धारण करके रखना चाहिए।

18👉 गुरुवार की शाम को पांच प्रकार की मिठाई, हरी ईलायची का जोडा तथा शुद्ध घी के दीपक के साथ जल अर्पित करना चाहिये, यह प्रयोग लगातार तीन गुरुवार को करना चाहिए, इससे शीघ्र विवाह के योग निस्संदेह बनते है।

19👉 गुरुवार केले के को वृ्क्ष पर जल अर्पित करके शुद्ध घी का दीपक जलाकर गुरु के 108 नामों का उच्चारण करने से जल्दी ही जीवनसाथी की तलाश पूर्ण हो जाती है।

20👉 बृहस्पति को देवताओं का गुरु माना जाता है इनकी पूजा से विवाह के मार्ग में आ रही सभी अड़चनें स्वत : ही समाप्त हो जाती हैं। इनकी पूजा के लिए गुरुवार का विशेष महत्व है।

21👉 गुरुवार को बृहस्पति देव को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग की वस्तुएं चढ़ानी चाहिए। पीले रंग की वस्तुएं जैसे हल्दी, पीला फल, पीले रंग का वस्त्र, पीले फूल, केला, चने की दाल आदि इसी तरह की वस्तुएं गुरु ग्रह को चढ़ानी चाहिए। साथ ही शीघ्र विवाह की इच्छा रखने वाले युवाओं को गुरुवार के दिन व्रत रखना चाहिए। इस व्रत में खाने में पीले रंग का खाना ही खाएं, जैसे चने की दाल, पीले फल, केले खाने चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले को पीले रंग के वस्त्र ही पहनने चाहिए।
ग्रां ग्रीं ग्रों स: गुरूवे नम:। मंत्र का पांच माला प्रति गुरुवार जप करें।

22👉 अगर किसी का विवाह कुण्डली के मांगलिक योग के कारण नहीं हो पा रहा है , तो ऎसे व्यक्ति को मंगल वार के दिन चण्डिका स्तोत्र का पाठ तथा शनिवार के दिन सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए। इससे भी विवाह के मार्ग की बाधाओं में कमी होती है।

23👉 शिव-पार्वती का पूजन करने से भी विवाह की मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं । इसके लिए प्रतिदिन शिवलिंग पर कच्चा दूध, बिल्व पत्र, अक्षत, कुमकुम आदि चढ़ाकर विधिवत पूजन करें।

24👉 जिन व्यक्तियों की विवाह की आयु हो चुकी है । परन्तु विवाह संपन्न होने में बाधा आ रही है उन व्यक्तियों को यह उपाय करना चाहिए। इस उपाय में शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोयें तथा शनिवार को प्रात: स्नान करने के बाद किसी भी बहते जल में इन्हें प्रवाहित कर दें।

25👉 यदि आपको प्रेम विवाह में अडचने आ रही हैं तो : – शुक्ल पक्ष के गुरूवार से शुरू करके विष्णु और लक्ष्मी मां की मूर्ती या फोटो के आगे “ऊं लक्ष्मी नारायणाय नमः” मंत्र का रोज़ तीन माला जाप स्फटिक माला पर करें ! इसे शुक्ल पक्ष के गुरूवार से ही शुरू करें! तीन महीने तक हर गुरूवार को मंदिर में प्रशाद चढांए और विवाह की सफलता के लिए प्रार्थना करें।

26👉 शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार को सात केले, सात गौ ग्राम गुड़ और एक नारियल लेकर किसी नदी या सरोवर पर जाएं । अब कन्या को वस्त्र सहित नदी के जल में स्नान कराकर उसके ऊपर से जटा वाला नारियल ऊसारकर नदी में प्रवाहित कर दें। इसके बाद थोड़ा गुड़ व एक केला चंद्रदेव के नाम पर व इतनी ही सामग्री सूर्यदेव के नाम पर नदी के किनारे रखकर उन्हें प्रणाम कर लें। थोड़े से गुड़ को प्रसाद के रूप में कन्या स्वयं खाएं और शेष सामग्री को गाय को खिला दें। इस टोटके से कन्या का विवाह शीघ्र ही हो जाएगा।

27👉 शादी वाले दिन से एक दिन पहले एक ईंट के ऊपर कोयले से “बाधायें” लिखकर ईंट को उल्टा करके किसी सुरक्षित स्थान पर रख दीजिये , और शादी के बाद उस ईंट को उठाकर किसी पानी वाले स्थान पर डाल कर ऊपर से कुछ खाने का सामान डाल दीजिये, विवाह के समय और विवाह के बाद में वर / वधु के दाम्पत्य जीवन में बाधायें नहीं आयेंगी, यह काम वर – वधु या उनके घर का कोई भी सदस्य कर सकता है लेकिन यह काम बिल्कुल चुपचाप करना चाहिए।

28👉 बृहस्पति, शुक्र, बुद्ध और सोम इन वारों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है । विवाह में चतुर्दशी, नवमी इन तिथियों को त्याग देना चाहिए।

29👉 विवाह के पश्चात एक वर्ष तक पिण्डदान, मृक्ति का स्नान, तिलतर्पण, तीर्थयात्रा, मुण्डन, प्रेतानुगमन आदि नहीं करना चाहिये।

30👉 यदि किसी कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा है तो वह कन्या आज विवाह की कामना से भगवान श्रीगणेश को मालपुए का भोग लगाए तो शीघ्र ही उसका विवाह जाता है हो।

31👉 यदि किसी युवक के विवाह में परेशानियां आ रही हैं तो वह भगवान श्रीगणेश को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं तो उसका विवाह भी जल्दी जाता है हो।

नोट👉 प्राराब्ध जनित बाधा शांति के लिए वैदिक उपाय ही श्रेयष्कर है।
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भावनगर के राजा


http://www.punjabkesari.in/religious-fiction/news/inspirational-story-488335

भावनगर के राजा एक बार गर्मियों के दिनों में अपने आम के बागों में आराम कर रहे थे। वह बहुत ही खुश थे कि उनके बागों में बहुत अच्छे आम लगे थे और ऐसे में वह अपने ख्यालों में खोए हुए थे। तब वहां से गरीब किसान गुजर रहा था और वह बहुत भूखा था। उसका परिवार पिछले 2 दिनों से भूखा था तो उसने देखा कि क्या मस्त आम लगे हैं, अगर मैं यहां से कुछ आम तोड़ कर ले लाऊं तो मेरे परिवार के खाने का बंदोबस्त हो जाएगा। यह सोच कर वह उस बाग में गया तो उसे पता नहीं था कि इस बाग में भावनगर के राजा आराम कर रहे हैं। उसने तो चोरी-छिपे प्रवेश करते ही एक पत्थर उठाकर आम के पेड़ पर मार दिया और वह पत्थर आम के पेड़ से टकराकर सीधा राजा के सिर पर जा लगा। राजा का पूरा सिर खून से लथपथ हो गया और वह अचानक हुए हमले से अचंभित थे तथा उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर उन पर हमला किसने किया।

 

राजा ने अपने सिपाहियों को आवाज दी तो सारे सिपाही दौड़े चले आए और राजा का यह हाल देख उन्हें लगा कि किसी ने उन पर हमला किया है। वे बगीचे के चारों तरफ आरोपी को ढूंढने लगे। इस शोर-शराबे को देखकर गरीब किसान समझ गया कि कुछ गड़बड़ हो गई है। वह डर के मारे भागने लगा। सिपाहियों ने इस गरीब किसान को दरबार में पेश किया और राजा ने उससे सवाल किया कि तूने मुझ पर हमला क्यों किया।

 

गरीब किसान डरते-डरते बोला, ‘‘माई-बाप मैंने आप पर हमला नहीं किया है, मैं तो सिर्फ आम लेने आया था। मैं और मेरा परिवार पिछले 2 दिनों से भूखे थे इसलिए मुझे लगा कि अगर यहां से कुछ फल मिल जाएं तो मेरे परिवार की भूख मिट सकेगी। यह सोचकर मैंने वह पत्थर आम के पेड़ को मारा था। मुझे पता नहीं था कि आप उस पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे और वह पत्थर आपको लग गया।’’

 

यह सुनकर सभी दरबारी बोलने लगे कि अरे मूर्ख, तुझे पता है कि तूने कितनी बड़ी भूल की है। तूने इतने बड़े राजा के सिर पर पत्थर मारा है, अब देख तेरा क्या हाल होता है। राजा ने सभी दरबारियों को शांत रहने को कहा और बोले, ‘‘भला अगर एक पेड़ को कोई पत्थर मारता है और वह फल दे सकता है तो मैं तो भावनगर का राजा हूं, मैं इसे दंड कैसे दे सकता हूं। अगर एक पेड़ पत्थर खाकर कुछ देता है तो मैंने भी पत्थर खाया है, मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं भी इस गरीब किसान को कुछ दूं।’’

 

उन्होंने अपने मंत्री को आदेश दिया कि जाओ और हमारे अनाज भंडार से इस इंसान को पूरे एक साल का अनाज दे दो।  वह गरीब किसान भी राजा की दया और उदारता देखकर अपने आंसू नहीं रोक पाया और भावनात्मक होकर राजा के सामने झुक कर कहने लगा कि धन्य भाग हैं इस भावनगर के जिसको इतना परोपकारी दयालु राजा मिला और पूरे दरबार में राजा का जयकार नाद गूंजने लगा।