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आखिर कहाँ खो गए भारत के ७ लाख ३२ हज़ार गुरुकुल एवं विज्ञान की २० से अधिक शाखाएं : राजीव जी दीक्षित


आखिर कहाँ खो गए भारत के ७ लाख ३२ हज़ार गुरुकुल एवं विज्ञान की २० से अधिक शाखाएं : राजीव जी दीक्षित

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बात आती है की भारत में विज्ञान पर इतना शोध किस प्रकार होता था, तो इसके मूल में है भारतीयों की जिज्ञासा एवं तार्किक क्षमता, जो अतिप्राचीन उत्कृष्ट शिक्षा तंत्र एवं अध्यात्मिक मूल्यों की देन है। “गुरुकुल” के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है। भारत में विज्ञान की २० से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख १. खगोल शास्त्र २. नक्षत्र शास्त्र ३. बर्फ़ बनाने का विज्ञान ४. धातु शास्त्र ५. रसायन शास्त्र ६. स्थापत्य शास्त्र ७. वनस्पति विज्ञान ८. नौका शास्त्र ९. यंत्र विज्ञान आदि इसके अतिरिक्त शौर्य (युद्ध) शिक्षा आदि कलाएँ भी प्रचुरता में रही है। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते थे।

थोमस मुनरो सन १८१३ के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में ४०० लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर जी.डब्लू.लिटनेर ने सन १८२२ में लिखा है, उत्तर भारत में २०० लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। माना जाता है की मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते है “भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में ८० सहस्त्र (हज़ार) से अधिक गुरुकुल है जो की कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है”।

उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आकडों के कुल पर औसत निकलने से यह ज्ञात होता है की भारत में १८ वी शताब्दी तक ३०० व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और चौकानें वाला तथ्य यह है की १८ शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग २० करोड़ थी, ३०० व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में ७ लाख ३२ सहस्त्र गुरुकुल होने चाहिए। अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसे के अनुसार १८२२ के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग ७ लाख ३२ सहस्त्र थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल। १६ से १७ वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी १८ वी शताब्दी में यहीं लिखा की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।

राजा की सहायता के अपितु, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण १८ शताब्दी तक भारत में साक्षरता ९७% थी, बालक के ५ वर्ष, ५ माह, ५ दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम १४ वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः २० से अधिक विषयों का अध्यन कर गुरुकुल से निकलता था। तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।

इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो २००० वर्ष पूर्व के है परंतु मात्र १५०-१७० वर्ष पूर्व भी भारत में ५००-५२५ के लगभग विश्वविद्यालय थे। थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) जिन्हें पहले हमने विराम दिया था जब सन १८३४ आये तो कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गए की अंग्रेजो पहले के आक्रांताओ अर्थात यवनों, मुगलों आदि भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाशकरने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत कदापि पददलित नहीं किया जा सकेगा, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन करने का हेतु सिद्ध हो सकता है। इसी कारण “इंडियन एज्यूकेशन एक्ट” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजो को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश का परिश्रम न करना पड़े।

उस पर से अंग्रेजी कदाचित शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं होती तो इस कुचक्र के पहले अंकुर माता पिता ही पल्लवित होने से रोक लेते परंतु ऐसा हो न सका। हमारे निर्यात कारखाने एवं उत्पाद की कमर तोड़ने हेतु भारत में स्वदेशी वस्तुओं पर अधिकतम कर देना पड़ता था एवं अंग्रेजी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया गया था। कृषकों पर तो ९०% कर लगा कर फसल भी लूट लेते थे एवं “लैंड एक्विजिशन एक्ट” के माध्यम से सहस्त्रो एकड़ भूमि भी उनसे छीन ली जाती थी, अंग्रेजो ने कृषकों के कार्यों में सहायक गौ माता एवं भैसों आदि को काटने हेतु पहली बार कलकत्ता में कसाईघर चालू कर दिया, लाज की बात है वह अभी भी चल रहा है। सत्ता हस्तांतरण के दिवस (१५-८-१९४७ ) के उपरांत तो इस कुचक्र की गोरे अंग्रेजो पर निर्भरता भी समाप्त हो गई, अब तो इसे निर्बाधित रूप से चलने देने के लिए बिना रीढ़ के काले अंग्रेज भी पर्याप्त थे, जिनमें साहस ही नहीं है भारत को उसके पूर्व स्थान पर पहुँचाने का |

“दुर्भाग्य है की भारत में हम अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक पुरुषों को भूल चुके है। इसका कारण विदेशियत का प्रभाव और अपने बारे में हीनता बोध की मानसिक ग्रंथि से देश के बुद्धिमान लोग ग्रस्त है” – डॉ.कलाम, “भारत २०२० : सहस्त्राब्दी”

आप सोच रहे होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चों के लिए सार्वजानिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैण्ड में सन १८६८ में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका में अर्थात जब भारत में प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल था, ९७ % साक्षरता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे? होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी की शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए बाकी सब को तो सेवा करनी है।

source: http://www.krantidoot.in/

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सिर्फ 7 दीन में सफ़ेद दाग खत्म होगी खत्म दिवान हकीम परमानन्द जी के द्वारा अनभूत प्रयोग


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दुर्गेश दुबे

सिर्फ 7 दीन में सफ़ेद दाग खत्म होगी खत्म
दिवान हकीम परमानन्द जी के द्वारा अनभूत प्रयोग

१- २५ ग्राम देशी कीकर (बबूल) के सूखे पते
२- २५ ग्राम पान की सुपारी (बड़े आकार की)
३- २५ ग्राम काबली हरड का छिलका
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उपरोक्त तीन बस्तुवे लेकर दवा बनाये | कही से देशी कीकर(काटे वाला पेड़ जिसमे पीले फुल लगते है ) के ताजे पत्ते (डंठल रहित ) लाकर छाया में सुखाले कुछ घंटो में पत्ते सुख जायेगे बबूल के इन सूखे पत्तो को काम में ले पान वाली सुपारी बढिया ले इसका पावडर बना ले कबाली हरड को भी जौ कुट कर ले
और इन सभी चीजो को यानि बबूल , सुपारी , काबली हरड का छिलका (बड़ी हरड) सभी को २५ -२५ ग्राम की अनुपात में ले कुल योग ७५ ग्राम और ५०० मिली पानी में उबाले पानी जब १२५ मिली बचे तब उतर कर ठंडा होने दे और छान कर पी ले ये दवा एक दिन छोड़ कर दुसरे दिन पीनी है अर्थात मान लीजिये आज आप ने दवा ली तो कल नहीं लेनी है और इस काढ़े में २ चमच खांड या मिश्री मिला ले (10 ग्राम ) और ये निहार मुह सुबह –सुबह पी ले और २ घंटे तक कुछ भी खाना नहीं है दवा के प्रभाव से शरीर शुद्धि हो और उलटी या दस्त आने लगे परन्तु दवा बन्द नहीं करे १४ दीन में ७ दिन लेनी है और फीर दवा बन्द कर दे कुछ महीने में घिरे –घिरे त्वचा काली होने लगेगी हकीम साहब का दावा है की ये साल भर में सिर्फ एक बार ही लेने से रोग निर्मूल (ख़त्म ) हो जाता है अगर कुछ रह जाये तो दुसरे साल ये प्रयोग एक बार और कर ले नहीं तो दुबारा इसकी जरूरत नहीं पडती
पूरक उपचार
एक निम्बू एक अनार एक सेब _ तीनो का अलग – अलग तजा रस निकालने के बाद अच्छी तरह परस्पर मिलाकर रोजाना सुबह शाम या दिन में किसी भी समय एक बार नियम पूर्वक ले |यह फलो का ताजा रस कम से कम दवा सेवन के पर्योग आगे २ 3 महीने तक जारी रख सके तो अधिक लाभदायक रहेगा |
विशेस __
१ – दवा के सेवन काल के १४ दिनों में मक्खन घी दूध अधिक लेना हितकर है क्योकि दवा खुश्क है
२ – चौदह दिन दवा लेने के बाद कोई बिशेस परहेज पालन की जरुरत नहीं है श्वेत कुष्ठ के दुसरे इलाजो में कठीन परहेज पालन होती है परन्तु इस ईलाज में नातो सफेद चीजो का परहेज है और ना खटाई आदि का फीर भी आप मछली मांस अंडा नशीले पदार्थ शराब तम्बाकू आदि और अधिक मिर्च मसले तेल खटाई आदि का परहेज पालन कर सके तो अच्छा रहेगा

3,दवा सेवन के 14 दिनों में कभी –कभी उलटी या दस्त आदि हो सकता है इससे घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसे शारीरिक शुध्धी के द्वारा आरोग्य प्राप्त होनेका संकेत समझना चाहिए
4, रोग दूर होने के संकेत हकीम साहब के अनुसार दवा के सेवन के लगभग 3 महीने बाद सफेद दागो के बीच तील की तरह काले भूरे या गुलाबी धब्धे ( तील की तरह धब्बे ) के रूप में चमड़ी में रंग परिवर्तन दिखाई देगा और साल भर में धीरे –धीरे सफेद दाग या निसान नष्ट हो कर त्वचा पहले जयसी अपने स्वभाविक रंग में आ जाएगी फीर भी यदि कुछ कसर रह जाये तो एक साल बीत जाने के बाद दवा की सात खुराके इसी तरह दुबारा ले सकते है

5, दिवान हकीम साहब का दावा है की उतर्युक्त ईलाज से उनके १४६ श्वेत कुष्ठ के रोगियों में से १४२ रोगी पूर्णत : ठीक अथवा लाभान्वित हुये है कुछ सम्पूर्ण शरीर में सफेद रोगी भी ठीक हुये है निर्लोभी परोपकारी दीवान हकीम परमानन्द जी की अनुमति से बिस्तार से यह अनमोल योग मानव सेवा भावना के साथ जनजन तक पहुचा रहा हु इस आशा और उदात भावना के साथ की पाठक निश्वार्थ भावना से तथा बिना किसी लोभ के जनजन तक जरुर पहुचाये
साभार – विनोद पांडेय

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शरद पूर्णिमा विशेष


शरद पूर्णिमा विशेष →

शरद पूर्णिमा की रात्रि का सेहत के लिए विशेष महत्त्व है। इस रात को चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषकशक्ति एवं शांतिरूपी अमृत की वर्षा करता है। आज की रात्रि चंद्रमा पृथ्वी के बहुत नजदीक होता है और उसकी उज्जवल किरणें पेय एवं खाद्य पदार्थों में पड़ती हैं अत: उसे खाने वाला व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है। उसका शरीर पुष्ट होता है। भगवान ने भी कहा है –

पुष्णमि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।

‘रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।’ (गीताः15.13)

चन्द्रमा की किरणों से पुष्ट खीर पित्तशामक, शीतल, सात्त्विक होने के साथ वर्ष भर प्रसन्नता और आरोग्यता में सहायक सिद्ध होती है। इससे चित्त को शांति मिलती है और साथ ही पित्तजनित समस्त रोगों का प्रकोप भी शांत होता है ।

आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो चन्द्र का मतलब है, शीतलता। बाहर कितने भी परेशान करने वाले प्रसंग आए लेकिन आपके दिल में कोई फरियाद न उठे। आप भीतर से ऐसे पुष्ट हों कि बाहर की छोटी-मोटी मुसीबतें आपको परेशान न कर सकें ।

इस रात हजार काम छोड़कर 15 मिनट चन्द्रमा को एकटक निहारना सेहत की दृष्टि से अति उत्तम है।

एक आध मिनट आंखें पटपटाना यानी झपकाना चाहिए।

कम से कम 15 मिनट चन्द्रमा की किरणों का फायदा लेना चाहिए, ज्यादा भी करें तो कोई नुकसान नहीं। इससे 32 प्रकार की पित्त संबंधी बीमारियों में लाभ होगा।

चांद के सामने छत पर या मैदान में ऐसा आसन बिछाना चाहिए जो विद्युत का कुचालक हो।

चन्द्रमा की तरफ देखते-देखते अगर मन हो तो आप लेट भी सकते हैं।

श्वासोच्छवास के साथ भगवान का नाम और शांति को भीतर भरते जाएं।

ऐसा करते-करते आप विश्रान्ति योग में चले जाए तो सबसे अच्छा होगा।

जिन्हें नेत्रज्योति बढ़ानी हो, वे शरद पूनम की रात को सुई में धागा पिरोने की कोशिश करें।

इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त 64 कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है।

चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है, जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। मान्यता है कि इस खीर के सेवन से अस्थमा रोगी रोगमुक्त होता है। इसके अलावा खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी है।

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मंगल स्तोत्रम्


●●●●ॐ अथ् मंगल स्तोत्रम् एवं यंत्रम ●●●●

● (यह स्तोत्र एवं यन्त्र महृषि भार्गव जी द्वारा कृत है और यह ऋणहर्ता, रोगनाशक, दारिद्र्यनाशक , पापनाशक, अकाल-मृत्यु नाशक , शत्रु नाशक, भय-शोकादि निवारक, गृह-सुख कारक, भूमि -सुख कारक एवं मानसिक रोग / चिंता नाशक है । कृपया एक समय पर इस यंत्र से अत्यावश्यक एक ही काम सिद्ध करें और इसका दुरुपयोग भूल से भी न करें जी ।)

● मंगल स्तोत्र :–
1 (१) ॐ मंगलाय नमः ।।
2. (२) ॐ भूमिपुत्राय नमः ।।
3. (३) ॐ ऋणहर्त्रे नमः ।।
4. (४) ॐ धनप्रदाय नमः ।।
5. (५) ॐ स्थिरासनाय नमः ।।
6. (६) ॐ महाकाय नमः ।।
7. (७) ॐ सर्वकर्मावरोधकाय नमः ।।
8. (८) ॐ लोहिताय नमः ।।
9. (९) ॐ लोहिताक्षाय नमः ।।
10.(१०) ॐ सामगानां कृपाकराय नमः ।।
11.(११) ॐ धरात्मजाय नमः ।।
12.(१२) ॐ कुजाय नमः ।।
13.(१३) ॐ भौमाय नमः ।।
14.(१४) ॐ भूमिसुताय नमः ।।
15.(१५) ॐ भूमिनन्दनाय नमः ।।
16.(१६) ॐ अंगारकाय नमः ।।
17.(१७) ॐ यमाय नमः ।।
18.(१८) ॐ सर्वरोगापहारकाय नमः ।।
19.(१९) ॐ वृष्टिकर्त्रे नमः ।।
20.(२०) ॐ अपहर्त्रे नमः।।
21.(२१) ॐ सर्वकर्मफलप्रदाय नमः ।।

●● ॐ ऋण–रोगादि– दारिद्रयम्–पापम् –क्षुदपमृत्यव:–शत्रुणाम् — भय–शोक–मनस्तापा विनाशाय च महाबुद्धे संकटान् मे निवारय निवारय स्वाहा ॐ… ●●

●यन्त्र लिखने की विधि :–
कृपया सबसे पहले भुर्जपत्र या सादे कागज पर अभीष्ट रेखाओं द्वारा यंत्र का खाका लाल पेन या खदिर/ रक्त चंदन/ अनार की कलम एवं अष्टगंध मसि से तैयार कर लेवें जी । फिर ” मंगल अमृतसिद्धि योग ” के समय लाल पेन से या खदिर / लाल चंदन / अनार की कलम द्वारा अष्टगंध मसि से उपरोक्त क्रमांक एक पर लिखा मन्त्र पढ़ते हुए यन्त्र के निर्धारित खाने में अंक १ लिखें । इस विधि को क्रमांक इक्कीस तक जारी रखें और फिर सबसे अन्त में दिए हुए मन्त्र को 108 बार पढ़ने पर यन्त्र सिद्ध हो जाता है । अब इसे ताम्बे या चांदी या स्वर्ण के ताबीज में जड़वाकर लाल डोरी या स्वर्ण की चैन में किसी शुभ मंगलवार को धारण करें जी । आपकी प्रार्थना 41 दिनों में या एक वर्ष के अंदर- अंदर अवश्य पूर्ण रूप से फलीभूत होगी ~आवश्यकता है पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास की ।

शेष शुभेच्छा ।
ॐ स्मरण…

●विशेष :–
मंगल का यंत्र नीचे छायाचित्र में दिया हुआ है जिसका आपने स्वयमेव् शुद्ध मुहूर्त में विधिपूर्वक निर्माण करना है । ॐ…

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परमात्मा प्राप्ति किसे होती हॆ???? – Sanjay Sharma


Sanjay Sharma

परमात्मा प्राप्ति किसे होती हॆ????

एक सुन्दर कहानी है:—-

एक राजा था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।
वह नित्य अपने इष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।
एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा—“राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?”
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला—“भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हॆ।आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति हॆ। फिर भी मेरी एक ईच्छा हॆ कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।”
“यह तो सम्भव नहीं है ।” –भगवान ने राजा को समझाया ।परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले,-“ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।”

राजा अत्यन्त प्रसन्न. हुअा और भगवान को धन्यवाद दिया।
अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें।

दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो,इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।

परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ एक प्रजा तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गयी और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे।

राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे।उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है । चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया।अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।

अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे।राजा रानी से कहने लगे—“देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हॆ। भगवान के सामने सारी दुनियां कि दौलत क्या चीज हॆ?” सही बात है–रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे।

कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड हॆ।अब तो रानी से रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी,और हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी।यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।

वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे।राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा –“कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ।”

राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।तब भगवान ने राजा को समझाया–
“राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हॆ, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हॆ।”

सार……
जो आत्मायें अपनी मन ओर बुद्धि से भगवान पर कुर्बान जाते हैं,
और सर्वसम्बधों से प्यार करते है………..वह भगवान के प्रिय बनते हैं।

Posted in संस्कृत साहित्य

संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः (4)


संन्यास धर्म के बारे महाभारत ग्रंथ में बहुत-सी बातें कही गई हैं । उनमें से कुछ चुनी हुई बातों का उल्लेख मैंने पिछले तीन आलेखों में किया है

(दिनांक ११ मई, ७ जून, एवं २७ जुलाई) । चार आलेखों की इस शृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम आलेख यहां पर प्रस्तुत है ।

महाभारत ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है । उसी के अंतर्गत एक प्रकरण है जिसके अनुसार युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उनके विचार को नकारते हुए सलाह देते हैं कि उन्हें जनता का हित साधने के लिए राजकाज चलाना चाहिए । वार्तालाप के उस सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधु-महात्माओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग…

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बात उस जमाने की है जब कबूतर


Mukesh Sharma 
बात उस जमाने की है जब कबूतर झाड़ियों में बच्चे दिया करते थे। लोमड़ी आती और उनके अण्डे खा जाती। रखवाली का कोई ठीक प्रबन्ध न बन पड़ा तो कबूतरों ने दूसरी चिड़ियों से बचाव का उपाय पूछा। उनने कहा पेड़ पर घोंसला बनाने के अलावा और कोई चारा नहीं।
कबूतर ने घोंसला बनाया पर वह ठीक तरह बन न सका। आखिर उसने तय किया कि दूसरी चिड़ियों की सहायता से घोंसला बनाने का काम पूरा किया जाय।
चिड़ियों को बुलाया तो वे खुशी खुशी आई और कबूतर को अच्छा घोंसला बनाना सिखाने लगी। अभी बनना शुरू ही हुआ था कि कबूतर ने कहा- “ऐसा बनाना तो हमें आता हैं यों तो हमीं बना लेंगे।”
चिड़ियां वापिस चली गई।
कबूतर ने बहुत कोशिश की पर घोंसला ठीक से बना नहीं। वह फिर चिड़ियों के पास गया। खीजती हुई वे फिर आई और तिनके ठीक तरह जमाना सिखाने लगी। आधा भी काम पूरा न हो पाया था कि कबूतर उचका। उसने कहा- “ऐसे तो मैं जानता ही हूँ।”
चिड़ियाँ वापिस चली गई। कबूतर लगा रहा पर वह बना फिर भी न सका।
चिड़ियों के पास फिर पहुँचा तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया और कहा – “जो जानता कुछ नहीं और मानता है कि मैं सब कुछ जानता हूँ, ऐसे मूर्ख को कोई कुछ नहीं सिखा सकता।”
नासमझ कबूतर अपने ओछे अहंकार में किसी से कुछ न सीख सका और अभी तक उसका घोंसला अन्य चिड़ियों की बनिस्बत भौंड़ा ही बनता है….
कहानी की तारतम्य ये क़ि परमात्मा ने किसी को भी सर्वागीण नहीं बनाया…हम सभी को हर किसी से जो भी कौशल है,उसको सीखना चाहिए…यही सफल जीवन की इबारत लिखने में कारगर होता…आज अपने प्रभु से जीवन में हर किसी से सीखने की अलौकिक प्रार्थना के साथ…***शुप्रभात***

Posted in हिन्दू पतन

व्यास जी द्वारा रचित हमारे 18 वैदिक पुराणों मे से भविष्य पुराण भी एक है… , भविष्य पुराण में मूलतः पचास हजार (50,000) श्लोक विद्यमान थे,परन्तु श्रव्य परम्परा पर निर्भरता और अभिलेखों के लगातार विनष्टीकरण (मुगलों द्वारा तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों को जलाकर एंव मुगल शासन काल मे ब्राह्मणो द्वारा संचित धर्म […]

via जानिये । मुसलमान मुंछे क्यों नहीं रखते है ? वैदिक ग्रंथ भविष्य पुराण मे है इसका उत्तर ,जरूर पढ़ें हर हिन्दू गर्व करे । Yogesh Mishra — પ્રહલાદ પ્રજાપતિ