Posted in भारत का गुप्त - Bharat Ka rahasyamay Itihaas

“पद्मावती”

“पद्मावती”
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चित्तौड़ के राजमहल की छत पर बैठे बैठे उसका मन उचट गया था। सखियों की ठिठोली अब अप्रिय हो चली थी। अंत में वह ऊब कर उठी और पिजड़े में बन्द अपने पालतू तोते के पास जा कर उसकी पूंछ सहलाने लगी, तभी दासी ने कहा- महारानी, महाराज पधार रहे हैं।
प्रभात में सूर्य की प्रथम किरण के स्पर्श से उन्मत्त कुमुदनी की तरह खिल गयी वह, और मध्यरात्रि में वायु के साथ अटखेलियां करती रजनीगंधा की तरह महकने लगी। उसने संकेत किया और सभी दासियाँ तुरंत हट गयीं।
मुस्कुराते रतन सिंह ने कहा- कैसी हो पद्मा?
वह भी मुस्कुराई- जैसे आप हैं महाराज।
– मैं तो आनंद में हूँ, मेरे पास तुम जो हो…
– मैं आप से दुगुने आनंद में हूँ, मेरे पास आप जो हैं। किन्तु आप तो दक्षिण सीमा की ओर प्रस्थान करने वाले थे महाराज?
– हाँ, पर विचार त्याग दिया।
पद्मा ने हँस कर कहा- तब तो आपको करों की बड़ी हानि हो गयी महाराज, यह हानि कैसे पूरी होगी?
– हानि कहाँ हुई, कुछ मुद्राओं की हानि के स्थान पर तुम्हारे सामीप्य का लाभ हुआ। गणित करो तो मैं आज हजार गुने लाभ में हूँ।
कुछ देर के परिहास के बाद रतन सिंह ने कहा- पद्मा आओ तनिक युद्धाभ्यास किया जाय। तलवार में तो तुम गुरु हो मेरी।
पद्मा मुस्कुराई और उसने निकट दीवाल पर टंगी म्यान से तलवार खींची और प्रस्तुत हुई, आइये महाराज बहुत दिन हुए आपको पराजित किए।
महाराज हँस पड़े- आज नही हरा पाओगी पद्मा।
मुस्कुराती पद्मा ने जैसे चुनौती दी, आइये फिर देख ही लेते हैं।
कुछ हीं पलों में तलवारों की टंकार से पूरा महल गूंज उठा। पर यह किसी के लिए आश्चर्य की बात नही थी। महल का समूचा अन्तःपुर जानता था कि महाराज रतनसिंह और महारानी पद्मावती के अद्भुत प्रेम के पीछे सिर्फ महारानी का सौंदर्य ही नही अपितु उनकी अतुल्य वीरता
भी है। ये दो प्रेमी जब भी स्नेह के कुछ अतिरिक्त पल पाते तो तलवार ले कर उतर जाते। सो तलवारों की टंकार सुन कर अन्तःपुर की सभी दासियों के चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी।
दोनों की तलवारें हवा को मात दे रही थीं पर महारानी की फुर्ती और हस्तलाघव देखते ही बनता था। महारानी के हर वार पर रतन सिंह के मुह से वाह निकलता और रतन सिंह के हर वार पर महारानी खुश हो कर उछल पड़तीं। अचानक पद्मा के एक जोरदार प्रहार से रतन सिंह के हाथ से तलवार छिटक कर दूर गिरी और पद्मा की तलवार उनकी गर्दन को छूने लगी, पर अगले हीं पल पद्मा ने अपना अपनी तलवार छोड़ दी और उसकी दोनों भुजाएं वरमाल की भांति रतन सिंह की गर्दन में लिपट गयीं। महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा- तुम्हे पराजित करना बड़ा कठिन है पद्मा।
पद्मा ने गंभीर हो कर कहा- सिंघल नरेश महाराज गंधर्वसेन की दुहिता अगर तलवार उठा ले तो एक बार यमराज की भी गर्दन काट दे, और अपनी गर्दन काट देने के लिए भी उसे महाराज रतन सिंह के मात्र एक संकेत की ही आवश्यक्ता है।
महाराज मुस्कुरा उठे, कहा- जानता हूँ प्रिये, रतन सिंह को स्वयं से ज्यादा अपनी पद्मा पर विश्वास है। रतन सिंह तुम्हे सिर्फ प्रेम ही नही करता, तुमपर गर्व् करता है।
कुछ पल रुक कर महाराज रतन सिंह ने कहा- जानती हो पद्मा अभी मैं क्यों आया हूँ?
पद्मा ने मुस्कुरा कर कहा- मेरा स्नेह खीच लाया है।
महाराज ने कहा- हाँ तुम्हारा स्नेह ही है, पर अभी अभी गुप्तचर ने सुचना दी है, दिल्ली का सुल्तान अलाउदीन ख़िलजी अपनी अथाह सैन्य शक्ति के साथ चित्तौड़ पर आक्रमण के लिए निकल पड़ा है।
महारानी के अतुलनीय सौंदर्य भरे चेहरे पर चिंता की कुछ रेखाएं उभरीं पर अगले ही पल मिट गयीं।उसने कहा- यह तो अच्छी सुचना है महाराज।आपको असंख्य मासूमों के हत्यारे, असंख्य स्त्रियों का शील हरण करने वाले उस दुष्ट को सजा देने का सौभाग्य मिल रहा है, इससे अच्छी सुचना क्या होगी।
रतन सिंह ने पद्मा के दमकते मुखड़े की ओर देखा, क्षत्राणी का तेज सूर्य को मात दे रहा था। कहा- तुम ठीक कह रही हो, किन्तु ख़िलजी की सैन्य शक्ति अथाह है, उसे पराजित करना अत्यंत कठिन है।
पद्मा ने कहा- भारत का राजपूत जय-पराजय की भावना के साथ युद्ध कब करता है महाराज। युद्ध तो हमारे लिए सदा एक आनंददायक उत्सव रहा है। और उसमे भी आर्यावर्त की पावन धरा को अपवित्र करने वाले क्रूर ख़िलजी से युद्ध तो विवाह से भी बड़ा उत्सव सिद्ध होगा।
रतनसिंह ने कहा- जानता हूँ पद्मा। यह युद्ध मेरे लिए उत्सव ही है। यदि विजय हुई तो क्रूर आक्रांता का शीश काट कर वापस आकर तुम्हे गले लगाउँगा, और यदि पराजय हुई तो युद्धभूमि में ही तुम्हारी सौत का आलिंगन करूँगा। मुझे चिंता है तो तुम्हारी, मुझे चिंता है चित्तौड़ की सभी स्त्रियों की।अगर हम पराजित हुए तो सत्ता के लिए अपने चाचा की हत्या कर देने वाले क्रूर अलाउदीन की बर्बर सेना चित्तौड़ की नारियों के साथ कैसा अत्याचार करेगी, यह सोच कर कांप जाता हूँ। इन बर्बरों के हृदय में करुणा का लेस भी नही है पद्मा।
चितौड़ की नारियों की चिंता मत करिये महाराज, असंख्य महान योद्धाओं को जन्म देने की क्षमता रखने वाली स्त्रियां इतनी कायर नहीं कि स्वयं की रक्षा भी न कर सकें। और विश्वास रखिये, चितौड़ की नारियों के लिए आपकी पद्मा उपयुक्त है। रही बात मेरी सौत को गले लगाने की, तो याद रखिये, इस जन्म में आप मेरे हैं, सिर्फ मेरे। मैं जीते जी आपको अपनी सौत से मिलने नही दूंगी।
महाराज रतन सिंह मुस्कुराये और कहा- देखेंगे।
!
फिर कुछ देर बाद पद्मा का हाथ पकड़ कर कहा- रणक्षेत्र जाने के पहले शायद फिर तुमसे मिलने का समय न मिले, पर याद रखना रतन सिंह ने अपना हृदय सिर्फ तुम्हे दिया है। मैंने सिर्फ तुम्हे प्रेम ही नही किया, मुझे तुमपर गर्व है।
पद्मा की आवाज थोड़ी कांपी, पर उसने धीरे से कहा- पद्मा आपका गर्व टूटने नही देगी, आपकी पद्मा आपके गर्व को अमर कर जायेगी।
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दो दिन के बाद रतनसिंह और ख़िलजी की सेनाएं आमने सामने थी। दिल्ली सल्तनत की सेना के सामने राजपूतों की सेना आटे में नमक की तरह थी, पर बीर राजपूतों ने अपने सौर्य से ख़िलजी को नाको चने चबवा दिया था। पर कब तक? दोपहर होते होते राजपूत कमजोर होने लगे, ख़िलजी की बर्बर सेना भारी पड़ने लगी। दूतों के माध्यम से पल पल की खबर लेती पद्मा को जब कमजोर होती राजपूत सेना की खबर मिली तो जैसे उसने अपना लक्ष्य तय कर लिया। यह आत्मोत्सर्ग की बेला थी। यह मातृभूमि की शील की रक्षा के लिए वलिदान देने का समय था। पद्मा ने सेवकों को आदेश दिया, और आधे प्रहर में विशाल चिता तैयार हो गयी। पद्मा ने दूत को बुलाया और कहा- युद्धभूमि जाओ, महाराज से कहना उनकी रानी ने अपना प्रण निभा दिया, अब आप उनकी सौत का आलिंगन कर सकते हैं। और यह भी कहना कि पद्मा ने हर जन्म में सिर्फ आपको प्रेम किया है।
चिता में अग्नि पड़ी और पद्मा के साथ सैकड़ों नारियों ने उस अग्नि में प्रवेश किया। उस दिन स्वयं अग्नि धन्य हो गयी.. उस दिन आकाश ने भारत की महान स्त्रियों का सौर्य देखा… उस दिन धरती चीख कर बोली- भारत मेरे माथे का सिंदूर है, और इसे यह गौरव इसकी बेटियों ने
दिलाया है।
दूत आधे घंटे में युद्धभूमि पंहुचा और महाराज रतन सिंह ने सुना- पद्मा ने जौहर कर दिया। उनकी आँखों से दो बून्द आंसू गिरे और उनकी छाती में समा गए।राजपूतों ने हर हर महादेव का उद्घोष किया और उनकी तलवार का वेग चार गुना हो गया। ख़िलजी की सेना गाजर मूली की तरह कट रही थी। राजपूतों की संख्या भी लगातार घट रही थी, अचानक एक जहर बुझा तीर आकर रतन सिंह के हृदय को छेद गया। रतन सिंह ने चिल्ला कर कहा- पद्मा…. तुम मेरा गर्व थी, और भूमि पर गिर पड़े।
पद्मावती ने रतन सिंह के गर्व को अमर कर दिया था।
यह एक क्षत्राणी का प्रेम था, यह भारत का प्रेम था।

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साभार- व्हाट्स एप्प

विशाल सिंह सूर्यवंशम

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