Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

चूना


​चूना जो आप पान में खाते है वो सत्तर

बीमारी

ठीक कर देते है….!
” चूना अमृत है ” ..
🤔👌🏻👌🏻🤔👌🏻👌🏻🤔👌🏻👌🏻
* चूना एक टुकडा छोटे से मिट्टी के

बर्तन मे डालकर

पानी से भर दे , चूना गलकर नीचे और

पानी ऊपर

होगा ! 
वही एक चम्मच पानी किसी

भी खाने की

वस्तु के साथ लेना है ! 50 के उम्र के बाद

कोई

कैल्शियम की दवा शरीर मे जल्दी नही

घुलती चूना

तुरन्त घुल व पच जाता है …
* जैसे किसी को पीलिया हो जाये

माने जॉन्डिस

उसकी सबसे अच्छी दवा है चूना ;गेहूँ के

दाने के बराबर

चूना गन्ने के रस में मिलाकर पिलाने से

बहुत जल्दी

पीलिया ठीक कर देता है ।
* ये ही चूना नपुंसकता की सबसे अच्छी

दवा है -अगर

किसी के शुक्राणु नही बनता उसको

अगर गन्ने के रस

के साथ चूना पिलाया जाये तो साल

डेढ़ साल में

भरपूर शुक्राणु बनने लगेंगे; और जिन

माताओं के शरीर

में अन्डे नही बनते उनकी बहुत अच्छी दवा

है ये चूना ।
* बिद्यार्थीओ के लिए चूना बहुत

अच्छा है जो

लम्बाई बढाता है ..
* गेहूँ के दाने के बराबर चूना रोज दही में

मिला के

खाना चाहिए, दही नही है तो दाल में

मिला के

खाओ, दाल नही है तो पानी में मिला

के पियो –

इससे लम्बाई बढने के साथ स्मरण शक्ति

भी बहुत

अच्छा होता है ।
* जिन बच्चों की बुद्धि कम काम

करती है मतिमंद

बच्चे उनकी सबसे अच्छी दवा है चूना

..जो बच्चे

बुद्धि से कम है, दिमाग देर में काम करते

है, देर में

सोचते है हर चीज उनकी स्लो है उन

सभी बच्चे को

चूना खिलाने से अच्छे हो जायेंगे ।
* बहनों को अपने मासिक धर्म के समय

अगर कुछ भी

तकलीफ होती हो तो उसका सबसे

अच्छी दवा है

चूना । हमारे घर में जो माताएं है

जिनकी उम्र पचास

वर्ष हो गयी और उनका मासिक धर्म

बंध हुआ उनकी

सबसे अच्छी दवा है चूना..
* गेहूँ के दाने के बराबर चूना हर दिन

खाना दाल में,

लस्सी में, नही तो पानी में घोल के

पीना । जब

कोई माँ गर्भावस्था में है तो चूना रोज

खाना

चाहिए क्योंकि गर्भवती माँ को सबसे

ज्यादा

केल्शियम की जरुरत होती है और चूना

केल्शियम का

सबसे बड़ा भंडार है । गर्भवती माँ को

चूना

खिलाना चाहिए ..अनार के रस में –

अनार का रस

एक कप और चूना गेहूँ के दाने के बराबर ये

मिलाके

रोज पिलाइए नौ महीने तक लगातार

दीजिये..तो

चार फायदे होंगे –

पहला फायदा :-

माँ को बच्चे के जनम के समय कोई

तकलीफ नही

होगी और नॉर्मल डीलिवरी होगा,

दूसरा :-

बच्चा जो पैदा होगा वो बहुत हृष्ट पुष्ट

और तंदुरुस्त

होगा ,

तीसरा फ़ायदा :-

बच्चा जिन्दगी में जल्दी बीमार नही

पड़ता

जिसकी माँ ने चूना खाया ,

चौथा सबसे बड़ा लाभ :-

बच्चा बहुत होशियार होता है बहुत

Intelligent और

Brilliant होता है उसका IQ बहुत अच्छा

होता है ।
* चूना घुटने का दर्द ठीक करता है , कमर

का दर्द

ठीक करता है ,कंधे का दर्द ठीक करता

है,
* एक खतरनाक बीमारी है Spondylitis

वो चूने से

ठीक होता है ।
* कई बार हमारे रीढ़की हड्डी में जो

मनके होते है

उसमे दुरी बढ़ जाती है Gap आ जाता है

– ये चूना ही

ठीक करता है

उसको; रीड़ की हड्डी की सब

बीमारिया चूने से

ठीक होता है । अगर आपकी हड्डी टूट

जाये तो टूटी

हुई हड्डी को जोड़ने की ताकत सबसे

ज्यादा चूने में

है । चूना खाइए सुबह को खाली पेट ।
* मुंह में ठंडा गरम पानी लगता है तो

चूना खाओ

बिलकुल ठीक हो जाता है ,
* मुंह में अगर छाले हो गए है तो चूने का

पानी पियो

तुरन्त ठीक हो जाता है ।
* शरीर में जब खून कम हो जाये तो चूना

जरुर लेना

चाहिए , एनीमिया है खून की कमी है

उसकी सबसे

अच्छी दवा है ये चूना , चूना पीते रहो

गन्ने के रस में ,

या संतरे के रस में नही तो सबसे अच्छा है

अनार के रस

में – अनार के रस में चूना पिए खून बहुत

बढता है , बहुत

जल्दी खून बनता है – एक कप अनार का

रस गेहूँ के दाने

के बराबर चूना सुबह खाली पेट ।
* घुटने में घिसाव आ गया और डॉक्टर

कहे के घुटना

बदल दो तो भी जरुरत नही चूना खाते

रहिये और

हरसिंगार के पत्ते का काढ़ा खाइए घुटने

बहुत अच्छे

काम करेंगे । —.

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सौ ऊंट


🐪🐪 सौ ऊंट 🐪🐪

किसी शहर में, एक आदमी प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था . वो अपनी ज़िन्दगी से खुश नहीं था , हर समय वो किसी न किसी समस्या से परेशान रहता था .

एक बार शहर से कुछ दूरी पर एक महात्मा का काफिला रुका . शहर में चारों और उन्ही की चर्चा थी.

बहुत से लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास पहुँचने लगे ,
उस आदमी ने भी महात्मा के दर्शन करने का निश्चय किया .

छुट्टी के दिन सुबह -सुबह ही उनके काफिले तक पहुंचा . बहुत इंतज़ार के बाद उसका का नंबर आया .

वह बाबा से बोला ,” बाबा , मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ , हर समय समस्याएं मुझे घेरी रहती हैं , कभी ऑफिस की टेंशन रहती है , तो कभी घर पर अनबन हो जाती है , और कभी अपने सेहत को लेकर परेशान रहता हूँ ….

बाबा कोई ऐसा उपाय बताइये कि मेरे जीवन से सभी समस्याएं ख़त्म हो जाएं और मैं चैन से जी सकूँ ?

बाबा मुस्कुराये और बोले , “ पुत्र , आज बहुत देर हो गयी है मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर कल सुबह दूंगा … लेकिन क्या तुम मेरा एक छोटा सा काम करोगे …?”

“हमारे काफिले में सौ ऊंट 🐪 हैं ,
मैं चाहता हूँ कि आज रात तुम इनका खयाल रखो …
जब सौ के सौ ऊंट 🐪 बैठ जाएं तो तुम भी सो जाना …”,

ऐसा कहते हुए महात्मा अपने तम्बू में चले गए ..

अगली सुबह महात्मा उस आदमी से मिले और पुछा , “ कहो बेटा , नींद अच्छी आई .”

वो दुखी होते हुए बोला :
“कहाँ बाबा , मैं तो एक पल भी नहीं सो पाया. मैंने बहुत कोशिश की पर मैं सभी ऊंटों🐪को नहीं बैठा पाया , कोई न कोई ऊंट 🐪 खड़ा हो ही जाता …!!!

बाबा बोले , “ बेटा , कल रात तुमने अनुभव किया कि चाहे कितनी भी कोशिश कर लो सारे ऊंट 🐪 एक साथ नहीं बैठ सकते …

तुम एक को बैठाओगे तो कहीं और कोई दूसरा खड़ा हो जाएगा.

इसी तरह तुम एक समस्या का समाधान करोगे तो किसी कारणवश दूसरी खड़ी हो जाएगी ..

पुत्र जब तक जीवन है ये समस्याएं तो बनी ही रहती हैं … कभी कम तो कभी ज्यादा ….”

“तो हमें क्या करना चाहिए ?” , आदमी ने जिज्ञासावश पुछा .

“इन समस्याओं के बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखो …

कल रात क्या हुआ ?
1) कई ऊंट 🐪 रात होते -होते खुद ही बैठ गए ,
2) कई तुमने अपने प्रयास से बैठा दिए ,
3) बहुत से ऊंट 🐪 तुम्हारे प्रयास के बाद भी नहीं बैठे … और बाद में तुमने पाया कि उनमे से कुछ खुद ही बैठ गए ….

कुछ समझे ….??
समस्याएं भी ऐसी ही होती हैं..

1) कुछ तो अपने आप ही ख़त्म हो जाती हैं ,
2) कुछ को तुम अपने प्रयास से हल कर लेते हो …
3) कुछ तुम्हारे बहुत कोशिश करने पर भी हल नहीं होतीं ,

ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ दो … उचित समय पर वे खुद ही ख़त्म हो जाती हैं.!!

जीवन है, तो कुछ समस्याएं रहेंगी ही रहेंगी …. पर इसका ये मतलब नहीं की तुम दिन रात उन्ही के बारे में सोचते रहो …

समस्याओं को एक तरफ रखो
और जीवन का आनंद लो…

चैन की नींद सो …

जब उनका समय आएगा वो खुद ही हल हो जाएँगी”…

बिंदास मुस्कुराओ क्या ग़म हे,..
ज़िन्दगी में टेंशन किसको कम हे..

अच्छा या बुरा तो केवल भ्रम हे..
जिन्दगी का नाम ही
कभी ख़ुशी कभी ग़म हे..!!

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

“पद्मावती”


“पद्मावती”
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चित्तौड़ के राजमहल की छत पर बैठे बैठे उसका मन उचट गया था। सखियों की ठिठोली अब अप्रिय हो चली थी। अंत में वह ऊब कर उठी और पिजड़े में बन्द अपने पालतू तोते के पास जा कर उसकी पूंछ सहलाने लगी, तभी दासी ने कहा- महारानी, महाराज पधार रहे हैं।
प्रभात में सूर्य की प्रथम किरण के स्पर्श से उन्मत्त कुमुदनी की तरह खिल गयी वह, और मध्यरात्रि में वायु के साथ अटखेलियां करती रजनीगंधा की तरह महकने लगी। उसने संकेत किया और सभी दासियाँ तुरंत हट गयीं।
मुस्कुराते रतन सिंह ने कहा- कैसी हो पद्मा?
वह भी मुस्कुराई- जैसे आप हैं महाराज।
– मैं तो आनंद में हूँ, मेरे पास तुम जो हो…
– मैं आप से दुगुने आनंद में हूँ, मेरे पास आप जो हैं। किन्तु आप तो दक्षिण सीमा की ओर प्रस्थान करने वाले थे महाराज?
– हाँ, पर विचार त्याग दिया।
पद्मा ने हँस कर कहा- तब तो आपको करों की बड़ी हानि हो गयी महाराज, यह हानि कैसे पूरी होगी?
– हानि कहाँ हुई, कुछ मुद्राओं की हानि के स्थान पर तुम्हारे सामीप्य का लाभ हुआ। गणित करो तो मैं आज हजार गुने लाभ में हूँ।
कुछ देर के परिहास के बाद रतन सिंह ने कहा- पद्मा आओ तनिक युद्धाभ्यास किया जाय। तलवार में तो तुम गुरु हो मेरी।
पद्मा मुस्कुराई और उसने निकट दीवाल पर टंगी म्यान से तलवार खींची और प्रस्तुत हुई, आइये महाराज बहुत दिन हुए आपको पराजित किए।
महाराज हँस पड़े- आज नही हरा पाओगी पद्मा।
मुस्कुराती पद्मा ने जैसे चुनौती दी, आइये फिर देख ही लेते हैं।
कुछ हीं पलों में तलवारों की टंकार से पूरा महल गूंज उठा। पर यह किसी के लिए आश्चर्य की बात नही थी। महल का समूचा अन्तःपुर जानता था कि महाराज रतनसिंह और महारानी पद्मावती के अद्भुत प्रेम के पीछे सिर्फ महारानी का सौंदर्य ही नही अपितु उनकी अतुल्य वीरता
भी है। ये दो प्रेमी जब भी स्नेह के कुछ अतिरिक्त पल पाते तो तलवार ले कर उतर जाते। सो तलवारों की टंकार सुन कर अन्तःपुर की सभी दासियों के चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी।
दोनों की तलवारें हवा को मात दे रही थीं पर महारानी की फुर्ती और हस्तलाघव देखते ही बनता था। महारानी के हर वार पर रतन सिंह के मुह से वाह निकलता और रतन सिंह के हर वार पर महारानी खुश हो कर उछल पड़तीं। अचानक पद्मा के एक जोरदार प्रहार से रतन सिंह के हाथ से तलवार छिटक कर दूर गिरी और पद्मा की तलवार उनकी गर्दन को छूने लगी, पर अगले हीं पल पद्मा ने अपना अपनी तलवार छोड़ दी और उसकी दोनों भुजाएं वरमाल की भांति रतन सिंह की गर्दन में लिपट गयीं। महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा- तुम्हे पराजित करना बड़ा कठिन है पद्मा।
पद्मा ने गंभीर हो कर कहा- सिंघल नरेश महाराज गंधर्वसेन की दुहिता अगर तलवार उठा ले तो एक बार यमराज की भी गर्दन काट दे, और अपनी गर्दन काट देने के लिए भी उसे महाराज रतन सिंह के मात्र एक संकेत की ही आवश्यक्ता है।
महाराज मुस्कुरा उठे, कहा- जानता हूँ प्रिये, रतन सिंह को स्वयं से ज्यादा अपनी पद्मा पर विश्वास है। रतन सिंह तुम्हे सिर्फ प्रेम ही नही करता, तुमपर गर्व् करता है।
कुछ पल रुक कर महाराज रतन सिंह ने कहा- जानती हो पद्मा अभी मैं क्यों आया हूँ?
पद्मा ने मुस्कुरा कर कहा- मेरा स्नेह खीच लाया है।
महाराज ने कहा- हाँ तुम्हारा स्नेह ही है, पर अभी अभी गुप्तचर ने सुचना दी है, दिल्ली का सुल्तान अलाउदीन ख़िलजी अपनी अथाह सैन्य शक्ति के साथ चित्तौड़ पर आक्रमण के लिए निकल पड़ा है।
महारानी के अतुलनीय सौंदर्य भरे चेहरे पर चिंता की कुछ रेखाएं उभरीं पर अगले ही पल मिट गयीं।उसने कहा- यह तो अच्छी सुचना है महाराज।आपको असंख्य मासूमों के हत्यारे, असंख्य स्त्रियों का शील हरण करने वाले उस दुष्ट को सजा देने का सौभाग्य मिल रहा है, इससे अच्छी सुचना क्या होगी।
रतन सिंह ने पद्मा के दमकते मुखड़े की ओर देखा, क्षत्राणी का तेज सूर्य को मात दे रहा था। कहा- तुम ठीक कह रही हो, किन्तु ख़िलजी की सैन्य शक्ति अथाह है, उसे पराजित करना अत्यंत कठिन है।
पद्मा ने कहा- भारत का राजपूत जय-पराजय की भावना के साथ युद्ध कब करता है महाराज। युद्ध तो हमारे लिए सदा एक आनंददायक उत्सव रहा है। और उसमे भी आर्यावर्त की पावन धरा को अपवित्र करने वाले क्रूर ख़िलजी से युद्ध तो विवाह से भी बड़ा उत्सव सिद्ध होगा।
रतनसिंह ने कहा- जानता हूँ पद्मा। यह युद्ध मेरे लिए उत्सव ही है। यदि विजय हुई तो क्रूर आक्रांता का शीश काट कर वापस आकर तुम्हे गले लगाउँगा, और यदि पराजय हुई तो युद्धभूमि में ही तुम्हारी सौत का आलिंगन करूँगा। मुझे चिंता है तो तुम्हारी, मुझे चिंता है चित्तौड़ की सभी स्त्रियों की।अगर हम पराजित हुए तो सत्ता के लिए अपने चाचा की हत्या कर देने वाले क्रूर अलाउदीन की बर्बर सेना चित्तौड़ की नारियों के साथ कैसा अत्याचार करेगी, यह सोच कर कांप जाता हूँ। इन बर्बरों के हृदय में करुणा का लेस भी नही है पद्मा।
चितौड़ की नारियों की चिंता मत करिये महाराज, असंख्य महान योद्धाओं को जन्म देने की क्षमता रखने वाली स्त्रियां इतनी कायर नहीं कि स्वयं की रक्षा भी न कर सकें। और विश्वास रखिये, चितौड़ की नारियों के लिए आपकी पद्मा उपयुक्त है। रही बात मेरी सौत को गले लगाने की, तो याद रखिये, इस जन्म में आप मेरे हैं, सिर्फ मेरे। मैं जीते जी आपको अपनी सौत से मिलने नही दूंगी।
महाराज रतन सिंह मुस्कुराये और कहा- देखेंगे।
!
फिर कुछ देर बाद पद्मा का हाथ पकड़ कर कहा- रणक्षेत्र जाने के पहले शायद फिर तुमसे मिलने का समय न मिले, पर याद रखना रतन सिंह ने अपना हृदय सिर्फ तुम्हे दिया है। मैंने सिर्फ तुम्हे प्रेम ही नही किया, मुझे तुमपर गर्व है।
पद्मा की आवाज थोड़ी कांपी, पर उसने धीरे से कहा- पद्मा आपका गर्व टूटने नही देगी, आपकी पद्मा आपके गर्व को अमर कर जायेगी।
**************************************
दो दिन के बाद रतनसिंह और ख़िलजी की सेनाएं आमने सामने थी। दिल्ली सल्तनत की सेना के सामने राजपूतों की सेना आटे में नमक की तरह थी, पर बीर राजपूतों ने अपने सौर्य से ख़िलजी को नाको चने चबवा दिया था। पर कब तक? दोपहर होते होते राजपूत कमजोर होने लगे, ख़िलजी की बर्बर सेना भारी पड़ने लगी। दूतों के माध्यम से पल पल की खबर लेती पद्मा को जब कमजोर होती राजपूत सेना की खबर मिली तो जैसे उसने अपना लक्ष्य तय कर लिया। यह आत्मोत्सर्ग की बेला थी। यह मातृभूमि की शील की रक्षा के लिए वलिदान देने का समय था। पद्मा ने सेवकों को आदेश दिया, और आधे प्रहर में विशाल चिता तैयार हो गयी। पद्मा ने दूत को बुलाया और कहा- युद्धभूमि जाओ, महाराज से कहना उनकी रानी ने अपना प्रण निभा दिया, अब आप उनकी सौत का आलिंगन कर सकते हैं। और यह भी कहना कि पद्मा ने हर जन्म में सिर्फ आपको प्रेम किया है।
चिता में अग्नि पड़ी और पद्मा के साथ सैकड़ों नारियों ने उस अग्नि में प्रवेश किया। उस दिन स्वयं अग्नि धन्य हो गयी.. उस दिन आकाश ने भारत की महान स्त्रियों का सौर्य देखा… उस दिन धरती चीख कर बोली- भारत मेरे माथे का सिंदूर है, और इसे यह गौरव इसकी बेटियों ने
दिलाया है।
दूत आधे घंटे में युद्धभूमि पंहुचा और महाराज रतन सिंह ने सुना- पद्मा ने जौहर कर दिया। उनकी आँखों से दो बून्द आंसू गिरे और उनकी छाती में समा गए।राजपूतों ने हर हर महादेव का उद्घोष किया और उनकी तलवार का वेग चार गुना हो गया। ख़िलजी की सेना गाजर मूली की तरह कट रही थी। राजपूतों की संख्या भी लगातार घट रही थी, अचानक एक जहर बुझा तीर आकर रतन सिंह के हृदय को छेद गया। रतन सिंह ने चिल्ला कर कहा- पद्मा…. तुम मेरा गर्व थी, और भूमि पर गिर पड़े।
पद्मावती ने रतन सिंह के गर्व को अमर कर दिया था।
यह एक क्षत्राणी का प्रेम था, यह भारत का प्रेम था।

शेयर इफ यू रियली केयर…..

साभार- व्हाट्स एप्प

विशाल सिंह सूर्यवंशम

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एक मोटे आदमी


एक मोटे आदमी
ने न्यूज पेपर में विज्ञापन देखा ” एक सप्ताह में 5 किलो
वजन कम कीजिये। ” 💡⚖⚖
उसने उस विज्ञापन वाली कम्पनी में
फोन किया तो एक महिला ने जवाब दिया और कहा : ” कल
सुबह 6 बजे तैयार रहिए। ”
अगली सुबह उस मोटे ने दरवाजा खोला तो देखा कि एक
खूबसूरत युवती जागिंग
सूट और शूज पहने बाहर तैयार खड़ी है।😍😍
युवती बोली :- मुझे पकड़ो और मुझे किस कर लो ये कह कर
युवती दौड़ पड़ी।😘😘
मोटू भी पीछे दौड़ा मगर उसे पकड़ नहीं पाया।
पूरे हफ्ते रोज मोटू ने उसे पकड़ने का प्रयास किया लेकिन उस
युवती को पकड़ नही पाया। और उसका 5 किलो वजन कम
हो गया।🏃🏃🏃💃💃💃
फिर मोटू ने 10 किलो वजन कम करने वाले प्रोग्राम की
बात की।
अगली सुबह 6 बजे उसने दरवाजा खोला तो देखा कि: पहले
वाली से भी खूबसूरत
युवती जागिंग सूट और शूज में खड़ी है।🙀🙀🙀
युवती बोली :- मुझे
पकड़ो और मुझे किस करलो और इस हफ्ते मोटू का 10 किलो
वजन घट गया। 😻😻
मोटू ने सोचा वाह क्या बढ़िया प्रोग्राम है। क्यूँ ना 25
किलो वाला प्रोग्राम आजमाया जाए। उसने 25 किलो वाले
प्रोग्राम के लिए फोन किया। तो महिला ने जवाब दिया और
कहा कि :
” क्या आपका इरादा पक्का है.?” क्योंकि ये
प्रोग्राम थोड़ा कठिन है। ”
मोटू बोला :- ” हाँ। ” 😜😏😏
अगली सुबह 6 बजे मोटू ने दरवाजा खोला तो देखा कि
दरवाजे पर जागिंग सूट और शूज पहने एक काली भुजंग लड़की
खडी है …… 😵😵
लड़की बोली : मैंने तुम्हे पकड़ लिया तो मैं तुम्हें
किस करूँगी, 😚😚😚
बस तो फिर क्या अब तो भाग मिल्खा भाग…!!!

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एक अँधा….


एक अँधा….
🔴🙏🏼🚩
भीख मांगता हुआ राजा के द्वार पर पंहुचा। राजा को उस पर दया आ गयी, राजा ने प्रधानमंत्री से कहा,- “यह भिक्षुक जन्मान्ध नहीं है, यह ठीक हो सकता है, इसे राजवैद्य के पास ले चलो।”

(दोनों उसे पकड़कर ले जाते हैं)रास्ते में राजा का मंत्री कहता है, “महाराज आपसे एकांत में कुछ कहना चाहता हूं।”दोनों भिक्षुक को वहीँ बैठाकर दूसरी ओर जाते हैं।

मंत्री कहता है “महाराज यह भिक्षुक शरीर से हृष्ट-पुष्ट है, यदि इसकी रौशनी लौट आयी तो इसे आपका सारा भ्र्ष्टाचार दिखेगा, आपकी शानोशौकत और फिजूलखर्ची इसे दिखेगी।
आपके राजमहल की विलासिता और आपके रनिवास का अथाह खर्च इसे दिखेगा, इसे यह भी दिखेगा कि जनता भूख और प्यास से तड़प रही है, सूखे से अनाज का उत्पादन हुआ ही नहीं, और आपके सैनिक पहले से चौगुना लगन वसूल रहे हैं।

शाही खर्चे में बढ़ोत्तरी के कारण राजकोष रिक्त हो रहा है, जिसकी भरपाई हम सेना में कटौती करके कर रहे हैं, इससे हजारों सैनिक और कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं।
ठीक होने पर यह भिक्षुक औरों की तरह ही रोजगार की मांग करेगा और आपका ही विरोधी बन जायेगा।

मेरी मानिये तो…..!
यह आपसे मात्र दो वक्त का भोजन ही तो मांगता है, इसे आप राजमहल में बैठाकर मुफ्त में सुबह-शाम भोजन कराइये, और दिन भर इसे घूमने के लिए छोड़ दीजिये।
यह आपका पूरे राज्य में गुणगान करता फिरेगा, कि राजा बहुत न्यायी हैं, बहुत ही दयावान और परोपकारी हैं।
इस तरह मुफ्त में खिलाने से आपका संकट कम होगा और आप लंबे समय तक शासन कर सकेंगे।”

राजा को यह बात समझ में आ गयी, वह वापस अंधे के पास गया और दोनों उसे उठाकर राजमहल ले आये।अब अँधा राजा का पूरे राज्य में गुणगान करता फिरता है, उसे यह नहीं पता कि राजा ने उसके साथ धूर्तता की है, छल किया है, वह ठीक होकर स्वयं कमा कर अपनी आँखों से संसार का आनंद ले सकता था।

यही हाल वर्तमान में सरकारें करती हैं, हमे मुफ्त का लालच देती हैं, किंतु आँखों की रोशनी (अच्छी शिक्षा व रोजगार) नहीं देतीं, जिससे कि हम उनका भ्रष्टाचार देख पाएं, उनकी फिजूलखर्जी और गुंडागर्दी देख पाएं, उनका शोषण और अन्याय देख पाएं।

और हम अंधे की तरह उनका गुणगान करते हैं, कि राजा मुफ्त में सबको सामान देते हैं।
हम यह नहीं सोचते कि यदि हमें अच्छी शिक्षा और रोजगार सरकारें दें तो हमें उनकी खैरात की जरूरत न होगी, हम स्वतः ही सब खरीद सकते हैं।
🔴🙏🏼🚩
पर हम सभी अंधे जो ठहरे,
केवल मुफ्त की चीजें ही.
हमे दिखती हैं।

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एक संत ने एक


एक संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और आवाज़ लगाई – भिक्षां देहि।
एक छोटी-सी बच्ची बाहर आई, बोली, ‘‘बाबा, हम गरीब हैं, हमारे पास देने को कुछ नहीं है…!!”
संत बोले, ‘‘बेटी, मना मत कर, अपने आँगन की धूल ही दे दे।’’
लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और भिक्षा-पात्र में डाल दी।
शिष्य ने पूछा, ‘‘गुरु जी, धूल भी कोई भिक्षा है! आपने धूल देने को क्यों कहा?’’
संत बोले, ‘‘बेटा, अगर वह आज ‘न’ कह देती तो फिर कभी नहीं दे पाती। धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो पड़ गया। आज धूल दी है तो उसमें देने की भावना तो जागी…
कल समर्थ होगी तो फल-फूल भी देगी।’’
जितनी छोटी कथा है, निहितार्थ उतना ही विशाल है।
संस्कार बचपन से ही पड़ते हैं। ।।

Neelam Saini
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एक महिला ने


Technological JOKE
😜😜😜😜😝😝😝😝😝
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एक महिला ने .. “IT TECHNICAL Support” ..
को PHONE किया।
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महिला—“मुझे HUSBAND PROGRAM में दिक्कत आ रही है। ”
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Technical Support—” कब से है यह दिक्कत…?”
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महिला—” देखिए, पिछले साल मैंने अपने BOYFRIEND को UPDATE कर HUSBAND INSTALL किया था।
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उसके बाद से ही पूरा SYSTEM SLOW हो गया है।
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खासतौर पर ‘FLOWER’ और ‘JEWELLERY’ APPLICATION ने काम करना बंद कर दिया है।
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ये Apps ‘BOYFRIEND’ में अच्छी चलती थीं।

इसके अलावा HUSBAND ने ‘ROMANCE’ Program भी UNINSTALL कर दिया है।
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इसकी जगह ‘NEWS’, ‘MONEY’ और ‘CRICKET’ जैसे फालतू Program INSTALL हो गए हैं।
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अब मैं इसे कैसे सुधारूँ …???

Technical Support—” जी Madam, ‘HUSBAND Install करने के बाद ऐसी समस्या होती रहती है।
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सबसे पहले इस बात का ध्यान रखें कि ‘BOYFRIEND’ एक ENTERTAINMENT DEMO PACKAGE था,
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जबकि ‘HUSBAND OPERATING SYSTEM है।

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इसे सुधारने के लिए ‘आँसू Program Download करें।
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इससे ‘JEWELLERY’ और ‘FLOWERS’ Application अपने आप Install हो जाएँगे।

Warning:

हालांकि याद रखें, आँसू ज्यादा इस्तेमाल करने पर ‘HUSBAND
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‘ हमेशा के लिए ‘SILENCE’ या ‘BEER’ whisky Mode पर चला जाएगा।
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साथ ही ‘HUSBAND’ के Original Package को Disturb न करें।
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ऐसा करने पर नया VIRUS ‘GIRLFRIEND’
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Download हो जाता है।

इसके अलावा ‘BOYFRIEND’ को दोबारा INSTALL करने की कोशिश भी न करें।
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ऐसा करने पर आपका LIFE OPERATING SYSTEM Crash हो जाएगा। ”
😛😀😀😀😀😋😋😝😝😝😝

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तीसरी बकरी


*तीसरी बकरी*

रोहित और मोहित बड़े शरारती बच्चे थे, दोनों 5th स्टैण्डर्ड के स्टूडेंट थे और एक साथ ही स्कूल आया-जाया करते थे।
एक दिन जब स्कूल की छुट्टी हो गयी तब मोहित ने रोहित से कहा, “ दोस्त, मेरे दिमाग में एक आईडिया है?”
“बताओ-बताओ…क्या आईडिया है?”, रोहित ने एक्साईटेड होते हुए पूछा।

मोहित- “वो देखो, सामने तीन बक रियां चर रही हैं।”

रोहित- “ तो! इनसे हमे क्या लेना-देना है?”

मोहित-” हम आज सबसे अंत में स्कूल से निकलेंगे और जाने से पहले इन बकरियों को पकड़ कर स्कूल में छोड़ देंगे, कल जब स्कूल खुलेगा तब सभी इन्हें खोजने में अपना समय बर्वाद करेगे और हमें पढाई नहीं करनी पड़ेगी…”

रोहित- “पर इतनी बड़ी बकरियां खोजना कोई कठिन काम थोड़े ही है, कुछ ही समय में ये मिल जायेंगी और फिर सबकुछ नार्मल हो जाएगा….”

मोहित- “हाहाहा…यही तो बात है, वे बकरियां आसानी से नहीं ढूंढ पायेंगे, बस तुम देखते जाओ मैं क्या करता हूँ!”

इसके बाद दोनों दोस्त छुट्टी के बाद भी पढ़ायी के बहाने अपने क्लास में बैठे रहे और जब सभी लोग चले गए तो ये तीनो बकरियों को पकड़ कर क्लास के अन्दर ले आये।

अन्दर लाकर दोनों दोस्तों ने बकरियों की पीठ पर काले रंग का गोला बना दिया। इसके बाद मोहित बोला, “अब मैं इन बकरियों पे नंबर डाल देता हूँ।, और उसने सफेद रंग से नंबर लिखने शुरू किये-

पहली बकरी पे नंबर 1
दूसरी पे नंबर 2
और तीसरी पे नंबर 4

“ये क्या? तुमने तीसरी बकरी पे नंबर 4 क्यों डाल दिया?”, रोहित ने आश्चर्य से पूछा।

मोहित हंसते हुए बोला, “ दोस्त यही तो मेरा आईडिया है, अब कल देखना सभी तीसरी नंबर की बकरी ढूँढने में पूरा दिन निकाल देंगे…और वो कभी मिलेगी ही नहीं…”

अगले दिन दोनों दोस्त समय से कुछ पहले ही स्कूल पहुँच गए।

थोड़ी ही देर में स्कूल के अन्दर बकरियों के होने का शोर मच गया।

कोई चिल्ला रहा था, “ चार बकरियां हैं, पहले, दुसरे और चौथे नंबर की बकरियां तो आसानी से मिल गयीं…बस तीसरे नंबर वाली को ढूँढना बाकी है।”

स्कूल का सारा स्टाफ तीसरे नंबर की बकरी ढूढने में लगा गया…एक-एक क्लास में टीचर गए अच्छे से तालाशी ली। कुछ खोजू वीर स्कूल की

छतों पर भी बकरी ढूंढते देखे गए… कई सीनियर बच्चों को भी इस काम में लगा दिया गया।

तीसरी बकरी ढूँढने का बहुत प्रयास किया गया….पर बकरी तब तो मिलती जब वो होती…बकरी तो थी ही नहीं!

आज सभी परेशान थे पर रोहित और मोहित इतने खुश पहले कभी नहीं हुए थे। आज उन्होंने अपनी चालाकी से एक बकरी अदृश्य कर दी थी।

इस कहानी को पढ़कर चेहरे पे हलकी सी मुस्कान आना स्वाभाविक है। पर इस मुस्कान के साथ-साथ हमें इसमें छिपे सन्देश को भी ज़रूर समझना चाहिए। तीसरी बकरी, *दरअसल वो चीजें हैं जिन्हें खोजने के लिए हम बेचैन हैं पर वो हमें कभी मिलती ही नहीं….क्योंकि वे reality में होती ही नहीं*!

हम ऐसी लाइफ चाहते हैं जो perfect हो, जिसमे कोई problem ही ना हो…. it does not exist !

हम ऐसा life-partner चाहते हैं जो हमें पूरी तरह समझे जिसके साथ कभी हमारी अनबन ना हो…..it does not exist!

हम ऐसी job या बिजनेस चाहते हैं, जिसमे हमेशा सबकुछ एकदम smoothly चलता रहे…it does not exist!

क्या ज़रूरी है कि हर वक़्त किसी चीज के लिए परेशान रहा जाए ?

ये भी तो हो सकता है कि हमारी लाइफ में जो कुछ भी है वही हमारे life puzzle को solve करने के लिए पर्याप्त हो….

ये भी तो हो सकता है कि जिस तीसरी चीज (aadarsh) की हम तलाश कर रहे हैं वो हकीकत में हो ही ना….और हम पहले से ही complete हों !

इसलिए अदृश्य आदर्श की तलाश में अपनी life को spoil किये बगैर, वर्तमान में मस्त रहिये ।

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व्याकरण प्रश्नोत्तरी – कुमार आर्य्य


व्याकरण प्रश्नोत्तरी :-

प्रश्न :- व्याकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर :- शब्दों और वाक्यों को नियमबद्ध कर उनकी चिकित्सा करने वाले शास्त्र को व्याकरण कहते हैं ।

प्रश्न :- व्याकरण में कितने ग्रंथ हैं ?
उत्तर :- व्याकरण किसी एक शास्त्र का नाम नहीं बल्कि शास्त्रों का संग्रह है । इसमें पाणिनी मुनि के पाँच उपदेश ( अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिकोष, लिङ्गानुशासनम् ) और पतंजलि मुनि द्वारा अष्टाध्यायी का भाष्य जिसे महाभाष्य कहा जाता है । ये व्याकरण ग्रंथ हैं ।

प्रश्न :- व्याकरण की रचना का प्रयोजन क्या है ?
उत्तर :- शब्दों के भ्रष्ट रूप हो जाने से भाषा बिगड़ जाती है और अर्थ भिन्न होने लगते हैं । इन्हीं व्यवधानों का समाधान करने के लिए व्याकरण शास्त्र रचा जाता है ।

प्रश्न :- व्याकरण की रचना किन किन के द्वारा हुई है ?
उत्तर :- समय समय पर व्याकरण की रचना मनुष्यों की बुद्धि के आधार पर ऋषियों द्वारा होती रही है । जिनमें गर्ग, ब्रह्मा, आग्रगायण, औपनमनव्य, उल्लूक, आपिशल, चन्द्रायण, शाकल्य, कश्यप, काश्कृत्सन् , पाणीनि, पतंजलि आदि मुनियों के नाम प्रसिद्ध हैं । प्रचीनतम व्याकरण केवल पाणीनि मुनि का ही उपलब्ध है । पाणीनि मुनि के व्याकरण से पूर्व इन्द्र का व्याकरण प्रचलित था ।

प्रश्न :- अष्टाध्यायी किसे कहते हैं ?
उत्तर :- आठ अध्यायों की पुस्तक को अष्टाध्यायी कहते हैं । जिनमें पाणिनीय सूत्र होते हैं ।

प्रश्न :- सूत्र किसे कहते हैं ?
उत्तर :- संक्षिप्त नियमों को सूत्र कहा जाता है ।

प्रश्न :- अष्टाध्यायी में कितने सूत्र हैं ?
उत्तर :- अष्टाध्यायी में 3980 के लगभग सूत्र हैं ।

प्रश्न :- सूत्रों से क्या प्रयोजन है ?
उत्तर :- सूत्रों से शब्दों और वाक्यों को आपसे में नियमबद्ध किया जाता है जिससे कि भाषा का मन्तव्य स्पष्ट हो ।

प्रश्न :- धातुपाठ आदि ग्रंथों के क्या प्रयोजन हैं ?
उत्तर :- ये सब अष्टाध्यायी के सहायक ग्रंथ हैं । जिनसे धातुरूप, प्रत्यय आदि के द्वारा शब्द बनाए जाते हैं ।

प्रश्न :- महाभाष्य किसे कहते हैं ?
उत्तर :- अष्टाध्यायी सूत्रों के भाष्य को महाभाष्य कहते हैं । जिनसे शब्दों का दार्शनिक, वैज्ञानिक पक्ष जाना जाता है ।

प्रश्न :- पूरी व्याकरण को पढ़ने के लिए कितना समय लगता है ?
उत्तर :- व्याकरण पढ़ने में बुद्धि के अनुसार ४-५ वर्ष तक समय लगता है ।

प्रश्न :- व्याकरण किस विधी से पढ़ी जाती है ?
उत्तर :- सबसे पहले वर्णोच्चारण शिक्षा से उच्चारण शुद्ध किया जाता है और फिर अष्टाध्यायी सूत्रों को कंठस्थ करवाया जाता है और बुद्धि अनुसार बाकी के उपदेश धातुपाठ आदि कंठस्थ करवाकर अष्टाध्यायी की प्रथमावृत्ति पढ़ाई जाती है जिसमें सूत्रों के अर्थ से लेकर शब्द सिद्धी करी जाती है, प्रथमावृत्ति में लगभग 1 से 1.5 वर्ष लगता है । फिर शंका समाधान के साथ अष्टाध्यायी को दूसरी बार पढ़ना द्वितीयानुवृत्ति कहलाता है । द्वितीयानुवृत्ति में लगभग 8 से 10 मास लगते हैं । द्वितीयानुवृत्ति के बाद 1.5 से 2 वर्ष में महाभाष्य पढ़ा जाता है । तब व्याकरण पूर्ण होती है ।

प्रश्न :- व्याकरण पढ़ने से क्या होता है ?
उत्तर :- मनुष्य की बुद्धि तीव्र हो जाती है, खरबों शब्दों या अनंत शब्दों के शब्दकोष का वह स्वामी हो जाता है, समस्त शास्त्रों पर उसका अधिकार हो जाता है, वेदार्थ करने में गति हो जाति है, उसकी जीह्वा शुद्धता और वह व्यवहार कुशल हो जाता है, निरुक्त शास्त्र पढ़ने का वह अधिकारी हो जाता है ऐसे ही कई लाभ होते हैं ।

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राजा महाराणा प्रताप


१८ जून १५७६ में मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इस लड़ाई में न अकबर जीता और न महाराणा प्रताप हारे। कई दौर में यह युद्ध चला। कहा जाता है कि, इस युद्ध में महाराणा प्रताप की वीरता और युद्ध-कौशल को देखकर अकबर दंग रह गया था। बहुत ही कम सैनिकों के बल पर महाराणा प्रताप ने अकबर की सेना से जबरदस्त मुकाबला किया था। यह युद्ध भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्धों में गिना जाता है।

हल्दीघाटी का कण-कण कहता है बलिदान की कहानी

हल्दीघाट
हल्दीघाटी का कण-कण प्रताप की सेना के शौर्य, पराक्रम और बलिदानों की कहानी कहता है। रणभूमि की कसौटी पर राजपूतों के कर्तव्य और वीरता के जज्बे की परख हुई थी। मेवाड़ के राजा राणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के पुत्र महाराणा प्रताप सिसोदिया वंश के अकेले ऐसे राजपूत राजा थे जिन्होंने अकबर की आधीनता अस्वीकार करने का साहस दिखाया था और जब तक जीवित रहे अकबर को चैन से नहीं रहने दिया।

हल्दी घाटी के पास हुआ गुरिल्ला युद्ध

अकबर की फौज के पास उस दौर के हर आधुनिक हथियार थे। इधर, महाराणा प्रताप की सेना संख्या में कम थी और उनके पास घोड़ों की संख्या ज्यादा थी। अकबर की सेना गोकुंडा तक पहुंचने की तैयारी में थी। हल्दीघाटी के पास ही खुले में उसने अपने खेमे लगाए थे। महाराणा प्रताप की सेना ने गुरिल्ला पद्धति से युद्ध करके अकबर की सेना में भगदड़ मचा दी। अकबर की बड़ी सेना लगभग पांच किलोमीटर पीछे हट गई। जहां खुले मैदान में महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच पांच घंटे तक भयंकर युद्ध हुआ।

मारे गए १८ हजार सैनिक

इस युद्ध में लगभग १८ हजार सैनिक मारे गए। इतना खून बहा कि इस जगह का नाम ही रक्त तलाई पड़ गया। महाराणा प्रताप के खिलाफ इस युद्ध में अकबर की सेना का नेतृत्व सेनापति मानसिंह कर रहे थे। जो हाथी पर सवार थे। महाराणा अपने वीर घोड़े चेतक पर सवार होकर रणभूमि में आए थे, कहा जाता है कि यह घोड़ा बहुत तेज दौड़ता था।

घोड़े के सिर पर बांधा गया था हाथी की मुखौटा

मुगल सेना में हाथियों की संख्या ज़्यादा होने के कारण चेतक (घोड़े) के सिर पर हाथी का मुखौटा बांधा गया था ताकि हाथियों को भरमाया जा सके। कहा जाता है कि चेतक पर सवार महाराणा प्रताप एक के बाद एक दुश्मनों का सफाया करते हुए सेनापति मानसिंह के हाथी के सामने पहुंच गए थे। उस हाथी की सूंड़ में तलवार बंधी थी। महाराणा ने चेतक को एड़ लगाई और वो सीधा मानसिंह के हाथी के मस्तक पर चढ़ गया। मानसिंह हौदे में छिप गया और राणा के वार से महावत मारा गया। हाथी से उतरते समय चेतक का एक पैर हाथी की सूंड़ में बंधी तलवार से कट गया।

जब दुश्मन से घिर गए थे महाराणा प्रताप

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की समाधि।
चेतक का पांव कटने के बाद महाराणा प्रताप दुश्मन की सेना से घिर गए थे। महाराणा को दुश्मनों से घिरता देख सादड़ी सरदार झाला माना सिंह उन तक पहुंच गए और उन्होंने राणा की पगड़ी और छत्र जबरन पहन लिए। उन्होंने महाराणा से कहा कि एक झाला के मरने से कुछ नहीं होगा। अगर आप बच गए तो कई और झाला तैयार हो जाएंगे। राणा का छत्र और पगड़ी पहने झाला को ही राणा समझकर मुगल सेना उनसे भिड़ गई और महाराणा प्रताप बच कर निकल गए। झाला मान वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वजह से महाराणा जिंदा रहे।

कटे पैर से महाराणा को सुरक्षित ले गया चेतक

महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक अपना एक पैर कटा होने के बावजूद महाराणा को सुरक्षित स्थान पर लाने के लिए बिना रुके पांच किलोमीटर तक दौड़ा। यहां तक कि उसने रास्ते में पड़ने वाले 100 मीटर के बरसाती नाले को भी एक छलांग में पार कर लिया। राणा को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के बाद ही चेतक ने अपने प्राण छोड़े। जहां चेतक ने प्राण छोड़े वहां चेतक की समाधि है। युद्ध में विजय भले ही किसी को न मिली हो लेकिन इतिहास में नाम अमर हुआ महाराणा प्रताप की वीरता, चेतक की स्वामिभक्ति और झालामान के बलिदान का।