Posted in કવિતા - कविता - Kavita

बचपन


Kavi Bhole Prasad Nema

मैने बचपन की यादों का,एक झरौंखा देख लिया।
बच्चे के संग बच्चा बनकर,फिर से बचपन देख लिया॥
,
उसकी तुतलाहट ने मेरे शब्दों को कई अर्थ दिए
उसके नये प्रयासों ने,मेरे अनुभव कई व्यर्थ किए
,
छुपा छिपाई खेल खेलकर,फिर से छुटपन देख लिया।
बच्चे के संग बच्चा बनकर, फिर से बचपन देख लिया॥
,
डिब्बों के खाली ढक्कन में, चाय पिलाई थी उसने
माचिस के खाली खोखे में,खीर खिलाई थी उसने
,
उसके संग छप्पन भोगों को,पल में चखकर देख लिया।
बच्चे के संग बच्चा बनकर, फिर से बचपन देख लिया॥
,
कागज के राकेट में उसने,मुझे घुमाया चंदा तक
उसके भोले मोल भाव ने,मुझे सिखाया धंधा तक
,
उसके आगे-पीछे होकर, मैने मधुवन देख लिया।
बच्चे के संग बच्चा बनकर,फिर से बचपन देख लिया॥
, स्वरचित
भोले प्रसाद नेमा
चंचल
हर्रई जागीर छिंदवाड़ा

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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