Posted in संस्कृत साहित्य

चार आश्रम


आश्रम-व्यवस्था

http://www.missionvishwamaryam.com/aashramsystem/

9ashramvyvastha-2
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ये चार आश्रम कहलाते हैं। श्रम से जीवन को सफल बनाने के कारण आश्रम कहा जाता है।
१) ब्रह्मचर्य-आश्रम (सुशिक्षा और सत्यविद्यादि गुणों को ग्रहण करने के लिए)
२) गृहस्थ-आश्रम (उत्तम गुणों के आचरण और श्रेष्ठ पदार्थों की उन्नति से सन्तानों की उत्पत्ति और सुशिक्षा)
३) वानप्रस्थ-आश्रम (ब्रह्म-उपासना, एकान्त-सेवन, विद्याफल विचार आदि कार्यों के लिए)
४) संन्यास-आश्रम (परब्रह्म, मोक्ष, परमानन्द को प्राप्त होने के लिए)
धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चार पदार्थों की प्राप्ति के लिए इन चार आश्रमों का सेवन करना सब मनुष्यों को उचित है। इनमें से प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम जो की सब आश्रमों का मूल है, उसके ठीक-ठीक सुधरने से सब आश्रम सुगम होते और बिगडने से सब आश्रम नष्ट हो जाते हैं।

ब्रह्मचर्य-आश्रम:
आचार्य सुश्रुत के अनुसार, २५ वर्ष आयु के पुरुष के समतुल्य १६ वर्षीया कन्या होती है। इस आयु में दोनों का शारीरिक और मानसिक विकास समतुल्य होता है। – (सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान १.३५.१३)

ब्रह्मचर्य ३ प्रकार का होता है:
१) कनिष्ठ – जिस प्रकार २४ अक्षरों का गायत्री छन्द होता है, उसी प्रकार २४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले पुरुष को वसु ब्रह्मचारी कहते हैं। कन्याओं का १६ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदादि विद्या और सुशिक्षा का ग्रहण करे, तो उसके शरीर में प्राण बलवान् होकर सब शुभगुणों के वास कराने वाले होते हैं।
२) मध्यम – जिस प्रकार ४४ अक्षरों का त्रिष्टुप छन्द होता है, उसी प्रकार ४४ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले पुरुष को रूद्र ब्रह्मचारी कहते हैं। कन्याओं का २२ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाभ्यास करता है, उसके प्राण, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और आत्मा बलयुक्त होके सब दुष्टों को रुलाने वाले और श्रेष्ठों का पालन करने वाले होते हैं।
३) उत्तम – जिस प्रकार ४८ अक्षरों का जगती छन्द होता है, उसी प्रकार ४८ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले पुरुष को आदित्य ब्रह्मचारी कहते हैं। कन्याओं का २४ वर्ष पर्यन्त। जो इतने समय तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाभ्यास करता है, उसके प्राण, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण अनुकूल होकर आत्मा सकल विद्याओं से युक्त हो जाता है।
२४ वर्ष आयु की समाप्ति से पूर्व पुरुष को और १६ वर्ष आयु से पूर्व कन्या को विवाह नहीं करना चाहिए। ४८ वर्ष आयु के पश्चात् पुरुष को और २४ वर्ष की आयु के पश्चात् कन्या को ब्रह्मचर्य नहीं रखना चाहिए। किन्तु यह नियम विवाह करने वाले पुरुष और कन्याओं का है, और जो विवाह करना ही न चाहें वे मरणपर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकते हों, तो भले ही रहे, परन्तु यह सामर्थ्य पूर्ण विद्या वाले जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी स्त्री-पुरुषों का है।

ब्रह्मचर्य-आश्रम के वेदों में अनेक प्रमाण हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः। तं रात्रीस्त्रिस्र उदरे बिभर्त्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवा: ।।३।।
इयं समित्पृथिवी द्यौरद्वितियोतान्तरिक्षम् समिधा पृणाति। ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्त्ति।।४।।
पूर्वो जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी घर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत्। तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम् ।।५।।
– अथर्ववेद काण्ड-११, अनुवाक-३, वर्ग-५, मन्त्र-३,४,५
अर्थात् जो गर्भ में बसके माता और पिता के सम्बन्ध से मनुष्य का जन्म होता है, वह प्रथम जन्म कहाता है। और दूसरा वह की जिसमें आचार्य पिता और विद्या माता होती है, इस दूसरे जन्म के न होने से मनुष्य को मनुष्यपन प्राप्त नहीं होता। इसीलिए उसको प्राप्त होना मनुष्यों को अवश्य चाहिए। जब आठवें वर्ष गुरुकुल में जाकर आचार्य के समीप रहते हैं, तभी से उनका नाम ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी हो जाता है। क्योंकि वे ब्रह्म (वेद और परमात्मा) के विचार में तत्पर रहते हैं। उनको आचार्य तीन रात्रि पर्यन्त गर्भ में रखता है, अर्थात् ईश्वर की उपासना, धर्म, परस्पर विद्या के पढने और विचारने की युक्ति आदि जो मुख्य-मुख्य बातें हैं, वे सब तीन दिन में उनको सिखाई जाती हैं। तीन दिन के उपरान्त उनको देखने के लिए अध्यापक अर्थात् विद्वान् लोग आते हैं।।३।।
फिर उस दिन होम करके उनको प्रतिज्ञा कराते हैं, की जो ब्रह्मचारी पृथिवी, सूर्य और अन्तरिक्ष इन तीनों प्रकार की विद्याओं को पालन और पूर्ण करने की इच्छा करता है, सो इन समिधाओं से पुरुषार्थ करके सब लोकों को धर्मानुष्ठान से पूर्ण आनन्दित कर देता है।।४।।
जो ब्रह्मचारी पूर्व वेदानुकूल आचरण करके ब्राह्मण होता है, वह धर्मानुष्ठान से अत्यन्त पुरुषार्थी होकर सब मनुष्यों का कल्याण करता है, फिर उस पूर्ण विद्वान् ब्राह्मण को, जो की अमृत अर्थात् परमेश्वर की पूर्ण भक्ति और धर्मानुष्ठान से युक्त होता है, उसे देखने के लिए सब विद्वान आते हैं।।५।।

ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णम् वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रु:।
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरम् समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत् ।।६।।
ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिम् परमेष्ठिनं विराजम्।
गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह ।।७।।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति । आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते ।।१७।।
ब्रह्मचर्येण कन्या३ युवानं विन्दते पतिम् । अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीषति ।।१८।।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत । इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व१राभरत् ।।१९।।
– अथर्ववेद काण्ड- ११, अनुवाक- ३ मन्त्र- ६, ७, १७, १८, १९

जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बडे-बडे केश-श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है । तथा जो की शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतरकर उत्तर-समुद्रस्वरुप गृहाश्रम को प्राप्त होता है, और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढाता है।।६।।

वह ब्रह्मचारी वेद-विद्या को यथार्थ जानकर प्राण-विद्या, लोक-विद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो की सबसे बडा और सबका प्रकाशक है, उसका जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्यरूप होके असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है।।७।।

पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढके और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उसको कहते हैं, जो की असत्याचार छुडाकर, सत्याचार का और अनर्थों को छुडाके, अर्थों का ग्रहण कराके, ज्ञान को बढा देता है।।१७।।

जब वह कन्या ब्रह्मचर्याश्रम से पूर्ण विद्या पढ चुके, तब अपनी युवावस्था में, पूर्ण जवान पुरुष को अपना पति करे। इसी प्रकार, पुरुष भी सुशील धर्मात्मा स्त्री के साथ प्रसन्नता से विवाह करके, दोनों परस्पर सुख-दुःख में सहायकारी हों। क्योंकि अनड्वान् अर्थात् पशु भी जो पूरी जवानी पर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात् सुनियम में रखा जाए तो अत्यन्त बलवान होके निर्बल जीवों को जीत लेता है।।१८।।

ब्रह्मचर्य और धर्मानुष्ठान से ही विद्वान् लोग जन्म-मरण को जीतकर मोक्षसुख को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे इन्द्र अर्थात् सूर्य, परमेश्वर के नियम में स्थित होके, सब लोकों का प्रकाश करने वाला हुआ है, वैसे ही मनुष्य का आत्मा ब्रह्मचर्य से प्रकाशित होके सबको प्रकाशित कर देता है।।१९।।

बिना ब्रह्मचर्य के किसी को भी यथायोग्य विद्या की प्राप्ति नहीं होती। ब्रह्मचर्याश्रम ही सभी आश्रमों का मूल है। ब्रह्मचर्य के अनुष्ठान से ही गृहाश्रम आदि तीनों आश्रमों में सुख होता है, अन्यथा मूल के अभाव में शाखा कैसे होगी?
किन्तु यदि मूल रूपी ब्रह्मचर्य दृढ है, तभी वृक्षरूपी मनुष्य-जीवन शाखा, फल, छाया आदि सुखों से युक्त होता है।

गृहस्थ-आश्रम:- आश्रम-व्यवस्था में गृहस्थाश्रम का क्रमानुसार दूसरा स्थान है। गृहस्थाश्रम में पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए और अपने सन्तान के लिए त्याग करते हैं। गृहस्थाश्रम तपश्चर्या का आश्रम है। इसमें सम्बन्धों की स्थापना होती है।
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्। अविलुप्त ब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रमाविशेत् ।। मनुस्मृति अध्याय-३, श्लोक-२
जब यथावत् ब्रह्मचर्य आचार्यानुकूल वर्त्तकर, धर्म से चारों, तीन वा दो, अथवा एक वेद को सांगोपांग पढके जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित न हुआ हो, वह पुरुष वा स्त्री गृहाश्रम में प्रवेश करे।

वेदों में गृहस्थाश्रम का प्रमाण:
युवा॑ सु॒वासा॒: परि॑वीत॒ आगा॒त्स उ॒ श्रेया॑न्भवति॒ जाय॑मानः । तं धीरा॑सः क॒वय॒ उन्न॑यन्ति स्वा॒ध्यो॒३॒॑ मन॑सा देव॒यन्त॑: ॥
—ऋ॰ 3.8.4॥
जो पुरुष (परिवीतः) सब ओर से यज्ञोपवीत, ब्रह्मचर्य सेवन से उत्तम शिक्षा और विद्या से युक्त (सुवासाः) सुन्दर वस्त्र धारण किया हुआ ब्रह्मचर्ययुक्त (युवा) पूर्ण ज्वान होके विद्याग्रहण कर गृहाश्रम में (आगात्) आता है ( स उ) वही दूसरे विद्याजन्म में (जायमानः) प्रसिद्ध होकर (श्रेयान्) अतिशय शोभायुक्त मङ्गलकारी (भवति) होता है (स्वाध्यः) अच्छे प्रकार ध्यानयुक्त (मनसा) विज्ञान से (देवयन्तः) विद्यावृद्धि की कामनायुक्त (धीरासः) धैर्ययुक्त (कवयः) विद्वान् लोग (तम्) उसी पुरुष को (उन्नयन्ति) उन्नतिशील करके प्रतिष्ठित करते हैं और जो ब्रह्मचर्यधारण, विद्या, उत्तम शिक्षा का ग्रहण किये विना अथवा बाल्यावस्था में विवाह करते हैं वे स्त्री पुरुष नष्ट भ्रष्ट होकर विद्वानों में प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होते॥
आ धे॒नवो॑ धुनयन्ता॒मशि॑श्वीः सब॒र्दुघा॑: शश॒या अप्र॑दुग्धाः । नव्या॑नव्या युव॒तयो॒ भव॑न्तीर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म् ॥
—ऋ॰ मं॰ 3। सू॰ 55। मं॰ 16॥
जो (अप्रदुग्धाः) किसी से दुही न हो उन (धेनवः) गौओं के समान (अशिश्वीः) बाल्यावस्था से रहित (सबर्दुघाः) सब प्रकार के उत्तम व्यवहारों का पूर्ण करनेहारी (शशयाः) कुमारावस्था को उल्लंघन करने हारी (नव्यानव्याः) नवीन-नवीन शिक्षा और अवस्था से पूर्ण (भवन्तीः) वर्त्तमान (युवतयः) पूर्ण युवावस्थास्थ स्त्रियां (देवानाम्) ब्रह्मचर्य, सुनियमों से पूर्ण विद्वानों के (एकम्) अद्वितीय (महत्) बड़े (असुरत्वम्) प्रज्ञा शास्त्रशिक्षायुक्त प्रज्ञा में रमण के भावार्थ को प्राप्त होती हुई तरुण पतियों को प्राप्त होके (आधुनयन्ताम्) गर्भ धारण करे कभी भूल के भी बाल्यावस्था में पुरुष का मन से भी ध्यान न करें क्योंकि यही कर्म इस लोक और परलोक के सुख का साधन है। बाल्यावस्था में विवाह से जितना पुरुष का नाश उस से अधिक स्त्री का नाश होता है॥

सुमंगली प्रतरणी गृहाणाम् सुशेवा पत्ये श्वशुराय शम्भू: । स्योना श्वश्रवै प्र गृहान् विशेमान्।। – अथर्ववेद १४.२.२६
अर्थात् अच्छे मंगलाचरण करने तथा दोष और शोकादि से पृथक रहने वाली, गृहकार्यों में चतुर और तत्पर रहकर, उत्तम सुखयुक्त होके पति, श्वसुर और सासु के लिए, सुखकर्त्री और स्वयं प्रसन्न हुई इस घर में सुखपूर्वक प्रवेश कर।
गृहस्थाश्रम में प्रवेश:
(सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान १०-४६, ४८) में लिखा है:-
“सोलह वर्ष से कम आयु वाली स्त्री में पच्चीस वर्ष से न्युन आयु वाला पुरुष जो गर्भ का स्थापन करे तो वह कुक्षिस्थ हुआ गर्भ विपत्ति को प्राप्त होता है, अर्थात् पूर्णकाल तक गर्भाशय में रहकर उत्पन्न नहीं होता, अथवा उत्पन्न हो तो फिर चिरकाल तक नहीं जीता। यदि जिये तो दुर्बलेन्द्रिय होता है।”
अतः विवाह बाल्यावस्था में नहीं होना चाहिए, युवावस्था में विवाह ठीक रहता है।

स संधार्य: प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता। सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियै: ।। – (मनु० ३/७९)
अर्थ- जो मोक्ष और संसार के सुख की इच्छा करता है, वह गृहस्थाश्रम को धारण करे। वह गृहस्थ निर्बल इन्द्रियवालों के द्वारा धारण करने के योग्य नहीं है।
काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि। न चैवेनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ।। – (मनु० ९/८९)
अर्थ- कन्या रजस्वला होने पर भी चाहे मृत्युपर्यन्त घर में अविवाहित बैठी रहे, परन्तु पिता कभी उसे गुणहीन युवक के साथ विवाहित न करे।
उपर्युक्त दोनों श्लोकों के अनुसार, विवाह से पहले युवक और युवती का स्वस्थ और सबलेन्द्रिय होना आवश्यक है। इसके साथ-साथ आजीविका के साधन से सम्पन्न होने के साथ ही दोनों का सदाचारी होना भी अत्यन्त आवश्यक है।
यथानदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् । तथैवाश्रमिण: सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ।। – (मनु० ३/६६)
यथावायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तव:। तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमा: ।। – (मनु० ३/७७)
यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्। गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ।। – (मनु० ३/७८)
अर्थात् जैसे नदी और बड़े-बड़े नद तब तक भ्रमते ही रहते हैं जब तक समुद्र को प्राप्त नहीं होते, वैसे गृहस्थ ही के आश्रय से सब आश्रम स्थिर रहते हैं।। जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का जीवन सिद्ध होता है,वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और क संन्यास आश्रमों का निर्वाह होता है। अर्थात् जिस प्रकार वायु के बिना प्राणियों का जीवन चल ही नहीं सकता,वैसे ही गृहस्थाश्रम के बिना उक्त तीनों आश्रम टिक ही नहीं सकते॥ जिस से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तीन आश्रमों को दान और अन्नादि देके प्रतिदिन गृहस्थ ही धारण करता है इससे गृहस्थ ज्येष्ठाश्रम है, अर्थात् सब व्यवहारों में धुरन्धर कहाता है॥
इसलिये जितना कुछ व्यवहार संसार में है उस का आधार गृहाश्रम है। जो यह गृहाश्रम न होता तो सन्तानोत्पत्ति के न होने से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम कहां से हो सकते? जो कोई गृहाश्रम की निन्दा करता है वही निन्दनीय है और जो प्रशंसा करता है वही प्रशंसनीय है। परन्तु तभी गृहाश्रम में सुख होता है जब स्त्री पुरुष दोनों परस्पर प्रसन्न, विद्वान्, पुरुषार्थी और सब प्रकार के व्यवहारों के ज्ञाता हों। इसलिये गृहाश्रम के सुख का मुख्य कारण ब्रह्मचर्य और पूर्वोक्त स्वयंवर विवाह है।

वानप्रस्थ आश्रम:- वानप्रस्थ का समय ५० वर्ष की आयु के उपरान्त है। यह विज्ञान बढाने और तपश्चर्या करने के लिए है। जब केश श्वेत होने लगे और पुत्र को भी सन्तान हो जाए तब अपनी स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, पुत्रवधू आदि को सब गृहाश्रम की शिक्षा करके वन की ओर यात्रा की तैयारी करें। यदि स्त्री चले तो साथ ले जावें, नहीं तो ज्येष्ठ पुत्र को सौंप जावे की इसकी सेवा यथावत् किया करना, और अपनी पत्नी को शिक्षा कर जावें की, तू सदा पुत्र आदि को धर्ममार्ग में चलने के लिए और अधर्म से हटाने के लिए शिक्षा करती रहना। सब इष्ट-मित्रों से मिल, पुत्रादिकों पर सब घर का दायित्व धरकर वानप्रस्थ आश्रम में जीवन का तृतीय भाग व्यतीत करना चाहिए।
आ नयैतमा रभस्व सुकृतां लोकमपि गच्छतु प्रजानन्। तीर्त्वा तमांसि बहुधा महान्त्यजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्।।
– अथर्ववेद काण्ड-९, सूक्त-५, मन्त्र-१
अर्थात् हे गृहस्थ! प्रकर्षता से जानता हुआ तू इस वानप्रस्थ आश्रम का आरम्भ कर। अपने मन को गृहाश्रम से इधर की ओर ला। पुण्यात्माओं के देखने योग्य वानप्रस्थाश्रम को भी प्राप्त हो। बहुत प्रकार के बडे-बडे अज्ञान दुःख आदि संसार के मोहों को तर के अर्थात् पृथक होकर, अपने आत्मा को अजर-अमर जान। तीसरे दुःखरहित वानप्रस्थ-आश्रम को रीति पूर्वक आरूढ होवो।
मनुस्मृति अध्याय-६ के अनुसार,
जंगल में वेदादि शास्त्रों को पढने-पढाने में नित्य-युक्त मन और इन्द्रियों को जीतकर यदि स्वस्त्री भी समीप हो, तथापि उससे सेवा के सिवाय विषय सेवन अर्थात् भोग-विलास कभी ना करें। सबसे मित्रभाव, सावधान, नित्य देनेवाला, और किसी से कुछ भी न लेवें। सब प्राणी पर अनुकम्पा रखने वाला होवे। जो जंगल में पढाने और योगाभ्यास करनेवाले तपस्वी धर्मात्मा विद्वान् लोग रहते हों, जो की गृहस्थ वा वानप्रस्थ वनवासी हों, उनके घरों में से भिक्षा ग्रहण करें। और इस प्रकार वन में वसता हुआ इन और अन्य दीक्षाओं का सेवन करें, और आत्मा तथा परमात्मा के ज्ञान के लिए नाना प्रकार के उपनिषद् अर्थात् ज्ञान और उपासना विधायक श्रुतियों के अर्थों का विचार किया करें, इसी प्रकार, जब तक संन्यास करने की इच्छा न हो, तब तक वानप्रस्थ ही रहें।
वानप्रस्थ आश्रम की न्यूनतम अवधि १२ वर्ष और अधिकतम २५ वर्ष है। – (संस्कार-विधि)
इस प्रकार, वानप्रस्थ आश्रम में अग्निहोत्र की सामग्री सहित जंगल में जाकर, एकान्त में निवासकर योगाभ्यास, शास्त्रों का विचार, महात्माओं का संग करके, स्वात्मा और परमात्मा को साक्षात् करने में प्रयत्नशील होना चाहिए।

संन्यास आश्रम:- जो मोहादि आवरण पक्षपात छोडकर, विरक्त होकर संसार में परोपकार्थ विचरण करना।
आयु का चौथा भाग अर्थात् ७० वर्ष के पश्चात् सब मोहादि संगों को छोडकर संन्यासी हो जावे।
– मनुस्मृति, संस्कार-विधि
संन्यास आश्रम में प्रवेश के ३ प्रकार:
१) ब्रह्मचर्य पूर्ण करके गृहस्थ, गृहस्थ होके वनस्थ, वनस्थ होके संन्यासी होवे अर्थात् अनुक्रम से आश्रमों का अनुष्ठान करते-करते, वृद्धावस्था में जो संन्यास लेना है, उसी को क्रम-संन्यास कहते हैं।
२) यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेद् वनाद् वा गृहाद् वा। – (ब्राह्मण-ग्रन्थ)
अर्थात् जिस दिन दृढ वैराग्य प्राप्त होवे उसी दिन, चाहे वानप्रस्थ का समय पूरा भी ना हुआ हो, अथवा वानप्रस्थ-आश्रम का अनुष्ठान न करके गृहाश्रम से ही संन्यास-आश्रम ग्रहण करें, क्योंकि संन्यास लेने में दृढ वैराग्य और यथार्थ ज्ञान का होना मुख्य कारण है।
३) ब्रह्मचर्या देव प्रव्रजेत् – (ब्राह्मण-ग्रन्थ) यदि पूर्ण अखण्डित ब्रह्मचर्य, सच्चा वैराग्य और पूर्ण ज्ञान-विज्ञान, को प्राप्त होकर विषयासक्ति की इच्छा आत्मा से यथावत् उठ जावे, पक्षपातरहित होकर सबके उपकार करने की इच्छा होवे, और जिसको दृढ निश्चय हो जावे की मैं मरण-पर्यन्त यथावत् संन्यास धर्म का निर्वाह कर सकूंगा, तो वह न गृहाश्रम करे, न वानप्रस्थ-आश्रम, किन्तु ब्रह्मचर्याश्रम को पूर्ण कर ही के संन्यासाश्रम को ग्रहण कर लेवे।

वेदों में संन्यास आश्रम के प्रमाण:
यद्दे॑वा॒ यत॑यो यथा॒ भुव॑ना॒न्यपि॑न्वत । अत्रा॑ समु॒द्र आ गू॒ळ्हमा सूर्य॑मजभर्तन ॥ – ऋग्वेद मण्डल-१०, सूक्त-७२, मन्त्र-७
हे पूर्ण विद्वान् संन्यासी लोगों! तुम जैसे इस आकाश में, गुप्त स्वयं प्रकाशस्वरुप सूर्यादि का प्रकाशक परमात्मा है, उसको चारों ओर से अपने आत्माओं में धारण करो, और आनन्दित होवो वैसे जो सब भुवनस्थ गृहस्थादि मनुष्य हैं, उनको सदा विद्या और उपदेश से संयुक्त किया करो, यही तुम्हारा परम धर्म है।
श॒र्य॒णाव॑ति॒ सोम॒मिन्द्र॑: पिबतु वृत्र॒हा । बलं॒ दधा॑न आ॒त्मनि॑ करि॒ष्यन्वी॒र्यं॑ म॒हदिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
आ प॑वस्व दिशां पत आर्जी॒कात्सो॑म मीढ्वः । ऋ॒त॒वा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्र॒द्धया॒ तप॑सा सु॒त इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
– ऋग्वेद मण्डल-९, सूक्त-११३, मन्त्र- १, २
(श॒र्य॒णाव॑ति॒ …) अर्थात् जैसे मेघ का नाश करने वाला सूर्य हिंसनीय पदार्थों से युक्त भूमितल में स्थित रस को पीता है, वैसे संन्यास लेने वाला पुरुष उत्तम मूल फलों के रस को पीवे और अपने आत्मा में, बडे सामर्थ्य को करूँगा, ऐसी इच्छा करता हुआ, दिव्य बल को धारण करता हुआ, परमैश्वर्य के लिए, हे चन्द्रमा के तुल्य सबको आनन्दित करने वाले पूर्ण विद्वान् तू संन्यास लेके सब पर सत्योपदेश की वृष्टि कर।।१।।
(आ प॑वस्व…) अर्थात् हे सोम्यगुणसम्पन्न ! सत्य से सबके अन्तःकरण को सींचने वाले, सब दिशाओं में स्थित मनुष्यों को सच्चा ज्ञान देकर पालन करने वाले, शम-दम आदि गुणयुक्त संन्यासिन् ! तू यथार्थ बोलने, सत्यभाषण करने से, सत्य के धारण में सच्ची प्रीति और प्राणायाम योगाभ्यास से, सरलता से, निष्पन्न होता हुआ, तू अपने शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि को पवित्र कर। परम-ऐश्वर्ययुक्त परमात्मा के लिए सब ओर से गमन कर ।।२।।

मनुस्मृति के अनुसार:
संन्यासी को चाहिए की शिर के बाल, दाढ़ी-मूँछ और नखों को समय-समय पर छेदन कराता रहे। कुसुम के रंगे हुए वस्त्रों, पात्र एवं दण्ड को धारण किया करे। संन्यासी को यज्ञोपवीत, शिखा का बन्धन नहीं रहता।
जो संन्यासी यथार्थ ज्ञान वा षटदर्शनों से युक्त है, वह दुष्ट कर्मों में बद्ध नहीं होता, और जो ज्ञान, विद्या, योगाभ्यास, सत्संग, धर्मानुष्ठान एवं षडदर्शनों से रहित विज्ञानहीन होकर संन्यास लेता है, वह संन्यास पदवी और मोक्ष को प्राप्त न होकर जन्म-मरण रूप संसार को प्राप्त होता है, और ऐसे मूर्ख अधर्मी को संन्यास का लेना व्यर्थ है, और धिक्कार देने योग्य है।
ऐसे तो मुख्यतः ब्राह्मण जो पूर्ण विद्वान् धार्मिक परोपकारप्रिय मनुष्य है, उसे ही संन्यास लेने का अधिकार है, क्योंकि बिना पूर्ण विद्या के धर्म, परमेश्वर की निष्ठा और वैराग्य के संन्यास ग्रहण करने में संसार का विशेष उपकार नहीं हो पाता। वैसे जो विद्वान्, वैराग्यवान, और परोपकारप्रिय द्विज (ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य) है, वह संन्यास ले सकता है।
जैसे शरीर में शिर की आवश्यकता है, वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है। क्योंकि इसके बिना विद्या, धर्म कभी नहीं बढ सकता और दूसरे आश्रमों को विद्याग्रहण, गृहकृत्य और तपश्चार्यादी का सम्बन्ध होने से अवकाश बहुत कम मिलता है। पक्षपात छोडकर वर्त्तना दूसरे आश्रमों को दुष्कर है। जैसे संन्यासी सर्वतोमुक्त होकर जगत् का उपकार करता है, वैसा अन्य आश्रम नहीं कर सकता। क्योंकि संन्यासी को सत्यविद्या से पदार्थों के विज्ञान की उन्नति का जितना अवकाश मिलता है, उतना अन्य आश्रम को नहीं मिल सकता। परन्तु जो ब्रह्मचर्य आश्रम से संन्यासी होकर जगत् को सत्यशिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है, उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके संन्यासाश्रमी नहीं कर सकता।

ये चारों आश्रम वेदों और युक्तियों से सिद्ध हैं, क्योंकि सब मनुष्यों को अपनी आयु का प्रथम भाग, विद्या पढने में, व्यतीत करना चाहिए, और पूर्णविद्या को पढकर उससे संसार की उन्नति करने के लिए गृहाश्रम भी अवश्य करें। तथा विद्या और संसार के उपकार के लिए एकान्त में बैठकर सब जगत् का अधिष्ठाता जो ईश्वर है, उसका ज्ञान अच्छी प्रकार करें, और मनुष्यों को सब व्यवहारों का उपदेश करें। फिर उनके सब सन्देहों का छेदन और सत्य बातों का निश्चय कराने के लिए संन्यास आश्रम भी अवश्य ग्रहण करें, क्योंकि इसके बिना सम्पूर्ण पक्षपात छूटना बहुत कठिन है।

Advertisements

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s